Social Welfare
विश्व होम्योपैथी दिवस 2026
बदलते विश्व में समग्र स्वास्थ्यसेवा की पुनर्कल्पना
Posted On:
09 APR 2026 11:54AM
मुख्य बिंदु
- होम्योपैथी के जनक डॉ सैमुएल हैनीमैन का जन्म दिन 10 अप्रैल हर साल विश्व होम्योपैथी दिवस के रूप में मनाया जाता है।
- विश्व होम्योपैथी दिवस 2026 की थीम ‘सतत स्वास्थ्य के लिए होम्योपैथी’ है।
- भारत विश्व के सबसे बड़े होम्योपैथी कार्यबल वाले देशों में से एक है।
- भारत में होम्योपैथी की शुरुआत 1810 में हुई जब जर्मन मिशनरियों ने दवाएं बांटनी शुरू की।
- भारत में 3.45 लाख पंजीकृत होम्योपैथी डॉक्टर, 8590 होम्योपैथी चिकित्सालय, 277 होम्योपैथी शिक्षा संस्थान और 34 होम्योपैथी अनुसंधान केंद्र हैं।
लगातार विकसित हो रही परंपरा1
|
सैमुअल हैनिमैन (1755-1843) एक जर्मन चिकित्सक थे, जिन्होंने 18वीं सदी के अंत में होम्योपैथी की स्थापना की थी। उनकी महत्वपूर्ण कृति, 'ऑर्गनॉन ऑफ़ मेडिसिन', आज भी दुनिया भर में होम्योपैथी से इलाज करने वालों का मार्गदर्शन करती है। 10 अप्रैल, उनकी जयंती का दिन 'विश्व होम्योपैथी दिवस' के रूप में मनाया जाता है।
|
'होम्योपैथी’ दो ग्रीक शब्दों 'होमोइस' (समान) और 'पैथोस' (पीड़ा) से बना है, यह चिकित्सा की एक ऐसी पद्धति है जिसमें किसी रोग का उपचार उन्हीं तत्वों से किया जाता है जो उस बीमारी के लक्षणों के लिए जिम्मेदार होते हैं। इस पद्धति को 1796 में होम्योपैथी के संस्थापक सैमुअल हैनिमैन द्वारा औपचारिक रूप दिया गया था। उनकी जयंती प्रतिवर्ष 10 अप्रैल को 'विश्व होम्योपैथी दिवस' के रूप में मनाई जाती है और इस वर्ष का विषय है -"स्थायी स्वास्थ्य के लिए होम्योपैथी।" 2
उन्होंने इसके बुनियादी सिद्धांत स्थापित किए, जिनमें से पहला सिद्धांत था "दर्द ही दवा बन जाता है"। इस सिद्धांत के अनुसार, जो चीज़ किसी स्वस्थ व्यक्ति में कुछ विकार पैदा करती है, वो ही चीज़ यदि सावधानीपूर्वक तैयार किए गए रूप में दी जाये तो वह किसी बीमार व्यक्ति में उन्हीं जैसे लक्षणों का इलाज भी कर सकती है। दूसरा सिद्धांत, जिसे "कम से कम खुराक" का नियम कहा जाता है, इस बात पर ज़ोर देता है कि शरीर की स्वतः-उपचार प्रक्रियाओं को सक्रिय करने के लिए तुनूकृत की गई औषधियों का उपयोग किया जाना चाहिए, ताकि उनके दुष्प्रभाव कम हों।3

होम्योपैथिक दवाएँ प्राकृतिक स्रोतों जैसे पौधों, खनिजों और पशु-पदार्थों से तनुकरण और सक्शन की प्रक्रिया द्वारा तैयार की जाती हैं और इन्हें टैबलेट, छोटी गोलियों और तरल पदार्थों जैसे रूपों में दिया जाता है। इसकी एक मुख्य विशेषता इसका 'व्यक्ति आधारित दृष्टिकोण' है, जिसमें उपचार केवल बीमारी के बजाय रोगी की समग्र शारीरिक और मानसिक स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाता होता है।
भारत में, होम्योपैथी व्यापक रूप से प्रचलित चिकित्सा पद्धति के रूप में विकसित हुई है, जो स्वस्थ रखने, पुरानी बीमारियों को ठीक करने और समग्र रूप से आरोग्य और कुशल बनाए रखने में योगदान करती है।
|
विश्व होम्योपैथी दिवस 2026: मुख्य बातें4
