वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय
एक नए भारत की दृष्टि - 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था
पहली बार लाई गई कृषि निर्यात नीति
कारोबारी सुगमता रैंकिंग में भारत की चमक
प्रविष्टि तिथि:
11 DEC 2018 7:53PM by PIB Delhi
एक नए भारत का दृष्टिकोण:
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय एक कायोन्मुख योजना बना रहा है जो 2025 से पहले 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में भारत की यात्रा को गति देने के लिए विशिष्ट क्षेत्र स्तर पर हस्तक्षेपों को उजागर करेगी। इस प्रकार की केंद्रित योजनाओं का जोर सेवा क्षेत्र के योगदान को बढ़ाकर 3 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर, विनिर्माण क्षेत्र के योगदान को बढ़ाकर 1 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर और कृषि क्षेत्र के योगदान को बढ़ाकर 1 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर करने पर होगा।
मंत्रालय ने सेवाओं में 12 चैंपियन क्षेत्रों को बढ़ावा देने के लिए 1 अरब अमेरिकी डॉलर की निधि तैयार की है और यह भविष्य की मांगों को ध्यान में रखते हुए नई औद्योगिक नीति जारी करने पर काम कर रहा है। इसके अलावा वाणिज्य विभाग और औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग दोनों के सभी प्रयास भारत को 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में हैं।
12 चैम्पियन क्षेत्र:
- प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वाणिज्य विभाग के उस प्रस्ताव को मंजूरी दी है जिसके तहत चिन्ह्ति 12 चैम्पियन सेवा क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने, उनके विकास को बढ़ावा देने और उनकी क्षमताओं को भुनाने का सुझाव दिया गया है। इन सेवा क्षेत्रों में सूचना प्रौद्योगिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी समर्थ सेवाएं (आईटी एवं आईटीईएस), पर्यटन एवं आतिथ्य सेवा, चिकित्सा मूल्य यात्रा, परिवहन एवं रसद सेवाएं, लेखा एवं वित्त सेवाएं, ऑडियो विजुअल सेवाएं, कानूनी सेवाएं, संचार सेवाएं, निर्माण एवं संबंधित इंजीनियरिंग सेवाएं, पर्यावरण सेवाएं, वित्तीय सेवाएं और शैक्षणिक सेवाएं शामिल हैं।
यह पहल केंद्रित एवं निगरानी कार्य योजनाओं के कार्यान्वयन के माध्यम से भारत के सेवा क्षेत्रों की प्रतिस्पर्धा को बढ़ाएगी जिससे जीडीपी वृद्धि को बढ़ावा मिलेगा, अधिक रोजगार सृजन होगा और वैश्विक बाजारों को निर्यात के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।
भारत के सेवा क्षेत्र में रोजगार की अपार संभावनाएं है। यह पहल केंद्रित एवं निगरानी कार्य योजनाओं के कार्यान्वयन के माध्यम से भारत के सेवा क्षेत्र की स्पर्धा बढ़ाएगी जिससे भारत में अधिक नौकरियां पैदा होंगी, जीडीपी में योगदान बढ़ेगा और वैश्विक बाजारों को सेवाओं का निर्यात बढ़ेगा।
भारत के सकल घरेलू उत्पाद, निर्यात एवं रोजगार सृजन में सेवा क्षेत्र महत्वपूर्ण योगदान करता है, इसलिए चैंपियन सेवा क्षेत्रों की उत्पादकता एवं प्रतिस्पर्धा में वृद्धि भारत से विभिन्न सेवाओं के निर्यात को और बढ़ावा देगी। एम्बेडेड सेवाएं 'माल' का भी पर्याप्त हिस्सा हैं। इस प्रकार, प्रतिस्पर्धी सेवा क्षेत्र विनिर्माण क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा को भी बढ़ाएगा।
सेवाओं के वैश्विक निर्यात में भारत के सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी 2015 में 3.3% हो गई जो 2014 में 3.1% थी। इस पहल के आधार पर वर्ष 2022 के लिए 4.2% के लक्ष्य की परिकल्पना की गई है।
भारत के सकल मूल्य योगदान (जीवीए) में सेवाओं की हिस्सेदारी 2015-16 में लगभग 53% (निर्माण सेवाओं सहित 61%) रही थी। वर्ष 2022 तक जीवीए में सेवाओं की 60% (निर्माण सेवाओं सहित 67%) हिस्सेदारी हासिल करने का लक्ष्य भी निर्धारित किया गया है।
कृषि निर्यात नीति, 2018
वाणिज्य मंत्रालय ने 2022 तक भारत के कृषि निर्यात को 60 बिलियन अमरीकी डॉलर तक बढ़ाने के लिए एक केंद्रित योजना के साथ भारत की पहली कृषि निर्यात नीति तैयार की है जिससे कृषि मंत्रालय को 100 अरब अमेरिकी डॉलर के लक्ष्य को हासिल करने और भारतीय किसानों एवं उच्च गुणवत्ता वाले कृषि उत्पादों को वैश्विक मूल्य श्रृंखला के साथ एकीकृत करने में और वैश्विक कृषि में भारत की हिस्सेदारी को दोगुना करने में मदद मिल सके।
कृषि निर्यात नीति का दृष्टिकोण उचित नीतिगत उपायों के माध्यम से भारतीय कृषि की निर्यात क्षमता का उपयोग करना, भारत को कृषि में वैश्विक शक्ति बनाना और किसानों की आय बढ़ाना है।
कृषि निर्यात नीति के तत्व:
कृषि निर्यात नीति के तहत दो श्रेणियों - रणनीतिक और परिचालन - में सिफारिशें की गई हैं:
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रणनीतिक
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नीतिगत उपाय
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बुनियादी ढांचा एवं लॉजिस्टिक सहायता
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निर्यात को बढ़ावा देने के लिए समग्र दृष्टिकोण
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कृषि निर्यात में राज्य सरकारों की बड़ी भागीदारी
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परिचालन
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क्लस्टर पर ध्यान केंद्रित करना
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मूल्य वर्धित निर्यात को बढ़ावा देना
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'ब्रांड इंडिया' का विपणन और प्रचार
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उत्पादन और प्रसंस्करण में निजी निवेश आकर्षित करना
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मजबूत गुणवत्ता के नियम
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अनुसंधान एवं विकास
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विविध
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व्यापार की बढ़ावा:
वाणिज्य मंत्रालय निर्यात क्षेत्र के लिए ऋण प्रवाह को सुगम बनाने विशेष रूप से छोटे निर्यातकों को धन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए वित्त मंत्रालय के साथ मिलकर काम कर रहा है।
वाणिज्य मंत्री ने 15 रणनीतिक विदेशी स्थानों की पहचान की है जहां व्यापार संवर्धन संगठन (टीपीओ) का निर्माण करने का प्रस्ताव है। इन देशों को निर्यात बढ़ाने के लिए भारत के पास पर्याप्त क्षमता मौजूद है लेकिन वर्तमान में उनके साथ व्यापार महज एक अंक में है। जिन स्थानों पर टीपीओ प्रस्तावित हैं वे इस प्रकार हैं: अस्टाना (कजाखस्तान), बीजिंग (चीन) केप टाउन (दक्षिण अफ्रीका), दुबई (संयुक्त अरब अमीरात), फ्रैंकफर्ट (जर्मनी), हो ची मिन्ह सिटी (वियतनाम), जकार्ता (इंडोनेशिया) लीमा (पेरू), लंदन (ब्रिटेन), मेलबर्न (ऑस्ट्रिया), मेक्सिको सिटी (मेक्सिको), मॉस्को (रूस), न्यूयॉर्क (अमेरिका)+.
