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Social Welfare

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026

नारी शक्ति : विकसित भारत की आधारशिला

Posted On: 07 MAR 2026 9:53AM

मुख्य बिंदु

  • अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च को मनाया जाता है। वर्ष 2026 की थीम "अधिकार और न्याय के साथ-साथ हर महिला और बालिका के सशक्तिकरण के लिए वास्तविक कार्रवाई" पर केंद्रित है।

  • दुनिया भर में “गिव टू गेन” अभियान जेंडर इक्वालिटी के लिए आपसी सहयोग और उदारता के महत्व पर जोर देता है।

  • भारत अब "महिलाओं के लिए कल्याणकारी योजनाएं" बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि "महिला-नेतृत्व वाले विकास" को प्राथमिकता दे रहा है। यह इस बात की स्वीकारोक्ति है कि महिलाएं अर्थव्यवस्था और समाज की उन्नति की असली शक्ति हैं।

  • संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकार और सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार ने यह सुनिश्चित किया है कि भारत के लोकतंत्र में महिलाओं को न केवल बराबरी का दर्जा मिले, बल्कि शासन प्रणाली में उनकी हिस्सेदारी भी समान हो।

  • शिक्षा, स्वास्थ्य, वित्तीय समावेशन और सुरक्षा के क्षेत्रों में सरकार की विभिन्न पहलें महिला सशक्तिकरण के लिए एक मजबूत इकोसिस्टम का निर्माण कर रही हैं।

  • स्वयं सहायता समूह, एंटरप्रेन्योरशिप स्कीम और कौशल विकास कार्यक्रम महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और उद्यम निर्माण की संभावनाओं का विस्तार कर रहे हैं।

सामूहिक संकल्प से वैश्विक पहचान तक

A group of hands with clenched fistsAI-generated content may be incorrect.परिवर्तन विरले ही किसी दिखावे के साथ आता है। प्रायः इसकी जड़ें एक मौन संकल्प में छिपी होती हैं—उन सीमाओं को मानने से एक स्पष्ट इंकार, जो परिस्थितियों ने हम पर तय की हैं। महिला अधिकारों की यात्रा भी कुछ इसी तरह विकसित हुई। औद्योगिक परिसरों से लेकर सामुदायिक सभाओं और सार्वजनिक मंचों तक, जहाँ उठी हुई आवाजें केवल विरोध का स्वर नहीं थीं, बल्कि एक उज्ज्वल भविष्य का संकल्प थीं।

हर साल 8 मार्च को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस, महिला अधिकारों और समानता की दिशा में तय किए गए एक लंबे संघर्षपूर्ण सफर की याद दिलाता है।

श्रमिक आंदोलनों और मताधिकार अभियानों से लेकर वैश्विक अधिकार सम्मेलनों तक, महिलाओं के सामूहिक प्रयासों ने संस्थाओं को नया रूप दिया है और सामाजिक प्रगति को आगे बढ़ाया है। 1977 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को दी गई मान्यता, वास्तव में उस आंदोलन का सम्मान था जो पहले से ही समाजों में बदलाव ला रहा था।

8 मार्च को ही क्यों मनाया जाता है अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस?

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की जड़ें बीसवीं सदी की शुरुआत में उत्तरी अमेरिका और यूरोप के श्रमिक आंदोलनों से जुड़ी हैं। इसे 1977 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा आधिकारिक मान्यता प्रदान की गई। 8 मार्च की यह तारीख विशेष रूप से वर्ष 1917 से संबंधित है, जब रूस की महिलाओं ने 'रोटी और शांति' की मांग को लेकर ऐतिहासिक हड़ताल शुरू की थी। यह आंदोलन तत्कालीन जूलियन कैलेंडर के अनुसार 23 फरवरी को शुरू हुआ था, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित ग्रेगोरियन कैलेंडर के हिसाब से 8 मार्च बैठता है।

आज, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस दुनिया के अनेक देशों में मनाया जाता है। यह दिन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में महिलाओं की उपलब्धियों को सम्मान देने का अवसर है। साथ ही, यह एक ऐसे वैश्विक मंच के रूप में कार्य करता है, जहाँ से महिला अधिकारों और उनकी समान भागीदारी के लिए दुनिया भर के समर्थन को और अधिक सशक्त बनाया जाता है।

आज, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस न केवल अतीत के संघर्षों को याद करने का अवसर है, बल्कि यह एक आह्वान भी है। यह दुनिया भर के राष्ट्रों और संस्थाओं को प्रेरित करता है कि वे केवल प्रतीकात्मक समारोहों से आगे बढ़कर न्याय, समानता और नेतृत्व की दिशा में ठोस कदम उठाएं।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026 की थीम

संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2026 के अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के लिए एक स्पष्ट संदेश साझा किया है—“अधिकार और न्याय के साथ-साथ हर महिला और बालिका के सशक्तिकरण के लिए वास्तविक कार्रवाई।” यह थीम केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक दृढ़ संकल्प है। यह याद दिलाती है कि अब वक्त प्रतीकों से ऊपर उठकर महिलाओं के अधिकारों को सशक्त बनाने और न्याय को उनकी पहुँच में लाने का है।

पूरे संयुक्त राष्ट्र में वैश्विक स्तर पर कार्यक्रम और चर्चाएं आयोजित की जा रही हैं। यूरोप में डब्ल्यूएचओ के क्षेत्रीय कार्यालय के जरिए भी ऐसे प्रयास हो रहे हैं, जहाँ नीति निर्माता, विशेषज्ञों और नागरिक समाज के लोग मिलकर महिलाओं के अधिकारों और उनकी हिस्सेदारी को बढ़ावा देने वाली योजनाओं पर काम कर रहे हैं।

