Economy
नीतिगत सुधार जिसने व्यावसायिक माहौल को बदल दिया
Posted On:
05 MAR 2026 11:44AM
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मुख्य बातें
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- भारत में व्यवसाय पंजीकरण 2020–21 में 1.55 लाख से बढ़कर 2025–26 में 1.98 लाख हो गए, जो लगभग 27 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है (3 फरवरी 2026 तक)।
- केंद्रीय बजट 2026–27 डिजिटल व्यापार सुगमता, कर-निश्चितता, नियमों और वाद-विवाद में कमी, विश्वास-आधारित सीमा शुल्क प्रणाली तथा निवेश-अनुकूल कर व्यवस्था जैसे विभिन्न प्रस्तावित उपायों के माध्यम से भारत में व्यवसाय करने में सुगमता संबंधी इकोसिस्टम को और सुदृढ़ कर रहा है।
- स्टार्ट-अप इंडिया, ऋण गारंटी योजना, डिजिटल ऋण मूल्यांकन मॉडल आदि जैसे संस्थागत सुधार एक पारदर्शी, प्रौद्योगिकी-सक्षम और निवेशक-अनुकूल इकोसिस्टम का निर्माण कर रहे हैं।
- समानांतर विनियामक सुधार जैसे जन विश्वास कानून, आईबीसी, एमएटी आदि क्षमता-निर्माण, विनियामक सामंजस्य तथा विश्वास और जवाबदेही पर आधारित शासन मॉडल को प्राथमिकता दे रहे हैं।
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भारत: एक उभरती वैश्विक व्यावसायिक महाशक्ति
पिछले कुछ वर्षों में भारत न केवल निवेश के लिए, बल्कि व्यवसाय करने के लिए भी सबसे आकर्षक गंतव्यों में से एक के रूप में उभरा है। करीब एक दशक से अधिक समय पहले, सरकार ने भारत में व्यवसाय करने को आसान बनाने के उद्देश्य से विनियामक सुधारों का एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम शुरू किया था।

व्यवसाय करने में सुगमता (ईओडीबी) संबंधी पहलों के शुभारंभ और व्यवसाय-हितैषी सुधारों की एक श्रृंखला के साथ, भारत ने अब दक्षता और अवसर के एक नए युग में प्रवेश किया है। देश - और उसके युवा निवेशकों का उर्जा से भरपूर समुदाय -अब इस परिवर्तित, विकासोन्मुखी इकोसिस्टम के लाभों को प्राप्त करने के लिए सक्षम और तत्पर है। भारत का उद्यम इकोसिस्टम सुदृढ़ हुआ है जिसका प्रमाण मात्र पांच वर्षों में सक्रिय पंजीकृत कंपनियों की संख्या में लगभग 27 प्रतिशत की वृद्धि से मिलता है। यह संख्या 2020–21 में 1.55 लाख से बढ़कर 2025–26 में 1.98 लाख हो गई (3 फरवरी 2026 तक)।
भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) का व्यावसायिक विश्वास सूचकांक वित्त वर्ष 2024–25 के दौरान और वित्त वर्ष 2025–26 की जुलाई से सितंबर (द्वितीय तिमाही) तक लगातार 100 के तटस्थ मानक से ऊपर बना हुआ है। यह भविष्य के उत्पादन, रोजगार और निवेश को लेकर सकारात्मक भाव का संकेत देता है। ये संकेतक सामूहिक रूप से उद्योग जगत की भावना की निरंतर सुदृढ़ता को पुष्ट करते हैं और ऐसे व्यावसायिक भाव को दर्शाते हैं, जहां कंपनियां मांग और विकास की संभावनाओं को लेकर आश्वस्त बनी हुई हैं।
व्यवसाय करने में सुगमता पर सरकार का रणनीतिक ध्यान
व्यवसाय करने में सुगमता (ईओडीबी) उद्यमिता, नवाचार और संपदा सृजन को प्रोत्साहित करने के मूलभूत आधार हैं। इसे ध्यान में रखते हुए, सरकार ने निवेश आकर्षित करने, उद्यमिता को प्रोत्साहन देने और आर्थिक विकास को गति प्रदान करने के उद्देश्य से “व्यावसायिक वातावरण में सुधार” को एक रणनीतिक प्राथमिकता बनाया है। विनियामक और विधायी संरचनाओं में सुधार, प्रक्रियाओं के सरलीकरण तथा अनावश्यक व्यवस्थाओं को समाप्त करके सरकार व्यवसायों के लिए एक अधिक पारदर्शी, कुशल और उम्मीद के मुताबिक इकोसिस्टम बनाना चाहती है।
आज व्यवसाय करने में सुगमता भारत के सुधार एजेंडा का एक केंद्रीय स्तंभ बन चुका है। केंद्रीय बजट 2026–27 इस दृष्टि को आगे बढ़ाते हुए डिजिटल व्यापार सुगमीकरण, कर-निश्चितता, नियमों और वाद-विवाद में कमी, विश्वास-आधारित सीमा शुल्क प्रणाली तथा निवेश-अनुकूल कर व्यवस्था को प्रोत्साहित करने वाले उपायों को सम्मिलित करता है। ये सतत सुधार निवेशकों के विश्वास को सुदृढ़ करते हैं और भारत की स्थिति को एक अधिक प्रतिस्पर्धी और व्यवसाय-तत्पर अर्थव्यवस्था के रूप में मजबूत बनाते हैं।.