राष्ट्रव्यापी आयोजन: राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग ने राज्य परिषदों, संस्थानों और चिकित्सकों से 10 अप्रैल को पूरे देश में विभिन्न गतिविधियों का आयोजन करने का आह्वान किया है।
- शैक्षणिक कार्यक्रम: सेमिनार, रोग-विषयक चर्चाएँ और प्रतियोगिताएँ छात्रों तथा चिकित्सकों के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान और पेशेवर उत्कृष्टता को बढ़ावा देंगी।
- जन-संपर्क: मुफ़्त स्वास्थ्य जाँच, जागरूकता अभियान और सामुदायिक गतिविधियाँ, निवारक और समग्र देखभाल में होम्योपैथी की भूमिका को उजागर करेंगी।
- रचनात्मक भागीदारी: निबंध लेखन, पोस्टर-निर्माण और लघु वीडियो जैसी प्रतियोगिताएँ व्यापक जन-समुदाय और छात्रों की भागीदारी को प्रोत्साहित करेंगी।
|
परंपरा से नीतिगत प्राथमिकता तक

लगभग ढाई लाख पंजीकृत होम्योपैथी चिकित्सकों के साथ, भारत दुनिया के सबसे बड़े होम्योपैथिक कार्यबल में से एक है। पिछली एक सदी के दौरान, यह पद्धति न केवल कायम रही है, बल्कि देश की प्राकृतिक और निवारक स्वास्थ्य देखभाल की समृद्ध परंपराओं के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से एकीकृत भी हुई है।5
हाल के वर्षों में, इस स्वीकार्यता को मज़बूत संस्थागत सहयोग से और भी बल मिला है। 2014 में आयुष मंत्रालय की स्थापना एक निर्णायक मोड़ साबित हुई, जिससे अनुसंधान, मानकीकरण और वैश्विक पहुँच के क्षेत्रों में सुनियोजित कार्यों के माध्यम से होम्योपैथी पर नीतिगत तरीके से ध्यान केंद्रित किया गया। इन प्रयासों ने होम्योपैथी को एक पुरानी चिकित्सा पद्धति से बदलकर, भारत की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की एक लोकप्रिय पद्धति और नीति-आधारित हिस्से के रूप में स्थापित करने में सहायता की है।
|
भारत में होम्योपैथी का इतिहास 6
भारत में होम्योपैथी की शुरुआत 19वीं सदी की शुरुआत में हुई, जिसने इसके धीरे-धीरे विस्तार की नींव रखी। लगभग 1810 में, सैमुअल हैनिमैन के एक शिष्य, जॉन मार्टिन होनिगबर्गर ने भारत में इसका अभ्यास शुरू किया। 1839 में महाराजा रणजीत सिंह का उनके द्वारा किया गया सफल इलाज, समाज के संभ्रांत वर्ग और आम जनता—दोनों के बीच इसकी स्वीकार्यता को बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।
मुख्य पड़ाव
- 1847: तमिलनाडु के तंजौर में सबसे शुरुआती होम्योपैथिक अस्पतालों में से एक की स्थापना हुई।
- बंगाल में चिकित्सक और समाजसेवी राजेंद्र लाल दत्ता द्वारा इसका ज़ोरदार प्रचार किया गया।
- जाने-माने चिकित्सक महेंद्र लाल सरकार के समर्थन से इसकी विश्वसनीयता और बढ़ गई।
- कलकत्ता, बनारस और इलाहाबाद में डिस्पेंसरियों का विस्तार हुआ।
स्वतंत्रता के बाद के घटनाक्रम
स्वतंत्रता के बाद के दौर में, भारत सरकार ने होम्योपैथी को संस्थागत रूप देने के लिए कदम उठाए:
• 1973: केंद्रीय होम्योपैथी परिषद की स्थापना
• 1978: केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद की स्थापना
इन पहलों ने इस क्षेत्र में विनियमन, शिक्षा और अनुसंधान को मज़बूत किया।
|
भारत में होम्योपैथी का बुनियादी ढांचा