वैश्विक गिव टू गेन अभियान

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026 की ग्लोबल कैंपेन थीम "गिव टू गेन" इस बात पर जोर देती है कि कैसे हमारा आपसी सहयोग जेंडर इक्वालिटी की राह आसान बना सकता है। यह अभियान हर व्यक्ति और संस्था को बुलावा देता है कि वे अपना समय, संसाधन और मार्गदर्शन साझा करें, ताकि महिलाएँ न केवल आगे बढ़ें, बल्कि अपनी मंज़िल भी पा सकें।

यह विचार बहुत सरल है पर गहरा असर रखता है—जब हम महिलाओं के सपनों और उनकी सफलताओं में अपना योगदान देते हैं, तो उसका फायदा सिर्फ एक व्यक्ति तक नहीं रुकता। वह लहर बनकर पूरे समाज को छूता है, हमारे समुदायों को ताकत देता है और एक ऐसा समाज बनाता है जो सबके लिए हो और हर मुश्किल का डटकर सामना कर सके।

A group of women in a rowAI-generated content may be incorrect.

नारी शक्ति - भारत के विकास का आधार स्तंभ

पूरे भारत में, बदलाव अक्सर उन जगहों से शुरू होता है जो शायद ही कभी सुर्खियों में आती हैं—जैसे यह बदलाव किसी गाँव की उस पंचायत में दिखता है जहाँ एक महिला पहली बार अपनी आवाज़ उठाती है, यह उस छोटे उद्यम में नजर आता है जो एक रसोई से शुरू होकर बाजार तक पहुँच जाता है या फिर उस क्लासरूम में जहाँ एक लड़की यह ठान लेती है कि उसका आने वाला कल, उसके बीते हुए कल जैसा नहीं होगा।  व्यक्तिगत रूप से देखें तो ये पल शायद बहुत मामूली लगें, लेकिन साथ मिलकर ये भारत के विकास की कहानी में एक ऐतिहासिक बदलाव लिख रहे हैं।

दशकों तक हमारा पूरा ध्यान महिलाओं के लिए भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं की पहुँच बढ़ाने पर रहा। इन प्रयासों ने सशक्तिकरण की एक मजबूत नींव तैयार की। लेकिन आज, कहानी पूरी तरह बदल चुकी है। अब हम महिलाओं के विकास से आगे बढ़कर महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास की बात कर रहे हैं। आज भारत महिलाओं को केवल योजनाओं के लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति को रफ्तार देने वाली शक्ति के रूप में देख रहा है।

महिलाओं के इस बदलाव को सहारा देने के लिए आज देश में अवसरों का एक बड़ा नेटवर्क तैयार हो रहा है। आसान लोन, स्वयं सहायता समूह, डिजिटल प्लेटफॉर्म, शिक्षा के नए रास्ते और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम—ये सब मिलकर एक ऐसा माहौल बना रहे हैं जहाँ अधिक से अधिक महिलाएं न केवल हिस्सा ले रही हैं, बल्कि वे भारत के विकास की दिशा तय कर रही हैं और उसका नेतृत्व भी कर रही हैं।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हमारा ध्यान केवल अब तक हुई प्रगति का उत्सव मनाने पर ही नहीं, बल्कि उस गहरे बदलाव को पहचानने पर भी है जो हमारे समाज में आ रहा है। आज बड़े उद्योगों से लेकर खेतों तक और क्लासरूम से लेकर शासन-प्रशासन के मंचों तक—हर जगह महिलाएं भारत की विकास यात्रा को एक नया आकार दे रही हैं।

नई दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2026 का आयोजन

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2026 के देशव्यापी उत्सव के हिस्से के रूप में, नई दिल्ली में कार्यक्रमों की एक श्रृंखला आयोजित की जाएगी। 

कार्यक्रम के प्रमुख बिंदुओं का विवरण इस प्रकार है:

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026

8 मार्च 2026 | नई दिल्ली

शक्ति वॉक – #SheLeadsBharat

यात्रा का मार्ग: कर्तव्य पथ होकर (इंडिया गेट से शुरू होकर विजय चौक तक)

'शक्ति वॉक' हमारे संस्थागत और सामाजिक परिवेश के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाली महिलाओं को एक साथ लाएगी। भारत की नारी की एक प्रतीकात्मक प्रगति के रूप में परिकल्पित यह पदयात्रा, महिला-नेतृत्व वाले विकास के उदय और कार्यबल में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के इस ऐतिहासिक दशक का उत्सव है।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस समारोह

स्थान: मानेकशॉ सेंटर ऑडिटोरियम
माननीय राष्ट्रपति की गरिमामय उपस्थिति में आयोजित होने वाला यह समारोह गवर्नेंस, साइंस, एंटरप्राइज, सिक्योरिटी, आर्ट्स और ग्रासरूट लीडरशिप से जुड़ी महिला उपलब्धियों को एक मंच पर लाएगा। यह आयोजन विकसित भारत @ 2047 के विजन को आगे बढ़ाने में नारी शक्ति की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करेगा।

 

 

अधिकारों को सुनिश्चित करना

राष्ट्रीय महिला आयोग

जनवरी 1992 में, सरकार ने इस सांविधिक निकाय की स्थापना एक विशेष अधिदेश के साथ की थी। इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं के लिए प्रदान किए गए सभी संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों का अध्ययन और निगरानी करना, मौजूदा कानूनों की समीक्षा करना और जहाँ भी आवश्यक हो, उनमें संशोधन के सुझाव देना है।

जेंडर इक्वालिटी के प्रति भारत की प्रतिबद्धता इसके संवैधानिक ढांचे में गहराई से रची-बसी है, जो कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है और लैंगिक आधार पर किसी भी भेदभाव को खत्म करता है। 1990 के दशक के बाद से, इस दिशा में एक क्रमिक लेकिन निर्णायक बदलाव आया है—अब महिलाओं को केवल सुरक्षात्मक नीतियों के लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि विकास के मुख्य स्टेकहोल्डर के रूप में पहचाना जाने लगा है।

