Farmer's Welfare
भारत के खाद्य प्रसंस्करण इकोसिस्टम का सशक्तिकरण
खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए उत्पादन पर आधारित प्रोत्साहन योजना
Posted On:
21 APR 2026 10:42AM
मुख्य बातें
- पीएलआईएसएफपीआई (परिव्यय 10,900 करोड़ रुपये; 2021-22 से 2026-27) का उद्देश्य बिक्री में वृद्धि एवं ब्रांड के प्रचार को प्रोत्साहित करके वैश्विक स्तर पर भारतीय खाद्य मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की अग्रणी कंपनियों का निर्माण करना है
इस योजना के अंतर्गत (फरवरी 2026 तक):
- कुल 274 परियोजना स्थलों से संबंधित 165 आवेदनों को मंजूरी दे दी गई है
- लाभार्थियों को 2,162.55 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि प्राप्त हुई है
- ~3.39 लाख रोजगार सृजित किए गए हैं, जोकि 2.5 लाख के रोजगार के लक्ष्य से अधिक है
- खाद्य प्रसंस्करण एवं संरक्षण क्षमता में प्रति वर्ष 34 लाख एमटी की वृद्धि हुई है
- कृषि प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के कुल निर्यात में 2019-20 की तुलना में 2024-25 के दौरान 13.23 प्रतिशत की सीएजीआर की दर से वृद्धि हुई है
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भूमिका
भारत का खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र कृषि और मैन्यूफैक्चरिंग इकोसिस्टम का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभरा है। यह क्षेत्र मूल्यवर्धन को बढ़ावा देता है, बाजार के साथ जुड़ाव को मजबूत करता है और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की उपलब्धता को बढ़ाता है। हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में निरंतर विकास हुआ है और पहले संशोधित अनुमानों के अनुसार, सकल मूल्य वर्धित (जीवीए) 2014-15 में 1.34 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2023-24 में 2.24 लाख करोड़ रुपये हो गया है। वैश्विक स्तर पर इसकी बढ़ती उपस्थिति कृषि निर्यात में प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के निर्यात की हिस्सेदारी में परिलक्षित होती है, जो 2014-15 में 13.7 प्रतिशत से बढ़कर 2024-25 में 20.4 प्रतिशत हो गई है।
फलों एवं सब्जियों का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक होने के नाते अपने मजबूत संसाधन आधार के साथ, भारत खाद्य प्रसंस्करण के वैश्विक केन्द्र के रूप में उभरने की अपार क्षमता रखता है। हालांकि, इस क्षमता को साकार करने हेतु उत्पादन के पैमाने, उत्पादकता, मूल्यवर्धन और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं के साथ एकीकरण के संदर्भ में बढ़ी हुई प्रतिस्पर्धात्मकता आवश्यक है। इन अनिवार्यताओं को पहचानते हुए, सरकार ने खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए उत्पादन पर आधारित प्रोत्साहन योजना (पीएलआईएसएफपीआई) की शुरुआत की है ताकि विकास को गति दी जा सके तथा दुनिया के बाजारों में भारत की स्थिति को और अधिक मजबूत बनाया जा सके।
पीएलआईएसएफपीआई के अवधारणात्मक एवं नीतिगत ढांचे को समझना
खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए उत्पादन पर आधारित प्रोत्साहन योजना, जिसे केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने 31 मार्च 2021 को मंजूरी दी थी, व्यापक उत्पादन पर आधारित प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत आती है।