भारत के व्यावसायिक इकोसिस्टम को सुदृढ़ करने वाले संस्थागत सुधार
भारत की सुधार-प्रेरित विकास रणनीति उद्यमिता को सुदृढ़ करने, वित्त तक पहुंच का विस्तार करने, विनियामक ढांचों का आधुनिकीकरण करने और व्यापार सुगमीकरण को सशक्त बनाने पर आधारित है। स्टार्टअप इंडिया, ऋण गारंटी योजनाओं, डिजिटल ऋण मूल्यांकन मॉडलों, बीमा क्षेत्र में व्यापक सुधारों तथा एकीकृत सीमा शुल्क प्रणालियों जैसी पहलों के माध्यम से सरकार एक अधिक पारदर्शी, प्रौद्योगिकी-सक्षम और निवेशक-अनुकूल इकोसिस्टम का निर्माण कर रही है।
ये सभी उपाय न केवल व्यवसाय करने में सुगमता (ईओडीबी) में सुधार करते हैं, बल्कि वित्तीय समावेशन को गहराई प्रदान करते हैं, नवाचार को प्रोत्साहित करते हैं, एमएसएमई के विकास को गति देते हैं और भारत को एक प्रतिस्पर्धी वैश्विक व्यापार एवं निवेश केंद्र के रूप में स्थापित करते हैं।.
स्टार्टअप इंडिया पहल के अंतर्गत, पात्र कंपनियां उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) से स्टार्टअप के रूप में मान्यता प्राप्त कर सकती हैं, जिससे उन्हें कर प्रोत्साहन, सरल अनुपालन प्रक्रियाओं, बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) के त्वरित निपटारे तथा अन्य विनियामक समर्थन सहित अनेक लाभ प्राप्त करने की सुविधा मिलती है। यह पहल एक सुदृढ़ और समावेशी स्टार्टअप इकोसिस्टम बनाने का प्रयास करती है, जो नवाचार को प्रोत्साहित करे, सतत आर्थिक विकास को गति दे और देशभर में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर उत्पन्न करे।
फरवरी 2026 तक 2.16 लाख से अधिक डीपीआईआईटी से मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स के साथ, भारत विश्व के सबसे बड़े स्टार्टअप इकोसिस्टम में से एक के रूप में सुदृढ़ स्थिति में है। वर्ष 2016 से प्रारंभ किए गए स्टार्टअप्स के लिए विनियामक सुधारों का उद्देश्य व्यवसाय करने में सुगमता को सुदृढ़ करना, पूंजी जुटाने की प्रक्रिया को सरल बनाना और स्टार्टअप इकोसिस्टम पर अनुपालन बोझ को कम करना है।
स्टार्टअप इंडिया से आगे बढ़ते हुए, अनेक पहलों ने तकनीकी नवाचार, ग्रामीण उद्यमिता, शैक्षणिक अनुसंधान और क्षेत्रीय समावेशन को प्रोत्साहित कर भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम को और सुदृढ़ किया है। ये पहलें सुनिश्चित करती हैं कि स्टार्टअप समर्थन व्यापक, विकेंद्रीकृत और राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं के साथ करीबी रूप से संबद्ध रहे।

ऋण गारंटी योजनाएं एमएसएमई और स्टार्टअप्स को बिना जमानत अथवा तृतीय-पक्ष गारंटी के ऋण उपलब्ध कराकर व्यवसाय करने में सुगमता (ईओडीबी) को सुदृढ़ करती हैं। ये योजनाएं ऋणदाताओं के लिए जोखिम को कम करती हैं, जिससे उद्यमियों के लिए वित्त तक पहुंच आसान होती है, नवाचार को प्रोत्साहन मिलता है और समग्र व्यावसायिक माहौल अधिक सरल और सुगम बनता है।
लक्षित योजनाएं:
- सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के लिए क्रेडिट गारंटी योजना (सीजीटीएमएसई): सूक्ष्म और लघु उद्यमों (एमएसई) को 10 करोड़ रुपये तक की ऋण सहायता के लिए ऋण गारंटी उपलब्ध कराती है।
- स्टार्टअप्स के लिए ऋण गारंटी योजना (सीजीएसएस): स्टार्टअप्स को ऋण गारंटी प्रदान कर समर्थन देती है; संशोधित संरचना के तहत गारंटी सुविधा को सुदृढ़ किया गया है, जिसमें प्रति पात्र उधारकर्ता के लिए अधिकतम सीमा 10 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 20 करोड़ रुपये कर दी गई है।
- निर्यातकों के लिए ऋण गारंटी योजना (सीजीएसई): प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष एमएसएमई निर्यातक को 20,000 करोड़ रुपये तक की अतिरिक्त जमानत-मुक्त ऋण सहायता उपलब्ध कराती है।