हाल के वर्षों में, होम्योपैथी के साक्ष्य-आधारित सत्यापन पर विशेष ज़ोर दिया गया है। भारत में लगभग 34 विशेष होम्योपैथिक अनुसंधान केंद्र हैं, जो व्यवस्थित अनुसंधान के लिए एक मज़बूत आधार हैं। इन प्रयासों का नेतृत्व करते हुए, 'राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग' और 'केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद' जैसे संस्थान नैदानिक अनुसंधान, दवाओं के मानकीकरण और अंतर्विषयक अध्ययनों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सरकार द्वारा सहायता प्राप्त फोरम, विशेष रूप से 'विश्व होम्योपैथी दिवस' के आस-पास आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में अब डेटा-आधारित परिणामों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जाता है; यह एक ऐसे बदलाव का संकेत है जिसका मजबूत वैज्ञानिक आधार है।
केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद (सीसीआरएच)

नई दिल्ली स्थित सीसीआरएच, होम्योपैथी के नैदानिक उपचार को बेहतर बनाने और इसकी वैश्विक स्वीकार्यता को बढ़ावा देने के लिए वैज्ञानिक और नैतिक अनुसंधान को प्रोत्साहित करता है। भारत भर में फैले 33 संस्थानों और इकाइयों के एक व्यापक नेटवर्क के माध्यम से होम्योपैथी में वैज्ञानिक आधार पर अनुसंधान किया जाता है। यह संस्थान इस चिकित्सा पद्धति को आधुनिक प्रमाणों के साथ सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सीसीआरएच की मुख्य गतिविधियाँ:
- औषधि परीक्षण, सत्यापन और मानकीकरण
- नैदानिक अनुसंधान, सत्यापन, प्रलेखन और प्रकाशन
- अनुसंधान सहयोग और अनुदान सहायता
सार्वजनिक स्वास्थ्य पहलें:
- स्वस्थ शिशु के लिए होम्योपैथी
- हृदय रोग और स्ट्रोक (एनपीसीडीसीएस) के साथ एकीकरण
- स्वास्थ्य रक्षण कार्यक्रम
- माँ और शिशु देखभाल के लिए होम्योपैथी पर राष्ट्रीय अभियान
राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग (एनसीएच)7
एनसीएच की स्थापना राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग अधिनियम, 2020 के तहत की गई थी, जो 5 जुलाई 2021 को लागू हुआ। इसके साथ ही, होम्योपैथी केंद्रीय परिषद अधिनियम, 1973 के तहत गठित 'बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स' और 'केंद्रीय होम्योपैथी परिषद' को भंग कर दिया गया।
एनसीएच की मुख्य गतिविधियाँ/कार्य:
- होम्योपैथिक शिक्षा और संस्थानों को विनियमित करता है
- पाठ्यक्रम और शैक्षणिक मानक निर्धारित करता है
- चिकित्सकों का राष्ट्रीय रजिस्टर रखता है
- पेशेवर नैतिकता और चिकित्सा-पद्धति की गुणवत्ता सुनिश्चित करता है
- स्वास्थ्य देखभाल की ज़रूरतों और योजना का आकलन करता है
- राज्य परिषदों और बोर्डों के साथ समन्वय करता है
- अनुपालन की निगरानी करता है और अपीलों को संभालता है
भारतीय चिकित्सा प्रणालियों के संस्थागत सुदृढ़ीकरण और मानकीकरण ने एक मज़बूत नियामक और गुणवत्ता ढाँचा तैयार किया है, जिसने बदले में इस क्षेत्र में शैक्षिक बुनियादी ढाँचे के विस्तार को बढ़ावा दिया है।
2013–14 से 2024–25 तक होम्योपैथी कॉलेजों और सीटों की संख्या में लगातार हो रही वृद्धि, इन विनियामक सुधारों के प्रभाव और भारत में होम्योपैथिक शिक्षा की बढ़ती क्षमता को दर्शाती है।

