वित्त मंत्रालय
पुन: वितरणकारी संसाधन अंतरणों (आर आर टी) को राज्यों की ओर से वित्तीय और शासन के प्रयासों से महत्वपूर्ण रूप से जोड़ा जाना चाहिए : आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17
समस्त पूर्वोत्तर राज्यों (असम को छोड़कर) और जम्मू-कश्मीर के लिए वार्षिक प्रतिव्यक्ति आर आर टी प्रवाह वार्षिक प्रतिव्यक्ति उपभोग व्यय बढ़ गया है, जो अखिल भारतीय गरीबी रेखा विशेषकर ग्रामीण रेखा को परिभाषित करता है।
प्रविष्टि तिथि:
31 JAN 2017 12:13PM by PIB Delhi
वित्तमंत्री श्री अरुण जेटली द्वारा आज संसद में पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 में इस बात का परीक्षण किया गया है कि क्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘सहायता संबंधी समस्या’ और ‘प्राकृतिक संसाधन संबंधी समस्या’ से संबंधित प्रभाव भारतीय राज्यों के संदर्भ में समझने योग्य हैं। यह केंद्र से (1994 से 2015 के बीच) पुन: वितरणकारी संसाधन अंतरणों (आर आर टी) और भारतीय राज्यों के लिए प्राकृतिक संसाधनों के मूल्य (1980 और 2014 में) की गणना करता है और इन्हें अनेक आर्थिक निष्कर्षों और शासन के एक सूचकांक के साथ परस्पर संबद्ध करता है।
किसी राज्य (केंद्र की ओर से) के पुन: वितरणकारी संसाधन अंतरणों या आर आर टी को राज्य के सकल हस्तांतरण के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो कुल सकल घरेलू उत्पाद में संबंधित क्षेत्र के अंश को समायोजित किया जाता है। प्राप्त करने वाले दस शीर्ष राज्य हैं : सिक्किम, अरुणाचलप्रदेश, मिजोरम, नागालैंड, मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा, जम्मू–कश्मीर, हिमाचलप्रदेश और असम।
चित्र - 1 2015 में राज्यों की रैंकिंग प्रतिव्यक्ति संदर्भ में प्राप्त आर आर टी के घटते क्रम और प्रतिव्यक्ति सकल हस्तांतरण के रूप में दर्शाता है। चित्र – 1 में दर्शायी गईं पीली और हरी डॉट वाली लाइनें क्रमश: अखिल भारतीय ग्रामीण और अखिल भारतीय शहरी वार्षिक प्रतिव्यक्ति गरीबी रेखा को दर्शाती है। समस्त पूर्वोत्तर राज्यों (असम को छोड़कर) और जम्मू-कश्मीर के लिए वार्षिक प्रतिव्यक्ति आर आर टी प्रवाह वार्षिक प्रतिव्यक्ति उपभोग व्यय बढ़ गया है, जो अखिल भारतीय गरीबी रेखा विशेषकर ग्रामीण रेखा को परिभाषित करता है।
चित्र – 1 प्रतिव्यक्ति सकल हस्तांतरण और आर आर टी – 2015

आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 इस बात की ओर इंगित करता है कि इन हस्तांतरणों और प्रतिव्यक्ति उपभोग, जी एस डी पी वृद्धि, विनिर्माण का विकास, अपने कर राजस्व संबंधी प्रयास और संस्थागत गुणवत्ता सहित विविध आर्थिक निष्कर्षो के बीच किसी सकारात्मक संबंध का कोई प्रमाण नहीं है।
इसकी बजाय नकारात्मक संबंध के प्रमाण का संकेत है। उदाहरण के तौर पर विशाल आर आर टी प्रवाह वित्तीय प्रयासों (जीएसडीपी के प्रति कर राजस्व के अपने अंश के रूप में परिभाषित) पर नकारात्मक प्रभाव डालते प्रतीत होते हैं।
साथ ही क्या खनिज की दृष्टि से समृद्ध राज्य जैसे झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडि़शा, राजस्थान और गुजरात आर्थिक निष्कर्षों की मात्रा पर अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं और गवर्नेंस पर विचार पुन: वितरणकारी हस्तांतरणों के संदर्भ में किया जाता है। हालांकि इससे कोई निर्णायक नतीजे सामने नहीं आते और 2001-14 की अवधि में वित्तीय प्रयासों तथा प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्त राजस्व पर निर्भरता के बीच किसी तरह के नकारात्मक संबंध के कोई प्रमाण नहीं हैं।
चित्र -3 वित्तीय प्रयास और प्रतिव्यक्ति खनिज मूल्य (2001-2014)

इस प्रकार भारतीय राज्यों के संदर्भ में ‘आर आर टी समस्या’ की मौजूदगी और प्राकृतिक संसाधन समस्या का अभाव का आशय है कि केंद्र और राज्य दोनों को आर आर टी समस्या के प्रभावों को कम करने के लिए कदम उठाने की जरूरत है और भविष्य में प्राकृतिक संसाधन समस्या के उभरने के प्रति सचेत रहने की जरूरत है। इस संदर्भ में प्रश्न यह उठता है कि क्या आर आर टी, भविष्य में राज्यों की ओर से वित्तीय और शासन के प्रयासों से ज्यादा विशिष्ट रूप से जोड़ा जा सकता है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 में यह भी कहा गया है कि आर आर टी का अंश उपलब्ध कराने या फिर संसाधनों से प्राप्त लाभ का पुन:वितरण संबंधित राज्यों में परिवारों के लिए सीधे तौर पर सार्वभौमिक मूलभूत आय (यू बी आई) के रूप में प्रयोग किए जा सकते हैं, जो विशाल आर आर टी प्रवाह प्राप्त करते हैं और प्राकृतिक संसाधन से प्राप्त होने वाले राजस्व पर ज्यादा आश्रित हैं।
आखिर में, इतिहास की भूलों से बचने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण होगा कि पुन: वितरण संसाधनों या प्राकृतिक संसाधनों की संभावित विकृतियों की पहचान और समाधान किया जाए।
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राजू/जगदीश/1
(रिलीज़ आईडी: 1485588)
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