जेंडर इक्वालिटी का समर्थन करने वाले मुख्य संवैधानिक प्रावधान

जेंडर इक्वालिटी का सिद्धांत भारतीय संविधान की प्रस्तावना, मौलिक अधिकारों, मौलिक कर्तव्यों और राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में निहित है।

  • अनुच्छेद 15: यह धर्म, मूलवंश, जाति, जैंडर या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है, साथ ही राज्य को महिलाओं और अन्य वंचित समूहों के लिए विशेष प्रावधान बनाने में सक्षम बनाता है ताकि वास्तविक रूप से समानता को बढ़ावा दिया जा सके।

  • अनुच्छेद 16: यह सरकारी नौकरियों में अवसर की समानता की गारंटी देता है। यह सुनिश्चित करता है कि सभी नागरिकों को धर्म, मूलवंश, जाति, जैंडर या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव के बिना सरकारी पदों तक समान पहुँच प्राप्त हो।

  • अनुच्छेद 39: यह राज्यों को निर्देशित करता है कि वह पुरुषों और महिलाओं के लिए आजीविका के समान अवसर सुनिश्चित करे।

  • अनुच्छेद 42: यह प्रसूति सहायता (मैटरनिटी रिलीफ) और काम की मानवीय स्थितियाँ सुनिश्चित करने के लिए प्रावधान करने का आदेश देता है।

  • अनुच्छेद 243: पंचायतों और नगर पालिकाओं में सभी प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सीटों और चेयरपर्सन के पदों का एक-तिहाई (1/3) हिस्सा महिलाओं (अनुसूचित जाति/जनजाति की महिलाओं सहित) के लिए आरक्षित है। इन सीटों का निर्धारण निर्वाचन क्षेत्रों के बीच रोटेशन के आधार पर होता है और अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षण राज्य के कानून के अनुसार प्रदान किया जाता है।

महिलाओं का नेतृत्व तब और अधिक सशक्त होता है, जब जीवन के हर चरण में उनके अधिकारों की रक्षा की जाती है और उनके लिए अवसरों का विस्तार किया जाता है। भारत में, ऐसी अनेक पहल की जा रही हैं जो यह सुनिश्चित करती हैं कि महिलाओं और बालिकाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और गरिमा तक समान पहुँच हो। ये प्रयास महिला-नेतृत्व वाले विकास की एक ठोस नींव तैयार कर रहे हैं।

  • भारत के लोकतंत्र में महिलाओं की समान आवाज: स्वतंत्रता के समय ही भारत ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार प्रदान कर दिया था, जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि गणतंत्र की शुरुआत से ही महिलाओं और पुरुषों को समान मतदान अधिकार प्राप्त हों। जिस समय दुनिया के कई देश महिलाओं के मताधिकार पर बहस कर रहे थे, उस समय भारत के संविधान ने महिलाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में समान भागीदार के रूप में स्थापित कर दिया था।

  • शिक्षा और अवसर: सशक्तिकरण की पहली सीढ़ी - सशक्तिकरण की शुरुआत शिक्षा से होती है। समग्र शिक्षा अभियान के माध्यम से, मुफ्त वर्दी, पाठ्यपुस्तकें, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और महिला शिक्षकों की भर्ती के जरिए जेंडर-सेंसिटिव स्कूली शिक्षा को बढ़ावा दिया जा रहा है। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय वंचित समुदायों की लड़कियों के लिए आवासीय शिक्षा प्रदान करते हैं, जबकि आईआईटी और एनआईटी जैसे संस्थानों में अतिरिक्त सीटों जैसी पहल उच्च शिक्षा तक महिलाओं की पहुँच का विस्तार कर रही हैं। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप, उच्च शिक्षा में महिलाओं का नामांकन 2014-15 के 1.57 करोड़ से बढ़कर 2022-23 में 2.18 करोड़ हो गया है। इसी अवधि के दौरान, महिला सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) — जो उच्च शिक्षा में नामांकित 18-23 वर्ष की महिलाओं के अनुपात को मापता है — 22.9 से बढ़कर 30.2 हो गया है, जो उच्च शिक्षा में महिलाओं की बेहतर पहुँच और भागीदारी को दर्शाता है। साथ ही, वित्त वर्ष 2024-25 में एसटीईएम (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित) विषयों में UGC NET-JRF शोधार्थियों में महिलाओं की हिस्सेदारी 53 प्रतिशत से अधिक रही, जो उन्नत अनुसंधान और नवाचार में उनकी बढ़ती भागीदारी का संकेत है।A child holding a book and a babyAI-generated content may be incorrect.

सुकन्या समृद्धि योजना: बेटियों के सुनहरे भविष्य की नींव - शिक्षा की इसी नींव को और मजबूत करते हुए, सुकन्या समृद्धि योजना (एसएसवाय) परिवारों को अपनी बेटियों के दीर्घकालिक भविष्य में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करती है। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के हिस्से के रूप में 22 जनवरी 2015 को शुरू की गई यह लघु बचत योजना, बालिकाओं की शिक्षा और उनकी भविष्य की आकांक्षाओं के लिए एक सुरक्षित वित्तीय मार्ग प्रदान करती है। इस योजना के तहत जमा राशि पर सरकार द्वारा अधिसूचित दरों पर ब्याज मिलता है, जो वर्तमान में 8.2 प्रतिशत है। इस योजना में जनता की अच्छी भागीदारी देखी गई है, जिसके तहत दिसंबर 2025 तक 4.53 करोड़ से अधिक खाते खोले जा चुके हैं और जमा राशि ₹3.33 लाख करोड़ से अधिक हो गई है। बालिकाओं के नाम पर बचत को बढ़ावा देकर, एसएसवाय न केवल वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित करती है, बल्कि बेटियों के भविष्य में निवेश के महत्व को भी सुदृढ़ करती है।