ऋण स्वीकृति प्रक्रिया को सुगम और तीव्र बनाकर ये योजनाएं पूंजी तक पहुंच से जुड़े समय और लागत को भी कम करने में सहायक होती हैं।
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) ने वर्ष 2025 में एमएसएमई के लिए डिजिटल फुटप्रिंट पर आधारित ऋण आकलन मॉडल (सीएएम) शुरू किया है। इस मॉडल का उद्देश्य डिजिटल रूप से प्राप्त और सत्यापन-योग्य डेटा का उपयोग कर एमएसएमई के लिए स्वचालित ऋण मूल्यांकन को सक्षम बनाना है, ताकि सभी ऋण आवेदनों के लिए वस्तुनिष्ठ निर्णय प्रक्रिया अपनाई जा सके तथा एमएसएमई के मौजूदा और नए बैंक दोनों प्रकार के उधारकर्ताओं के लिए मॉडल-आधारित ऋण सीमा का आकलन किया जा सके।
एमएसएमई के लिए व्यवसाय करने में सुगमता (ईओडीबी) में सुधार के साथ-साथ यह मॉडल ऋण गारंटी योजनाओं, जैसे सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए ऋण गारंटी कोष ट्रस्ट (सीजीटीएमएसई), के साथ भी एकीकृत है। 1 अप्रैल से 30 नवंबर 2025 की अवधि के दौरान, सीएएम के ऋण कार्यक्रमों के अंतर्गत सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा 3.2 लाख करोड़ रुपये से अधिक एमएसएमई ऋण आवेदन मिले हैं। इसमें 41.5 हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि को स्वीकृति प्रदान की गई है।
सबका बीमा, सबकी रक्षा (बीमा संशोधन कानून) अधिनियम, 2025
सबका बीमा, सबकी रक्षा (बीमा संशोधन कानून) अधिनियम, 2025 के माध्यम से बीमा अधिनियम, 1938, भारतीय जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 तथा बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 में व्यापक संशोधन किए गए हैं। इसका उद्देश्य पॉलिसीधारकों की सुरक्षा को सुदृढ़ करना, बीमा प्रसार को गहराई देना, क्षेत्रीय विकास को गति प्रदान करना तथा व्यवसाय करने में सुगमता में उल्लेखनीय सुधार करना है।
एक प्रमुख सुधार के रूप में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा को बढ़ाकर 100 प्रतिशत कर दिया गया है, जिससे नए निवेशकों को आकर्षित करने, पूंजी की उपलब्धता बढ़ाने तथा व्यक्तियों और व्यवसायों के लिए संरक्षण अंतर को कम करने की अपेक्षा है। यह अधिनियम निम्नलिखित उपायों के माध्यम से व्यवसाय करने में सुगमता को प्रोत्साहित करता है:
- बीमा मध्यस्थों के लिए एकमुश्त पंजीकरण, जिससे निर्बाध संचालन और बेहतर सेवा निरंतरता सुनिश्चित हो सके।
- शेयर अंतरण के लिए आईआरडीएआई की अनुमोदन सीमा को 1 प्रतिशत से बढ़ाकर 5 प्रतिशत करना, जिससे अनुपालन प्रक्रिया सरल हो सके।
- विदेशी पुनर्बीमाकर्ताओं के लिए नेट ओन्ड फंड की आवश्यकता को 5,000 करोड़ रुपये से घटाकर 1000 करोड़ रुपये करना, जिससे भारत में पुनर्बीमा भागीदारी और क्षमता को प्रोत्साहन मिले।
सरकार ने भारत को एक प्रतिस्पर्धी वैश्विक व्यापार और निवेश गंतव्य के रूप में सुदृढ़ करने के उद्देश्य से कार्गो प्रक्रियाओं को सुसंगत बनाने, सीमा शुल्क प्रणालियों का आधुनिकीकरण करने तथा निवेशकों की पहुंच को सशक्त बनाने के लिए विभिन्न उपाय किए हैं। ये पहलें डिजिटल एकीकरण, त्वरित मंजूरी, प्रौद्योगिकी-आधारित जोखिम प्रबंधन तथा निवेश के विस्तारित अवसरों पर केंद्रित हैं, जिससे एक अधिक दक्ष, पारदर्शी और निवेशक-अनुकूल व्यापार इकोसिस्टम का निर्माण हो सके।
- कार्गो प्रक्रियाओं की मंजूरी के लिए एकल और परस्पर-संबद्ध डिजिटल विंडो।
- जिन वस्तुओं पर किसी प्रकार के नियम पालन की आवश्यकता नहीं है, उनके लिए आयातक द्वारा ऑनलाइन पंजीकरण पूरा करने और शुल्क भुगतान के पश्चात सीमा शुल्क द्वारा तुरंत निकासी की जाएगी बशर्ते की शुल्क का भुगतान हो गया हो।
