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एफसीआरए: विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम
प्रविष्टि तिथि:
22 JUL 2026 18:46 PM
पारदर्शिता, संप्रभुता और लोकतांत्रिक जवाबदेही
तेजी से परस्पर जुड़ते जा रहे विश्व में विदेशी अंशदान
वैश्वीकरण ने राष्ट्रीय सीमाओं के पार लोगों, विचारों, प्रौद्योगिकी और वित्तीय संसाधनों के आवागमन को बदल दिया है। अंतरराष्ट्रीय परोपकार और विकास साझेदारियां आज विश्वभर में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, आपदा राहत, वैज्ञानिक अनुसंधान, पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक विकास के क्षेत्रों में सहयोग प्रदान करती हैं। भारत को भी ऐसे सहयोगों से लाभ मिला है, जिसमें हजारों संगठनों को देश के सामाजिक और आर्थिक विकास में योगदान देने वाली गतिविधियों के लिए विदेशी अंशदान प्राप्त हुए हैं।
इन अवसरों के साथ-साथ, विश्वभर की सरकारें इस आवश्यकता के प्रति अधिक जागरूक हुई हैं कि सीमापार वित्तीय प्रवाह पारदर्शी और जवाबदेह बने रहें। वैश्विक वित्तीय नेटवर्कों, डिजिटल लेन-देन और अंतरराष्ट्रीय वित्तपोषण तंत्रों के तीव्र विस्तार ने वित्तीय पारदर्शिता, विदेशी प्रभाव और लोकतांत्रिक संस्थाओं की सुरक्षा से संबंधित नई शासन संबंधी चुनौतियां उत्पन्न की हैं। परिणामस्वरूप, विदेशी वित्तीय प्रवाह का विनियमन कई लोकतंत्रों में आधुनिक शासन की एक स्वीकृत विशेषता के रूप में उभरा है।
इसलिए विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) को इस व्यापक अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में समझा जाना चाहिए। यह अधिनियम वैध धर्मार्थ गतिविधियों को प्रतिबंधित करने के बजाय एक ऐसा कानूनी ढांचा प्रदान करता है, जो वास्तविक अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सक्षम बनाता है और यह सुनिश्चित करता है कि विदेशी अंशदान भारतीय कानून के अनुरूप प्राप्त किए जाएं, उनका उपयोग किया जाए और उनका लेखा-जोखा व जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) वह कानून है जो यह नियंत्रित करता है कि भारतीय व्यक्ति, संघ, गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ), ट्रस्ट और कंपनियां भारत से बाहर के किसी स्रोत से भेजे गए धन, प्रतिभूतियों या वस्तुओं को किस प्रकार प्राप्त और उपयोग कर सकते हैं। इसका प्रशासन गृह मंत्रालय द्वारा किया जाता है।
सरल शब्दों में, एफसीआरए तीन कार्य करता है:
- यह निर्धारित करता है कि कौन विदेशी अंशदान स्वीकार कर सकता है और किन शर्तों के तहत।
- यह निर्धारित करता है कि उस धन को किस प्रकार प्राप्त किया जाना चाहिए, उसका लेखा-जोखा कैसे रखा जाना चाहिए और उसकी जानकारी कैसे दी जानी चाहिए।
- यह विदेशी वित्तपोषित उन सीमित और स्पष्ट रूप से परिभाषित गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाता है, जो भारत की संप्रभुता, सुरक्षा या लोक व्यवस्था को प्रभावित कर सकती हैं।
एफसीआरए जो कार्य नहीं करता है, वह यह कि भारतीयों को विदेशी दान प्राप्त करने से रोकना या कानून का पालन करने वाले नागरिक समाज संगठनों को बंद करना। हजारों संघ वैध रूप से पंजीकृत हैं और नियमित रूप से स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा राहत, अनुसंधान तथा मानवीय कार्यों के लिए विदेशी धन प्राप्त करते हैं। इस कानून को उसी प्रकार समझा जाना चाहिए, जिस प्रकार संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा अपने-अपने समकक्ष कानूनों का वर्णन करते हैं: यह विदेशी निर्देशित गतिविधियों के लिए पंजीकरण और प्रकटीकरण व्यवस्था है — न कि नागरिक समाज के अस्तित्व की अनुमति देने वाली व्यवस्था।
मुख्य उद्देश्य
एफसीआरए स्पष्ट और सुसंगत सिद्धांतों के एक समूह पर आधारित है, जो 1976 से अब तक प्रत्येक संशोधन में अपरिवर्तित रहे हैं। ये सिद्धांत किसी भी जवाबदेह सरकार की अपने नागरिकों, संस्थानों और राष्ट्रीय हितों के प्रति जिम्मेदारियों को प्रतिबिंबित करते हैं।
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पारदर्शिता
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विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले प्रत्येक संगठन को सरकार के पास पंजीकरण कराना होता है, निर्धारित एवं सत्यापन योग्य बैंकिंग माध्यम से धन प्राप्त करना होता है तथा प्राप्त धनराशि, दाताओं और जिन उद्देश्यों के लिए धन का उपयोग किया गया, उनका विवरण प्रकट करना होता है।
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जवाबदेही
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प्राप्तकर्ताओं को प्रतिवर्ष ऑडिट की गई विवरणिका (रिटर्न) दाखिल करनी होती हैं। ये रिटर्न ऑनलाइन दाखिल की जाती हैं। दाताओं, प्राप्त धनराशि और उसके उपयोग का पूरा रिकॉर्ड रखा जाता है, जिससे विदेशी स्रोत से लेकर जमीनी स्तर पर की गई गतिविधि तक की पूरी श्रृंखला का पता लगाया जा सकता है।
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संप्रभुता
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भारत की संप्रभुता, लोकतांत्रिक संस्थाओं, निर्वाचन प्रक्रियाओं, लोक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकने वाले विदेशी अंशदानों का विनियमन किया जाता है। यह वैध धर्मार्थ कार्यों पर प्रतिबंध नहीं है। यह संप्रभु शासन की एक वैध पद्धति है।
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वैध कार्यों को सक्षम बनाना
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यह अधिनियम वैध अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बाधित करने के लिए नहीं, बल्कि उसे सुगम बनाने के लिए बनाया गया है। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, गरीबी उन्मूलन, आपदा राहत, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, वैज्ञानिक अनुसंधान और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्य इस व्यवस्था के अंतर्गत निर्बाध रूप से जारी रहते हैं।