पाउलो (ब्राजील) और टोक्यो (जापान)।
निर्यात में तेजी:
पिछले 6 वर्षों में भारत के निर्यात में सबसे ज्यादा वृद्धि हुई है। क्षेत्र के लिए विशिष्ट हस्तक्षेप, केंद्रित निर्यात को बढ़ावा देने की पहल, अत्यधिक पारदर्शिता और समस्याओं के त्वरित समाधान के कारण वर्ष 2017-18 (अक्टूबर से सितंबर) में पिछले वर्ष के मुकाबले निर्यात में 14.76% की आकर्षक वृद्धि हुई है।
वाणिज्य विभाग भारत की निर्यात टोकरी में क्षेत्रवार और वस्तुओं के अनुसार विविधता लाने के लिए सभी प्रयास कर रहा है। मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) भारत के व्यापार संतुलन को सुधारने के साधन हैं। अमेरिका के साथ द्विपक्षीय वार्ता जारी है और चीन के वाणिज्य मंत्रालय (एमओएफसीओएम) के साथ वाणिज्य विभाग के जरिये भारत ने जून, अगस्त और नवंबर 2018 में तीन अंतर-मंत्रालयी प्रतिनिधिमंडल स्तरीय बातचीत की है ताकि बाजार तक पहुंचने के मुद्दों को निपटाया जा सके। जनरल एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ कस्टम चाइना (जीएसीसी) ने भारत के कुल 24 भारतीय चावल मिलों को चीन को गैर-बासमती चावल के निर्यात के लिए मंजूरी दी है। साथ ही 28.09.2018 और 30.09.2018 को 100 टन सफेद चावल (5% टूटा हुआ) की पहली खेप भेजी गई। अक्टूबर 2018 में चीन को 23 टन चावल का निर्यात किया गया। इसके बाद नवंबर 2018 में 260 टन चावल का निर्यात हुआ। चीन को खाद्य रैपसीड का निर्यात, जिसे 2012 में बंद कर दिया गया था, अब वाणिज्य विभाग और जीएसीसी के निरंतर प्रयासों से खोला गया है। चीन ने खाद्य रैपसीड की आपूर्ति के लिए पांच रैपसीड मिलों को मंजूरी दी। दिसंबर 2018 में खाद्य सोयाबीन मिलों और अनार के बागों और पैक हाउसों का निरीक्षण करने के लिए जीएसीसी टीमों ने भी भारत का दौरा किया। चीन अगले वर्ष के आरंभ में भारत से 50,000 टन कच्चे चीनी का आयात शुरू कर देगा।
मेटल्स एंड मिनरल्स ट्रेडिंग कॉरपोरेशन (एमएमटीसी):
एमएमटीसी भारत के लिए विदेशी मुद्रा कमाने वाला और व्यापार करने वाला सबसे बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है। वर्ष की पहली छमाही के दौरान एमएमटीसी ने 12,511 करोड़ रुपये का परिचालन राजस्व अर्जित किया जबकि पिछले साल की समान अवधि में उसे 9,996 करोड़ रुपये की परिचालन आय हुई थी जो साल दर साल आधार पर 26% की वृद्धि दर्शाती है। इस दौरान कंपनी का शुद्ध लाभ पिछले साल के 29.76 करोड़ रुपये के मुकाबले 40% बढ़कर 41.62 करोड़ रुपये हो गया। वित्त वर्ष 2018-19 की दूसरी छमाही के दौरान कंपनी का प्रदर्शन कहीं अधिक बेहतर होने के आसार हैं।
निर्यात योजना के लिए व्यापार बुनियादी ढांचा:
निर्यात योजना के लिए व्यापार बुनियादी ढांचा (टीआईईएस) सीमावर्ती हाटों, स्थल सीमा शुल्क केंद्रों, गुणवत्ता परीक्षण एवं प्रमाणन प्रयोगशालाओं, शीतगृह श्रृंखलाओं, व्यापार संवर्धन केंद्रों, सूखे बंदरगाहों, निर्यात गोदाम और पैकेजिंग, एसईजेड एवं बंदरगाहों, हवाई अड्डा कार्गो टर्मिनस जैसे भारी निर्यात लिंकेज के साथ बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की स्थापना एवं उन्नयन के लिए सहायता प्रदान करती है। निर्यात संवर्धन परिषद, कमोडिटी बोर्ड, एसईजेड प्राधिकरण और भारत सरकार की एग्जिम नीति के तहत मान्यता प्राप्त शीर्ष व्यापार निकायों सहित केंद्रीय एवं राज्य एजेंसियां इस योजना के तहत वित्तीय सहायता के लिए पात्र हैं।
निर्यातकों के लिए कारोबारी सुगमता- डीजीएफटी द्वारा उठाया गया कदम:
विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) ने आईटी प्लेटफॉर्म को मजबूत करने और निर्यातकों के लिए कारोबारी सुगमता सुनिश्चित करने के लिए कई उपाय किए हैं:
क. डीजीएफटी ने इस साल मौजूदा आईटी हार्डवेयर को अपग्रेड कर दिया है।
ख. सितंबर 2017 में डीजीएफटी वेबसाइट पर एक ऑनलाइन शिकायत निवारण सेवा शुरू की गई: कॉन्टैक्ट @ डीजीएफटी। यह निर्यातकों और आयातकों के सभी विदेशी व्यापार से जुड़े मुद्दों के लिए एकल संपर्क बिंदु है। पिछले साल इस प्लेटफॉर्म पर 60,000 से अधिक शिकायतें प्राप्त हुईं और 97% शिकायतों का निवारण किया गया।
ग. डीजीएफटी की ईडीआई प्रणाली अपनी अधिकतर योजनाओं और मंजूरियों के लिए निर्यातकों- आयातकों के लिए ऑनलाइन आवेदन की सुविधा प्रदान करती है। इन योजनाओं में आईईसी, अग्रिम मंजूरी योजना, वार्षिक अग्रिम मंजूरी योजना, डीएफआईए, ईपीसीजी योजना, वार्षिक ईपीसीजी योजना, एमईआईएस, एसईआईएस, एफपीएस, एफएमएस, एमएलएफपीएस, वीकेजीयूवाई, एसएफआईएस, एसआईआईएस, वृद्धिशील निर्यात प्रोत्साहन योजना, प्रतिबंधित वस्तुओं के आयात एवं निर्यात के लिए मंजूरी आदि शामिल हैं। अन्य एजेंसियों (सीमा शुल्क और आरबीआई) के साथ मुलाकात भी ईडीआई प्रणाली के माध्यम से होती है।
घ. सभी शिपिंग बिलों के लिए सीमा शुल्क विभाग से प्राप्त शिपिंग बिल डेटा का ऑनलाइन दृश्य 1.4.2016 से क्षेत्रीय कार्यालयों को इलेक्ट्रॉनिक तरीके से जारी किया जा रहा है। अब निर्यातकों को ईओडीसी को भुनाने के लिए शिपिंग बिल की हार्ड कॉपी जमा कराने की आवश्यकता नहीं होगी। डीजीएफटी क्षेत्रीय कार्यालय अन्य तमाम प्रयोजनों के लिए भी सीमा शुल्क विभाग की ओर से प्रेषित इलेक्ट्रॉनिक एसबी डेटा का उपयोग कर सकते हैं।
ड. निर्यातक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर आयातक निर्यातक कोड (आईईसी) स्वयं सृजित कर सकते हैं।
च. एमईआईएस लाभ के ऑनलाइन स्वत: स्वीकृति को एमईआईएस के तहत 97% उत्पाद लाइनों के लिए सितंबर 2018 से लागू किया गया है। अब एमईआईएस के एप्लिकेशन सिस्टम द्वारा अनुमोदित हैं और अनुमोदन के 3 दिनों के भीतर स्क्रिप्स जारी किए जाते हैं।
छ. कॉल सेंटर को मजबूत किया गया है और अब हेल्प डेस्क पर प्राप्त सभी टेलीफोन कॉल की बारीकी से निगरानी की जाती है। एक आईवीआरएस प्रणाली भी तैनात की गई है।
कारोबारी सुगमता रैंकिंग में भारत की स्थिति में सुधार:
भारत ने इस साल विश्व बैंक की कारोबारी सुगमता रैंकिंग में 23 पायदान चढ़कर 77वें पायदान पर पहुंच गया। पिछले दो वर्षों में भारत की रैंकिंग में 53 पायदान का सुधार हुआ है और यह 2011 के बाद से 2 साल में सबसे ज्यादा सुधार दर्ज करने वाला देश बन गया है। भारत अब दक्षिण एशियाई देशों के बीच कारोबारी सुगमता रिपोर्ट में पहले स्थान पर है जो 2014 में छठे पायदान पर रहा था।