- सभी सीमा शुल्क प्रक्रियाओं के लिए एकल, एकीकृत और स्केलेबल प्लेटफार्म के रूप में कस्टम्स इंटीग्रेटेड सिस्टम (सीआईएस) को दो वर्षों में लागू किया जाएगा।
- उन्नत इमेजिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रौद्योगिकी के साथ नन-इंट्रूसिव स्कैनिंग के उपयोग को चरणबद्ध तरीके से विस्तारित किया जाएगा, जिसका उद्देश्य सभी प्रमुख बंदरगाहों पर प्रत्येक कंटेनर की स्कैनिंग सुनिश्चित करना है।
- भारत के बाहर निवासी व्यक्तिगत व्यक्तियों (पीआरओआई) को पोर्टफोलियो निवेश योजना (पीआईएस) के माध्यम से सूचीबद्ध भारतीय कंपनियों के इक्विटी साधनों में निवेश की अनुमति दी जाएगी। साथ ही, इस योजना के अंतर्गत एक व्यक्तिगत पीआरओआई के लिए निवेश सीमा को 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 10 प्रतिशत करने तथा सभी व्यक्तिगत पीआरआईओ के लिए कुल निवेश सीमा को वर्तमान 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 24 प्रतिशत करने का प्रस्ताव है।
व्यवसाय करने में सुगमता बढ़ाने के लिए विनियामक सुधार
समानांतर विनियामक सुधारों ने व्यवसाय करने में सुगमता को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से क्षमता-निर्माण, विनियामक सामंजस्य और विश्वास तथा जवाबदेही पर आधारित शासन मॉडल को प्राथमिकता दी है। हालिया उपाय वित्तीय बाज़ारों, कराधान, श्रम विनियमन, दिवाला समाधान, सीमा शुल्क प्रशासन, गुणवत्ता मानकों और अनुपालन सरलीकरण जैसे विभिन्न क्षेत्रों को समाहित करते हैं। कानूनों के एकीकरण, लघु अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने, प्रक्रियाओं के डिजिटलीकरण और पारदर्शिता को सुदृढ़ करने के माध्यम से ये सुधार नियामकीय अवरोधों को कम करते हुए जवाबदेही को बनाए रखते हैं। ये समन्वित कदम विनियामक निश्चितता को मजबूत करते हैं, प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करते हैं और एक अधिक दक्ष तथा सुदृढ़ व्यावसायिक माहौल को बढ़ावा देते हैं।
भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने अपने विनियामक ढांचे को सरल और सुव्यवस्थित करते हुए 9,000 से अधिक परिपत्रों और दिशानिर्देशों को एकीकृत कर विभिन्न श्रेणियों की विनियमित संस्थाओं के लिए कार्य-विशिष्ट 238 वृहत निर्देशों में परिवर्तित किया है। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (एनएबीएआरडी) के साथ समन्वय करते हुए क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और सहकारी बैंकों को जारी निर्देशों को भी अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एकीकृत और सरल बनाया गया है।
पहुंच को सुदृढ़ करने और अनुपालन बोझ को कम करने के उद्देश्य से कुल 9,446 परिपत्र निरस्त किए जा रहे हैं, 3,809 को वृहत परिपत्रों में समाहित किया गया है और 5,673 को बेकार के रूप में चिन्हित किया गया है। यह प्रक्रिया स्पष्टता को बढ़ाती है और व्यवसाय करने में सुगमता को सुदृढ़ करती है।
नियमों को सरल बनाने और पारदर्शिता में सुधार की दिशा में सेबी की पहल
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने व्यवसाय करने में सुगमता (ईओडीबी) को सुदृढ़ करने और पूंजी बाज़ारों को गहराई प्रदान करने के उद्देश्य से, विनियामक आवश्यकताओं को सरल बनाने और पारदर्शिता को मजबूत करने के लिए विभिन्न उपाय प्रस्तुत किए हैं। इसने प्रतिभूतिकृत ऋण साधनों (एसडीआई) के निर्गम और सूचीबद्धता से संबंधित दिशानिर्देशों को भारतीय रिज़र्व बैंक के मानक परिसंपत्तियों के प्रतिभूतिकरण संबंधी मानकों के अनुरूप समायोजित किया है, जिससे व्यापक विनियामक सामंजस्य, सुगम अनुपालन और निर्गमकर्ताओं के लिए स्पष्ट प्रक्रियाएं सुनिश्चित होती हैं।