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जन विश्वास
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जब नागरिकों को यह विश्वास होता है कि संगठनों को प्राप्त विदेशी वित्तपोषण का पंजीकरण किया गया है, उसका खुलासा किया गया है और उसका लेखापरीक्षण किया गया है, तो इससे स्वयं-सेवी क्षेत्र तथा उन संगठनों के प्रति विश्वास बढ़ता है। पारदर्शिता लाभार्थियों और दाताओं की मंशा, दोनों की रक्षा करती है।
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कानून का विकास: प्रतिबंध बढ़ाना नहीं, बल्कि पारदर्शिता को सुदृढ़ करना
विदेशी अंशदान के विनियमन हेतु भारत के ढांचे को पिछले पाँच दशकों में विभिन्न सरकारों द्वारा निरंतर परिष्कृत किया गया है। प्रत्येक सुधार का उद्देश्य एक ही दिशा में रहा है: अधिक प्रकटीकरण, मजबूत जवाबदेही और बेहतर शासन व्यवस्था। भारत ने विदेशी अंशदान की प्राप्ति और उसके उपयोग के विनियमन के लिए 1976 में पहला विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम लागू किया था। जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय सहभागिता बढ़ी और सीमापार वित्तीय प्रवाह अधिक जटिल होता गया, संसद ने 2010 में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम अधिनियमित किया, जिसने पूर्ववर्ती कानून का स्थान लेते हुए एक आधुनिक नियामक ढांचा स्थापित किया। इसके बाद 2016, 2018 और 2020 में किए गए संशोधनों के माध्यम से इस ढांचे को और सुदृढ़ किया गया, जबकि प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 तथा अधिसूचित एफसीआरए (संशोधन) नियम, 2026 का उद्देश्य पारदर्शिता, सुशासन और नियामक स्पष्टता को और बेहतर बनाना है।
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वर्ष
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विकास
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1976
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विदेशी अंशदान तथा आतिथ्य के उपयोग का विनियमन करने के लिए एफसीआरए अधिनियमित किया गया, जो एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य के मूल्यों के अनुरूप था।
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1984
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संशोधन के माध्यम से विदेशी धन प्राप्त करने वाले सभी गैर-सरकारी संगठनों के लिए गृह मंत्रालय में पंजीकरण अनिवार्य किया गया, न्यायाधीशों को अधिनियम के दायरे में लाया गया, “विदेशी अंशदान” और “राजनीतिक दल” की परिभाषाओं का विस्तार किया गया तथा लेखापरीक्षण संबंधी शक्तियाँ जोड़ी गईं।
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2010
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एफसीआरए, 2010 ने 1976 के अधिनियम का स्थान लेते हुए उसे समेकित किया और अधिक सुदृढ़ अनुपालन ढाँचा स्थापित किया। इसे 26 सितंबर 2010 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई। प्रमुख परिवर्तन: प्रत्येक पाँच वर्ष में पंजीकरण का अनिवार्य नवीनीकरण, पंजीकरण के लिए विस्तृत एवं कठोर शर्तें, पंजीकरण का निलंबन, निरस्तीकरण, परिसंपत्तियों का निहित होना तथा अपराधों का शमन।
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2011
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विदेशी अंशदान (विनियमन) नियम अधिसूचित किए गए, जिनके माध्यम से पंजीकरण, नामित बैंक खातों और प्रतिवेदन प्रारूपों को क्रियान्वित किया गया।
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2020
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प्रमुख संशोधन अधिनियम: पदाधिकारियों के लिए आधार/पासपोर्ट पहचान अनिवार्य की गई; विदेशी अंशदान केवल नई दिल्ली स्थित भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के एकल नामित खाते में प्राप्त करने का प्रावधान किया गया; अन्य संघों को उप-अनुदान (सब-ग्रांटिंग) देने पर प्रतिबंध लगाया गया; प्रशासनिक व्यय की सीमा 50% से घटाकर 20% कर दी गई; तथा पंजीकरण का नवीनीकरण सरकारी जांच के अधीन कर दिया गया।
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2022
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एफसीआरए नियमों में संशोधन: विदेश में रहने वाले रिश्तेदारों से प्राप्त अंशदान की सीमा ₹1 लाख से बढ़ाकर ₹10 लाख प्रति वर्ष कर दी गई, जिससे सामान्य परिवारों के लिए अनुपालन आसान हुआ; साथ ही कुछ अपराधों के शमन (कम्पाउंडिंग) से संबंधित प्रावधान भी जोड़े गए।
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2024–25
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नियमों में आगे संशोधन: प्रशासनिक व्यय के लिए आवंटित अप्रयुक्त राशि को आगे ले जाने की अनुमति दी गई; टीडीएस रिफंड के संबंध में प्रावधानों को स्पष्ट किया गया; तथा आवेदनों के शीघ्र निस्तारण के लिए आवेदन के चरण में आवश्यक दस्तावेज संबंधी प्रावधानों को सुदृढ़ किया गया।
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2026 (प्रस्तावित)
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प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 में यह प्रस्ताव किया गया है कि किसी पंजीकरण की अवधि समाप्त होने या उसके निरस्त होने की स्थिति में विदेशी वित्तपोषित परिसंपत्तियों की सुरक्षा के लिए एक नामित प्राधिकरण की व्यवस्था की जाए। अधिसूचित एफसीआरए (संशोधन) नियम, 2026 के तहत पंजीकरण को निर्दिष्ट उद्देश्यों तथा अनुमोदित राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों से जोड़ा गया है तथा अनुमत धार्मिक गतिविधियों के दायरे से धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से किए जाने वाले प्रचार-प्रसार (प्रोसिलिटाइजेशन) को बाहर रखा गया है।
