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Rural Prosperity

वैश्विक स्वास्थ्य सेवा में भारत का फार्मास्यूटिकल क्षेत्र

“स्वदेश में उत्पादन से अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार तक”

Posted On: 21 MAR 2026 10:25AM

मुख्य बिंदु

  • भारतीय फार्मास्यूटिकल उद्योग मात्रा के हिसाब से वैश्विक स्तर पर तीसरा सबसे बड़ा और मूल्य के हिसाब से 11वां सबसे बड़ा उद्योग है।
  • घरेलू बाज़ार का आकार 60 अरब अमेरिकी डॉलर है, जिसके 2030 तक 130 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
  • फार्मा क्षेत्र का वार्षिक कारोबार वित्त वर्ष 25 में 4.72 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया।
  • मूल्य के आधार पर, भारत वर्तमान में फार्मास्यूटिकल निर्यात में वैश्विक स्तर पर 11वें स्थान पर है, और वर्ष 2024-25 में इसने 191 देशों को निर्यात किया।
  • फार्मा निर्यात 30.5 अरब अमेरिकी डॉलर रहा, जो 2000-01 के 1.9 अरब अमेरिकी डॉलर की तुलना में लगभग 16 गुना अधिक है।
  • वर्ष 2025-26 में (अप्रैल-सितंबर) के दौरान एफडीआई में 13,193 करोड़ रुपये दर्ज किया गया।
  • केंद्रीय बजट 2026-27 में, भारत को वैश्विक बायोफार्मास्युटिकल मैन्युफैक्चरिंग केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिए 'बायोफार्मा शक्ति' का प्रस्ताव रखा गया है, जिसके लिए अगले पांच वर्षों में कुल 10,000 करोड़ रुपये का परिव्यय निर्धारित किया गया है।

 

परिचय - जन स्वास्थ्य को आर्थिक प्रगति से जोड़ना

आर्थिक विकास के लिए स्वास्थ्य, प्रेरक और परिणाम दोनों की ही भूमिका निभाता है और इस मामले में औषधि उद्योग की स्थिति अत्यंत बहुत महत्वपूर्ण है। आवश्यक दवाओं और टीकों की उपलब्धता सुनिश्चित करके, यह उद्योग जन स्वास्थ्य परिणामों और सामाजिक कल्याण को बेहतर बनाने में एक निर्णायक भूमिका निभाता है; साथ ही, यह रोज़गार के अवसर भी पैदा करता है, आपूर्ति-श्रृंखला को मजबूत करता है और व्यापक सामाजिक-आर्थिक विकास में अपना योगदान देता है। समय के साथ, भारतीय दवा उद्योग दुनिया के सबसे विशिष्ट और सामाज के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक के रूप में उभरा है, जिसने भारत को वैश्विक स्तर पर सबसे बड़े और तकनीकी रूप से सबसे उन्नत दवा उत्पादकों में से एक के रूप में स्थापित किया है।

वैश्विक फार्मास्यूटिकल्स बाज़ार में भारत

'दुनिया की फार्मेसी' के रूप में भारत के दवा उद्योग में किफ़ायती कीमतों और सुनिश्चित गुणवत्ता का अनूठा मेल है, जिसके कारण भारतीय दवाएँ वैश्विक बाज़ारों में बड़े पैमाने पर पसंद की जाती हैं। एक मज़बूत वैज्ञानिक कार्यबल और बड़े पैमाने पर उत्पादन क्षमता के सहयोग से, लागत-कुशल निर्माण प्रक्रिया ने गुणवत्ता के मानकों से समझौता किए बिना, आवश्यक दवाओं की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित की है।