पेनाल्टी एवं अभियोजन को सुसंगत बनाना
अनुपालन संबंधी दबाव को कम करने के उद्देश्य से सरकार ने पेनाल्टी को सुसंगत बनाने, लघु चूकों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने तथा मूल्यांकन और अभियोजन ढांचे को सरल बनाने के लिए कई उपाय किए हैं, जिससे कर प्रणाली अधिक पारदर्शी, अनुमान-योग्य और व्यवसाय-अनुकूल बन सके।
- एकीकृत मूल्यांकन एवं पेनाल्टी आदेश में अपील के दौरान पेनाल्टी पर कोई ब्याज देय नहीं; पूर्व-जमा 20 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत (मूल कर मांग पर) किया गया।
- पुनर्मूल्यांकन के बाद भी अद्यतन रिटर्न दाखिल करने की अनुमति, अतिरिक्त 10 प्रतिशत कर के साथ।
- पूर्ण कर और ब्याज के भुगतान पर, कम-रिपोर्टिंग से आगे बढ़ाकर गलत-रिपोर्टिंग के मामलों तक पेनाल्टी एवं अभियोजन से संरक्षण का विस्तार।
- खाताबही प्रस्तुत न करने तथा वस्तु के रूप में किए गए भुगतानों पर टीडीएस से संबंधित प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर करना; लघु अपराधों पर केवल जुर्माना।
- तकनीकी पेनाल्टी को सुसंगत बनाकर उन्हें शुल्क के रूप में परिवर्तित किया गया।
- आनुपातिक अभियोजन संरचना, जिसमें अधिकतम 2 वर्ष के साधारण कारावास का प्रावधान, जिसे जुर्माने में परिवर्तित किया जा सकता है।
- 20 लाख रुपये से कम मूल्य की विदेशी परिसंपत्तियों का खुलासा नहीं करने पर पूर्वप्रभावी संरक्षण (1.10.2024 से प्रभावी)
व्यवसाय करने में सुगमता (ईओडीबी) को सुदृढ़ करने के लिए सरकार का ध्यान विश्वास-आधारित सीमा शुल्क तंत्र प्रदान करने पर केंद्रित है। इस संदर्भ में, केंद्रीय बजट 2026–27 में टियर 2 और टियर 3 अधिकृत आर्थिक ऑपरेटरों (एईओ) के लिए शुल्क स्थगन अवधि को 15 दिनों से बढ़ाकर 30 दिन करने का प्रस्ताव किया गया है, ताकि गोदी से गोदाम तक बेहतर पारगमन सुनिश्चित हो सके और जस्ट-इन-टाइम विनिर्माण को सुविधा मिल सके। शुल्क स्थगन अवधि में यह वृद्धि आयातित वस्तुओं पर सीमा शुल्क या आयात शुल्क का भुगतान तुरंत करने के बजाय निर्धारित अवधि के भीतर बाद में करने की अनुमति प्रदान करती है।
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स्थगित शुल्क भुगतान एक ऐसी व्यवस्था है जिसके अंतर्गत शुल्क भुगतान और सीमा शुल्क निकासी को अलग कर दिया जाता है। यह ‘पहले प्रक्रिया पूर्ति–बाद में भुगतान’ के सिद्धांत पर आधारित है। इसका उद्देश्य गोदी से गोदाम तक निर्बाध पारगमन सुनिश्चित करना है, ताकि जस्ट-इन-टाइम विनिर्माण को सुविधा मिल सके।
अधिकृत आर्थिक परिचालक (एईओ) वह व्यावसायिक इकाई है जो वस्तुओं की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही में संलग्न होता है और जिसे राष्ट्रीय सीमा शुल्क कानून के प्रावधानों के अनुपालन की आवश्यकता होती है। इसे राष्ट्रीय प्रशासन द्वारा या उसकी ओर से विश्व सीमा शुल्क संगठन (डबल्यूसीओ) अथवा समकक्ष आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा मानकों के अनुरूप अनुमोदित किया जाता है।
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अन्य प्रस्तावों में शामिल हैं-
- पात्र विनिर्माता-आयातकों को समान शुल्क स्थगन सुविधा प्रदान करना। इससे उन्हें समय के साथ पूर्ण रूप से टियर 3-एईओ के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।
- अधिक निश्चितता और बेहतर व्यावसायिक योजना के लिए, सीमा शुल्क पर बाध्यकारी अग्रिम निर्णय की वैधता अवधि को वर्तमान 3 वर्षों से बढ़ाकर 5 वर्ष करना।