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प्रत्येक संशोधन का उद्देश्य एक ही दिशा में रहा है—प्रकटीकरण और लेखा-जोखा व्यवस्था को अधिक सुदृढ़ बनाना, न कि वैध गतिविधियों पर नए प्रतिबंध लगाना। प्रतिबंधित गतिविधियों की श्रेणियाँ (संप्रभुता, सुरक्षा, लोक व्यवस्था या विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों पर प्रभाव डालने वाली गतिविधियाँ) 1976 से मूलतः अपरिवर्तित बनी हुई हैं।
भारत के दृष्टिकोण के पाँच आधार स्तंभ
- विदेशी वित्तीय प्रवाह का विनियमन करने का संप्रभु अधिकार। प्रत्येक संप्रभु राज्य को यह जानने तथा आवश्यकता पड़ने पर यह निर्धारित करने का मान्य अधिकार है कि उसकी सीमाओं के बाहर से आने वाला धन उसके घरेलू संस्थानों के माध्यम से किस प्रकार प्रवाहित होता है। भारत किसी असाधारण अधिकार का नहीं, बल्कि संप्रभुता से जुड़े एक सामान्य अधिकार का प्रयोग कर रहा है।
- पारदर्शिता और प्रकटीकरण का ढाँचा, न कि प्रतिबंध। एफसीआरए भारतीयों को विदेशी धर्मार्थ सहायता, अनुसंधान अनुदान या मानवीय सहायता प्राप्त करने से नहीं रोकता। यह केवल यह अपेक्षा करता है कि ऐसे अंशदानों का पंजीकरण किया जाए, उन्हें एक नामित बैंक खाते के माध्यम से प्राप्त किया जाए तथा उनकी जानकारी दी जाए। यही अनुपालन व्यवस्था कंपनी कानून, बैंकिंग विनियमन और राजनीतिक दलों के वित्तपोषण में भी अपनाई जाती है।
- लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिए विदेशी वित्तपोषण में पारदर्शिता आवश्यक है। यदि नीतियों, चुनावों या जनमत को प्रभावित करने के लिए प्राप्त विदेशी वित्तपोषण अदृश्य रहे, तो नागरिक, मीडिया और संसद किसी भी पक्ष को उसके लिए जवाबदेह नहीं ठहरा सकते। इसलिए प्रकटीकरण जवाबदेही के लिए एक पूर्वापेक्षा है, न कि उसके लिए कोई खतरा।
- विदेशी प्रभाव संचालन से जुड़ी राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताएँ आज विश्वव्यापी विषय हैं। विदेशी राज्यों द्वारा वकालत, लॉबिंग या राजनीतिक गतिविधियों के लिए गुप्त वित्तपोषण को आज पूरे लोकतांत्रिक विश्व में राष्ट्रीय सुरक्षा के अग्रणी मुद्दे के रूप में देखा जाता है, चाहे वह चुनावों में हस्तक्षेप हो या दुष्प्रचार अभियान।
- भारत का दृष्टिकोण वैश्विक रुझानों के अनुरूप है, उनसे अलग नहीं। जैसा कि अनुभाग 6 में दर्शाया गया है, जिन वर्षों में एफसीआरए को और सुदृढ़ किया गया, उसी अवधि में विश्व के प्रमुख लोकतंत्र भी विदेशी प्रभाव संबंधी पारदर्शिता कानूनों को कमजोर करने के बजाय उन्हें और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़े हैं।
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व्यवहार में एफसीआरए कैसे कार्य करता है
एफसीआरए भारत में विदेशी अंशदान प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले प्रत्येक संगठन के लिए एक स्पष्ट, नियम-आधारित प्रक्रिया निर्धारित करता है। यह प्रक्रिया पारदर्शी, ऑनलाइन और सभी पर समान रूप से लागू होती है।
- पंजीकरण एवं पूर्व अनुमति: विदेशी अंशदान प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले किसी संगठन को या तो एफसीआरए के तहत पंजीकरण प्राप्त करना होता है, जो कम-से-कम तीन वर्षों से कार्यरत संगठनों के लिए उपलब्ध है, अथवा किसी विशिष्ट परियोजना के लिए पूर्व अनुमति प्राप्त करनी होती है। दोनों ही प्रक्रियाओं में पहचान का सत्यापन, प्रस्तावित गतिविधियों का विवरण तथा पदाधिकारियों की जानकारी का प्रकटीकरण आवश्यक होता है।
- पूर्व अनुमति के तहत किस्तों में विदेशी अंशदान जारी: बड़ी राशि वाले विदेशी अंशदान को चरणबद्ध किस्तों में जारी किया जाएगा। अगली किस्त जारी किए जाने से पहले प्रत्येक किस्त की कम-से-कम 75% राशि का उपयोग किया जा चुका होना और उसका सत्यापन होना आवश्यक होगा।
- एकल, सत्यापन योग्य प्रवेश बिंदु: सभी विदेशी अंशदान सबसे पहले भारतीय स्टेट बैंक की नई दिल्ली मुख्य शाखा में स्थित एकल नामित एफसीआरए खाते में ही प्राप्त किए जाने चाहिए। इससे देश में आने वाले सभी विदेशी धन के लिए एक लेखापरीक्षण योग्य एकल प्रवेश बिंदु सुनिश्चित होता है। इस खाते से धनराशि को वैध कार्यक्रमगत उपयोग के लिए परिचालन खातों में स्थानांतरित किया जा सकता है, लेकिन उसका पूरा वित्तीय क्रम एक ही स्पष्ट रूप से पहचाने जा सकने वाले बिंदु से प्रारंभ होता है।
- घोषित उद्देश्य, प्रकट उपयोग: संगठनों को उन उद्देश्यों की घोषणा करनी होती है जिनके लिए वे विदेशी अंशदान प्राप्त कर रहे हैं। इसके बाद उन्हें उसी घोषित उद्देश्य के लिए धनराशि का उपयोग करना होता है। वार्षिक विदेशी अंशदान का अधिकतम 20% ही प्रशासनिक व्ययों पर खर्च किया जा सकता है। शेष 80% राशि उन गतिविधियों पर व्यय किया जाना चाहिए जिनके लिए यह वित्तपोषण प्राप्त हुआ है।
- वार्षिक लेखापरीक्षित प्रकटीकरण: प्रत्येक पंजीकृत संगठन को प्रपत्र एफसी-4 में वार्षिक विवरणी (रिटर्न) दाखिल करनी होती है, जिसमें प्राप्त विदेशी अंशदान का पूर्ण लेखापरीक्षित विवरण, दाताओं की पहचान, प्रत्येक दाता से प्राप्त धनराशि तथा धनराशि के उपयोग का विस्तृत ब्यौरा शामिल होता है। ये विवरणियां सरकार के ऑनलाइन एफसीआरए पोर्टल fcraonline.nic.in पर दाखिल की जाती हैं। इस प्रकार भारत का एफसीआरए भारतीय संगठनों को प्राप्त विदेशी अंशदान का प्रतिवर्ष अपडेट होने वाला एक व्यापक डेटाबेस तैयार करता है।
- पाँच वर्षीय पंजीकरण एवं नवीनीकरण समीक्षा: एफसीआरए के तहत जारी पंजीकरण प्रमाण-पत्र पाँच वर्षों के लिए वैध होते हैं और उनका नवीनीकरण कराना अनिवार्य होता है। नवीनीकरण से पहले सरकार प्रतिवेदन संबंधी आवश्यकताओं के अनुपालन की समीक्षा करती है तथा यह सत्यापित करती है कि संगठन घोषित उद्देश्यों के अनुरूप सक्रिय एवं कार्यरत है। यह एक मानक समीक्षा प्रक्रिया है, जिससे यह सुनिश्चित किया जाता है कि पंजीकरण व्यवस्था जमीनी स्तर की वास्तविक स्थिति को प्रतिबिंबित करती रहे। यदि वैधता अवधि समाप्त होने से पहले पंजीकरण का नवीनीकरण नहीं कराया जाता, तो उसकी वैधता स्वतः समाप्त हो जाती है।