भारत ने 10 संकेतकों में से 6 में अपने रैंक में सुधार दर्ज किया है और वह 10 संकेतकों में से 7 में सर्वोत्तम अंतरराष्ट्रीय प्रथाओं (सीमांत अंक से दूरी) के करीब पहुंच चुका है। निर्माण परमिट और सीमाओं के व्यापार से संबंधित संकेतकों में सबसे नाटकीय सुधार दर्ज किए गए हैं। निर्माण परमिट के अनुदान में भारत की रैंक 2017 में 181 से बढ़कर 2018 में 52 हो गई जो एक वर्ष में 129 पायदान का सुधार दर्शाता है। सीमापार व्यापार में भारत 66 पायदान सुधार के साथ 80वें पायदान पर पहुंच गया जबकि 2017 में वह 146वें पायदान पर था।
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क्रम संख्या
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संकेतक
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2017
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2018
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Change
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1
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निर्यात परमिट
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181
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52
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+129
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2
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सीमापार व्यापार
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146
|
80
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+66
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3
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कारोबार की शुरुआत
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156
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137
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+19
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4
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ऋण हासिल
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29
|
22
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+7
|
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5
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बिजली हासिल
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29
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24
|
+5
|
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6
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अनुबंधों का प्रवर्तन
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164
|
163
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+1
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कुल मिलाकर रैंकिंग
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100
|
77
|
+23
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राज्यों की रैंकिंग:
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अधीन औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) विश्व बैंक के सहयोग से सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) के लिए बिजनेस रिफॉर्म एक्शन प्लान (बीआरपी) के तहत वार्षिक सुधार कार्यक्रम आयोजित करता है ताकि केंद्र सरकार की विभिन्न नियामकीय गतिविधियों एवं सेवाओं को कुशल, प्रभावी एवं पारदर्शी तरीके से बेहतर बनाया जा सके। राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने श्रम, पर्यावरण मंजूरी, निर्माण परमिट, अनुबंध प्रवर्तन, संपत्ति पंजीकरण एवं निरीक्षण जैसे क्षेत्रों में अपने नियमों और व्यवस्थाओं को सुगम बनाने के लिए सुधार किए हैं। राज्यों ने भी पंजीकरण एवं मंजूरियों के लिए समय-सारिणी लागू करने के लिए लोक सेवा डिलिवरी गारंटी कानून को अधिनियमित किए हैं।
कारोबारी सुगमता रैंकिंग में सुधार भारत सरकार द्वारा किए गए परिवर्तनकारी उपायों के कारण संभव हुआ है जिसमें विधायी एवं नियामक दोनों तरह के सुधार शामिल हैं। स्टार्टअप और एमएसएमई के लिए कम कर दरों का समर्थन करने के लिए 600 दिनों के बजाय 140 दिनों में त्वरित पर्यावरणीय मंजूरी व्यवस्था लागू की गई है। इसके अलावा जीएसटी लागू होने के बाद अंतरराज्यीय चेक पोस्ट को खत्म कर दिया गया है और बेहतर इनपुट कर क्रेडिट एवं इलेक्ट्रॉनिक जीएसटी नेटवर्क तैयार किया गया है। साथ ही, देश में स्टार्टअप को बढ़ावा देने के लिए अनुबंधों पर तेजी से अमल करने और सुरक्षा मंजूरियों में तेजी लाने के लिए फास्ट ट्रैक वाणिज्यिक अदालत स्थापित किए गए हैं।
ब्रिक्स देशों के बीच भारत की रैंकिंग 2010 में 5वीं थी जो सुधरकर 2018 में तीसरी हो गई। इस बेहतर रैंकिंग को सुनिश्चित करने के लिए किए गए उपायों में निर्माण परमिट जारी करना शामिल है जहां भारत का स्थान 52वां है, बिजली कनेक्शन प्राप्त करने के लिहाज से भारत 24वें पायदान पर मौजूद है और सीमा पार व्यापार के लिहाज से भारत अब 84वें स्थान पर मौजूद पर है। करों के भुगतान के लिहाज से भारत की रैंकिंग 121वीं है जबकि दिवालियापन के समाधान के मामले में भारत 108वें पायदान पर मौजूद है।
स्टार्ट-अप के लिए कारोबारी सुगमता सुनिश्चित करने के लिए 21 नियामकीय बदलाव किए गए हैं।
संसाधन उपयोगिता को युक्तिसंगत बनाने और विनिर्माण क्षेत्र की दक्षता में वृद्धि के लिए डीआईपीपी ने मई 2017 में देश भर में औद्योगिक क्षेत्रों एवं समूहों के लिए जीआईएस-समर्थ डेटाबेस औद्योगिक सूचना प्रणाली (आईआईएस) को लॉन्च किया। यह पोर्टल एक ही जगह सभी समाधान के तौर पर कार्य करता है। इससे शुल्क से लेकर कच्चे माल - कृषि, बागवानी, खनिज, प्राकृतिक संसाधन, प्रमुख लॉजिस्टिक नोड्स से दूरी, इलाके की परतें और शहरी बुनियादी ढांचा आदि की उपलब्धता सहित सभी औद्योगिक सूचनाओं की मुफ्त और आसान पहुंच सुनिश्चित हुई है।