भारतीय दवा उद्योग मात्रा के हिसाब से दुनिया में तीसरे और मूल्य के हिसाब से 11वें स्थान पर है, जिसमें 3,000 से अधिक कंपनियां और 10,500 मेन्युफेक्चरिंग इकाइयां कार्यरत हैं। घरेलू दवा बाजार, जिसका वर्तमान मूल्य 60 अरब अमेरिकी डॉलर है, 2030 तक 130 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में इस क्षेत्र का वार्षिक कारोबार 4.72 लाख करोड़ रुपये रहा, जिसमें पिछले दशक (वित्त वर्ष 15 से वित्त वर्ष 25) के दौरान निर्यात में 7 प्रतिशत की  वार्षिक चक्रवृद्धि दर (सीएजीआर) दर्ज की गई है। भारत दुनिया में जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है, जो वैश्विक आपूर्ति में लगभग 20 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखता है और 60 चिकित्सीय श्रेणियों में लगभग 60,000 जेनेरिक ब्रांडों का निर्माण करता है। किफायती एचआईवी उपचार तक पहुंच का विस्तार करके और लागत प्रभावी टीकों के अग्रणी वैश्विक आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरकर, दवा उद्योग आर्थिक अवसर पैदा करने के साथ-साथ घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में निरंतर योगदान दे रहा है।

भारत में संयुक्त राज्य अमेरिका के बाहर यूएसएफडीए द्वारा अनुमोदित मैन्युफ़ैक्चरिंग संयंत्रों की संख्या सर्वाधिक है, जो भारतीय दवाओं की सुरक्षा और गुणवत्ता में अंतरराष्ट्रीय विश्वास को और सुदृढ़ करता है। देश में लगभग 500 सक्रिय दवा सामग्री (एपीआई) निर्माता हैं, जो वैश्विक एपीआई उद्योग में करीब 8 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखते हैं।

फार्मा निर्यात - वैश्विक पहुंच और निवेश में वृद्धि

भारत डिप्थीरिया, टिटनेस और काली खांसी (डीपीटी), बैसिलस कैलमेट-गुएरिन (बीसीजी) और खसरे  के टीकों की आपूर्ति में वैश्विक स्तर पर अग्रणी देशों में है। भारतीय निर्माता संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय बाल आपातकालीन कोष (यूनिसेफ) को लगभग 60 प्रतिशत टीकों की आपूर्ति करते हैं, डिप्थीरिया ((डीपीटी) और बीसीजी  टीकों की 40-70 प्रतिशत वैश्विक मांग को पूरा करते हैं, और विश्व स्वास्थ्य संगठन की खसरे के टीके की 90 प्रतिशत मांग की आपूर्ति करते हैं। यह भारतीय फार्मास्युटिकल निर्यात की मजबूती और वैश्विक स्वास्थ्य सेवा आपूर्ति नेटवर्क में उनके व्यापक एकीकरण को रेखांकित करता है।

निर्यात प्रदर्शन

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, भारत वर्तमान में मूल्य के हिसाब से दवा निर्यात में वैश्विक स्तर पर 11वें स्थान पर है। वर्ष 2024-25 में भारत ने 191 देशों को निर्यात किया, जिसमें से 50 प्रतिशत निर्यात संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप जैसे अत्यधिक विनियमित  बाजारों में किया गया। यह भारतीय दवाओं की व्यापक अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता को दर्शाता है।

वर्ष 2024-25 में, फार्मा निर्यात 30.5 अरब अमेरिकी डॉलर रहा, जो वर्ष 2000-01 के 1.9 अरब अमेरिकी डॉलर से लगभग 16 गुना अधिक है। निर्यात की यह गति हर महीने मजबूत बनी हुई है, जहाँ दवाओं और फार्मास्युटिकल का निर्यात जनवरी 2025 के 2.59 अरब अमेरिकी डॉलर से लगभग 2.70 प्रतिशत बढ़कर जनवरी 2026 में 2.66 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया है। इसके अतिरिक्त, चिकित्सा उपकरणों  के निर्यात में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो वर्ष 2020-21 के 2.5 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2024-25 में 4.1 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। वित्त वर्ष 2025 में 187 देशों को इनका निर्यात किया गया।