- अपात्र श्रेणियों का एक सीमित और स्पष्ट रूप से परिभाषित दायरा: कुछ व्यक्तियों और संस्थाओं की एक छोटी एवं निश्चित सूची ऐसी है जिन्हें किसी भी परिस्थिति में विदेशी अंशदान प्राप्त करने की अनुमति नहीं है। यह सूची 1976 से मूलतः अपरिवर्तित बनी हुई है और इसमें चुनाव उम्मीदवार, विधायिकाओं के सदस्य, न्यायाधीश, सरकारी कर्मचारी, समाचार रिपोर्टिंग से जुड़े समाचारपत्रों के संपादक एवं प्रकाशक तथा राजनीतिक दल शामिल हैं। इसका आधार स्पष्ट है—ये श्रेणियाँ भारत की संवैधानिक संस्थाओं के प्रति विशेष उत्तरदायित्व निभाती हैं, इसलिए इनके द्वारा विदेशी धन प्राप्त करना विशेष संवेदनशीलता का विषय माना जाता है।
- विदेशी अंशदान से सृजित परिसंपत्तियों का निहित होना: आज भी, पंजीकरण के निरस्त होने, समर्पण (सरेण्डर) किए जाने या समाप्त होने की स्थिति में विदेशी अंशदान तथा उससे निर्मित परिसंपत्तियाँ एफसीआरए की धारा 15 के तहत निर्धारित राज्य सरकार के प्राधिकरण में निहित हो जाती हैं। यह प्रावधान वर्ष 2010 से प्रभावी है। पिछले एक दशक में लगभग 20,000 पंजीकरण निरस्त हुए हैं और लगभग 15,000 पंजीकरण स्वतः समाप्त माने गए हैं, जिसके परिणामस्वरूप विदेशी अंशदान तथा उससे निर्मित हजारों करोड़ रुपये मूल्य की परिसंपत्तियाँ अनिश्चित स्थिति में पड़ी हुई हैं। राज्यों का कहना है कि केवल धारा 15 के मौजूदा प्रावधानों के आधार पर वे इन परिसंपत्तियों का कब्ज़ा लेने, उनका रखरखाव करने या उनका प्रबंधन करने में सक्षम नहीं हैं।
विदेशी अंशदान का उपयोग किन उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है
एफसीआरए के तहत भारतीय समाज के लगभग प्रत्येक क्षेत्र से संबंधित अनेक प्रकार की गतिविधियाँ विदेशी अंशदान प्राप्त करने के लिए पात्र हैं। पंजीकृत संगठन निम्नलिखित सहित अनेक श्रेणियों की गतिविधियों के लिए विदेशी अंशदान प्राप्त कर सकते हैं और उसका उपयोग कर सकते हैं:
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क्षेत्र
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अनुमत गतिविधियों के उदाहरण
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शिक्षा
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विद्यालय, महाविद्यालय, व्यावसायिक प्रशिक्षण, छात्रवृत्ति सहायता, शैक्षिक अनुसंधान, पुस्तकालय, वयस्क साक्षरता कार्यक्रम
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स्वास्थ्य-रक्षा
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अस्पताल, क्लीनिक, मोबाइल स्वास्थ्य इकाइयाँ, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाएँ, सामुदायिक स्वास्थ्य शिक्षा, दिव्यांगता सहायता
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ग्रामीण विकास
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जलागम विकास, आजीविका सहायता, कृषि विस्तार सेवाएँ, स्वच्छता, स्वच्छ पेयजल उपलब्धता, आवास
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सामाजिक कल्याण
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दिव्यांगजन सहायता, वृद्धजन देखभाल, बाल कल्याण, महिला सशक्तिकरण, पुनर्वास कार्यक्रम
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पर्यावरण
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संरक्षण संबंधी पहलें, वनीकरण, स्वच्छ ऊर्जा, प्रदूषण नियंत्रण, वन्यजीव संरक्षण, पर्यावरणीय अनुसंधान
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संस्कृति एवं विरासत
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सांस्कृतिक विरासत, लोक कलाएँ, स्वदेशी ज्ञान, पारंपरिक शिल्प, संग्रहालय और अभिलेखागारों का संरक्षण
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राहत एवं पुनर्वास
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आपदा राहत, आपातकालीन प्रतिक्रिया, आपदा के बाद पुनर्वास, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन सहायता
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आस्था-आधारित कल्याण
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धार्मिक स्थलों का रखरखाव, धार्मिक शिक्षा, नैतिक शिक्षा, ध्यान कार्यक्रम, आस्था परंपराओं का संरक्षण
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वैज्ञानिक अनुसंधान
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अनुसंधान संस्थान, प्रयोगशालाएँ, शैक्षणिक गठजोड़, प्रकाशन और ज्ञान का प्रसार
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2026 का संशोधन: क्या जोड़ा गया है
विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया और वर्तमान में यह संसद के विचाराधीन है, जबकि संशोधित एफसीआरए नियम, 2026 को 22 जून 2026 को अधिसूचित किया गया और ये प्रभावी हैं। दोनों मिलकर उन विशिष्ट परिचालन संबंधी कमियों को दूर करते हैं जो वर्षों के दौरान अधिनियम के प्रशासन में सामने आई थीं। ये परिवर्तन प्रशासनिक और सुशासन पर केंद्रित हैं तथा 2010 से अस्तित्व में रहे इसी ढाँचे को आगे बढ़ाते हैं।
संशोधन विधेयक, 2026 — संसद में विचाराधीन
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नामित प्राधिकरण
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एक लंबे समय से विद्यमान कमी: एफसीआरए की धारा 15 के तहत विदेशी अंशदान से संबंधित परिसंपत्तियों का निहित होना 2010 से ही अस्तित्व में था, लेकिन अधिनियम में ऐसी परिसंपत्तियों का कब्ज़ा लेने, प्रबंधन करने या उनके निपटान के लिए कोई विस्तृत ढाँचा उपलब्ध नहीं था। 2026 का विधेयक इस प्रक्रिया को निर्धारित करता है।
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अस्थायी निहितीकरण