उत्पादन पर आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना की शुरुआत पात्र कंपनियों को उनकी बिक्री में हुई वृद्धि के आधार पर वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करके घरेलू मैन्यूफैक्चरिंग क्षमताओं को बढ़ावा देने के इरादे से अप्रैल 2020 में की गई थी। इस योजना का उद्देश्य मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को मजबूत करके देश को अपेक्षाकृत अधिक संतुलित और स्थिर प्रगति हासिल करने में समर्थ बनाना था।
आत्मनिर्भर भारत और व्यापक ‘मेक इन इंडिया’ पहल की परिकल्पना के अनुरूप, पीएलआई योजना का समावेश शुरू में मोबाइल मैन्यूफैक्चरिंग और विशिष्ट इलेक्ट्रॉनिक घटकों, महत्वपूर्ण प्रारंभिक सामग्री/दवा मध्यवर्ती एवं सक्रिय फार्मास्यूटिकल अवयवों तथा चिकित्सा उपकरणों की मैन्यूफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में किया गया था। कुछ समय बाद, 1.97 लाख करोड़ रुपये के प्रोत्साहन आवंटन के साथ पीएलआई ढांचे का विस्तार 14 रणनीतिक क्षेत्रों को शामिल करने के लिए किया गया है। इन रणनीतिक क्षेत्रों में खाद्य प्रसंस्करण एक अहम क्षेत्र है।
कुल 10,900 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ, पीएलआईएसएफपीआई योजना 2021-22 से 2026-27 तक कार्यान्वित की जा रही है। इस योजना का उद्देश्य 2026-27 तक कुल 33,494 करोड़ रुपये का प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादन करना और लगभग 2.5 लाख लोगों के लिए रोजगार सृजित करना है।

उत्पादन से लेकर ब्रांडिंग तक: पीएलआईएसएफपीआई का एकीकृत ढांचा
खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए उत्पादन पर आधारित प्रोत्साहन योजना (पीएलआईएसएफपीआई) की संरचना तीन मुख्य घटकों के इर्द-गिर्द की गई है, जिन्हें मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ावा देने, लघु एवं मध्यम उद्यमों के बीच नवाचार को प्रोत्साहित करने और भारतीय खाद्य उत्पादों की वैश्विक ब्रांडिंग को सहायता प्रदान करने हेतु डिजाइन किया गया है।

पहला घटक (श्रेणी I): चार प्रमुख खाद्य उत्पाद खंडों की मैन्यूफैक्चरिंग को प्रोत्साहन देना, अर्थात् पकाने योग्य (रेडी-टू-कुक)/ खाने योग्य (रेडी-टू-ईट) (आरटीसी/आरटीई) खाद्य पदार्थ, जिनमें पोषक अनाज (मिलेट) पर आधारित उत्पाद, प्रसंस्कृत फल एवं सब्जियां, समुद्री उत्पाद और मोजरेला पनीर शामिल हैं।
दूसरा घटक (श्रेणी II): फ्री रेंज-अंडे, मुर्गी का मांस एवं अंडे से बने उत्पाद समेत खाद्य उत्पादों के सभी चार खंडों में लघु एवं मध्यम उद्यमों के नवोन्मेषी/जैविक उत्पादों को प्रोत्साहन देना।
तीसरा घटक (श्रेणी III): मजबूत भारतीय ब्रांडों के उदय को प्रोत्साहित करने हेतु विदेशों में ब्रांडिंग और मार्केटिंग, जिसमें इन-स्टोर ब्रांडिंग, शेल्फ स्पेस रेंटल तथा मार्केटिंग शामिल है, के लिए समर्थन।
इसके अलावा, पीएलआईएसएफपीआई के तहत बचत से, वित्त वर्ष 2022-23 में 800 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ पोषक अनाज (मिलेट) पर आधारित उत्पादों के लिए उत्पादन पर आधारित प्रोत्साहन योजना (पीएलआईएसएमबीपी) नाम का एक नया घटक बनाया गया। इस घटक का उद्देश्य आरटीसी/आरटीई उत्पादों में पोषक अनाज (मिलेट) के उपयोग को प्रोत्साहित करना और इसके उत्पादन, मूल्यवर्धन और बिक्री को बढ़ावा देने की योजना के तहत इसके उपयोग को प्रोत्साहित करना है।