भारत के फार्मास्यूटिकल क्षेत्र ने बढ़ते निर्यात और स्थिर विदेशी निवेश के माध्यम से अपनी वैश्विक उपस्थिति का विस्तार किया है, जो इसके मैन्युफैक्चरिंग और नियामक मानकों में मज़बूत अंतरराष्ट्रीय विश्वास का संकेत है। सामूहिक रूप से, ये ताकतें भारत को गुणवत्तापूर्ण और किफायती दवाओं के एक भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता के रूप में स्थापित करती हैं और इसकी निरंतर निर्यात-आधारित वृद्धि को मज़बूत करती हैं।

भारतीय फार्मा निर्यातकों ने दवा निर्माण सामग्री (बल्क ड्रग्स), सर्जिकल उत्पादों और फॉर्मूलेशन के निर्यात को नाइजीरिया, मैक्सिको, तंजानिया, नीदरलैंड, फ्रांस, ब्राजील, श्रीलंका, सऊदी अरब और स्पेन जैसे उभरते और गैर-पारंपरिक देशों के बाजारों तक विस्तार करके अपने निर्यात पोर्टफोलियो का रणनीतिक विविधीकरण किया है। इस लक्षित बाजार विविधीकरण ने व्यक्तिगत बाजारों में केंद्रित शुल्क-संबंधी जोखिमों के प्रभाव को कम करके निर्यात बढ़ाया है।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश

भारतीय दवा क्षेत्र विदेशी निवेशकों के लिए एक प्राथमिकता वाला देश बनकर उभरा है और यह भारत में विदेशी निवेश को आकर्षित करने वाले शीर्ष 10 उद्योगों में से एक है। वर्तमान वित्त वर्ष 2025-26 (सितंबर तक) में दवाओं और फार्मास्युटिकल्स में विदेशी निवेश का प्रवाह 13,193 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यह बढ़ती उत्पादन क्षमता, नियामक स्थिरता और वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में भारत की स्थिति के चलते निवेशकों के बढ़ते विश्वास को रेखांकित करता है।

व्यापार समझौतों के माध्यम से भारत के फार्मास्युटिकल और चिकित्सा उपकरण निर्यात को बढ़ाना

भारत के व्यापार समझौतों का बढ़ता नेटवर्क, फार्मास्युटिकल और चिकित्सा उपकरण क्षेत्रों के लिए वैश्विक बाजार तक पहुंच का विस्तार कर रहा है। ये साझेदारियाँ दुनिया भर में सस्ती दवाओं और चिकित्सा प्रौद्योगिकियों के एक विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता के रूप में भारत की स्थिति को मजबूत कर रही हैं। यूरोप और न्यूजीलैंड के साथ हाल ही में हुए समझौतों से निर्यात, निवेश और वैश्विक स्वास्थ्य सेवा मूल्य श्रृंखला में एकीकरण को और बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता

भारत और यूरोपीय संघ ने एक मुक्त व्यापार समझौते के लिए बातचीत सफलतापूर्वक संपन्न कर ली है, जिससे भारतीय फार्मास्यूटिकल्स और मेडिकल उपकरणों के क्षेत्रों के लिए अवसर काफी बढ़ गए हैं। यह समझौता यूरोपीय संघ के लगभग 572.3 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के बाजार तक बेहतर पहुंच प्रदान करता है, जिसमें फार्मास्युटिकल उत्पाद और चिकित्सा प्रौद्योगिकियां शामिल हैं। टैरिफ उदारीकरण से भारतीय चिकित्सा उपकरणों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार होने की उम्मीद है, जबकि महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे स्थापित मेन्युफेक्चरिंग केंद्रों में निर्यात बढ़ने की संभावना है।  इस समझौते से कुशल रोजगार को प्रोत्साहित करने, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों  की भागीदारी को बढ़ाने और वैश्विक स्वास्थ्य सेवा मूल्य श्रृंखला में भारत की हिस्सेदारी बढ़ने की उम्मीद है।