आईपीआरएस को देश भर के सभी पार्कों को कवर करने वाले वार्षिक कार्यक्रम बनाने का प्रस्ताव है। इसके कवरेज को विस्तृत किया जाएगा ताकि गहन गुणात्मक मूल्यांकन प्रतिपुष्टि और अद्यतन तकनीकी हस्तक्षेप लाया जा सके और इसे एक ऐसे उपकरण के रूप में विकसित किया जाएगा जो नीति निर्माताओं और निवेशकों दोनों द्वारा मांग संचालित और आवश्यकता आधारित हस्तक्षेप के लिए प्रभावी तौर पर मदद करे।
जिला स्तर विकास- एक समय में एक जिले की प्रगति:
वाणिज्य मंत्रालय के औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग ने जिला स्तर पर सुधार के लिए एक योजना तैयार की है। इसे जिलों में लागू करने के लिए राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की सरकारों के साथ साझा किया गया है। राज्यों और संघ शासित प्रदेशों से अनुरोध किया गया है कि वे इस योजना के कार्यान्वयन में उपलब्धियों के आधार पर जिलों का मूल्यांकन करें।
नीचे से ऊपर के दृष्टिकोण पर ध्यान केंद्रित करते हुए मंत्रालय ने जिला स्तरीय प्रशासन के क्षमता निर्माण के लिए पांच राज्यों में छह जिलों की पहचान की है। जबकि नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) को हिमाचल प्रदेश में सोलन, महाराष्ट्र में रत्नागिरी एवं सिंधुदुर्ग में जिला प्रशासन के साथ मिलकर काम करने का निर्देश दिया गया है। आईआईएम लखनऊ उत्तर प्रदेश के वाराणसी, बिहार के मुजफ्फरपुर और आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में जिला प्रशासन के साथ मिलकर काम कर रहा है। इस कार्योन्मुख योजना का लक्ष्य जिला स्तर पर ईओडीबी को बेहतर करने पर ध्यान देने के साथ-साथ जिला स्तर पर उत्पादन में 3% की वृद्धि करना है। इससे भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि को जबरदस्त रफ्तार मिलेगी।
वृद्धि के नए प्रक्षेपकों में एफआईडी:
वित्त वर्ष 2019 की पहली तिमाही में एफडीआई प्रवाह में वित्त वर्ष 2018 की पहली तिमाही के मुकाबले 23% की वृद्धि देखी गई। वित्त वर्ष 2019 की पहली तिमाही में एफडीआई प्रवाह 12.7 अरब अमेरिकी डॉलर रहा। भारत ने पहली बार वित्त वर्ष 2017-18 में 61.96 अरब अमेरिकी डॉलर एफडीआई हासिल की जो अब तक का सर्वाधिक आंकड़ा है। वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान वाहन एवं वाहनों के कलपुर्जा क्षेत्र में एफडीआई इक्विटी प्रवाह में वित्त वर्ष 2016-17 की तुलना में 13% की वृद्धि हुई। वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान कपड़ा क्षेत्र में एफडीआई इक्विटी प्रवाह में वित्त वर्ष 2016-17 के मुकाबले 18% की वृद्धि दर्ज की गई।
मेक इन इंडिया
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 सितंबर 2014 को भारत को एक विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए लॉन्च किया था और इससे भारत एक तेजी से वृद्धि करने वाली अर्थव्यवस्था के तौर पर उभरा है।
भारत ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स (2015-16) (स्रोत: विश्व बौद्धिक संपदा संगठन) में 15 पायदान उछल गया और लॉजिस्टिक्स परफॉर्मेंस इंडेक्स (2015-16) (स्रोत: विश्व बैंक) पर 19 स्थान आगे बढ़ा है।
वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता सूचकांक (2014-16) में भारत ने 32 पायदान (स्रोत: विश्व आर्थिक मंच) उछाल के साथ बेहतर स्थित तक पहुंच गया।
वाणिज्य मंत्रालय यह सुनिश्चित करने के लिए पूरा प्रयास कर रहा है कि सार्वजनिक खरीद में मेक इन इंडिया को प्राथमिकता दी गई है:
- छूट उस मामले में दी जाती है जहां खरीद का अनुमानित मूल्य 5 लाख रुपये से कम है।
- न्यूनतम स्थानीय सामग्री आमतौर पर 50% होगी। नोडल मंत्रालय किसी भी विशेष वस्तु के संबंध में उच्च या निम्न प्रतिशत निर्धारित कर सकता है और स्थानीय सामग्री की गणना के तरीके को भी निर्धारित कर सकता है।
- खरीद वरीयता का मार्जिन 20% होगा।
- डीआईपीपी के सचिव की अध्यक्षता में औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग की एक स्थायी समिति 2017 के उस आदेश के कार्यान्वयन की निगरानी करती है जो मेक इन इंडिया उत्पादों को प्राथमिकता देती है।
अब तक 14 नोडल मंत्रालयों और विभागों ने विभिन्न उत्पाद श्रेणियों के लिए न्यूनतम स्थानीय सामग्री के लिए अधिसूचनाएं जारी की हैं। राज्य सरकारों से अनुरोध है कि वे अपने राज्यों में सार्वजनिक खरीद आदेश लागू करें। आदेश के कार्यान्वयन पर जोरदार निगरानी की जा रही है। डीआईपीपी में एक सार्वजनिक खरीद प्रकोष्ठ बनाया गया है। स्थायी समिति की नियमित बैठकें उद्योग-विशिष्ट बैठकों को उद्योग से प्रतिक्रिया देने और प्रतिक्रिया लेने के अलावा आयोजित की जा रही हैं।
पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स से चमक में निरंतर विस्तार संकेत:
पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) विनिर्माण और सेवाओं दोनों क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधि का संकेतक है। अक्टूबर 2018 में पीएमआई 53.1 हो गया जो अक्टूबर 2017 में 50.3 रहा था। अक्टूबर 2018 पीएमआई लगातार 15वें महीने 50 से अधिक रहा जो विनिर्माण क्षेत्र में वृद्धि को दर्शाता है।
स्टार्टअप में भारी वृद्धि:
स्टार्ट-अप इंडिया भारत सरकार की एक प्रमुख पहल है जिसका उद्देश्य एक मजबूत माहौल तैयार करना है जो स्टार्टअप व्यवसायों के विकास के लिए अनुकूल हो, सतत आर्थिक विकास को रफ्तार देने में समर्थ हो और बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए अनुकूल हो। इस पहल के माध्यम से सरकार की नजर नवाचार एवं डिजाइन के जरिये विकास के लिए स्टार्टअप को सशक्त बनाना है।
डीआईपीपी मान्यता प्राप्त स्टार्टअप की संख्या 18 नवंबर में 14,545 तक पहुंच गई, जबकि अक्टूबर 2017 में यह आंकड़ा महज 4,610 था। इससे कुल 1,30,424 लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा हुए।
भारत को रोजगार तलाशने वालों के देश से रोजगार सृजन करने वालों के देश में तब्दील करने के लिए प्रधानमंत्री द्वारा 16 जनवरी, 2016 को शुरू की गई पहल के बाद कई कार्यक्रम शुरू किए गए हैं।
19-सूत्री स्टार्ट-अप इंडिया कार्य योजना के तहत कई इनक्यूबेशन सेंटर, आसान पेटेंट फाइलिंग, कर छूट, कारोबार स्थापित करने में सुगमता, 10,000 करोड़ रुपये की एक निधि और तेजी से निकास तंत्र की परिकल्पना की गई है।
