वित्‍त मंत्रालय

राजकोषीय नियम : राज्यों से प्राप्त शिक्षा

प्रविष्टि तिथि: 31 JAN 2017 12:58PM by PIB Delhi

2000 के दशक के बीच भारत में राजकोषीय सुदृढ़ीकरण की एक महत्वकांक्षी परियोजना का आरंभ किया, जिसके तहत ऐसे राजकोषीय नियम स्वीकार किए गए जिनका उद्देश्य राजकोषीय घाटों को नियंत्रित करना था। केंद्र के राजकोषीय दायित्व एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) अधिनियम में राज्यों द्वारा अपनाए गए राजकोषीय दायित्व विधान
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एफआरएल) का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। 2005 के बाद राज्यों की वित्तीय स्थिति में लगभग सभी क्षेत्रों में सुधार हुआ। औसत राजस्व घाटे का पूर्ण उन्मूलन कर दिया गया, जबकि औसत राजकोषीय घाटे को जीएसडीपी के तीन प्रतिशत से भी कम तक नियंत्रित कर लिया गया, जैसा कि एफआरएल के तहत अधिदेश दिया गया। तदनुसार, वित्तीय वर्ष 2013 में औसत ऋण बनाम जीएसडीपी अनुपात 10 प्रतिशत बिंदु गिरकर मात्र जीएसडीपी के 22 प्रतिशत पर गया।

फिर भी, एफआरएल लागू करने के बाद राजकोषीय प्रगति आरंभ हुई, इसका यह अर्थ नहीं है कि इस प्रगति के लिए एफआरएल ही उत्तरदायी थे। यह अध्याय इस बात की जांच करता है कि किस सीमा तक राज्यों के राजकोषीय सुदृढीकरण में एफआरएल का वास्तविक रूप में योगदान है।

निम्नलिखित बातें प्रमुख तौर पर पाई गयी हैं :

  • घाटे में कटौती अधिकाधिक रूप में उपयुक्त बाहरी कारकों पर आधारित है (आंकड़े 1 देखें) :

o   जीडीपी की वृद्धि में मामूली तेजी (2005 के बाद औसतन 6 प्रतिशत बिंदु) ने राज्यों के राजस्व में लगभग जीएसडीपी के 1 प्रतिशत की वृद्धि करने में सहायता की ;

o   केंद्र द्वारा अतंरित राशि में जीएसडीपी के लगभग 1 प्रतिशत की वृद्धि, 13वें वित्त आयोग की सिफारिशों और केंद्रीय सरकारी राजस्वों में वृद्धि, दोनों के कारण;

o   केंद्र द्वारा प्रदान किए गए ऋण पुनर्निर्माण पैकेज के कारण जीएसडीपी के लगभग 0.9 प्रतिशत के कम ब्याज भुगतान ; तथा

o   राज्यों द्वारा खर्च की जाने वाली राशि की जरूरत में कमीलगभग जीडीपी के 1.2 प्रतिशत तक अनुमानितक्योंकि केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाओँ (सीएसएस) के तहत अनेक मुख्य सामाजिक क्षेत्र के खर्चों की जिम्मेदारी ली।

 
 


आंकड़ा 1 :  राज्यों के एफआरएल से पहले और बाद में राजकोषीय, प्राथमिक एवं राजस्व घाटे में कटौती का अलग-अलग ब्यौरा

  • अपव्ययता के बजाय आडंबर से बचाव को संभवतः राज्यों का वास्तविक योगदान माना जा सकता हैराजस्व में वृद्धि के बावजूद, गैर-ब्याज राजस्व व्यय केवल जीएसडीपी के 0.4 प्रतिशत तक ही बढ़े।
  • गैर-बजट खर्चों में गिरावट आई, जैसा कि सार्वजनिक उपकरणों दी गई गारंटी और ऋणों के प्रवाह से आंका गया है।
  • पूर्वानुमान संबंधी गलतियों की मात्रा में भारी गिरावट आई जो बजट निर्माण की प्रक्रिया में सुधार को दर्शाता है। बजटीकृत एवं वास्तविक कर राजस्व के बीच की कमियां एफआरएल से पूर्व वास्तविक (आशावादी पूर्वानुमान) के औसतन 5.9 प्रतिशत से घटकर बाद में वास्तविक के  -0.6 प्रतिशत तक गयीं।
  • यह सभी सकारात्मक संकेतक बाद के वर्षों में ह्रास के संकेत प्रदर्शित करते हैं ; उदाहरण के लिए एफआरएल के पश्चात औसतन 10 वर्ष में राजकोषीय घाटे 3 प्रतिशत की सीमा के निकट हैं (आकंड़े – 2 देखें)

आंकड़ा 2 :  राज्यों का औसत राजकोषीय घाटा, एफआरएल अंगीकरण की तुलना में (जीएसडीपी के प्रतिशत के रूप में)


चूंकि वेतन आयोग की सिफारिशों के कारण, तथा यूडीएवाई बॉन्ड से भुगतान में वृद्धि के कारण आगे बढ़ रहे राज्यों के लिए राजकोषीय चुनौतियों में वृद्धि हो रही है, इस बात की समीक्षा की आवश्यकता है कि राजकोषीय प्रदर्शन को किस प्रकार नियंत्रित रखा जा सकता है। श्रेष्ठ राजकोषीय प्रदर्शन को बढ़ावा देने पर अधिक विश्वास करने की आवश्यकता होगी, क्योंकि राज्य धीरे-धीरे केंद्र के प्रति अपने दायित्वों को पूरा कर रहे हैं, तथा उन पर ठोस बजट नियंत्रण आरोपित करने की उसकी योग्यता को कम कर रहे हैं। तथापि, सबसे अधिक, राज्यों के श्रेष्ठ प्रदर्शन को प्रोत्साहित करने में केंद्र से यह अपेक्षा होगी कि वह खुद मजबूत राजकोषीय प्रबंधन का उदाहरण प्रस्तुत करे।

वी.लक्ष्मी/सुविधा/अमित/जितेन्द्र/इन्दपाल/राजीवरंजन/शशि/राणा/गांधी/रीता/मनीषा/विकासयशोदा/सुनीता/गीता/सुनील/सागर/धर्मेन्द्र/महेश/हरेन्द्र/राजीव/

राजू/जगदीश - 6


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