भारत-यूके व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता

जुलाई 2025 में हस्ताक्षरित भारत-यूके व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता (सीईटीए), भारत के फार्मास्युटिकल और चिकित्सा उपकरण क्षेत्रों के लिए नए अवसर पैदा करता है। इस समझौते के तहत, 56 फार्मास्युटिकल टैरिफ लाइनों की  शुल्क मुक्त बाजार तक पहुंच हो सकेगी, जिससे ब्रिटेन में भारतीय जेनेरिक दवाएं अधिक प्रतिस्पर्धी बन जाएंगी। गौरतलब है कि ब्रिटेन यूरोप में भारत का सबसे बड़ा फार्मास्युटिकल निर्यात बाजार बना हुआ है।

यह समझौता कई चिकित्सा उपकरणों के लिए शुल्क-मुक्त पहुंच भी प्रदान करता है, जिनमें सर्जिकल उपकरण, नैदानिक उपकरण, ईसीजी मशीनें और एक्स-रे सिस्टम शामिल हैं। इससे भारतीय निर्माताओं के लिए लागत कम होने और ब्रिटेन के बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धिता मजबूत होने की उम्मीद है।

भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता

दिसंबर 2025 में संपन्न भारत—न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते से भारतीय औषधि निर्यात के लिए अवसरों का विस्तार हुआ है। इस समझौते में उन लगभग 90 टैरिफ श्रेणियों में फार्मास्यूटिकल उत्पादों को शुल्क मुक्त करने का प्रावधान किया गया है जिनमें पहले 5 प्रतिशत तक प्रशुल्क लगता था।

इसलिए इस समझौते से स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में व्यापार को मजबूती मिलने की संभावना है जिससे भारत के फार्मास्यूटिकल उत्पादन परिवेश के विकास में सहायता मिलेगी।

फार्मास्यूटिकल्स क्षेत्र को सहायता प्रदान करने के लिए सरकार-संचालित हस्तक्षेप

सरकार की रणनीति के केंद्र में 'उत्पादन आधारित प्रोत्साहन' (पीएलआई) योजनाएं हैं, जिनका उद्देश्य घरेलू मेन्युफेक्चरिंग को मजबूत करना, आयात पर निर्भरता कम करना और फार्मास्युटिकल, बल्क ड्रग्स तथा चिकित्सा उपकरणों के निर्यात को बढ़ावा देना है। बल्क ड्रग और मेडिकल डिवाइस पार्कों, उद्योग सहायता पहलों और अनुसंधान प्रोत्साहन उपायों के साथ मिलकर ये योजनाएं मेन्युफेक्चरिंग क्षमता का विस्तार कर रही हैं, बुनियादी ढांचे में सुधार कर रही हैं और एक वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी फार्मास्युटिकल केंद्र के रूप में भारत की स्थिति को और सुदृढ़ कर रही हैं।

उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाएँ

फार्मास्यूटिकल्स विभाग द्वारा लागू की गई उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाएँ, फार्मास्यूटिकल क्षेत्र में घरेलू मेन्युफेक्चरिंग को मज़बूत करने और आयात पर निर्भरता कम करने के प्रयासों की आधारशिला हैं। इन योजनाओं के परिणामस्वरूप, फार्मास्यूटिकल्स और बल्क ड्रग्स के लिए पीएलआई योजनाओं के तहत, सक्रिय दवा सामग्री (एपीआई), प्रमुख शुरुआती सामग्री (केएसएम) और ड्रग इंटरमीडिएट्स (डीआई) के 3,591 करोड़ रुपये मूल्य के आयात को रोकने में सफलता मिली है। इस प्रकार, ये योजनाएं आयात निर्भरता में औसत दर्जे की कमी लाने और भारत के मेन्युफेक्चरिंग क्षमता को सुदृढ़ करने में योगदान दे रही हैं।

सक्रिय दवा सामग्री (एपीआई)

यह किसी औषधीय उत्पाद के निर्माण में उपयोग किया जाने वाला वह पदार्थ है, जो अंतिम दवा का सक्रिय तत्व बनता है। यह रोगों के निदान, उपचार, शमन या रोकथाम में औषधीय प्रभाव या प्रत्यक्ष चिकित्सीय क्रिया प्रदान करता है।

ड्रग इंटरमीडिएट (डीआई)