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जब पंजीकरण समाप्त हो जाता है, तो परिसंपत्तियाँ अस्थायी रूप से नामित प्राधिकरण में निहित हो जाती हैं। यदि संगठन अपना पंजीकरण पुनः बहाल कर लेता है, तो सभी परिसंपत्तियाँ और अप्रयुक्त धनराशि पूरी तरह वापस कर दी जाती हैं। (ऐसा ही एक प्रावधान 2010 से प्रभावी है। वर्तमान में व्यवहार में विदेशी अंशदान से संबंधित समस्त परिसंपत्तियों का निहित होना केवल अस्थायी होता है।)
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स्थायी निहितीकरण
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ऐसी स्थिति में, जब संगठन निर्धारित अवधि के भीतर अपना पंजीकरण पुनः बहाल नहीं करा पाता, केवल तभी परिसंपत्तियाँ स्थायी रूप से निहित होती हैं। इसके बाद भी उनका उपयोग लोक प्रयोजनों के लिए किया जाता है और बिक्री से प्राप्त राशि भारत की संचित निधि में जमा की जाती है। किसी भी सरकारी अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से कोई लाभ प्राप्त नहीं होता। (इसे इसलिए शामिल करना आवश्यक था क्योंकि अस्थायी निहितीकरण को अनिश्चित अवधि तक जारी रखना व्यावहारिक नहीं है।)
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धार्मिक स्थलों का संरक्षण
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कानून के तहत नामित प्राधिकरण के लिए किसी भी पूजा स्थल के धार्मिक स्वरूप को संरक्षित रखना स्पष्ट रूप से अनिवार्य है। वह किसी धार्मिक संस्थान का रूपांतरण, अन्य प्रयोजन के लिए उपयोग या धर्मनिरपेक्षीकरण नहीं कर सकता।
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पुनरीक्षण और न्यायिक अपील
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नामित प्राधिकरण के किसी आदेश से व्यथित कोई भी संगठन 90 दिनों के भीतर पुनरीक्षण के लिए आवेदन कर सकता है और उसे जिला न्यायाधीश के न्यायालय में अपील करने का अतिरिक्त अधिकार भी प्राप्त है। न्यायिक निगरानी की व्यवस्था स्पष्ट रूप से इसमें निहित है।
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स्वतः समाप्ति (प्रस्तावित धारा 14बी)
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यह स्पष्ट करता है कि यदि पंजीकरण की अवधि समाप्त होने से पहले उसका नवीनीकरण नहीं किया जाता है, तो पंजीकरण स्वतः समाप्त हो जाएगा। यह प्रमाण-पत्र की अवधि समाप्त होने के बाद संगठनों की कानूनी स्थिति को लेकर पहले से मौजूद प्रशासनिक अस्पष्टता को दूर करता है। (इस संशोधन से पहले भी मूल स्थिति यही थी और यह संशोधन केवल बेहतर स्पष्टता प्रदान करने के उद्देश्य से किया गया है।)
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तर्कसंगत बनाया गया दंड
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एफसीआरए के उल्लंघन के लिए अधिकतम कारावास की अवधि पाँच वर्ष से घटाकर एक वर्ष कर दी गई है। यह अनुपातिक और संतुलित प्रवर्तन नीति को दर्शाता है।
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समन्वित जांच
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एफसीआरए के तहत जांच शुरू करने से पहले राज्य सरकारों और उनकी एजेंसियों को केंद्र सरकार की अनुमति प्राप्त करनी होगी, जिससे केंद्रीय कानून के तहत समानांतर या परस्पर विरोधी कार्यवाहियों को रोका जा सके।
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संशोधित नियम, 2026 — अधिसूचित, प्रभावी
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गतिविधि एवं राज्य-विशिष्ट पंजीकरण
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पंजीकरण प्रमाणपत्र में अब सटीक उद्देश्य(यों) और संचालन वाले राज्य(यों)/केंद्र शासित प्रदेश(शों) का उल्लेख करना आवश्यक होगा, जिन्हें व्यापक श्रेणी के बजाय निर्धारित अनुसूची में से चुना जाएगा। मौजूदा संघों को यह सूचित करने के लिए एक वर्ष का समय दिया गया है कि वे किन उद्देश्यों/राज्यों को बनाए रखना चाहते हैं। यह व्यापक अनुमतियों के स्थान पर सटीक और निगरानी योग्य अनुमोदन व्यवस्था स्थापित करता है।
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आस्था-आधारित गतिविधियाँ
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अनुमत धार्मिक उद्देश्यों को अब नियमों में स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध किया गया है, जिससे सभी समुदायों के धार्मिक संगठनों को विदेशी वित्तपोषण के लिए पात्र गतिविधियों के संबंध में स्पष्टता प्राप्त होगी।
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नवीनीकरण के लिए न्यूनतम उपयोग
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एफसीआरए पंजीकरण का नवीनीकरण कराने वाले गैर-सरकारी संगठनों को यह दर्शाना करना होगा कि उन्होंने पिछले दो वर्षों की अवधि में कम से कम 10 लाख रुपये के विदेशी अंशदान का उपयोग किया है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि सक्रिय और कार्यरत संगठन ही वैध पंजीकरण बनाए रखें हुए हैं।
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उन्नत रिपोर्टिंग
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वार्षिक विवरणियों में अब परियोजना-वार और गतिविधि-वार उपयोग का विवरण, संगठन की वेबसाइट और सोशल मीडिया का प्रकटीकरण तथा मध्यस्थ माध्यमों से धन प्राप्त होने की स्थिति में भी अंतिम विदेशी दाता की पूर्ण पहचान शामिल होगी।
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भारत और विश्व: एक साझा वैश्विक पद्धति
विदेशी अंशदान और विदेशी प्रभाव का विनियमन केवल भारत का विशिष्ट दृष्टिकोण नहीं है। पिछले एक दशक में विश्व के प्रमुख लोकतंत्रों की सरकारों ने विदेशी वित्तपोषण, विदेशी लॉबिंग और विदेशी प्रभाव संबंधी गतिविधियों को नियंत्रित करने वाले ढाँचों को सुदृढ़ किया है। यह चिंता कि अनियंत्रित स्थिति में विदेशी धन लोकतांत्रिक संस्थाओं, चुनावी प्रक्रियाओं और सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित कर सकता है, वैश्विक स्तर पर मौज़ूद है और सरकारों ने इसके लिए विधायी उपाय किए हैं।