विकास को पुरस्कृत करना: पीएलआईएसएफपीआई की प्रोत्साहन संरचना
खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए उत्पादन पर आधारित प्रोत्साहन योजना (पीएलआईएसएफपीआई) के तहत, इस योजना के मैन्यूफैक्चरिंग संबंधी घटक (श्रेणी I और श्रेणी II) निर्दिष्ट खाद्य उत्पादों की बिक्री में वृद्धि के आधार पर पात्र खाद्य प्रसंस्करण कंपनियों को प्रोत्साहन प्रदान करते हैं। इन घटकों के अंतर्गत, आवेदकों को आधार वर्ष (2019-20) में न्यूनतम बिक्री सीमा को पूरा करना होगा और खाने योग्य (रेडी-टू-ईट)/पकाने योग्य (रेडी-टू-कुक) खाद्य पदार्थ, प्रसंस्कृत फल एवं सब्जियां, समुद्री उत्पाद और मोजरेला पनीर जैसे क्षेत्रों में संयंत्र एवं मशीनरी, तकनीकी सिविल कार्य और संबंधित बुनियादी ढांचे में निर्धारित निवेश करना होगा।
श्रेणी III के अंतर्गत, सरकार दुनिया के बाजारों में भारतीय ब्रांडेड उपभोक्ता खाद्य उत्पादों की ब्रांडिंग और विपणन गतिविधियों को बढ़ावा देने हेतु वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करती है। आवेदकों को विदेशों में उनके ब्रांडिंग एवं विपणन संबंधी खर्चों के 50 प्रतिशत हिस्से की प्रतिपूर्ति की जाती है, जो उनकी वार्षिक खाद्य उत्पाद बिक्री के 3 प्रतिशत या 50 करोड़ रुपये प्रति वर्ष, जो भी कम हो, तक सीमित है। इस घटक के अंतर्गत केवल वे भारतीय ब्रांड शामिल किए जाते हैं, जो पूरी तरह से भारत में निर्मित खाद्य उत्पाद बेचते हैं। पात्रता हासिल करने के लिए, आवेदकों को पांच वर्षों की अवधि में न्यूनतम 5 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे।
पीएलआईएसएफपीआई की संस्थागत व्यवस्था और कार्यान्वयन ढांचा
यह योजना एक परियोजना प्रबंधन एजेंसी (पीएमए) के जरिए कार्यान्वित की जाती है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय द्वारा भारत सरकार के उपक्रम, औद्योगिक वित्त निगम लिमिटेड (आईएफसीआई) को पीएमए के रूप में नियुक्त किया गया है। पीएलआईएसएफपीआई के अंतर्गत आवेदन रुचि की अभिव्यक्ति (ईओआई) के जरिए आमंत्रित किए जाते हैं और इन्हें एक ऑनलाइन पोर्टल (https://plimofpi.ifciltd.com) पर जमा किया जाता है, जहां पीएमए द्वारा निर्धारित समय सीमा के भीतर इनकी जांच और मूल्यांकन किया जाता है। सफलतापूर्वक आवेदन जमा होने पर, भविष्य में किए जाने वाले सभी पत्राचार के लिए एक विशिष्ट आवेदन आईडी जारी की जाती है। परियोजना की प्रगति की निरंतर ऑनलाइन निगरानी और आवश्यकता पड़ने पर अंतरिम सुधारात्मक उपाय करने के लिए एक वेब-आधारित एमआईएस प्रणाली का उपयोग किया जाता है।
पीएलआईएसएफपीआई का परिवर्तनकारी प्रभाव: मैन्यूफैक्चरिंग, एमएसएमई और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को मजबूती
इस योजना ने उन्नत प्रौद्योगिकियों को अपनाने और कई उत्पादन लाइनों की स्थापना को सुगम बनाया है। इसके परिणामस्वरूप फरवरी 2026 तक प्रति वर्ष 34 लाख एमटी प्रसंस्करण और संरक्षण क्षमता का सृजन हुआ है।
पीएलआईएसएफपीआई ने उद्योग जगत की मजबूत भागीदारी और निवेश को भी आकर्षित किया है:
- खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय द्वारा विभिन्न श्रेणियों में कुल 165 आवेदनों को मंजूरी दी गई है।