  • महिलाओं के लिए स्वास्थ्य, पोषण और गरिमा: महिलाओं का कल्याण, परिवार और समुदाय के कल्याण का केंद्र है। फिर भी, महिलाओं द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियाँ हमेशा दिखाई नहीं देती हैं। स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के अलावा, रोजमर्रा की जिम्मेदारियाँ जैसे पानी लाने के लिए लंबी दूरी तय करना, धुएं से भरे चूल्हों पर खाना बनाना या स्वच्छता की जरूरतों का प्रबंधन करना अक्सर उन पर एक अनदेखा शारीरिक और भावनात्मक बोझ डाल देता है। इसलिए, रोजमर्रा की इन व्यावहारिक समस्याओं का निराकरण करना नीतिगत समर्थन का एक महत्वपूर्ण आयाम बन गया है।

मातृ स्वास्थ्य और पोषण पर सरकार का एक प्रमुख फोकस बना हुआ है। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत, 4.26 करोड़ लाभार्थियों को ₹20,060 करोड़ से अधिक की राशि हस्तांतरित की गई है, जो प्रसूति के दौरान आय सहायता प्रदान करती है। प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान और पोषण अभियान जैसी पहलें देश भर में मातृ देखभाल और पोषण सेवाओं को और मजबूत करती हैं। इन निरंतर प्रयासों के परिणामस्वरूप भारत के मैटरनल मॉर्टेलिटी रेश्यो में भारी गिरावट आई है, जो 2014-16 के 130 से घटकर 2021-23 में 88 पर आ गया है।

स्वच्छ ऊर्जा और आवश्यक घरेलू सेवाओं तक पहुँच ने भी महिलाओं के स्वास्थ्य और गरिमा में उल्लेखनीय सुधार किया है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की महिलाओं को 10.56 करोड़ से अधिक एलपीजी कनेक्शन प्रदान किए गए हैं। इस पहल ने न केवल घरों के भीतर होने वाले वायु प्रदूषण के खतरे को कम किया है, बल्कि खाना पकाने के दैनिक बोझ और उससे होने वाली कठिनाइयों को भी आसान बनाया है।

इसी प्रकार, पानी और स्वच्छता तक बेहतर पहुँच महिलाओं के दैनिक जीवन को बदल रही है। अगस्त 2019 में अपनी शुरुआत के बाद से, जल जीवन मिशन (हर घर जल) ने ग्रामीण क्षेत्रों में नल के पानी के कवरेज को 16.72 प्रतिशत से बढ़ाकर 81.57 प्रतिशत से अधिक परिवारों तक पहुँचा दिया है। इसने महिलाओं द्वारा पानी लाने में लगने वाले समय और मेहनत को काफी कम कर दिया है। इसके पूरक के रूप में, स्वच्छ भारत मिशन ने 12 करोड़ से अधिक शौचालयों के निर्माण को संभव बनाया है, जिससे स्वच्छता में सुधार हुआ है, महिलाओं की निजता और गरिमा बढ़ी है और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बेहतर परिणामों में योगदान मिला है।

जनवरी 2026 तक, देश भर में कुल 2,153 बाल विवाहों को रोका गया है, और 60,262 बाल विवाह निषेध अधिकारियों की नियुक्ति की गई है।

  • सार्वजनिक और व्यावसायिक स्थानों पर सुरक्षा और न्याय : सुरक्षा के बिना सशक्तिकरण फल-फूल नहीं सकता। मिशन शक्ति के माध्यम से, वन स्टॉप सेंटर, महिला हेल्पलाइन और SHe-Box जैसे संस्थागत तंत्र मुश्किल में फंसी महिलाओं को चिकित्सा, कानूनी और परामर्श सहायता प्रदान करते हैं। कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (पीओएसएच अधिनियम) सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में सुरक्षित कार्य वातावरण सुनिश्चित करता है। कार्यस्थलों पर आंतरिक समितियों को अनिवार्य बनाकर और SHe-Box राष्ट्रीय पोर्टल के माध्यम से शिकायतों के निवारण को सक्षम बनाकर, यह कानून जवाबदेही को मजबूत करता है और काम पर महिलाओं की गरिमा के अधिकार को पुख्ता करता है।

ये सभी पहलें मिलकर एक ऐसे इकोसिस्टम को मजबूत करती हैं, जो महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने, कार्यबल में भाग लेने और देश भर के उद्यमों एवं संस्थानों का नेतृत्व करने में सक्षम बनाता है।

न्याय: समान आवाज, समान शक्ति

महिलाओं के लिए न्याय केवल कानूनी सुरक्षा तक सीमित नहीं है। यह तब साकार होता है जब महिलाएं कानूनों, नीतियों और सार्वजनिक प्राथमिकताओं को आकार देने में पूरी तरह से भाग लेती हैं। निर्णय लेने वाले स्थानों में प्रतिनिधित्व इस वादे का केंद्र है।

पिछले दशकों में, संसद और चुनावी राजनीति में महिलाओं की उपस्थिति में निरंतर वृद्धि हुई है, जो राजनीतिक भागीदारी में एक क्रमिक लेकिन सार्थक बदलाव को दर्शाती है। गणतंत्र के शुरुआती वर्षों में एक मामूली हिस्सेदारी से शुरू होकर, आज महिलाओं की संसद के दोनों सदनों और विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं में काफी मजबूत उपस्थिति है।