- एईओ मान्यता के आधार पर माल निकासी में वरीयता प्रदान करना।
- जोखिम प्रणालियों में विश्वसनीय आयातकों की पहचान, जिससे सत्यापन न्यूनतम हो; साथ ही इलेक्ट्रॉनिक रूप से सीलबंद निर्यात माल को कारखाने से जहाज़ तक सीधे निकासी की अनुमति।
- अनुपालन-रहित वस्तुओं के लिए, विश्वसनीय आयातकों की फाइलिंग से सीमा शुल्क को स्वतः सूचना प्राप्त होगी, जिससे आगमन पर तत्काल रिहाई संभव होगी।
- सीमा शुल्क गोदाम ढांचे को ऑपरेटर-केंद्रित प्रणाली में परिवर्तित करना, जिसमें स्व-घोषणाएं, इलेक्ट्रॉनिक ट्रैकिंग और जोखिम-आधारित ऑडिट शामिल हों, ताकि विलंब और अनुपालन लागत में कमी लाई जा सके।
सरकार ने विश्वास-आधारित विनियामक ढाँचे को और सुदृढ़ करने के उद्देश्य से कई छोटे मोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के लिए महत्वपूर्ण सुधार किए हैं। जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) अधिनियम, 2023 के माध्यम से 42 अधिनियमों की 183 धाराओं को अपराध की श्रेणी से हटाया गया, जिससे लघु और तकनीकी उल्लंघनों के लिए आपराधिक दायित्व में कमी आई।
इन प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए, जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) विधेयक, 2025, जिसमें 355 प्रावधान शामिल हैं उसने व्यवसाय करने में सुगमता(ईओडीबी) को प्रोत्साहित करने के लिए 288 प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का संबंधी संशोधन का प्रस्ताव किया। इनके अलावा 67 प्रावधान ऐसे जोड़े गये जिनका उद्देश्य जीवन की सुगमता को बढ़ाना है। यह “न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन” के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को प्रतिबिंबित करता है और सतत आर्थिक विकास तथा व्यवसाय करने की सुगमता में सुधार को प्रोत्साहित करने की दिशा में अग्रसर है।
दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता(आईबीसी), 2016
दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) ने वित्तीय रूप से संकटग्रस्त कंपनियों के समयबद्ध समाधान को सक्षम बनाकर तथा ऋणदाताओं के लिए वसूली में सुधार कर भारत के दिवाला ढांचे को उल्लेखनीय रूप से परिवर्तित किया है। कॉरपोरेट पुनर्जीवन या परिसमापन के लिए एक स्पष्ट, संरचित और समय-सीमित प्रक्रिया स्थापित कर इसने पारदर्शिता को बढ़ाया है, ऋणदाताओं के विश्वास को सुदृढ़ किया है और एक अधिक पूर्वानुमान-योग्य व्यावसायिक वातावरण को प्रोत्साहित किया है।
आईबीसी का मुख्य उद्देश्य संकटग्रस्त कॉरपोरेट देनदारों (सीडी) को पुनर्जीवित करना है। स्थापना से लेकर सितंबर 2025 तक कुल 3,865 कॉरपोरेट देनदारों का समाधान किया गया है- जिनमें से 1,300 का समाधान प्रस्तावित समाधान योजनाओं के माध्यम से, 1,342 का अपील, पुनरीक्षण या समझौते के माध्यम से तथा 1,223 का वापसी के माध्यम से हुआ। 30 सितंबर 2025 तक समाधान योजनाओं के अंतर्गत ऋणदाताओं ने 3.99 लाख करोड़ रुपये की वसूली की है। यह परिसमापन मूल्य का लगभग 170 प्रतिशत तथा उचित मूल्य का लगभग 94 प्रतिशत (1,177 मामलों के आधार पर) है। समग्र रूप से, ऋणदाताओं ने अपने स्वीकृत दावों का 32 प्रतिशत से अधिक वसूल किया है।
संपत्तियों के मूल्य को अधिकतम करके, उद्यमिता को प्रोत्साहन देकर, ऋण की उपलब्धता को सुदृढ़ करके तथा सभी हितधारकों के हितों में संतुलन स्थापित कर इस संहिता ने समग्र ऋण इकोसिस्टम को मजबूत किया है और देश में व्यावसायिक विश्वास को बढ़ाया है।
सेक्यूरिटी मार्केट्स कोड 2025 (एसएमसी)