स्टार्ट-अप इंडिया एक्शन प्लान की कुछ उपलब्धियां इस प्रकार हैं (i) स्व-प्रमाणीकरण के आधार पर अनुपालन व्यवस्था के लिए सरलीकरण एवं रखरखाव, मोबाइल ऐप एवं पोर्टल से बाहर निकलना, स्टार्ट-अप इंडिया हब, कानूनी सहायता एवं कम लागत पर फास्ट ट्रैक पेटेंट, स्टार्ट-अप के लिए सार्वजनिक खरीद के आसान मानदंड और स्टार्ट-अप के लिए तेजी से बाहर निकलने की सुविधा, (ii) 10,000 करोड़ रुपये की एक निधि के साथ ऋण के लिए फंड के माध्यम से वित्तीय सहायता प्रदान करना।, पूंजीगत लाभ पर कर छूट, 3 साल के लिए स्टार्ट-अप को कर छूट, प्रमुख कर को हटाना, (iii) अटल इनोवेशन मिशन को शुरू करने के माध्यम से उद्योग-अकादमिक भागीदारी और इनक्यूबेशन को बढ़ावा देना, इनक्यूबेटर सेटअप के लिए निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता का उपयोग करना, 11 प्रौद्योगिकी बिजनेस इनक्यूबेटर का निर्माण, आईआईटी मद्रास के अनुसंधान पार्क की तर्ज पर 7 नए शोध पार्कों की स्थापना, जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में स्टार्ट-अप को बढ़ावा देना और (iv) छात्रों के लिए नवाचार केंद्रित कार्यक्रम शुरू करना।
वाणिज्य विभाग (डीओसी) द्वारा एमएसएमई के लिए समर्थन एवं आउटरीच अभियान:
वाणिज्य मंत्रालय के प्रयासों के कारण एमएसएमई के लिए ब्याज अनुदान 2% बढ़ाया गया था। साथ ही 2 नवंबर 2018 को 80 जिलों में जीईएम पर एक प्रदर्शनी और निर्यात संवर्धन योजनाएं डीओसी द्वारा स्थापित की गई जिसमें डीओसी द्वारा डीजीएफटी और जीईएम से नियुक्त नोडल अधिकारी शामिल हुए।
वाणिज्य विभाग ने एमएसएमई के लिए निम्नलिखित प्रदेय की पहचान की है: एमएसएमई को बाजार तक आसान पहुंच के लिए उसे जीएसएम प्लेटफॉर्म पर लाने और जीएसएम के माध्यम से एमएसएमई से खरीद, एमएसएमई उत्पादों के लिए भारतीय गुणवत्ता नियंत्रण द्वारा गुणवत्ता प्रमाणन और क्षेत्रीय हस्तक्षेप के लिए जिलों की पहचान ताकि एमएसएमई या कोट्टायम में रबड़, कटक एवं हैदराबाद में रत्न व आभूषण और पश्चिम सिक्किम में बड़े इलायची बागानों को प्रोत्साहित किया जा सके।
डीजीएफटी की निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं के एमईआईएस, एए, ईपीसीजी, डीएफआईए और ब्याज समतुल्य जैसे लाभ का विस्तार एमएसएमई तक किया जाएगा। नए निर्यातकों को प्रशिक्षित और निर्देशित किया जाएगा कि कैसे निर्यात किया जाए और आईओईसी पंजीकरण और एफटीए मार्ग के तहत निर्यात अवसरों पर एमएसएमई के लिए कार्यशाल आयोजित किए जाएंगे। साथ ही एफआईईओ द्वारा प्रबंधित इंडिया ट्रेड पोर्टल जैसे तमाम पोर्टल के जरिये एफटीए मार्ग की जानकारी दी जाएगी।
लॉजिस्टिक्स एक नई क्षितिज की ओर:


मल्टी-मॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क नीति:
मल्टी-मॉडल लॉजिस्टिक पार्क (एमएमएलपी) देश के लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में सुधार के लिए भारत सरकार की एक प्रमुख नीतिगत पहल है। इसके तहत माल ढुलाई की लागत घटाने, वाहन प्रदूषण, भीड़भाड़ कम करने और गोदामों की लागत में कटौती कर घरेलू एवं वैश्विक व्यापार को बढ़ाबा देने की परिकल्पना की गई है। वर्तमान में मल्टी-मॉडल लॉजिस्टिक्स पार्कों की कोई विशिष्ट परिभाषा, विनिर्देश और मानक नहीं है।
रेलवे, जहारानी और उद्योग नीति एवं संवर्धन विभाग जैसे विभिन्न मंत्रालय एक ही स्थान पर यह पार्क विकसित कर रहे हैं। एक व्यापक नीति के अभाव के कारण ऐसा हो रहा है। वाणिज्य मंत्रालय मल्टी-मॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क नीति के प्रस्ताव पर विभिन्न हितधारकों, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से परामर्श कर रहा है।
लॉजिस्टिक्स पोर्टल:
भारत ने सीमा पार व्यापार की अपनी वैश्विक रैंकिंग में सुधार किया है। भारत वर्ष 2017 में इस रैंकिंग में 146वें स्थान पर था जो अब 2018 में 80वें स्थान तक पहुंच गया है। वाणिज्य विभाग एक एकीकृत दृष्टिकोण के साथ लॉजिस्टिक्स लागत घटाने के लिए काम कर रहा है। मौजूदा लॉजिस्टिक्स लागत जीडीपी का 14% है जिसे 2022 तक घटाकर जीडीपी का 10% पर लाने का लक्ष्य रखा गया है। एक राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स पोर्टल भी तैयार किया जा रहा है जो खरीदारों, लॉजिस्टिक्स सेवा प्रदाताओं और संबद्ध सरकारी एजेंसियों को जोड़कर एक लेनदेन ई-मार्केटप्लेस के रूप में कार्य करेगा। यह पोर्टल सभी हितधारकों को जोड़ने के लिए एकल खिड़की मार्केटप्लेस होगा।
लॉजिस्टिक्स डेटा बैंक:
भारत-जापान द्विपक्षीय सहयोग की एक प्रौद्योगिकी नवाचार परियोजना- लॉजिस्टिक्स डेटा बैंक परियोजना- को पहले से ही 'नियर-रियल-टाइम' आधार पर कंटेनरों को ट्रैक करने के लिए चालू कर दिया गया है। यह भारत सरकार की कारोबारी सुगमता पहल का का हिस्सा है जहां कंटेनरों को ट्रैक करने के लिए बंदरगाहों पर प्रत्येक कंटेनर पर आरएफआईडी टैग लगाया जाता है। इस परियोजना का विस्तार भारत में विभिन्न बंदरगाहों (जेएनपीटी, मुंद्रा, हजीरा, चेन्नई, पारादीप, कट्टुपल्ली, एन्नोर, कृष्णपत्तनम, मुंबई, मुर्मोगो, विशाखापत्तनम, न्यू मैंगलोर और कोलकाता) किया जा चुका है और भारत के कुल करीब 90% कंटेनर इसके दायरे में हैं।
एसईजेड नीति:
भारत की मौजूदा एसईजेड नीति का अध्ययन करने के लिए वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा गठित बाबा कल्याणी की अध्यक्षता वाली समिति ने अपनी रिपोर्ट वाणिज्य एवं उद्योग और नागरिक उड्डयन मंत्री सुरेश प्रभु को सौंप दी है।
इस समिति के उद्देश्यों एसईजेड नीति का मूल्यांकन करना और उसे डब्ल्यूटीओ के अनुकूल बनाना, एसईजेड में खाली पड़ी भूमि के अधिकतम उपयोग के लिए उपाय सुझाना, अंतर्राष्ट्रीय अनुभव के आधार पर एसईजेड नीति में बदलाव का सुझाव देना और एसईजेड नीति को अन्य सरकारी योजनाओं जैसे तटीय आर्थिक क्षेत्र, दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा, राष्ट्रीय औद्योगिक विनिर्माण क्षेत्र और खाद्य एवं वस्त्र पार्क के साथ एकीकृत करना था।