- ये मंजूरियां 274 परियोजना स्थलों से संबंधित हैं।
- लाभार्थियों ने इस योजना के तहत 9,207 करोड़ रुपये के निवेश की सूचना दी है।
- फरवरी 2026 तक कुल 2,162.55 करोड़ रुपये के प्रोत्साहन वितरित किए जा चुके हैं।
कुल मिलाकर, ये नतीजे क्षमता के विस्तार को उत्प्रेरित करने, निजी निवेश को जुटाने और भारतीय खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की तकनीकी एवं परिचालन संबंधी क्षमताओं को मजबूत करने में इस योजना की प्रभावशीलता को रेखांकित करते हैं।

इस योजना ने सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्वीकृत 165 आवेदनों में से 69 आवेदक एमएसएमई हैं (फरवरी 2026 तक)। इसके अलावा, मुख्य स्वीकृत आवेदकों से जुड़ी 40 संविदा मैन्यूफैक्चरिंग इकाइयां एमएसएमई श्रेणी में आती हैं, जो मूल्य श्रृंखला में उनके एकीकरण को दर्शाती हैं। साथ ही, 28 फरवरी 2025 तक 20 पात्र एमएसएमई को 13.266 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि वितरित की जा चुकी है।
क्षमता और निवेश में इस विस्तार के परिणामस्वरूप रोजगार का पर्याप्त सृजन हुआ है। फरवरी 2026 तक लगभग 3.39 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित किए गए हैं, जो 2026-27 तक 2.5 लाख रोजगार के इस योजना के लक्ष्य से कहीं अधिक है।
इसके अलावा, पीएलआईएसएफपीआई ने दुनिया के प्रसंस्कृत खाद्य बाजारों में भारत की उपस्थिति को मजबूत करने में योगदान दिया है:
• इस योजना के अंतर्गत स्वीकृत कृषि प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के निर्यात में 2019-20 की तुलना में 2024-25 तक 13.23 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) दर्ज की गई है।
• वित्तीय वर्ष अप्रैल 2021 से वित्तीय वर्ष सितंबर 2025 की अवधि के दौरान, पीएलआईएसएफपीआई लाभार्थियों की संचयी निर्यात बिक्री 89,053.44 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
निष्कर्ष
खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए उत्पादन पर आधारित प्रोत्साहन योजना (पीएलआईएसएफपीआई) भारत के खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में विकास के प्रमुख वाहक के रूप में उभरी है। प्रोत्साहनों को बिक्री में वृद्धि से जोड़कर, इसने निवेश को प्रोत्साहित किया है, उत्पादन क्षमता का विस्तार किया है और भारतीय खाद्य उत्पादों की वैश्विक उपस्थिति को मजबूत किया है। मूल्यवर्धन, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की भागीदारी और पोषक अनाज (मिलेट) पर आधारित उत्पादों पर इसके जोर ने समावेशी विकास में योगदान दिया है।
इस योजना ने कृषि और उद्योग के बीच संबंधों को मजबूत किया है तथा मूल्य श्रृंखला में रोजगार सृजित किया है। कुल मिलाकर, इन सभी नतीजों ने पीएलआईएसएफपीआई को देश में अधिक प्रतिस्पर्धी, सुदृढ़ और समावेशी खाद्य प्रसंस्करण इकोसिस्टम के निर्माण के एक मजबूत आधार के रूप में स्थापित किया है।
संदर्भ
वित्त मंत्रालय
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय
खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय
पीआईबी बैकग्राउंडर्स
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पीआईबी रिसर्च
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