निम्नलिखित में तुलनीय लोकतंत्रों द्वारा विदेशी प्रभाव और विदेशी वित्तपोषण के विनियमन का तुलनात्मक अवलोकन प्रस्तुत किया गया है:
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देश / समूह (ब्लॉक)
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कानून एवं वर्ष
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इसके लिए क्या आवश्यक है
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प्रवर्तन
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संयुक्त राज्य अमेरिका
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विदेशी अभिकर्ता पंजीकरण अधिनियम (एफएआरए), 1938
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न्याय विभाग के समक्ष पंजीकरण और प्रकटीकरण—उन सभी व्यक्तियों के लिए जो किसी “विदेशी प्रधान” के निर्देश पर राजनीतिक गतिविधियों, लॉबिंग, जनसंपर्क या धन वितरण से संबंधित कार्य करते हैं; समय-समय पर सार्वजनिक विवरणियाँ दाखिल करना।
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आपराधिक एवं दीवानी दंड; अभिलेखों का निरीक्षण; हाल के वर्षों में इसके अधिक सख्ती से प्रवर्तन का निर्देश दिया गया है, कम नहीं।
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ऑस्ट्रेलिया
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विदेशी प्रभाव पारदर्शिता योजना अधिनियम, 2018
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किसी विदेशी प्रधान की ओर से राजनीतिक या सरकारी प्रभाव डालने के लिए की जाने वाली गतिविधियों या व्यवस्थाओं का पंजीकरण; पूर्व वरिष्ठ मंत्रियों के लिए आजीवन पंजीकरण दायित्व।
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पंजीकरण न कराने, मिथ्या जानकारी देने या अभिलेख नष्ट करने पर आपराधिक अपराध।
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यूनाइटेड किंगडम
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विदेशी प्रभाव पंजीकरण योजना, राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 2023 (1 जुलाई 2025 से प्रभावी)
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दो-स्तरीय पंजीकरण: किसी विदेशी शक्ति के साथ किसी भी “राजनीतिक प्रभाव” संबंधी व्यवस्था का पंजीकरण, तथा निर्दिष्ट देशों (वर्तमान में रूस और ईरान) के लिए अधिक कठोर “उन्नत स्तर”।
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अधिकतम 2 वर्ष का कारावास (राजनीतिक प्रभाव स्तर) अथवा 5 वर्ष (उन्नत स्तर)।
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कनाडा
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विदेशी प्रभाव पारदर्शिता एवं जवाबदेही अधिनियम, 2024
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संचार, धन वितरण या प्रसार के माध्यम से कनाडा की राजनीतिक या सरकारी प्रक्रियाओं को प्रभावित करने के लिए किसी “विदेशी प्रधान” के साथ की गई व्यवस्थाओं की सार्वजनिक रजिस्ट्री।
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अधिकतम 10 लाख कनाडाई डॉलर तक का प्रशासनिक दंड; गंभीर उल्लंघनों के लिए आपराधिक दंड।
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यूरोपीय संघ
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तृतीय देशों की ओर से हित-प्रतिनिधित्व में पारदर्शिता संबंधी प्रस्तावित निदेश (डिफेन्स ऑफ डेमोक्रेसी पैकेज, 2023–)
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गैर-यूरोपीय संघ सरकारों की ओर से की जाने वाली लॉबिंग या वकालत के लिए सभी 27 सदस्य देशों में राष्ट्रीय पारदर्शिता रजिस्टर।
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भारत
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विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 (1976 के अधिनियम पर आधारित)
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विदेशी अंशदान प्राप्त करने के लिए पंजीकरण या पूर्व अनुमति; एकल नामित बैंक खाता; वार्षिक प्रकटीकरण; प्राप्तकर्ताओं और गतिविधियों की एक निर्धारित सूची पर प्रतिबंध।
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उपयुक्त मामलों में निलंबन या पंजीकरण निरस्तीकरण तथा आपराधिक अभियोजन।
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उल्लेखनीय बात यह है कि इस पूरी सारणी में एक समान ढाँचा दिखाई देता है। घरेलू मामलों को प्रभावित करने के उद्देश्य से विदेशी वित्तपोषण प्राप्त करने पर पंजीकरण या प्रकटीकरण की अनिवार्यता। प्रत्येक देश सार्वजनिक अभिलेख बनाए रखता है। प्रत्येक में अनुपालन न करने पर दंड का प्रावधान है। प्रत्येक ने नई प्रशासनिक चुनौतियों के अनुरूप अपने ढाँचे को समय-समय पर विकसित किया है।
लोकतांत्रिक देश ऐसे मामलों में अधिक से अधिक पारदर्शिता की अपेक्षा करते हैं, जहाँ विदेशी धन, विदेशी निर्देश या विदेशी संस्थागत संबंध घरेलू सार्वजनिक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकते हों, और जानकारी छिपाने या अनुपालन न करने पर दंड का प्रावधान करते हैं।
भारत का एफसीआरए ऐसे वैश्विक नियामक ढाँचों की इस श्रेणी में सहज रूप से स्थित है। विदेशी प्रभाव से संबंधित ऐसे अनेक कानून हाल के वर्षों में बनाए गए हैं या उन्हें उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ किया गया है। अधिक पारदर्शिता की ओर, न कि उससे दूर, बढ़ने की यह प्रवृत्ति व्यापक लोकतांत्रिक सहमति को दर्शाती है।
वैश्विक सहमति
कनाडा के विदेशी प्रभाव पारदर्शिता एवं जवाबदेही अधिनियम, 2024 की प्रस्तावना में यह उल्लेख किया गया है कि "कनाडा तथा उसके सहयोगी देशों के बीच इस बात पर सहमति बढ़ रही है कि राज्य के कार्यों में विदेशी हस्तक्षेप को कम करने के लिए विदेशी प्रभाव रजिस्ट्रीज़ एक आवश्यक साधन हैं।" भारत 1976 से ही इसी प्रकार का एक तुलनीय नियामक ढाँचा बनाए हुए है।
