सूचना और प्रसारण मंत्रालय

भारतीय पैनोरमा अनुभाग में गैर-फीचर फिल्म के निर्देशकों से चर्चा का आयोजन

भारत के अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के भारतीय पैनोरमा अनुभाग में आज ‘गैर फीचर फिल्मों के निर्देशकों से मिलिए’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। बलुता(मराठी) के निर्देशक श्री अजय कुराने, मेघनाबोध(बांग्ला) के निर्देशक श्री अनिक दत्ता, विलेज रॉक स्टार्स की निर्देशक रिमा दास(असामी), द वाटरफाल(अंग्रेजी) की निर्देशक लिपिका सिंह दराई ने इस दौरान मीडिया से बातचीत की। 

विलेज रॉक स्टार्स की निर्देशक रिमा दास ने अपनी फिल्म के बारे में अपने अनुभव साझा किए। यह उन ग्रामीण बच्चों की कहानी है जो संसाधनहीन हैं, लेकिन वे बड़े सपने देखते हैं। सुविधा न होने के बावजूद ये ग्रामीण बच्चे अपने जीवन को उत्सव की तरह जीते हैं। रिमा दास ने कहा, ‘मुंबई के अनुभव ने पर्दे पर ऐसी बहुत सी कहानियों को दिखाने में मदद की।’इस फिल्म की कहानी असम के दूरदराज के इलाके में गरीबी में जीने वाली 10 वर्षीय लड़की धानू के ईर्दगिर्द घूमती है। वह आजाद ख्याल है और उसे अपने सपनों की ताकत पर भरोसा है। उसकी विधवा मां रोजी-रोटी के लिए संघर्ष करती है, लेकिन धानू अपने गांव के लड़कों के साथ मिलकर बैंड बनाने का निश्चय करती है और गिटार का मालिक होने पर गर्व करना चाहती है, लेकिन उसे लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है जब लड़के उसका साथ नहीं देते हैं। लड़कों का साथ मिलने और समाज की ओर से अपने कदम पीछे खींचने की धमकी मिलने पर वह परेशान हो जाती है।

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बांग्ला भाषा की गैर फीचर फिल्म मेघनाबोध रोहोस्यो के निर्देशक अनिक दत्ता ने कहा कि गैर फीचर फिल्म के जरिये शहर में जटिल रिश्तों की कहानियों को दिखाना आसान नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत में गैर फीचर फिल्म का भविष्य अच्छा है। मेघनाबोध रोहोस्यो गूंगी लड़की चिंगी की कहानी है। उसका पिता भारतीय सेना का अधिकारी होता है जिसकी ड्यूटी के दौरान मौत हो गई होती है। वह अपनी मां, दादा जी और अपने पिता की यादों के साथ जीती है। इस दौरान वह पिता द्वारा दिए गए तिरंगा के रंग वाले पिनव्हील और शिक्षा को संजोकर रखती है और अधिकतर समय उसी के साथ गुजारती है। उसके पिता की यादें में बनाई गई मूर्ति को जब गिरा दिया जाता है तो चिंगी अपने परिवार का सम्मान वापस पाने के लिए खुद संघर्ष करती है।

मराठी गैर फीचर फिल्म बलुता वस्तु विनमय प्रणाली पर आधारित है। इस फिल्म के निर्देश अजय कुराने ने कहा कि इसकी कहानी व्हाट्सएप से प्रेरित है। उन्होंने कहा कि महिला सशक्तिकरण के बारे में तो सभी बात करते हैं, लेकिन वास्तविकता इससे इतर है। महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में कोई यह कल्पना नहीं कर सकता कि एक महिला भी नाई का काम कर सकती है। तमाम दुश्वारियों के बावजूद शांताबाई रोजी-रोटी के लिए अपने परंपरागत काम को चुनती है। चार बच्चों की मां और विधवा शांताबाई बिना परिवारिक समर्थन के अपने काम को करती है। बलुता उसके संघर्ष, साहस और आत्मविश्वास को दिखाती है जो तमाम दुश्वारियों के बावजूद यह साबित करती है कि दुनिया में पूर्वाग्रह सिर्फ एक शब्द भर है।

द वाटरफाल की निर्देशिका रिमा दास ने भी अपनी गैर फीचर के बारे में अनुभव साझा करते हुए कहा, ‘हम प्रकृति से दूर जा रहे हैं जिससे हमारा एक नाता-रिश्ता है। इसीलिए विकास और पर्यावरण में हमेशा संघर्ष होता है।’ करन अपने चचेरी बहन नीलू के साथ एक सुंदर पहाड़ी शहर के दौरे पर जाता है जहां वह घने जंगलों में भ्रमण करता है और एक छोटे शहर में प्रकृति की छटा देखकर प्रसन्न हो जाता है। मगर उसे पता चलता है कि जिस वाटरफाल को वह देखने के लिए गया था उसे विकास परियोजनाओं के चलते जल्द ही नष्ट कर दिया जाएगा। इससे परेशान करन विकास और प्रकृति संरक्षण के महत्व के बीच विरोधाभासी सोच में फंस जाता है।

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