वाणिज्य मंत्री को अपनी रिपोर्ट सौंपते समय भारत फोर्ज लिमिटेड के अध्यक्ष बाबा कल्याणी ने कहा कि यदि भारत 2025 तक 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है तो प्रतिस्पर्धात्मकता और सेवाओं के निर्माण के मौजूदा माहौल में एक आदर्श बदलाव करना होगा। आईटी एवं आईटीईएस जैसे सेवा क्षेत्र की सफलता को स्वास्थ्य की देखभाल, वित्तीय सेवाओं, कानूनी, मरम्मत एवं डिजाइन सेवा जैसे अन्य सेवा क्षेत्रों में बढ़ावा दिया जाना है।
भारत सरकार ने अपने प्रमुख कार्यक्रम 'मेक इन इंडिया' के तहत 2022 तक 10 करोड़ रोजगार सृजित करने और जीडीपी में विनिर्माण क्षेत्र का 25% योगदान हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके अलावा, सरकार 2025 तक विनिर्माण मूल्य को 1.2 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर तक बढ़ाने की योजना बना रही है। हालांकि ये भारत को विकास के क्षेत्र में आगे बढ़ाने की महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं, लेकिन इसके लिए विनिर्माण क्षेत्र के विकास को उत्प्रेरित करने के लिए मौजूदा नीतिगत ढांचे के मूल्यांकन की आवश्यकता है। साथ ही संबंधित डब्ल्यूटीओ नियमों के साथ इस नीति को ढालने की आवश्यकता है।
औद्योगिक गलियारा:
औद्योगिक गलियारे कार्यक्रम के तहत वैश्विक विनिर्माण केंद्रों के रूप में विश्व स्तरीय बुनियादी ढांचे, कनेक्टिविटी और नए ग्रीन फील्ड स्मार्ट शहरों के निर्माण की परिकल्पना की गई है जो बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करेंगे। दिल्ली मुंबई औद्योगिक गलियारा (डीएमआईसी) परियोजना ने गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में चार स्थानों करीब ट्रंक बुनियादी ढांचा विकास गतिविधियों में काफी प्रगति की है जो पूरा होने के करीब है। इन स्थानों में उद्योगों को विकसित भूमि का आवंटन शुरू हो गया है और 56 भूखंडों के तहत कुल 335.51 एकड़ भूमि पहले ही आवंटित किए जा चुके हैं। इससे 3 से 5 वर्षों में करीब 8,354 करोड़ रुपये ।
डीएमआईसी परियोजना की शुरुआती सफलता के आधार पर सरकार ने चार अन्य औद्योगिक गलियारा परियोजनाओं यानी अमृतसर कोलकाता औद्योगिक गलियारा (एकेआईसी), चेन्नई बेंगलूरु औद्योगिक गलियारा (सीबीआईसी), बेंगलूरू मुंबई आर्थिक गलियारा (बीएमईसी) और कोलकाता से चेन्नई तक पूर्व तटवर्ती आर्थिक गलियारा (ईसीईसी) के नियोजन एवं विकास गतिविधियों को भी शुरू किया है। इन गलियारा परियोजनाओं में ट्रंक बुनियादी ढांचा गतिविधियां अगले वर्ष से शुरू करने की योजना है।
व्यापार संवर्द्धन संवर्धन संगठन
इंडिया ट्रेड प्रमोशन ऑर्गनाइजेशन:
इंडिया ट्रेड प्रमोशन ऑर्गनाइजेशन (आईटीपीओ) वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की व्यापार संवर्धन एजेंसी है और यह नई दिल्ली के प्रगति मैदान में प्रदर्शनी एवं सम्मेलन के लिए एक स्थान है। यह लगभग 150 एकड़ का क्षेत्र है और इसमें प्रदर्शनी के लिए 6,25,000 वर्ग मीटर जगह उपलब्ध है। अप्रैल 2017 में इसे नए सिरे से विकास के लिए ध्वस्त कर दिया गया और पूरा होने के बाद यह दिल्ली का सबसे बड़ा प्रदर्शनी केंद्र होगा। आईटीपीओ 1 9 80 से हर साल भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला (आईआईटीएफ) का आयोजन करता रहा है। यह एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला है और व्यापार समुदाय के लिए एक प्रमुख आयोजन बन चुका है।
राज्यों, सरकारी विभागों, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के लगभग 800 प्रतिभागी ग्रामीण कारीगरों, कारीगरों और एसएमई उद्यमियों की काफी भागीदारी के साथ भाग ले रहे हैं। इस मेले में अफगानिस्तान, चीन, हॉन्गकॉन्ग, किर्गिस्तान, ईरान, म्यांमार, नेपाल, नीदरलैंड, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, तुर्की, ट्यूनीशिया, वियतनाम और संयुक्त अरब अमीरात आदि देशों से भागीदारी होती है।
इंडिया इंटरनेशनल कनवेंशन एंड एक्सपो सेंटर:
वाणिज्य मंत्रालय के औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग 25,703 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से नई दिल्ली के द्वारका, सेक्टर 25 में 221.37 एकड़ क्षेत्र में विश्वस्तरीय सुविधा के साथ इंडिया इंटरनेशनल कन्वेंशन एंड एक्सपो सेंटर का विकास कर रहा है। इस परियोजना के लिए आधारशिला 20 सितंबर 2018 को भारत के प्रधानमंत्री द्वारा रखी गई थी। इस परियोजना का पहला चरण दिसंबर 2019 तक और दूसरा चरण दिसंबर 2024 तक पूरा हो जाएगा।
भारतीय व्यापार संवर्द्धन परिषद:
जनवरी 2018 में भारतीय व्यापार संवर्धन परिषद (टीपीसीआई) और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के वाणिज्य विभाग ने दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय खाद्य एवं पेय प्रदर्शनी 'इंडसफूड' का आयोजन किया। इसमें भारतीय निर्यातकों ने 50 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक के ऑर्डर प्राप्त किए।
इंडसफूड चावल, सोयाबीन तेल, मछली उत्पाद, फल, सब्जियां, कार्बनिक भोजन एवं कई अन्य वस्तुओं के लिए जबरदस्त ऑर्डर प्राप्त करने के अलावा भारतीय चाय एवं मसालों के लिए नए बाजार ढूंढने में समर्थ रहा। टीपीसीआई ने बैंकॉक, हनोवर, जोहान्सबर्ग, मेक्सिको सिटी और पेरिस में प्रदर्शनी का आयोजन किया।
टीपीसीआई 14 से 15 जनवरी, 2019 को ग्रेटर नोएडा, एनसीआर, दिल्ली में इंडसफूड-2 का आयोजन कर रहा है। इस वर्ल्ड फूड सुपरमार्केट में 50 देशों के करीब 600 वैश्विक खरीदारों और 350 से अधिक भारतीय निर्यातकों एवं उत्पादकों के भाग लेने की उम्मीद है।
भारतीय फुटवियर, चमड़ा एवं सहायक समान विकास कार्यक्रम (आईएफएलएडीपी)