जमीनी स्तर पर यह परिवर्तन और भी अधिक स्पष्ट और प्रभावशाली है। पंचायती राज संस्थानों में निर्वाचित सभी प्रतिनिधियों में से लगभग आधी (50 प्रतिशत) महिलाएं हैं, जिसके कारण आज भारत में दुनिया की सबसे बड़ी संख्या में निर्वाचित महिला नेता मौजूद हैं। उनके नेतृत्व ने स्थानीय शासन की प्राथमिकताओं को एक नया आकार दिया है—जिसमें पेयजल, स्वच्छता, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और सामाजिक कल्याण के वितरण पर अधिक जोर दिया गया है।

  • 73वाँ संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1992 – ग्रामीण शासन में महिलाएं- 73वाँ संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1992 – ग्रामीण शासन में महिलाएं- इस संशोधन ने पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा दिया, जिसके तहत संविधान में भाग IX और ग्यारहवीं अनुसूची (29 विषय) जोड़ी गई और पंचायतों की त्रि-स्तरीय संरचना के साथ नियमित चुनाव अनिवार्य किए गए। इसके एक ऐतिहासिक प्रावधान ने महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई (1/3) सीटें और नेतृत्व के पद आरक्षित किए। इसने जमीनी स्तर के शासन में महिलाओं की भागीदारी का विस्तार किया और ग्रामीण भारत में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण (डेमोक्रेटिक डीसेंट्रलाइजेशन) को मजबूती प्रदान की।

  • 74वाँ संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1992 – शहरी स्थानीय शासन में महिलाएं
    संविधान में भाग IX-A और बारहवीं अनुसूची (18 कार्य) जोड़कर, इस संशोधन ने नगर पंचायतों, नगर परिषदों और नगर निगमों सहित शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया। इसने महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई (1/3) सीटें आरक्षित करना भी अनिवार्य कर दिया, जिससे शहरी स्थानीय शासन और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व और नेतृत्व के नए मार्ग प्रशस्त हुए।

  • 106वाँ संवैधानिक संशोधन अधिनियम (नारी शक्ति वंदन अधिनियम), 2023

एक ऐतिहासिक उपलब्धि 106वाँ संवैधानिक संशोधन अधिनियम (नारी शक्ति वंदन अधिनियम), 2023 का लागू होना था, जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई (33 प्रतिशत) आरक्षण का प्रावधान करता है। यह संवैधानिक गारंटी जेंडर-बैलेंस्ड डेमोक्रेसी की नींव को मजबूत करती है।

इस संदर्भ में, न्याय का अर्थ केवल प्रतिनिधित्व से कहीं अधिक है। इसका अर्थ है अधिकार। इसका अर्थ है प्रभाव। इसका अर्थ यह है कि महिलाएं न केवल चुनावों में मतदान करें, बल्कि उन संस्थानों को भी आकार दें जो भारत के भविष्य को परिभाषित करते हैं।

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एक्शन: प्रतिबद्धता को बदलाव में बदलना

संकल्प: हर महिला और हर बेटी के लिए

तीन तलाक की समाप्ति

तीन तलाक को खत्म करना एक ऐतिहासिक सुधार है, जो करोड़ों मुस्लिम महिलाओं के लिए गरिमा, समानता और वास्तविक सशक्तिकरण सुनिश्चित करता है। तीन तलाक अधिनियम तत्काल तलाक की प्रथा को अपराध की श्रेणी में रखता है, जिससे मुस्लिम महिलाओं को कानूनी सुरक्षा और व्यापक समानता मिलती है। यह उन्हें लंबे समय से चली आ रही घरेलू हिंसा और भेदभाव से मुक्ति दिलाने में सक्षम बनाता है।

महिला-नेतृत्व वाला विकास तब और मजबूत होता है, जब नीतिगत प्रतिबद्धताएं आर्थिक अवसरों में बदल जाती हैं। हाल के वर्षों में, भारत ने निवेश, वित्तीय पहुंच और कौशल इकोसिस्टम का विस्तार किया है, जो महिलाओं को अर्थव्यवस्था में अधिक सक्रिय रूप से भाग लेने, उद्यम स्थापित करने और संस्थानों का नेतृत्व करने में सक्षम बनाता है।

जेंडर-रिस्पॉन्सिव पब्लिक इन्वेस्टमेंट: भारत ने वित्त वर्ष 2026 में जेंडर बजट के मामले में अब तक का ऐतिहासिक शिखर छुआ है, जिसमें केंद्रीय बजट का 9.37 प्रतिशत हिस्सा जेंडर इक्वालिटी को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों के लिए निर्देशित किया गया है। विभिन्न क्षेत्रों में, 53 मंत्रालयों/विभागों और 5 केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा ₹5.01 लाख करोड़ की राशि निर्धारित की गई है, जो प्रतीकात्मक समावेश (सिंबॉलिक इन्क्लूजन) से हटकर महिलाओं के विकास में निरंतर निवेश की ओर एक बड़े बदलाव को दर्शाता है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था का निर्माण करती महिलाएं: दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के माध्यम से, करोड़ों महिलाएं अवैतनिक श्रम से निकलकर संगठित उद्यम की ओर बढ़ी हैं। आज, 10.05 करोड़ ग्रामीण परिवारों को 90.90 लाख स्वयं सहायता समूहों में संगठित किया गया है, जिन्होंने 2013-14 से अब तक ₹12.18 लाख करोड़ के इंस्टीट्यूशनल क्रेडिट तक पहुँच बनाई है। लखपति दीदी जैसे कार्यक्रम ग्रामीण महिलाओं को स्थायी आजीविका विकसित करने में सक्षम बना रहे हैं, जिसमें 3,07,33,820 से अधिक महिलाएं पहले से ही लखपति दीदी बनने के लक्ष्य की ओर अग्रसर हैं।