भारतीय चिकित्सा और होम्योपैथी के लिए भेषज संहिता आयोग (पीसीआईएम एंडएच)8
भारतीय चिकित्सा और होम्योपैथी के लिए भेषज संहिता आयोग (पीसीआईएम एंडएच), आयुष मंत्रालय के तहत एक अधीनस्थ कार्यालय है। यह भारतीय चिकित्सा पद्धतियों और होम्योपैथी के लिए 'फार्माकोपिया' (भेषज संहिता) और 'फॉर्मुलरी' (नुस्खा संग्रह) विकसित करने के लिए जिम्मेदार है। साथ ही, यह इन दवाओं की गुणवत्ता, सुरक्षा और मानकीकरण सुनिश्चित करने के लिए 'केंद्रीय औषधि परीक्षण-सह-अपीलीय प्रयोगशाला' के रूप में भी कार्य करता है।
इसे मूल रूप से 18 अगस्त 2010 को 'सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860' के तहत भारतीय चिकित्सा के लिए भेषज संहिता आयोग (पीसीआईएम) के रूप में स्थापित किया गया था। इसके कार्यक्षेत्र में होम्योपैथी को भी शामिल किए जाने के साथ, 20 मार्च 2014 को इसका नाम बदलकर भारतीय चिकित्सा और होम्योपैथी के लिए भेषज संहिता आयोग (पीसीआईएम एंड एच) कर दिया गया।
होम्योपैथी को सहयोग देने वाली आयुष नीतियां और योजनाएं 9
भारत सरकार ने आयुष मंत्रालय के माध्यम से, शिक्षा, अनुसंधान, नैदानिक सेवाओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य एकीकरण के क्षेत्रों में होम्योपैथी को सुदृढ़ बनाने के लिए कई लक्षित योजनाएं लागू की हैं। इन पहलों का उद्देश्य इसकी पहुंच को बढ़ाना, साक्ष्य-आधारित चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा देना तथा पेशेवर और संस्थागत क्षमता का निर्माण करना है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि होम्योपैथी भारत की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली का एक सुरक्षित, प्रभावी और वैज्ञानिक रूप से मान्य घटक बनी रहे।
मुख्य योजनाएँ और पहलें:
राष्ट्रीय आयुष मिशन (एनएएम)
यह एक प्रमुख कार्यक्रम है जिसका उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में सेवा वितरण और बुनियादी ढांचे को मज़बूत करके होम्योपैथी और अन्य पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवा में एकीकृत करना है।
- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों(सीएचसी) में होम्योपैथी सेवाओं की सह-स्थापना
- अस्पतालों, औषधालयों और शैक्षणिक संस्थानों के लिए वित्तीय सहायता
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों के साथ एकीकरण
- पूरे देश में 1,84,235 से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिर चलाये जा रहे हैं।10
आयुर्स्वास्थ्य
होम्योपैथी संस्थानों की गुणवत्ता में सुधार करने और उन्नत अनुसंधान तथा नैदानिक उत्कृष्टता को बढ़ावा देने पर केंद्रित।
- अनुसंधान और नैदानिक प्रशिक्षण के लिए उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना
- संस्थागत सुदृढ़ीकरण और क्षमता निर्माण
- साक्ष्य-आधारित सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप और सामुदायिक पहुंच
आयुर्ज्ञान
यह क्षमता-निर्माण की एक पहल है जो होम्योपैथी चिकित्सकों के बीच पेशेवर विकास और अनुसंधान-उन्मुख कार्यप्रणाली को बढ़ावा देती है। यह चिकित्सकों को पेशेवर प्रशिक्षण लेने, शिक्षकों और डॉक्टरों के ज्ञान को अपडेट करने और होम्योपैथी के क्षेत्र में हो रहे विकास की जानकारी प्रसारित करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा देने हेतु प्रोत्साहित करती है।