वैश्विक रुझान सुदृढ़ता बढ़ाने की ओर है, घटाने की ओर नहीं
यदि कुछ स्पष्ट रूप से सामने आता है, तो वह यह है कि जिन वर्षों में एफसीआरए की आलोचना की गई, उन्हीं वर्षों के दौरान वैश्विक रुझान विदेशी प्रभाव के अधिक नियमन की ओर बढ़े हैं, न कि नियमन कम करने की ओर:
• यूनाइटेड किंगडम की व्यवस्था बिल्कुल नई है; यह केवल जुलाई 2025 से प्रभावी हुई है।
• कनाडा की रजिस्ट्री 2024 में कानून के माध्यम से स्थापित की गई और इसका कार्यान्वयन अभी भी जारी है।
• यूरोपीय संघ का प्रस्ताव यूरोबैरोमीटर सर्वेक्षण के बाद आया, जिसमें 81% यूरोपीय नागरिकों ने गुप्त विदेशी हस्तक्षेप को एक गंभीर समस्या बताया।
• कनाडा के अपने कानून की प्रस्तावना में यह उल्लेख किया गया है कि “कनाडा तथा उसके सहयोगी देशों के बीच इस बात पर सहमति बढ़ रही है कि संप्रभु राज्यों के कार्यों में विदेशी हस्तक्षेप को कम करने के लिए विदेशी प्रभाव रजिस्ट्री एक आवश्यक साधन हैं।”
• संयुक्त राज्य अमेरिका, जिसने इस व्यवस्था की मूल अवधारणा विकसित की थी, ने 2025 में संघीय एजेंसियों को निर्देश दिया कि वे अपने 87 वर्ष पुराने एफएआरए का प्रवर्तन पहले की तुलना में अधिक सख्ती से करें, कम नहीं।
इसी व्यापक संदर्भ में एफसीआरए पर चर्चा की जानी चाहिए—एक पृथक भारतीय अपवाद के रूप में नहीं, बल्कि उस तेज़ी से उभरती वैश्विक सहमति के एक हिस्से के रूप में, जिसके अनुसार लोकतांत्रिक देशों को यह जानना आवश्यक है कि उनके सार्वजनिक जीवन को प्रभावित करने के लिए वित्तपोषण कौन कर रहा है। इसलिए अधिक प्रासंगिक प्रश्न यह नहीं है कि “भारत विदेशी वित्तपोषण का विनियमन क्यों कर रहा है?”, बल्कि यह है कि “दुनिया भर के लोकतांत्रिक देश लगातार ऐसा क्यों कर रहे हैं, और इस संदर्भ में भारत का ढाँचा उनकी तुलना में कहाँ ठहरता है?”
मिथक बनाम तथ्य
एफसीआरए से जुड़े कुछ मिथक अधूरी जानकारी या कानून के कुछ ऐसे प्रावधानों से उत्पन्न होते हैं, जिनकी अक्सर उनके व्यापक संदर्भ में व्याख्या नहीं की जाती। नीचे सबसे अधिक प्रचलित मिथकों और उनसे संबंधित तथ्यों का उल्लेख किया गया है, जिसमें सीधे उन प्रावधानों का संदर्भ दिया गया है जो कानून में वास्तव में निहित हैं।
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मिथक
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तथ्य
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एफसीआरए गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) को विदेशी अंशदान प्राप्त करने से प्रतिबंधित करता है
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यह विदेशी अंशदान की प्राप्ति को पंजीकरण और प्रकटीकरण की शर्तों से जोड़ता है। यही व्यवस्था एफएआरए, एफआईटीएस, एफआईआरएस और एफआईटीएए जैसे कानूनों में भी अपनाई गई है, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कहीं भी “प्रतिबंध” नहीं कहा जाता। वर्ष 2024–25 में लगभग 16,200 संस्थाएँ सक्रिय रूप से पंजीकृत थीं और उन्होंने लगभग 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी अंशदान प्राप्त किया, जो किसी प्रतिबंधात्मक व्यवस्था का संकेत नहीं है।
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विदेशी वित्तपोषित नागरिक समाज के विनियमन के मामले में भारत एक अपवाद है
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संयुक्त राज्य अमेरिका (1938), ऑस्ट्रेलिया (2018), यूनाइटेड किंगडम (2025) और कनाडा (2024) सभी ने इसी प्रकार की व्यवस्थाएँ लागू की हैं; यूरोपीय संघ भी वर्तमान में ऐसी ही व्यवस्था को विधिक रूप देने की प्रक्रिया में है।
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एफसीआरए केवल गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और धार्मिक संगठनों पर ही लागू होता है
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तुलनीय वैश्विक कानून लॉबिस्ट, जनसंपर्क (पीआर) फर्म, थिंक टैंक, विश्वविद्यालय तथा कंपनियों सहित उन सभी संस्थाओं या व्यक्तियों पर लागू होते हैं, जो किसी विदेशी प्रधान के निर्देश पर कार्य करते हैं, चाहे वे किसी भी क्षेत्र से संबंधित हों।
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एफसीआरए विशेष रूप से किसी एक धर्म या समुदाय को लक्षित करता है
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यह अधिनियम धर्म, समुदाय या विचारधारा की परवाह किए बिना सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होता है। आस्था-आधारित कल्याणकारी गतिविधियाँ, जिनमें धार्मिक शिक्षा, उपासना स्थलों का रखरखाव तथा सभी धर्मों के संगठनों द्वारा किए जाने वाले परोपकारी कार्य शामिल हैं, विदेशी वित्तपोषण प्राप्त करने के लिए निरंतर पात्र बने हुए हैं।
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एफसीआरए के अंतर्गत पंजीकरण कराने से किसी संगठन की अनुमत गतिविधियाँ बदल जाती हैं
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यूनाइटेड किंगडम की सरकार अपनी समकक्ष व्यवस्था के बारे में स्पष्ट रूप से कहती है कि पंजीकरण के लिए गतिविधियों की पूर्व स्वीकृति आवश्यक नहीं है—केवल यह आवश्यक है कि वे पारदर्शी रूप से संचालित हों। यही सिद्धांत भारत के ढाँचे का भी आधार है।
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2026 के संशोधनों के तहत सरकार किसी एनजीओ की परिसंपत्तियाँ जब्त कर सकती है
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नामित प्राधिकरण केवल विदेशी अंशदान से सृजित परिसंपत्तियों का प्रबंधन करता है, और वह भी तभी जब किसी संगठन का पंजीकरण विधिसम्मत रूप से समाप्त हो चुका हो। परिसंपत्तियों का निहित होना प्रारंभ में अस्थायी होता है और पंजीकरण के नवीनीकरण पर उन्हें पूर्णतः वापस कर दिया जाता है। प्रत्येक स्थिति में उपासना स्थल विधि द्वारा अपने धार्मिक स्वरूप को बनाए रखते हैं। नामित प्राधिकरण के आदेश पुनरीक्षण तथा जिला न्यायाधीश की अदालत में अपील के अधीन होते हैं।