नई पहलें महिलाओं के लिए तकनीक-आधारित कार्यों के नए मार्ग भी खोल रही हैं। नमो ड्रोन दीदी योजना के तहत, स्वयं सहायता समूहों को कृषि ड्रोन संचालित करने के लिए सहायता प्रदान की जा रही है। इसके लिए ड्रोन खरीद पर 80 प्रतिशत सब्सिडी का प्रावधान है और 15,000 स्वयं सहायता समूहों को लक्षित करते हुए ₹1,261 करोड़ का बजट आवंटित किया गया है। इस पहल से न केवल ग्रामीण महिलाओं की आय में वृद्धि होने की उम्मीद है, बल्कि यह उन्हें उभरते हुए तकनीकी इकोसिस्टम का हिस्सा भी बना रही है।

एक स्वयं सहायता समूह सदस्य से उद्यमी तक: बदाशीशा दखर की प्रेरणादायक यात्रा

मेघालय के पूर्वी जैंतिया हिल्स जिले के एक छोटे से गाँव त्लुह में रहने वाली बदाशीशा दखर की कहानी किसी सपने से कम नहीं है। साल 2019 में जब उन्होंने एक स्वयं सहायता समूह की सदस्यता ली, तो उनकी सोच बहुत साधारण थी—वे बस अपने गाँव की दूसरी महिलाओं से मिलना-जुलना और सुख-दुख साझा करना चाहती थीं। उस वक्त उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि समाज से जुड़ने की यह छोटी सी चाहत, उनके जीवन की दिशा और दशा दोनों बदल देगी।A person standing in front of a shelf of bottlesAI-generated content may be incorrect.

राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) उनके लिए उम्मीद की एक नई किरण लेकर आया। यहाँ से उन्हें न केवल आर्थिक सहारा मिला, बल्कि तकनीकी बारीकियों को सीखने का मौका भी मिला। उनके सफर की असली शुरुआत 2020 में खाद्य प्रसंस्करण के प्रशिक्षण से हुई, जिसे उन्होंने आगे बढ़ाते हुए शिलांग के प्रतिष्ठित इंस्टिट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट से अपने हुनर को और निखारा। इसी आत्मविश्वास के साथ, उन्होंने 2024 में ₹2.5 लाख का बैंक ऋण प्राप्त किया और अपनी जमा-पूंजी जोड़कर उमप्लांग में जूस प्रोसेसिंग का अपना माइक्रो-एंटरप्राइज शुरू करने के लिए इन्वेस्ट किया।

साल 2024 में उनकी मेहनत को एक नई पहचान मिली, जब उनके उत्पादों ने दिल्ली हाट में आयोजित पाइनएप्पल फेस्टिवल तक का सफर तय किया। जो सफर एक सामाजिक मेल-जोल के रूप में शुरू हुआ था, वह आज एक फलते-फूलते कारोबार में तब्दील हो चुका है। आज बदाशीशा लगभग ₹1.8 लाख की वार्षिक आय अर्जित कर रही हैं।

जो सफर कभी केवल आपसी मेल-जोल और सामाजिक जुड़ाव के लिए शुरू हुआ था, वह अंततः आत्मनिर्भरता की एक सुनहरी राह बन गया। बदाशीशा की यह जीवन-यात्रा इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि कैसे सामूहिक सहयोग, आसान ऋण और कौशल विकास ग्रामीण महिलाओं का कायाकल्प कर सकती है। आज वे केवल एक नाम नहीं, बल्कि उन लाखों आत्मविश्वासी महिला उद्यमियों की आवा हैं, जो अपनी मेहनत के दम पर अपने सुनहरे भविष्य लिख रही हैं।

उद्यमिता को मिलती वित्तीय शक्ति: वित्तीय समावेशन के विस्तार ने महिलाओं को बचत की आदतों से आगे बढ़ाकर अपना खुद का व्यवसाय खड़ा करने में सक्षम बनाया है। साल 2015 से, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (MUDRA) के तहत 32.61 लाख करोड़ मूल्य के 52 करोड़ ऋण स्वीकृत किए जा चुके हैं, जिनमें से 68 प्रतिशत लाभार्थी महिलाएं हैं। जन धन खाताधारकों में भी महिलाओं की हिस्सेदारी 56 प्रतिशत है, जबकि स्टैंड-अप इंडिया ने 2.01 लाख से अधिक महिला उद्यमियों को ग्रीनफील्ड उद्यम (नए व्यवसाय) स्थापित करने में मदद की है। वित्तीय सहायता के साथ-साथ, गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) पर वुमनिया (Womaniya) जैसी पहल महिला उद्यमियों और स्वयं सहायता समूहों को सीधे सरकारी खरीद से जोड़ रही हैं। वर्तमान में, गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस पर दो लाख से अधिक महिला-नेतृत्व वाले सूक्ष्म और लघु उद्यम पंजीकृत हैं, जिन्हें 80,000 करोड़ से अधिक के सरकारी खरीद ऑर्डर प्राप्त हुए हैं। यह न केवल उनके लिए बाजार के रास्ते खोल रहा है, बल्कि उनके व्यवसायों को और अधिक मजबूती दे रहा है।

 कौशल और नवाचार इकोसिस्टम: विस्तारित कौशल प्रशिक्षण और स्टार्टअप इकोसिस्टम के माध्यम से महिलाएं अब आधुनिक और नए जमाने के क्षेत्रों में तेजी से कदम रख रही हैं। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के लाभार्थियों में लगभग 45 प्रतिशत महिलाएं हैं, जबकि स्टार्टअप इंडिया के तहत 75,000 से अधिक महिला-नेतृत्व वाले स्टार्टअप्स को सहायता प्रदान की गई है। इसके साथ ही, नव्या (NAVYA - 2025) जैसे कार्यक्रम आकांक्षी जिलों की किशोरियों के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण को और अधिक सशक्त बना रहे हैं।