- सतत शिक्षा, कार्यशालाएँ और सेमिनार
- संकाय विकास और कौशल संवर्धन
- अनुसंधान परिणामों का दस्तावेजीकरण और प्रसार
एक्स्ट्रा म्यूरल रिसर्च (इएमआर) योजना 11
राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राथमिकताओं के अनुरूप वित्तपोषित अनुसंधान के माध्यम से होम्योपैथी के वैज्ञानिक सत्यापन को बढ़ावा देने की एक प्रमुख पहल है।
- 2–3 वर्षों के लिए 70 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता
- इसमें नैदानिक, औषधीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य अनुसंधान शामिल हैं
- महामारियों, पुरानी बीमारियों और एकीकृत दृष्टिकोणों पर विशेष ध्यान
- प्रकाशनों, पेटेंटों और ज्ञान के प्रसार में सहायता
आयुष औषधि गुणवत्ता एवं उत्पादन संवर्धन योजना (एओजीयुएसवाई)
एओजीयुएसवाई का उद्देश्य 'औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940' के तहत भारत में आयुर्वेद, सिद्धा, यूनानी और होम्योपैथी (एएसयू और एच) औषधियों की गुणवत्ता को विनियमित और बेहतर बनाना है। यह मानकीकरण, गुणवत्तापूर्ण निर्माण और विनियामक अनुपालन को बढ़ावा देकर लक्ष्य हासिल करती है।
मुख्य उद्देश्य:
- पारंपरिक औषधियों की निर्माण क्षमताओं और निर्यात को बढ़ावा देना
- गुणवत्तापूर्ण उत्पादन और परीक्षण के लिए बुनियादी ढांचे और प्रौद्योगिकी के उन्नयन में सहायता करना
- सुरक्षा और गुणवत्ता नियंत्रण के लिए विनियामक ढांचों को सुदृढ़ बनाना
- आयुष औषधियों के मानकों में सुधार के लिए सहयोग को बढ़ावा देना
लाभार्थी और सहायता:
- निर्माता: उपकरणों के लिए अनुदान, विश्व स्वास्थ्य संगठन-गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिसेज अनुपालन, क्षमता विस्तार
- परीक्षण प्रयोगशालाएँ: विश्लेषणात्मक उपकरणों और गुणवत्ता नियंत्रण के लिए वित्तीय सहायता।
- फार्मेसी: बुनियादी ढांचे के विकास, मानकीकरण और नियामक अनुपालन के लिए सहायता।
औषधीय पौधे आयुष स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों के लिए आवश्यक कच्चे माल का आधार हैं, जिनमें 7,000-7,500 से अधिक प्रजातियां शामिल हैं। भारत में पारंपरिक पद्धतियों जैसे आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्धा और होम्योपैथी का व्यापक रूप से अभ्यास किया जाता है, इनके बढ़ते उपयोग को देखते हुए प्रामाणिक और उच्च गुणवत्ता वाले औषधीय पौधों की मांग बढ़ी है। इस संबंध में, राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड (एनएमपीबी) की पहल होम्योपैथिक दवाओं के लिए औषधीय पौधों के सतत संरक्षण, खेती और आपूर्ति को सुनिश्चित करती है। गुणवत्तापूर्ण कच्चे माल की उपलब्धता को मज़बूत करके, यह स्वास्थ्य सेवा वितरण और किसानों व हितधारकों की आजीविका—दोनों को सहारा देती है। जहाँ एक ओर गुणवत्तापूर्ण औषधीय सामग्री की आपूर्ति, आयुष प्रणालियों की रीढ़ है, वहीं दूसरी ओर इनका प्रभावी उपयोग निरंतर जागरूकता और प्रचार-प्रसार के प्रयासों पर निर्भर करता है।
