वित्‍त मंत्रालय

विकसित देशों द्वारा अपनाया गया राजकोषीय सक्रियतावाद भारत के लिए प्रासंगिक नहीं है : आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17

भारत का आर्थिक अनुभव एफआरबीएम अधिनियम 2003 के राजकोषीय नीतिगत सिद्धांतों की बुनियादी वैधता को रेखांकित करता है : आर्थिक सर्वेक्षण

प्रविष्टि तिथि: 31 JAN 2017 1:11PM by PIB Delhi

भारत का आर्थिक अनुभव यह दर्शाता है कि विकसित देशों द्वारा अपनाया गया वह राजकोषीय सक्रियतावाद भारत के लिए प्रासंगिक नहीं है, जिसके तहत प्र‍ति-चक्रीय नीतियों की भूमिका बढ़ाई जा रही है और ऋण पर अंकुश लगाने को कम अहमियत दी जा रही है। वित्‍त मंत्री श्री अरुण जेटली द्वारा आज संसद में पेश किये गये आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 में इस ओर ध्‍यान दिलाया गया है। आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि भारत के राजकोषीय अनुभव ने राजकोषीय उत्‍तरदायित्‍व एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) अधिनियम 2003 में उल्‍लेखित राजकोषीय नीति के सिद्धांतों की बुनियादी वैधता को रेखांकित किया है।

वर्ष 2008-09 में गहराए वैश्विक वित्‍तीय संकट (जीएफसी) के बाद से ही अंतरराष्‍ट्रीय राजकोषीय नीति में व्‍यापक बदलाव देखा जा रहा है, जिसके तहत अब ऋणों के बजाय घाटे पर विशेष जोर दिया जा रहा है, प्रवाह (घाटा) के मामले में अपेक्षाकृत ज्‍यादा सक्रियतावाद की वकालत की जा रही है और स्‍टॉक (ऋण) की निरंतरता को लेकर उपजी चिंताओं को कम किया जा रहा है। हालांकि, तेजी के दौर में खर्चों पर विशेष ध्‍यान देने और मंदी के दौर में प्रोत्‍साहन संबंधी कदम उठाए जाने के मद्देनजर भारत के अनुभव से राजकोषीय घाटे को अंकुश में रखने के नियमों की जरूरत की फिर से पुष्टि हुई है। भारत के अनुभव से स्थिर विकास के बजाय त्‍वरित विकास पर निर्भर रहने के खतरों के बारे में भी जानकारी मिली है। संक्षिप्‍त में इसने एफआरबीएम में उल्‍लेखित राजकोषीय नीतिगत सिद्धांतों की बुनियादी वैधता को रेखांकित किया है।

वैसे तो एफआरबीएम के बुनियादी सिद्धांत अब भी वैध हैं, लेकिन वर्ष 2003 में तैयार की गई परिचालनगत रूपरेखा में आज के भारत की राजकोषीय नीतिगत दिशा को देखते हुए इसमें संशोधन करने की जरूरत है। यहां तक कि, यह कल के भारत के लिए और भी महत्‍वपूर्ण है। 21वीं शताब्‍दी के लिए एफआरबीएम के जरिए यह नया विजन तय करना एफआरबीएम समीक्षा समिति का अहम कार्य होगा।

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राजू/जगदीश - 10


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