संश्लेषण के मध्यवर्ती चरणों के दौरान बनने वाला एक पदार्थ, जिसे सक्रिय औषधीय घटक (एपीआई) बनने से पहले और अधिक प्रसंस्करण से गुजरना पड़ता है।

मुख्य प्रारंभिक सामग्री (केएसएम)

एक कच्चा माल, मध्यवर्ती या एपीआई, जिसका उपयोग किसी एपीआई के उत्पादन में किया जाता है और जो उसका एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक हिस्सा बनाता है। इसके रासायनिक गुण परिभाषित होते हैं और इसे व्यावसायिक रूप से प्राप्त किया जा सकता है या आंतरिक रूप से उत्पादित किया जा सकता है।

फार्मास्यूटिकल्स के लिए पीएलआई योजना

यह योजना उच्च-मूल्य वाले बायोफार्मास्यूटिकल उत्पादों, जटिल जेनेरिक्स और ऑटोइम्यून दवाओं के घरेलू निर्माण को बढ़ावा देती है, जिससे बिक्री, निर्यात और रोज़गार सृजन में महत्वपूर्ण योगदान मिलता है। सितंबर 2025 तक 17,274.96 करोड़ रुपये के लक्ष्य के मुकाबले, इस योजना के तहत 40,890 करोड़ रुपये का निवेश हुआ।

2021 में अपनी शुरुआत के बाद से:

  • सितंबर 2025 तक कुल बिक्री 3,16,797 करोड़ रुपये तक पहुँच गई है।
  • इस कुल बिक्री में से 2,03,730 करोड़ रुपये का योगदान निर्यात का है।
  • सितंबर 2025 तक, इस योजना के तहत लगभग 97,000 लोगों को रोज़गार दिया गया है, जिनमें संविदा और प्रशिक्षु कर्मचारी शामिल हैं।

बल्क ड्रग्स (एपीआई/केएसएम/ डीआई) के लिए पीएलआई योजना

इस योजना का उद्देश्य महत्वपूर्ण कच्चे माल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करना और किसी एक स्रोत या देश पर निर्भरता को कम करना है।

सितंबर 2025 तक:

  • 26 महत्वपूर्ण एपीआई/केएसएम के लिए प्रति वर्ष 55,100 मीट्रिक टन की कुल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता स्थापित की गई है।
  • शुरुआत (2022) से अब तक की संचयी बिक्री 2,313.16 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है, जिसमें 508.12 करोड़ रुपये का निर्यात शामिल है।
  • योजना के तहत 4,329.95 करोड़ रुपये के लक्ष्य के मुकाबले 4,763.34 करोड़ रुपये का निवेश जुटाया गया है।
  • इस योजना के अंतर्गत 4,929 व्यक्तियों के लिए रोजगार सृजित किया गया है।

चिकित्सा उपकरणों के घरेलू निर्माण को बढ़ावा देने हेतु पीएलआई योजना

इस योजना का उद्देश्य चिकित्सा उपकरण क्षेत्र में घरेलू निर्माण को बढ़ावा देना और बड़े निवेश को आकर्षित करना है।

सितंबर 2025 तक:

  • इस योजना के तहत कुल बिक्री 12,344.37 करोड़ रुपये रही, जिसमें 5,869.36 करोड़ रुपये का निर्यात शामिल है।
  • इस योजना के माध्यम से 1,093.69 करोड़ रुपये का वास्तविक निवेश प्राप्त हुआ है।

बल्क ड्रग्स और चिकित्सा उपकरणों के लिए अवसंरचना विकास योजनाएं

बल्क ड्रग्स पार्कों को प्रोत्साहन देने की योजना

इन पार्कों को बढ़ावा देने की योजना बल्क ड्रग्स के उत्पादन के लिए साझा अवसंरचना विकास में मददगार है। इस योजना के अंतर्गत आंध्र प्रदेश, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में तीन पार्कों को मंजूरी दी गई है। इनका विकास राज्य क्रियान्वयन एजेंसियों के जरिए विभिन्न चरणों में है। फरवरी 2026 की स्थिति के अनुसार इन पार्कों की कुल परियोजना लागत 6306.68 करोड़ रुपए से ज्यादा है। इनमें से हरेक में साझा अवसंरचना सुविधाएं बनाने के लिए केंद्र सरकार 1000 करोड़ रुपए की सहायता दे रही है। इसके लिए 3000 करोड़ रुपए का बजटीय प्रावधान किया गया है।