एसएमसी कोड, 2025 प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956, सेबी अधिनियम, 1992 तथा डिपॉजिटरी अधिनियम, 1996 का स्थान लेता है, और इस प्रकार भारत के प्रतिभूति बाज़ारों को संचालित करने वाले असमान कानूनों का एकीकरण करता है। इसमें बोर्ड संरचना, स्वतंत्रता, हितों के टकराव का प्रबंधन, पारदर्शिता, विनियामक सैंडबॉक्सिंग, निवेशक संरक्षण, बाज़ार अवसंरचना संस्थानों का शासन तथा व्यवसाय करने में सुगमता (ईओडीबी) जैसे विषयों को समाहित किया गया है।
विभिन्न मंत्रालयों और विभागों द्वारा जारी गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (क्यूसीओ) भारत के गुणवत्ता इकोसिस्टम को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनका कार्यान्वयन उपभोक्ता सुरक्षा को बढ़ाने, निम्न-स्तरीय उत्पादों के प्रसार पर अंकुश लगाने, निवेश आकर्षित करने तथा दुर्घटनाओं और जनहानि के जोखिम को कम करने के लिए सुदृढ़ गुणवत्ता मानकों को लागू कर वैश्विक विनिर्माण में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने की महत्वाकांक्षा का समर्थन करता है। क्यूसीओ उत्पाद दोषों और खराबियों का प्रारंभिक स्थिति में पता लगाने में भी सहायक हैं, जिससे विश्वसनीयता में सुधार और अधिक सुसंगत लागत के माध्यम से निर्माता और उपभोक्ता दोनों को लाभ होता है।
अनुपालन बोझ को न्यूनतम रखने और विशेषकर एमएसएमई के लिए व्यवसाय करने में सुगमता को समर्थन देने के लिए, निर्माण तथा कार्यान्वयन-दोनों चरणों में उद्योग निकायों, क्षेत्रीय संघों और अन्य हितधारकों के साथ व्यापक परामर्श किया जाता है।
हाल के वर्षों में भारत ने अपने अनिवार्य गुणवत्ता आश्वासन ढांचे का उल्लेखनीय विस्तार किया है। 31 दिसंबर 2025 तक 723 उत्पादों को कवर करने वाले 143 क्यूसीओ अधिसूचित किए जा चुके हैं-जो 2019 में 214 उत्पादों के कवरेज की तुलना में तीन गुना से अधिक वृद्धि को दर्शाता है। यह संतुलित दृष्टिकोण विनियामक दक्षता और व्यावसायिक सुगमता के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए गुणवत्ता मानकों को सुदृढ़ करता है।
विनियामक अनुपालन बोझ (आरसीबी) पहल
वर्ष 2020 में प्रारंभ की गई विनियामक अनुपालन बोझ (आरसीबी) पहल का उद्देश्य केंद्रीय मंत्रालयों, विभागों तथा राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा व्यापक स्व-समीक्षा के माध्यम से व्यवसायों और नागरिकों पर पड़ने वाले विनियामक दबाव को कम करना है। पिछले पाँच वर्षों में 47,000 से अधिक नियमों को समाप्त या कम किया गया है।.

इसके अतिरिक्त, विस्तारित RCB+ पहल के अंतर्गत 23 राज्य-कार्यान्वित अधिनियमों में पहचाने गए 6,262 नियमों में से 4,846 को पहले ही समाप्त या कम किया जा चुका है, जिससे विनियामक सरलीकरण की प्रक्रिया को और गति मिली है।
न्यूनतम वैकल्पिक कर (एमएटी)
न्यूनतम वैकल्पिक कर (एमएटी) भारत में व्यवसाय करने में सुगमता को सुदृढ़ करते हुए एक न्यायसंगत और पारदर्शी कर संरचना सुनिश्चित करता है, जिसके अंतर्गत लाभकारी कंपनियों को न्यूनतम कर का भुगतान करना अनिवार्य है। हाल ही में, केंद्रीय बजट 2026–27 में एमएटी के ढांचे के अंतर्गत महत्वपूर्ण तार्किक उपाय प्रस्तावित किए गए हैं।
अनुमानित कराधान का विकल्प चुनने वाले अनिवासियों को एमएटी के दायरे से बाहर रखने का प्रस्ताव है, जिससे अनुपालन बोझ कम होगा और कर-निश्चितता बढ़ेगी। बायबैक कराधान को सुव्यवस्थित करते हुए सभी शेयरधारकों के हाथों में बायबैक को पूंजीगत लाभ के रूप में कराधान के दायरे में लाने का प्रस्ताव है। इसके अतिरिक्त, नई कर व्यवस्था में उपलब्ध एमएटी ऋण के समायोजन को कर देयता के एक-चौथाई तक अनुमति देने का प्रस्ताव है। साथ ही, एमएटी को अंतिम कर के रूप में मानने तथा इसकी दर को 15 प्रतिशत से घटाकर 14 प्रतिशत करने का प्रस्ताव है, ताकि राजस्व स्थिरता बनाए रखते हुए कर संरचना को सरल बनाया जा सके।
