सूचना और प्रसारण मंत्रालय

आईएफएफआई 2017 के आठवें दिन भारतीय पैनोरमा में निर्देशकों से मिलिए कार्यक्रम आयोजित 

पिछले कुछ वर्षों से भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह (आईएफएफआई) एक वैश्विक और भारतीय परिप्रेक्ष्य में सिनेमा के उभरते समसामयिक रूझानों को कैद करता रहा है। एक मंच के रूप में इसने हमेशा ही युवा फिल्मकारों एवं सृजनशील लोगों की भागीदारी को प्रोत्साहित किया है।

इस वर्ष समारोह में युवा फिल्मकारों ने नए विचारों को प्रदर्शित किया एवं अपनी कृतियों  में नवोन्मेषण का उपयोग किया। प्रायोगिक फिल्म निर्माण एवं जोखिम लेने की इच्छा आईएफएफआई में प्रदर्शित फिल्मों के प्रकार से स्पष्ट झलक रही थी। ऐसे युवा फिल्मकारों, जिनका विश्वास है कि फिल्मों का निर्माण उच्च बौद्धिकता, बेहतर कंटेंट तथा उत्कृष्ट विजुअल तरीके से किया जाना चाहिए, ने फिल्म समारोह के दौरान मजबूती से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

जिन फिल्मकारों ने इस समारोह में भाग लिया - उनमें प्रतिम डी गुप्ता : निर्देशक माछेर झोल, तरूण जैन  : निर्देशक हरियाणवी गैर फीचर फिल्म अम्मा मेरी, नितिन आर : निर्देशक हिंदी गैर-फीचर फिल्म नेम प्लेस एनीमल थिंग एवं टेक ऑफ के निर्देशक महेश नारायण शामिल थे। इन लोगों ने अपने विचार सामने रखे एवं अपने अनुभव साझा किए।

निर्देशक महेश ने टेक ऑफ के निर्माण के पीछे की प्रेरणा के बारे में बताया कि, ‘अगर आप केरल से यहां आने वाले नर्सिंग समुदाय को देखें, तो आप पाएंगे कि यह एक विशाल समुदाय है। इन नर्सों का केरल की तरह यहां कोई मानक वेतन नहीं है। मेरा कहना यह है कि वे युद्ध से घिरे इन क्षेत्रों में क्यों जाते हैं। उनका सम्मान सीमा पर कार्य करने वाले लोगों की तरह होना चाहिए। उन्हें जो घाव मिलते हैं, वे गोलियों के घाव हैं। वे इसके लिए तैयार नहीं हैं, फिर भी वे वहां जा रहे हैं। यही प्रश्न इस फिल्म के निर्माण के पीछे की प्रेरणा है।’

प्रतिम कहते है, ‘यह फिल्म संबंधों और एक विघटित परिवार के बारे में है। भोजन का उपयोग फिल्म में किसी रूपक की तरह किया गया है। फिल्म में खाने से संबंधित कई यादगार दृश्य हैं। भोजन कई प्रकार से मानवीय संबंधों का भी प्रतिनिधित्व करता है। मैं इसी की खोज करना चाहता था।’

निर्देशक नितिन कहते हैं, ‘यह फिल्म तब बनी थी, जब मुझे फिल्म की कोई औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं हुई थी। केवल मित्रों का एक समूह था जिन्होंने यह फिल्म बनाने का फैसला किया। इतनी दूरी तय करके आज मैं बहुत खुश हूं।’

 तरूण जैन कहते हैं, ‘इस फिल्म का विचार मेरे मन में इसलिए आया क्योंकि पिछले 10 वर्षों के दौरान मैंने जिन परियोजनाओं में काम किया, उनमें अधिकतर का कार्य उत्तर प्रदेश और हरियाणा में किया गया था। हमें लगातार ऐसी चीजों का सामना करना पड़ रहा है जो हमारे आसपास हो रहे नए निर्माणों की वजह से है। लोगों को अपने खेतों से हाथ धोना पड़ रहा है। उनमें से कई को निश्चित रूप से काफी अच्छा मुआवजा मिल रहा है लेकिन इससे उन्हें कोई स्थिर आधार या भविष्य नहीं मिल पा रहा है। इस संकट को लेकर कुछ करने का विचार हमेशा से मेरे मन में रहा है।’

 

 

 

48वें भारतीय अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म महोत्‍सव का आयोजन गोवा में 20 नवम्‍बर, 2017 से किया जा रहा है, जो 28 नवम्‍बर तक चलेगा। आईएफएफआई भारत का सबसे बड़ा और एशिया का सबसे पुराना फिल्‍म महोत्‍सव है जिसकी बदौलत इसे विश्‍व के सर्वाधिक प्रतिष्ठित महोत्‍सवों में शुमार किया जाता है।  

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वीके/एसकेजे/सीएस-5619


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