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बढ़ती भागीदारी और नेतृत्व: सार्वजनिक जीवन के हर क्षेत्र में महिलाएं अपनी उपस्थिति का निरंतर विस्तार कर रही हैं। भारत ने आजादी के समय ही सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को अपना लिया था और आज महिलाएं एक निर्णायक वोटर के रूप में उभरी हैं। वर्तमान में, 47 करोड़ से अधिक पंजीकृत महिला मतदाता लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग ले रही हैं। महिलाओं की यह बढ़ती भूमिका उन क्षेत्रों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है, जिन्हें कभी उनके लिए दुर्गम माना जाता था। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 2025 में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) से महिला कैडेटों के पहले बैच का स्नातक होना है। यह ऐतिहासिक उपलब्धि राष्ट्रीय संस्थानों में महिलाओं की व्यापक और सशक्त भागीदारी का एक बड़ा संकेत है।

कुल मिलाकर, ये तमाम पहलें भारत के विकास की सोच में आए एक बड़े बदलाव को दर्शाती हैं—जहाँ अब जोर केवल महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर नहीं, बल्कि उन्हें नेतृत्व की भूमिका में लाने पर है। आज महिला-नेतृत्व वाला विकास ग्रामीण उद्योगों और स्टार्टअप्स से लेकर तकनीकी मंचों और शासन की संस्थाओं तक हर जगह साफ दिखाई देता है। यह बदलाव न केवल समावेशी विकास का रास्ता तैयार कर रहा है, बल्कि देश की प्रगति को एक नई और मजबूत दिशा भी दे रहा है।

नेतृत्व करती महिलाएं

महिला-नेतृत्व वाले विकास की सबसे सुंदर झलक उन महिलाओं के जीवन में दिखती है, जो मिले हुए अवसरों को प्रगति में बदलने का हुनर जानती हैं। सरकार की उन योजनाओं के सहयोग से, जो ऋण, कौशल, तकनीक और बाजार तक उनकी पहुँच बढ़ा रही हैं—आज अनगिनत महिलाएं खुद के उद्यम खड़े कर रही हैं। वे न केवल अपनी आजीविका को मजबूत बना रही हैं, बल्कि अपने पूरे समुदाय में सकारात्मक बदलाव की नींव भी रख रही हैं।

रीना का संकल्प: सेहत भी, शक्ति भी

54 साल की उम्र में रीना अपने काम को महज़ एक कारोबार नहीं मानतीं, बल्कि वे इसे एक 'मिशन' कहती हैं—एक ऐसा मिशन जो समाज की सोच बदलने के लिए शुरू हुआ है।

जिन छोटे-छोटे कदमों से इस सफर का आगाज हुआ था, वे आज प्राकृतिक हेल्थ सर्विसेज बन चुके हैं। यह एक ऐसी स्वास्थ्य सहकारी समिति है, जिसे महिलाएं ही चलाती हैं और जिसका नेतृत्व भी महिलाओं के ही हाथों में है। इसका मुख्य लक्ष्य उन महिलाओं की सेवा करना है, जो अर्थव्यवस्था के असंगठित क्षेत्र में काम करती हैं। साल 1990 में पंजीकृत हुई इस समिति से आज 1,500 सदस्य जुड़े हुए हैं। यह सहकारी संस्था आज न केवल मेडिकल स्टोर्स की एक पूरी श्रृंखला और स्वास्थ्य सेवाएं संचालित कर रही है, बल्कि इसका वार्षिक कारोबार ₹60.25 मिलियन के पार पहुँच चुका है।

यह विचार जितना सरल था, उतना ही शक्तिशाली भी—कि अगर असंगठित क्षेत्र की महिला कामगारों को सस्ता और बेहतर इलाज मिले, तो वे स्वस्थ रहेंगी, अधिक काम कर सकेंगी और गरीबी के कुचक्र से बाहर निकल पाएंगी। लेकिन, इस पूरे इकोसिस्टम को खड़ा करना इतना आसान नहीं था। इसके लिए अटूट साहस, आपसी तालमेल और सबसे बढ़कर पूंजी की जरूरत थी।

बीते वर्षों में, इस सहकारी समिति ने अपनी साख के दम पर न केवल बैंकों से ऋण प्राप्त किया, बल्कि एक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) से वर्किंग कैपिटल और महिला फेडरेशन का सहयोग भी हासिल किया। समय पर ऋण चुकाने के शानदार रिकॉर्ड और एक सतत बिजनेस मॉडल की बदौलत, यह समूह आज वित्तीय रूप से पूरी तरह सक्षम और क्रेडिट-रेडी है। अब यह समिति आयुर्वेदिक उत्पादों की अपनी निर्माण इकाई स्थापित करने के लिए ₹5–6 मिलियन की पूंजी जुटाने की तैयारी कर रही है।

आज यह उद्यम 300 सक्रिय सदस्यों को सपोर्ट करता है, जो न केवल आजीविका के साधन जुटा रहा है, बल्कि महिलाओं के लिए नेतृत्व के नए अवसर भी पैदा कर रहा है। रीना और उनके साथियों के लिए, फाइनेंस सिर्फ़ कैपिटल नहीं था — यह कॉन्फिडेंस था। जो सफर कभी सामूहिक अस्तित्व को बचाने की एक छोटी सी कोशिश के रूप में शुरू हुआ था, वह आज सामूहिक शक्ति की एक मिसाल बन चुका है।

प्रिया: उद्देश्यपूर्ण नवाचार की नई मिसाल

35 साल की उम्र में, प्रिया केवल एक व्यवसाय खड़ा नहीं कर रही हैं—बल्कि वे बढ़ती तपिश से जूझती इस दुनिया के लिए ठोस समाधान तलाश रही हैं। सतत विकास के प्रति अपने अटूट संकल्प से प्रेरित होकर, उन्होंने एक ऐसी ड्रोन टेक्नोलॉजी कंपनी की नींव रखी है जो अक्षय ऊर्जा से संचालित होती है। उनका मुख्य लक्ष्य उन दूरदराज के इलाकों और जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे समुदायों तक जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं और दवाइयाँ पहुँचाना है, जहाँ पहुँचना आज भी एक बड़ी चुनौती है।