29 केंद्रीय श्रम कानूनों का चार श्रम संहिताओं में एकीकरण ने अनुपालन को सरल बनाकर, मंजूरी समय सीमा को कम करके और विशेष रूप से एमएसएमई के लिए अधिक परिचालन लचीलापन प्रदान कर व्यवसाय करने में सुगमता (ईओडीबी) को उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ किया है।
- संहिताओं में कारखाने के निर्माण या विस्तार के लिए अनुमति प्रदान करने की समयसीमा 30 दिन निर्धारित की गई है तथा कुल मंजूरी अवधि को 90 दिनों से घटाकर 30 दिन कर दिया गया है।
- इनमें ठेका श्रम मानदंडों को सरल बनाते हुए 50 से कम श्रमिकों को नियोजित करने वाले ठेकेदारों को लाइसेंस से छूट दी गई है, तथा इलेक्ट्रॉनिक एकल पंजीकरण, एकल रिटर्न और पांच वर्ष के लिए वैध अखिल भारतीय एकल लाइसेंस की व्यवस्था की गई है, जिसमें अनुमोदन स्वतः स्वीकृत माने जाएंगे।
- संहिताओं ने छह मौजूदा बोर्डों के स्थान पर एक एकल राष्ट्रीय त्रिपक्षीय बोर्ड की स्थापना की है, अपराधों के समायोजन को श्रेणीबद्ध मौद्रिक दंड के माध्यम से सक्षम किया है, आपराधिक दंडों को दीवानी दंडों से प्रतिस्थापित किया है तथा विधिक कार्रवाई से पूर्व अनुपालन हेतु 30 दिन की नोटिस अवधि अनिवार्य की है।
- इनमें छंटनी, पुनर्नियोजन, बंदीकरण तथा स्थायी आदेशों के लिए सीमा को 300 श्रमिकों तक बढ़ाया गया है, जिससे प्रतिष्ठानों को पूर्व अनुमति के बिना अधिक परिचालन लचीलापन प्राप्त होता है।
सितंबर 2025 में लागू किए गए जीएसटी सुधारों ने कर दरों को सरल बनाकर और प्रमुख क्षेत्रों में दरों में कमी करते हुए व्यवसाय करने में सुगमता (ईओडीबी) को सुदृढ़ किया है जिससे कर भार घटता है और मूल्य प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार होता है। सरल दो-दर संरचना की दिशा में यह कदम अनुपालन और लेन-देन लागत को कम करता है, जबकि दरों के सुसंगत बनाने से किफायत बढ़ती है और उद्यमिता को प्रोत्साहन मिलता है।
इसका प्रभाव कर आधार के विस्तार में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जहां पंजीकृत करदाताओं की संख्या 2017 में लगभग 60 लाख से बढ़कर जनवरी 2026 में 1.6 करोड़ से अधिक हो गई है जो अर्थव्यवस्था के ज्यादा औपचारिक होने का संकेत है। इसके अतिरिक्त, श्रम-प्रधान और कृषि-आधारित इनपुट क्षेत्रों जैसे वस्त्र और उर्वरक में उल्टे शुल्क ढांचे के सुधार से लागत और कार्यशील पूंजी पर दबाव कम हुआ है, जिससे व्यावसायिक संचालन अधिक सुगम हुआ है।
निष्कर्ष
भारत का एक वैश्विक व्यावसायिक महाशक्ति के रूप में उभरना कराधान, विनियमन, वित्त, श्रम, व्यापार और निवेश जैसे क्षेत्रों में स्थायी एवं संरचनात्मक सुधारों पर आधारित है। नियमों के अनुपालन को सुसंगत बनाने और विश्वास-आधारित शासन से लेकर डिजिटल व्यापार प्रणालियों तथा स्टार्टअप समर्थन तक, सुधारों की यह निरंतर गति एक पारदर्शी, पूर्वानुमान-योग्य और विकासोन्मुखी इकोसिस्टम को प्रतिबिंबित करती है।
उद्यम पंजीकरण में वृद्धि, सुदृढ़ व्यावसायिक भावना, औपचारिककरण का विस्तार और ऋण तक बेहतर पहुंच उद्योग तथा निवेशकों के विश्वास को रेखांकित करते हैं। जैसे-जैसे भारत वैश्विक वैल्यू चेन्स के साथ अपने एकीकरण को गहरा कर रहा है और अपने नीतिगत ढांचे को सुदृढ़ कर रहा है, वह केवल व्यवसाय करने में सुगमता (ईओडीबी) को ही नहीं सुदृढ़ कर रहा, बल्कि एक सुदृढ़, प्रतिस्पर्धी और भविष्य के लिए तत्पर आर्थिक परिदृश्य का निर्माण भी कर रहा है।
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