चिकित्सा उपकरण पार्कों को प्रोत्साहन देने की योजना

इस योजना का उद्देश्य एक ही स्थान पर साझा परीक्षण और प्रयोगशाला सुविधाएं/केंद्र प्रदान करना है जिससे उत्पादन व्यय में उल्लेखनीय कमी आएगी और देश में चिकित्सा उपकरण निर्माण के लिए मजबूत परिवेश बनाने में मदद मिलेगी। योजना के अंतर्गत उत्तर प्रदेश (ग्रेटर नोएडा), मध्य प्रदेश (उज्जैन) और तमिलनाडु (कांचीपुरम) में तीन पार्कों की स्थापना की जा रही है जो विकास के उन्नत चरण में हैं। इन पार्कों का कुल परियोजना व्यय 871.11 करोड़ रुपए है। केंद्र सरकार इनमें से हरेक पार्क में साझा अवसंरचना सुविधाओं के लिए 100 करोड़ रुपए अनुदान के रूप में दे रही है। दिसंबर 2025 तक इन पार्कों में 199 चिकित्सा उपकरण निर्माताओं को कुल 306.64 एकड़ भूमि आवंटित की जा चुकी थी। इनमें से 34 इकाइयों ने अपने संयंत्रों के निर्माण का कार्य शुरू कर दिया है।

नवोन्मेष और पहुंच में सुधार के लिए अन्य पहलकदमियां

अनुसंधान और नवोन्मेष

फार्मा मेडटेक में अनुसंधान और नवोन्मेष को प्रोत्साहन देने के लिए योजना (प्रिप) का उद्देश्य भारत के फार्मास्यूटिकल और चिकित्सा प्रौद्योगिकी परिवेश को मजबूत करना है। यह योजना इस मकसद से जेनेरिक निर्माण से आगे बढ़ते हुए नवोन्मेष आधारित विकास को बढ़ावा देती है। यह दो घटकों के जरिए अनुसंधान, उत्पाद विकास तथा उद्योग और शिक्षा जगत के बीच ज्यादा नजदीकी सहयोग में मदद करती है।

  • घटक ए के अंतर्गत 7 राष्ट्रीय फार्मास्यूटिकल शिक्षा और अनुसंधान संस्थानों में से हरेक में कुल 700 करोड़ रुपए के परिव्यय से उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किया गया है।
  • नवंबर 2025 तक उत्कृष्टता केंद्र के अधीन 111 अनुसंधान परियोजनाएं मंजूर की गईं, 46 शोधपत्रों का प्रकाशन हुआ और 6 पेटेंट दाखिल किए गए।
  • घटक बी के अंतर्गत फार्मा मेडटेक क्षेत्र में प्राथमिकता के चिह्नित क्षेत्रों में उद्योगों, एमएसएमई और स्टार्टअप संस्थाओं को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।

किफायती दवाओं तक पहुंच

प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना (पीएमबीजेपी) का उद्देश्य देश भर में किफायती और गुणवत्तापूर्ण दवाओं तक पहुंच में सुधार लाना है। पीएमबीजेपी के माध्यम से प्रतिबद्ध दुकानों के व्यापक नेटवर्क के जरिए नागरिकों के दवाओं पर होने वाले खर्च को घटाने तथा आवश्यक दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की तर्कसंगत मूल्यों पर उपलब्धता सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है।