सूचना, शिक्षा और संचार पहल, सुनियोजित संचार रणनीतियों के माध्यम से होम्योपैथी के प्रति जागरूकता और इसकी पहुँच को बढ़ा रही है। यह होम्योपैथी के लाभों को बढ़ावा देती है। यह कार्य, अनुसंधान निष्कर्षों का प्रसार करके, स्वास्थ्य अभियानों और सेमिनारों के आयोजन, जन-भागीदारी कार्यक्रमों का संचालन करके तथा निवारक और संवर्धक स्वास्थ्य देखभाल पद्धतियों को प्रोत्साहित करके किया जाता है।
इसके जरिये आयुष में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के साथ-साथ, विशेषज्ञों के आदान-प्रदान, शैक्षणिक सहयोग और छात्रवृत्तियों के माध्यम से वैश्विक पहचान को आगे बढ़ाया जाता है। ये सभी प्रयास मिलकर आयुष प्रणालियों के घरेलू आधार और अंतर्राष्ट्रीय उपस्थिति, दोनों को सुदृढ़ करते हैं।
महामारी की तैयारी और उसके उपचार में होम्योपैथी 12
महामारी की तैयारी में होम्योपैथी एक पूरक साधन के रूप में उभरी है, जिसमें निवारक, संवर्धक और सहायक रणनीतिक तरीकों का उपयोग किया जाता है। केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद भारत भर में फैले अपने 33 संस्थानों और इकाइयों के माध्यम से महामारी से संबंधित अनुसंधान और चिकित्सा सम्बन्धी कार्य कर रहा है।
|
वैश्विक स्तर पर होम्योपैथी के क्षेत्र में सफलता की कहानियाँ 13
केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद (सीसीआरएच) ने भारत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महामारी प्रबंधन के लिए होम्योपैथिक हस्तक्षेपों को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
इसके कुछ प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं:
- भारत-जापानी एन्सेफलाइटिस/एईएस (यूपी): 96 गांवों में 3 लाख से अधिक लोगों को ‘बेलाडोना200’ बांटी गई, जिससे ‘एईएस’ के मामलों को रोकने और मानक उपचार के साथ मिलकर परिणामों को बेहतर बनाने में मदद मिली।
- भारत–चिकनगुनिया की रोकथाम (केरल, 2007): 19,750 लोगों को ब्रायोनिया अल्बा 30C दी गई, जिसके परिणामस्वरूप बीमारी के मामलों में काफ़ी कमी आई, बुखार के मामलों में 84.5% तेजी से सुधार हुआ और पुराने गठिया के रोग में 90% सुधार हुआ।
- क्यूबा - डेंगू प्रबंधन: होम्योपैथिक कॉम्प्लेक्स (ब्रायोनिया अल्बा, यूपेटोरियम परफोलिएटम, जेल्सेमियम एस., डेंगू नोसोड) से इलाज किए गए 25,000 रोगियों में महत्वपूर्ण सुधार हुआ और अस्पताल में रहने वाले रोगियों की संख्या में कमी आई।
- बहु-रोग महामारी शिविर (भारत): डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड, खसरा, मेनिनजाइटिस और कंजंक्टिवाइटिस के लिए सीसीआरएच के हस्तक्षेप, जिनमें लक्षणों पर आधारित और 'जीनस एपिडेमिकस' उपचारों का उपयोग किया गया।
- कोविड -19 इलाज (भारत): आयुष मंत्रालय के सहयोग से, 136 केंद्रों पर लगभग 5 लाख लोगों को निवारक उपाय के तौर पर 'आर्सेनिकम एल्बम 30सी' दी गई।
|
निष्कर्ष: परंपरा और परिवर्तन का संगम