जो सफर कभी उभरती हुई तकनीकों पर एक शोध के रूप में शुरू हुआ था, वह आज एक सफल व्यवसाय, एक मिनिमम वायबल प्रोडक्ट का रूप ले चुका है, जो पिछले दो वर्षों से शानदार ढंग से काम कर रहा है। आज, शहरी क्षेत्र में स्थित उनका यह उद्यम ₹12 मिलियन का वार्षिक राजस्व पैदा कर रहा है और 10 लोगों को रोजगार भी दे रहा है।

शुरुआत में प्रिया ने ट्रेडिशनल बैंक ऋण का सहारा लिया, लेकिन जल्द ही उन्हें अहसास हुआ कि उनके क्लाइमेट-टेक विजन के लिए अनुदान और इम्पैक्ट इन्वेस्टर्स से मिलने वाली इक्विटी अधिक उपयुक्त है। अपने विकास के शानदार रिकॉर्ड और स्केलेबल बिजनेस मॉडल के साथ, वे अब विस्तार के लिए पूरी तरह तैयार हैं। अब वे ऐसे वित्तीय भागीदारों की तलाश में हैं, जो न केवल उनके बड़े लक्ष्यों को समझें, बल्कि उनके सामाजिक और पर्यावरणीय उद्देश्य के साथ भी कदम से कदम मिलाकर चल सकें।

 

निष्कर्ष

भारत में महिला-नेतृत्व वाले विकास की कहानी आज देश भर की महिलाओं की उन छोटी-बड़ी सफलताओं में झलकती है, जिन्हें वे हर दिन हासिल कर रही हैं। यह बदलाव आज साफ देखा जा सकता है—चाहे वह सहकारी समितियों का कुशलता से संचालन हो, नए उद्यमों की नींव रखना हो, आधुनिक तकनीकों को अपनाना हो या लोकल गवर्नेंस में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना हो। सामूहिक रूप से, ये तमाम सफर भारत के विकास परिदृश्य में आए एक बहुत बड़े और बुनियादी बदलाव का प्रतीक हैं।

आज महिलाओं के अधिकारों ने न केवल उनकी गरिमा को मजबूत किया है, बल्कि उन्हें सुरक्षा का एक ठोस कवच भी दिया है। न्याय की सुलभता ने उनकी आवाज़ को बुलंद किया है और नीति-निर्माण में उनके प्रतिनिधित्व का विस्तार किया है। इसी दिशा में किए गए निरंतर प्रयासों ने आज ऐसे व्यापक अवसर पैदा कर दिए हैं, जिससे महिलाएं आर्थिक और सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में अपनी सक्रिय और प्रभावशाली भागीदारी सुनिश्चित कर रही है।

आज करोड़ों महिलाएं स्वयं सहायता समूहों का अटूट हिस्सा हैं, जिनमें से बड़ी संख्या में महिलाएं निर्वाचित स्थानीय निकायों में जन-प्रतिनिधि के रूप में अपनी सेवाएँ दे रही हैं। साथ ही, औपचारिक वित्तीय प्रणालियों और उद्यमिता के अवसरों तक महिलाओं की पहुँच लगातार बढ़ रही है। ये बुनियादी बदलाव धीरे-धीरे उन रास्तों का विस्तार कर रहे हैं, जो महिलाओं को केवल भागीदारी तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उन्हें नेतृत्व की ओर ले जा रहे हैं।

जैसे-जैसे भारत अपनी विकास यात्रा पर तेजी से आगे बढ़ रहा है, महिलाएं न केवल परिवारों और समुदायों को गढ़ने में, बल्कि राष्ट्र के भविष्य को एक नई दिशा देने में भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

संदर्भ

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2150216&reg=3&lang=2

https://www.pmuy.gov.in/index.aspx

फैक्टशीट:

https://www.ncw.gov.in/publications/women-centric-schemes-by-different-ministries-of-government-of-india-goi/

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2212747&reg=3&lang=1

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2224413&reg=3&lang=1

https://www.google.com/url?sa=t&source=web&rct=j&opi=89978449&url=https://www.mospi.gov.in/sites/default/files/reports_and_publication/statistical_publication/Women_Men/mw24/CompetePublication_WM2024.pdf&ved=2ahUKEwiEm6eZ4PiSAxWNzzgGHd8GFFsQFnoECBwQAQ&usg=AOvVaw1lAW-MvaorEWlxPV8CllFk

https://www.google.com/url?sa=t&source=web&rct=j&opi=89978449&url=https://dge.gov.in/dge/sites/default/files/2023-05/Female_Labour_Utilization_in_India_April_2023_final__1_-pages-1-2-merged__1_.pdf&ved=2ahUKEwiEm6eZ4PiSAxWNzzgGHd8GFFsQFnoECBsQAQ&usg=AOvVaw0MQe7HiDC_bkmGSzao8qKl

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2160547&reg=3&lang=2

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2220140&reg=3&lang=2

https://www.google.com/url?sa=t&source=web&rct=j&opi=89978449&url=https://dge.gov.in/dge/sites/default/files/2026-01/1365_e.pdf&ved=2ahUKEwimgpTBrICTAxVjXWwGHWliJ-EQFnoECBgQAQ&usg=AOvVaw1g5i6K5OCe10zgRTHDd5lp

https://www.facebook.com/unwomenindia/posts/india-has-recorded-its-highest-ever-gender-budget-allocation-in-fy26-with-937-of/1339258624889378/

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2178389&reg=3&lang=2

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