  • 28.02.2026 की स्थिति के अनुसार 18646 से ज्यादा जन औषधि केंद्र काम कर रहे हैं।
  • इस परियोजना के अंतर्गत 29 उपचार समूहों में 2110 दवाएं तथा 315 चिकित्सा उपकरण और अन्य सामग्रियां उपलब्ध हैं।
  • जन औषधि सुविधा सैनिटरी नैपकिन प्रति पैड 1 रुपए की कीमत पर उपलब्ध है। इसके 100 करोड़ पैड 31.01. 2026 तक बेचे जा चुके थे। इनमें से 22.50 करोड़ से ज्यादा जन औषधि सुविधा सैनिटरी पैड वित्त वर्ष 2025-26 में 31.01.2026 तक बेचे गए थे।
  • 2024-25 में 2022.47 करोड़ रुपए की बिक्री से नागरिकों को लगभग 8000 करोड़ रुपए की बचत हुई।
  • 2025-26 में 30 नवंबर 2025 तक 1409.32 करोड़ रुपए की बिक्री से नागरिकों को लगभग 5637 करोड़ रुपए की बचत होने का अनुमान है।

ये पहलकदमियां मिल कर फार्मास्यूटिकल और मेडटेक क्षेत्रों में स्वदेशी उत्पादन मजबूत करने, नवोन्मेष को प्रोत्साहन देने, किफायत में सुधार लाने और वैश्विक प्रतिस्पर्धिता बढ़ाने के लिए समन्वित नीतिगत दृष्टिकोण को प्रदर्शित करती हैं।

बायोफार्मा शक्ति - भारत के बायोफार्मास्युटिकल तंत्र का सुदृढ़ीकरण

केंद्रीय बजट 2026-27 में, सरकार ने भारत को एक वैश्विक बायोफार्मास्यूटिकल विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिए 'बायोफार्मा शक्ति' (ज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के माध्यम से स्वास्थ्य सेवा उन्नति के लिए रणनीति) पहल का प्रस्ताव रखा है। यह पहल अगले पाँच वर्षों में कुल 10,000 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ शुरू की जाएगी, और इसका उद्देश्य बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर्स के घरेलू उत्पादन के लिए एक मज़बूत इकोसिस्टम तैयार करना है।

'बायोफार्मा शक्ति' के अंतर्गत एक बायोफार्मा-केंद्रित संस्थागत नेटवर्क का निर्माण किया जाएगा, जिसमें 3 नए 'राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थानों' (नाइपर) की स्थापना और 7 मौजूदा संस्थानों का उन्नयन शामिल है। यह कार्यक्रम पूरे भारत में 1,000 से अधिक मान्यता प्राप्त क्लीनिकल ​​परीक्षण स्थलों का एक नेटवर्क बनाने में भी सहायता करेगा, जिससे क्लिनिकल अनुसंधान क्षमता मजबूत होगी और उच्च-मूल्य वाली बायोफार्मास्युटिकल चिकित्सा पद्धतियों में नवाचार को समर्थन मिलेगा।

बायोफार्मास्यूटिकल्स, या बायोलॉजिक्स, में टीके, चिकित्सीय प्रोटीन, रक्त के घटक और ऊतक जैसे उत्पाद शामिल होते हैं। ये जीवित स्रोतों से प्राप्त किए जाते हैं और रासायनिक रूप से संश्लेषित छोटे अणु वाली दवाओं की तुलना में अधिक जटिल होते हैं। बायोसिमिलर्स, अनुमोदित बायोलॉजिक दवाओं के ऐसे अनुवर्ती संस्करण होते हैं जिन्हें किसी मूल उत्पाद के संदर्भ में विकसित किया जाता है।

दवाओं का मूल्य निर्धारण और विनियमन-प्रशासन और अनुपालन

भारत की फार्मास्यूटिकल प्रणाली एक मज़बूत नियामक और गुणवत्ता वाले ढांचे पर आधारित है, जो पूरे देश में दवाओं की सुरक्षा, सामर्थ्य और मानकीकरण सुनिश्चित करती है।

केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ)

केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और सौंदर्य प्रसाधनों के लिए भारत के राष्ट्रीय विनियामक प्राधिकरण के रूप में कार्य करता है। यह उत्पादों की सुरक्षा, गुणवत्ता और प्रभावकारिता सुनिश्चित करने के लिए नई दवाओं के अनुमोदन, क्लिनिकल परीक्षणों के विनियमन, आयात एवं विनिर्माण लाइसेंसिंग और फार्माकोविजिलेंस (दवाओं के दुष्प्रभावों) की निगरानी करता है। इसका विनियामक अधिदेश 'औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940' और उससे संबंधित नियमों द्वारा शासित होता है, जिन्हें उभरती वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के अनुरूप समय-समय पर संशोधित किया जाता है।

राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए)

राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) को 'औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013' (डीपीसीओ) के प्रावधानों के तहत दवाओं की कीमतें तय करने और उनमें संशोधन करने का दायित्व सौंपा गया है। इसके साथ ही, यह आदेश के अनुपालन की निगरानी करता है, आवश्यक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करता है और औषधि नीति पर परामर्श देता है। इस आदेश का प्रबंधन एनपीपीए द्वारा औषधि विभाग की ओर से उसे सौंपे गए अधिकारों के तहत किया जाता है।

भारतीय फार्माकोपिया आयोग (आईपीसी)

भारत सरकार ने भारतीय फार्माकोपिया आयोग की स्थापना की, ताकि भारतीय फार्माकोपिया के आवधिक प्रकाशन की देखरेख की जा सके, जो औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के तहत दवा मानकों का आधिकारिक संग्रह है। यह फार्माकोपिया भारत में बाज़ार में उपलब्ध दवाओं के लिए उनकी पहचान, शुद्धता और क्षमता के मानक निर्धारित करता है, जिससे पूरे फार्मास्युटिकल तंत्र में एक समान गुणवत्ता सुनिश्चित होती है। 19 देशों में मान्यता प्राप्त यह दस्तावेज़ एक प्रमुख वैज्ञानिक और विनियामक संदर्भ के रूप में कार्य करता है, जो भारत की तकनीकी और विनियामक क्षमताओं पर बढ़ते अंतरराष्ट्रीय भरोसे को दर्शाता है।

ऐसा मज़बूत नियामक तंत्र न केवल जन-स्वास्थ्य की रक्षा कर रहा है, बल्कि भारतीय फार्मास्यूटिकल्स में वैश्विक विश्वास को भी सुदृढ़ कर रहा है। इस क्षेत्र में विकास, निर्यात और नवाचार को बनाए रखने के लिए यह आधार अत्यंत महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष

भारत का फार्मास्यूटिकल तंत्र अब एक विश्व स्तर पर एकीकृत और नीति-समर्थित प्रणाली के रूप में विकसित हो चुका है, जो बड़े पैमाने, किफायती और नियामक विश्वसनीयता का मेल है। मज़बूत विनिर्माण क्षमताएं, बढ़ते निर्यात, बढ़ता विदेशी निवेश और लक्षित सरकारी योजनाएं इन सभी ने मिलकर घरेलू उत्पादन को मज़बूत किया है, आयात पर निर्भरता कम की है और वैश्विक बाज़ार में भारत की उपस्थिति का विस्तार किया है। साथ ही, किफायती पहुंच, नवाचार, गुणवत्ता आश्वासन और विनियामक निरीक्षण को बढ़ावा देने वाली पहलों ने सार्वजनिक स्वास्थ्य परिणामों और अंतर्राष्ट्रीय विश्वास को और मजबूत किया है। यूरोपीय संघ, यूनाइटेड किंगडम और न्यूजीलैंड के साथ प्रस्तावित और हाल ही में संपन्न व्यापार समझौतों से भारत के फार्मास्युटिकल और चिकित्सा उपकरण क्षेत्र के और अधिक सशक्त होने की उम्मीद है। ये समझौते बाजार पहुंच का विस्तार करेंगे और इस क्षेत्र में भारत के वैश्विक व्यापार संबंधों को गहरा करेंगे। ये सभी तत्व मिलकर भारत के फार्मास्युटिकल्स क्षेत्र को एक स्थिर और प्रगतिशील पथ पर स्थापित करते हैं, जो निरंतर विकास, वैश्विक जुड़ाव और दीर्घकालिक मजबूती का समर्थन करते हैं।

संदर्भ

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