भारत में होम्योपैथी एक अनूठी यात्रा को दर्शाती है, जहाँ समय-सिद्ध सिद्धांत समकालीन प्रगति के साथ सहजता से मेल खाते हैं। समग्र उपचार की एक समृद्ध परंपरा में निहित यह पद्धति, वैज्ञानिक अनुसंधान, सुदृढ़ विनियमन और विस्तारित शैक्षिक क्षमता द्वारा संचालित एक सार्थक परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। परंपरा और आधुनिकीकरण के इस समागम ने आज के स्वास्थ्य परिदृश्य में इसकी विश्वसनीयता और प्रासंगिकता दोनों को बढ़ाया है।
केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद (सीसीआरएच) और राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग (एनसीएच) जैसे संस्थान साक्ष्य-आधारित उपचार, मानकीकरण और पेशेवर उत्कृष्टता को बढ़ावा देकर इस परिवर्तन का उदाहरण पेश करते हैं। साथ ही, सार्वजनिक स्वास्थ्य पहलों और महामारी के उपचार में होम्योपैथी का एकीकरण समकालीन स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने में इसकी लगातार बढ़ती भूमिका को रेखांकित करता है।
भविष्य की ओर बढ़ते हुए, भारत में होम्योपैथी एक अधिक समावेशी, सुलभ और एकीकृत स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में योगदान देने के लिए पूरी तरह से तैयार है।
फुटनोट
[1] Homoeopathy | Ministry of Ayush, India
2https://whdccrh.org/
3Homoeopathy | Ministry of Ayush, India
4https://www.google.com/url?sa=t&source=web&rct=j&opi=89978449&url=https://nch.org.in/upload/Circular%2520dated%252009.03.2026.pdf&ved=2ahUKEwisl6XQisyTAxXZTGwGHSqoDtMQFnoECBsQAQ&usg=AOvVaw06Ct4o3NhqUH3N6yHohvap
5Homoeopathy | Ministry of Ayush, India
6Origin and Growth of Homeopathy in India | Department of Homeopathy
7https://elms.ayush.gov.in/aboutnch
8 https://pcimh.gov.in/show_content.php?lang=1&level=1&ls_id=5&lid=5
9 https://ayush.gov.in/#!/schemes
10 Press Release Page | Press Information Bureau
11 Download
12 Epidemics research since inception.pdf
13 Epidemics research since inception.pdf
संदर्भ
आयुष मंत्रालय
https://ayush.gov.in
https://elms.ayush.gov.in/homoeopathy
About PCIM&H - PHARMACOPOEIA COMMISSION FOR INDIAN MEDICINE & HOMOEOPATHY (Government of India)
https://ccrhindia.ayush.gov.in/emr?language_content_entity=en
केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद
https://ccrhindia.ayush.gov.in/
https://ccrhindia.ayush.gov.in/publications/annual-reports
https://ccrhindia.ayush.gov.in/publications/annual-reports
https://whdccrh.org/about.html
https://homeopathy.delhi.gov.in/homeopathy/origin-and-growth-homeopathy-india
https://www.google.com/url?sa=t&source=web&rct=j&opi=89978449&url=https://ayush.telangana.gov.in/open_record_view.php%3FID%3D150&ved=2ahUKEwjF7Oyc6caTAxVWTmwGHZ_FGjUQFnoECBoQAQ&usg=AOvVaw2IYzqHzr6hHSsiz_CI_WDq
https://www.instagram.com/p/DIQLCJ9ptKd/?img_index=4
पीआईबी
https://www.pib.gov.in/newsite/PrintRelease.aspx?relid=133271&utm_source=chatgpt.com®=3&lang=2
See In PDF
पीआईबी शोध
पीके/केसी/एसके
(Explainer ID: 158108)
आगंतुक पटल : 91
Provide suggestions / comments