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एफसीआरए के अंतर्गत पंजीकृत संगठनों में विदेशी नागरिकों की प्रमुख भूमिकाओं पर अत्यधिक प्रतिबंध है
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यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि भारत में विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले संगठनों का संचालन ऐसे व्यक्तियों द्वारा किया जाए, जिनका भारत से सत्यापित संबंध हो। यह अधिनियम के उस मूल उद्देश्य के अनुरूप है, जिसके तहत घरेलू मामलों में अनुचित विदेशी प्रभाव को रोकना सुनिश्चित किया गया है।
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एफसीआरए पंजीकरण का निरस्तीकरण हमेशा यह दर्शाता है कि संगठन ने कोई गलत कार्य किया है
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यह ज़रूरी नहीं। अनेक पंजीकरण निरस्तीकरण और नवीनीकरण न होने के मामले केवल प्रशासनिक कारणों से होते हैं, जैसे वार्षिक विवरणियाँ दाखिल न करना, अवधि समाप्त होने से पहले नवीनीकरण न कराना या नामित बैंक खाते का अनुरक्षण न करना। किसी भी पंजीकरण निरस्तीकरण की न्यायिक समीक्षा करने का पूर्ण अधिकार न्यायालयों के पास बना रहता है।
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राज्य स्तर पर एफसीआरए जाँच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की स्वीकृति की आवश्यकता राज्यों की स्वायत्तता का अतिक्रमण है
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एफसीआरए विदेशी संबंधों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित एक केंद्रीय कानून है, जो संसद के विशिष्ट विधायी अधिकार-क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले विषय हैं। केंद्रीय कानून के अंतर्गत समानांतर या परस्पर विरोधी जाँचों को रोकने के लिए समन्वित स्वीकृति का प्रावधान किया गया है, जो अन्य केंद्रीय कानूनों में उपलब्ध समान प्रावधानों के अनुरूप है।
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एफसीआरए के अंतर्गत पंजीकृत संस्थाएँ भारत के नागरिक समाज के अधिकांश हिस्से का प्रतिनिधित्व करती हैं
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मंत्रालय के अनुमानों के अनुसार, एफसीआरए के अंतर्गत पंजीकृत संस्थाएँ भारत में कार्यरत सभी गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) का केवल एक छोटा-सा हिस्सा हैं। सक्रिय एफसीआरए डेटाबेस में लगभग 14,500 संस्थाएँ पंजीकृत हैं, जबकि देश में पंजीकृत एनजीओ की संख्या कई लाख है। अतः यह कानून व्यापक नागरिक समाज को नहीं, बल्कि विदेशी वित्तपोषण प्राप्त करने वाले एक विशिष्ट माध्यम को विनियमित करता है।
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पंजीकरण बनाए रखने के लिए न्यूनतम उपयोग की अनिवार्यता का कोई वास्तविक उद्देश्य नहीं है
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10 लाख रुपये के न्यूनतम उपयोग की अनिवार्यता यह सुनिश्चित करती है कि सक्रिय एफसीआरए पंजीकरण केवल वास्तव में कार्यरत संगठनों के पास ही बने रहें। इससे निष्क्रिय संस्थाओं को पंजीकरण बनाए रखते हुए बिना किसी घोषित गतिविधि के विदेशी अंशदान प्राप्त करने की वैधानिक पात्रता बनाए रखने से रोका जा सकेगा।
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पारदर्शी वैश्विक साझेदारियों के लिए एक रूपरेखा
विदेशी अंशदान शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, ग्रामीण कल्याण, पर्यावरण संरक्षण, आपदा राहत तथा अनेक अन्य क्षेत्रों में भारत के विकास को समर्थन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत वास्तविक अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों का स्वागत करता है और ऐसे अंशदानों को प्राप्त करने तथा उनका उपयोग करने के लिए सदैव एक वैधानिक ढाँचा उपलब्ध कराता रहा है।
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यही वैधानिक ढाँचा है। यह सुनिश्चित करता है कि भारत में आने वाला विदेशी धन पंजीकृत, जवाबदेह और प्रकट माध्यम से ही आए। यह संगठनों के लिए प्राप्त अंशदान तथा उसके उपयोग का लेखा-जोखा रखना अनिवार्य बनाता है। यह भारत की संवैधानिक संस्थाओं को अनियमित विदेशी वित्तीय प्रभाव के जोखिमों से संरक्षण प्रदान करता है। साथ ही, यह देश के प्रत्येक भाग में हजारों संगठनों को वैध एवं प्रभावी कार्य करने में सक्षम भी बनाता है।
2026 के संशोधनों का उद्देश्य इस ढाँचे को और अधिक परिष्कृत एवं सुदृढ़ बनाना है। ये परिचालन संबंधी कमियों को दूर करते हैं, स्पष्टता बढ़ाते हैं, न्यायिक पुनरीक्षण एवं अपील का प्रावधान करते हैं तथा दंड व्यवस्था को अधिक संतुलित बनाते हैं। विदेशी अंशदान (विनियमन) नियम, 2026 प्रभावी हैं और विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 संसद में विचाराधीन है। दोनों मिलकर उत्तरदायी शासन की उस विधायी परंपरा को आगे बढ़ाते हैं, जिसका इतिहास लगभग पाँच दशक पुराना है।
संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा तथा यूरोपीय संघ ने भी इसी प्रकार के नियामक ढाँचे अपनाए हैं। विदेशी वित्तपोषण में पारदर्शिता नागरिक समाज पर कोई प्रतिबंध नहीं है। यह उत्तरदायी, जवाबदेह और लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले शासन की पहचान है।
विदेशी वित्तपोषण में पारदर्शिता अच्छे कार्यों में बाधा नहीं है। बल्कि यही वह आधार है, जिस पर उन कार्यों के प्रति विश्वास पैदा होता है।
संदर्भ:
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(तथ्य सामग्री आईडी: 150794)
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