केंद्र सरकार ने चमड़ा और फुटवियर क्षेत्र में रोजगार सृजन के लिए एक विशेष पैकेज को मंजूरी दी है। इस पैकेज के तहत केंद्र सरकार की योजना 'भारतीय फुटवियर, चमड़ा एवं सहायक सामान विकास कार्यक्रम' को लागू करने के लिए 2017-18 से 2019-20 तक तीन वित्त वर्षों में 2,600 करोड़ रुपये के व्यय को मंजूरी दी गई है। इस योजना से चमड़ा क्षेत्र के लिए बुनियादी ढांचे का विकास होगा और चमड़ा क्षेत्र की पर्यावरण चिंताएं दूर होंगी। साथ ही इससे अतिरिक्त निवेश की सुविधा, रोजगार सृजन और उत्पादन में वृद्धि होगी। उन्नत कर प्रोत्साहन इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश आकर्षित करेगा और इस क्षेत्र की मौसमी प्रकृति के मद्देनजर श्रम कानून में सुधार होने से अर्थव्यवस्था को काफी बल मिलेगा। सरकार ने तमिलनाडु में चमड़ा उद्योग के लिए 9 कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) के उन्नयन के लिए 328.43 करोड़ रुपये और उत्कृष्टता केंद्र (सीओई) केंद्रों में सात फुटवियर डिजाइन एंड डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट (एफडीडीआई) के उन्नयन के लिए 129.62 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है। साथ ही, सरकार ने कोलकाता के बंटाला में मेगा लेदर, फुटवियर एंड एक्सेसरीज क्लस्टर (एमएलएफएसी) की स्थापना के लिए सैद्धांतिक मंजूरी दी है। मानव संसाधन विकास (एचआरडी) की उप-योजना आईएफएलएडीपी के तहत वर्ष 2018-19 और 2019-20 के दौरान प्रत्येक वर्ष 1,40,000 बेरोजगार व्यक्तियों को प्राथमिक कौशल विकास प्रशिक्षण और 20,000 श्रमिकों को कौशल उन्नयन प्रशिक्षण प्रदान करने का लक्ष्य रखा गया है।
वर्ष 2017-18 के दौरान चमड़ा एवं फुटवियर क्षेत्र में 94,232 बेरोजगार व्यक्तियों को प्राथमिक कौशल विकास प्रशिक्षण प्रदान किया गया और उनमें से 71,125 प्रशिक्षुओं को वर्ष 2017-18 के दौरान आईएफएलएडीपी के मानव संसाधन विकास (एचआरडी) उप-योजना के तहत उद्योग में नियुक्ति प्रदान की गई। इसके अलावा वर्ष 2018-19 के दौरान 25,643 व्यक्तियों को प्राथमिक कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षित किया गया।
पूर्वोत्तर औद्योगिक एवं निवेश संवर्धन नीति (एनईआईआईपीपी), 2007 / फ्रेट सब्सिडी योजना, 2013 (एफएसएस) और पूर्वोत्तर औद्योगिक विकास योजना (एनईआईडीएस), 2017
सिक्किम सहित पूर्वोत्तर क्षेत्र के राज्यों के औद्योगीकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सरकार पूर्वोत्तर औद्योगिक नीति (एनईआईपी) (1997-2007), पूर्वोत्तर औद्योगिक एवं निवेश संवर्धन नीति (एनईआईआईपीपी) (2007-2017), परिवहन सब्सिडी योजना (टीएसएस) (1971-2013) और फ्रेट सब्सिडी योजना (एफएसएस) (2013-2016) जैसी औद्योगिक सब्सिडी योजनाओं को लागू कर रही है। एनईआईआईपीपी के तहत अब तक कुल 2,045 करोड़ रुपये की नकदी सब्सिडी जारी की गई है। पिछले 4 वर्षों के दौरान एनईआईआईपीपी के तहत 1,598.53 करोड़ रुपये और टीएसएस एवं एफएसएस के तहत 1,455.59 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं।
पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्थित औद्योगिक इकाइयों को लाभ बरकरार रखने के उददेश्य से एक नई नीति 'पूर्वोत्तर औद्योगिक विकास योजना' (एनईआईडीएस), 2017 को 01.04.2017 को पांच साल की अवधि के लिए अधिसूचित किया गया।
हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड एवं जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष पैकेज योजना और हिमालयी राज्यों के लिए औद्योगिक विकास योजना - 2017 (आईडीएस-2017)
औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) ने औद्योगीकरण को बढ़ावा देने के लिए जून, 2002 से 14 जून, 2017 के बीच जम्मू-कश्मीर राज्य के लिए विभिन्न रियायतें जैसे- जम्मू-कश्मीर पैकेज -1 और जम्मू-कश्मीर पैकेज -2 तैयार की थीं। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड राज्यों के लिए जून 2003 से 31 मार्च, 2017 के बीच विभिन्न रियायतें उपलब्ध कराई गईं। इन रियायतों के परिणामस्वरूप 75,118 इकाइयों की स्थापना की गईं और 6,52,757 रोजगार के अवसर पैदा हुए। साथ ही इससे 55,550.42 करोड़ रुपये के निवेश सृजित हुए। विशेष पैकेज योजना के तहत पिछले 4 वर्षों के दौरान 380.65 करोड़ रुपये जारी किए गए और वित्त वर्ष 2018-19 (30.09.2018 तक) के दौरान कुल 119.11 करोड़ रुपये जारी किए गए।
जम्मू-कश्मीर के लिए 15.06.2017 से 31.03.2022 तक की औद्योगिक विकास योजना और हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड के लिए 01.04.2017 से 31.03.2022 तक की औद्योगिक विकास योजना को 23.04.2018 को अधिसूचित किया गया। इन पर कुल वित्तीय परिव्यय 194.90 करोड़ रुपये होगा।
जीएसटी व्यवस्था के तहत बजटीय समर्थन की योजना
जीएसटी व्यवस्था के तहत सिक्किम सहित जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों में स्थित योग्य इकाइयों के लिए बजटीय समर्थन की योजना अक्टूबर 2017 में अधिसूचित की गई ताकि कुल 10 वर्षों की शेष अवधि के लिए प्रतिबद्धता जारी रहे। यह योजना 01-07-2017 से 30-06-2027 तक लागू रहेगी।
इस योजना के तहत 1,673 इकाइयां पंजीकृत हैं। योग्य इकाइयों को भुगतान के लिए सीबीआईसी को 1,500 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। वर्ष 2019-20 के लिए 4,000 करोड़ रुपये का बजट भी मांगा गया है।
गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (जीईएम) से बढ़ी चमक:
राष्ट्रीय ई-सार्वजनिक खरीद पोर्टल जीईएम पर उपयोगकर्ताओं (खरीदारों एवं विक्रेताओं) की संख्या में पिछले एक साल के दौरान 186% की बढ़ोतरी हुई है। लेनदेन में वॉल्यूम के लिहाज से 772% और मूल्य के लिहाज से 599% की वृद्धि हुई है। जीईएम में 26% से अधिक वेंडर एमएसएमई हैं जिनका योगदान मूल्य के लिहाज से 56% है और यह इसे वास्तव में एक खुला एवं समावेशी प्लेटफॉर्म बनाता है। हाल में वाणिज्य मंत्री द्वारा लॉन्च 6 सप्ताह के नेशनल मिशन ऑफ जीएमएम (एनएमजी) के दौरान जीईएम ने 220 से अधिक जिलों और 180 कस्बों में प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए और इसके दायरे में लगभग 50,000 खरीदार एवं विक्रेता शामिल थे।
मिशन के दौरान 1,617 संगठनों को ऑन-बोर्ड किया गया है और 1,405 नए संगठनों ने लेनदेन शुरू कर दिया है। इस नेशनल मिशन से उभरने वाले रूपरेखा के तहत रेलवे ने अगले एक साल के दौरान आईआरईपीएस में जीईएम प्रावधान के माध्यम से 10,000 करोड़ रुपये की वार्षिक खरीददारी करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

भारत के विशिष्ट भौगोलिक संकेतों (जीआई) को अधिक शक्ति :
केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री सुरेश प्रभु ने भारत में जीआई को मान्यता देने के लिए जीआई लोगो और टैगलाइन को लॉन्च किया है। पिछले एक वर्ष के दौरान 312 जीआई पंजीकृत हुए हैं जिसमें बांग्ला रसगुल्ला और अल्फांसो जैसे प्रसिद्ध जीआई शामिल हैं। यह दुनिया के सबसे लोकप्रिय फलों में शामिल है और इसका निर्यात जापान, कोरिया और यूरोपीय देशों को किया जाता है। हाल में संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे नए बाजार भी खुले हैं।

महाराष्ट्र के रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग एवं आस-पास के अन्य इलाकों को अल्फांसो जीआई टैग मिला है
दार्जिलिंग चाय, महाबलेश्वर स्ट्रॉबेरी, जयपुर की ब्लू पॉटरी, बनारसी साड़ी और तिरुपति लड्डू ऐसे ही कुछ जीआई हैं। भारत में जीआई टैग प्राप्त करने वाला पहला उत्पाद 2004 में दार्जिलिंग चाय था। भारत से कुल 325 उत्पादों को यह संकेतक प्राप्त है।
जीआई के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए एक व्यापक जीआई अभियान शुरू किया गया है। किसान, कारीगर और शिल्पकार इस पहल के प्रत्यक्ष लाभार्थी हैं।
जीआई उत्पाद कारीगरों, किसानों, बुनकरों और शिल्पकारों के लिए एक पूरक आय के तौर पर दूरदराज की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचा सकते हैं। हमारे ग्रामीण कारीगरों के पास पारंपरिक प्रथाओं एवं विधियों का अद्वितीय कौशल एवं ज्ञान है जो उनके पास पीढि़यों से चला आ रहा है। इन्हें संरक्षित और प्रचारित करने की आवश्यकता है।
डब्ल्यूटीओ की मजबूती एवं आधुनिकीकरण के लिए सुधार:
कुछ सदस्यों द्वारा हालिया एकपक्षीय उपायों एवं उसके विपरीत उपायों, अपीलीय निकाय में सदस्यों की नियुक्ति पर विवाद गहराने और इस मुद्दे पर विवादित बहस के मद्देनजर वाणिज्य विभाग ने डब्ल्यूटीओ में सुधार के लिए प्रमुख पहल का प्रस्ताव दिया है जैसे सचिवालय की भूमिका में विस्तार और विवाद निपटान तंत्र की मजबूती। इसे भारत ने यूरोपीय संघ के साथ सह-प्रायोजित किया है। भारत अपने हितों की रक्षा के मद्देनजर डब्ल्यूटीओ में समान दृष्टिकोण वाले देशों की अधिक भागीदारी चाहता है।
आरसीईपी:
दूसरे आरसीईपी लीडर्स समिट का आयोजन 14 नवंबर 2018 को किया गया जहां नेताओं ने बातचीत में उल्लेखनीय प्रगति की। 12-13 नवंबर 2018 को आरसीईपी मंत्रिस्तरीय दौर की बैठक के दौरान 3 और अध्यायों को पूरा किया गया और इस प्रकार कुल 16 अध्यायों में से अब तक 7 अध्यायों को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है।
वाणिज्य मंत्री के निर्देशों के अनुसार आरसीईपी को लेकर भारत के दृष्टिकोण पर व्यापक अध्ययन करने के लिए 3 थिंक-टैंक को लगाए जा रहे हैं। इसके लिए आईसीआरईआरईआर, सीआरटी और आईआईएम (बेंगलूर) और सीडब्ल्यूटीओएस का चयन किया गया है।
थिंक-टैंक एवं परामर्श:
उच्चस्तरीय सलाहकार समूह (एचएलएजी):
समकालीन वैश्विक व्यापार परिदृश्य में उभरते मुद्दों के बीच आगे की राह तलाशने और चुनौतियों के समाधान के लिए मौजूद अवसरों पर सिफारिश डीओसी ने एक एचएलएजी की स्थापना की है।
एचएलएजी वैश्विक मर्केंडाइज एवं सेवा व्यापार में भारत की हिस्सेदारी और उसके महत्व को बढ़ावा देने, द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को बेहतर करने और नई पीढ़ी के नीति निर्माण को मुख्यधारा से जोड़ने के तरीकों पर विचार करेगा।
एचएलएजी की संदर्भ शर्तें (टीओआर) प्रचलित अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रथाओं की जांच करना है। इसमें संरक्षणवाद की बढ़ती प्रवृत्ति विशेष तौर पर प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के संदर्भ में, दोहा विकास एजेंडा सहित बकाया व्यापार बातचीत के मुद्दों एवं प्रतिबद्धताओं को कुछ देशों द्वारा नजरअंदाज करना और सामान्य समझ एवं आमराय बनाने कई मामलों में बातचीत पर जोर देना शामिल लेकिन वह यहीं तक सीमित नहीं है।
इस परीक्षण के संदर्भ में नए मुद्दों पर एचएलएजी भारत के लिए आगे की राह सुझाएगा, इसके हितों एवं संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए वैश्विक समुदाय के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण मुहैया कराएगा ताकि एक अनुकूल वैश्विक व्यापार ढांचा तैयार किया जा सके और सहमति एवं सामंजस्यपूर्ण तरीके से आगे का रुख किया जाए जो वैश्विक समुदाय को स्वीकार्य हो।
समूह संभावित दृष्टिकोणों पर विचार कर सकता है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारत की भविष्य की संलिप्तता के लिए व्यावहारिक रूपरेखा का सुझाव दे सकता है। साथ ही यह उभरते व्यापार संबंधी मुद्दों के समाधान के लिए सर्वसम्मति से समाधान तलाशने और विभिन्न देशों के समुदाय के साथ काम करने में सक्रिय एवं रचनात्मक भूमिका निभा सकता है। यह समूह अक्टूबर 2018 से अब तक पांच बार बैठक कर चुका है और यह इस साल के अंत तक वाणिज्य मंत्री को अपनी रिपोर्ट सौंपेगा।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन ट्रेड (आईआईएफटी):
आईआईएफटी वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त सार्वजनिक बिजनेस स्कूल है जो देश के विदेशी व्यापार प्रबंधन को पेशेवर बनाने और मानव संसाधन विकास, डेटा सृजन, विश्लेषण एवं विस्तारण और अनुसंधान के जरिये निर्यात बढ़ाने में मदद करता है।
सेंटर फॉर डब्ल्यूटीओ स्टडीज:
सेंटर फॉर डब्ल्यूटीओ स्टडीज की स्थापना 1999 में डब्ल्यूटीओ वार्ता, उससे संबंधित ज्ञान एवं दस्तावेजों का स्थायी भंडार बनाने के उद्देश्य से की गई थी। साथ ही यह भी परिकल्पना की गई थी कि यह सेंटर सामान्य तौर पर व्यापार हितों के साथ एक अनुसंधान इकाई में और विशेष तौर पर डब्ल्यूटीओ में शामिल रहेगा ताकि अंतत: इसे एक स्वतंत्र थिंक टैंक के तौर पर विकसित किया जा सके।
इस सेंटर ने वर्षों से डब्ल्यूटीओ में हित के सभी क्षेत्रों में दस्तावेजों की एक श्रृंखला के साथ जबरदस्त अनुसंधान कार्यक्रम आयोजित किए हैं। इसने अपने ट्रेड रिसोर्स सेंटर में महत्वपूर्ण डब्ल्यूटीओ दस्तावेजों का एक विशेष ई-रिपॉजिटरी भी तैयार की है।
इसे भारत सरकार द्वारा नियमित रूप से अनुसंधान करने और स्वतंत्र विश्लेषणात्मक इनपुट प्रदान करने के लिए कहा जाता है ताकि डब्ल्यूटीओ और मुक्त एवं तरजीही व्यापार समझौते एवं व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते जैसे अन्य मंचों पर विभिन्न व्यापार वार्ता में उसे अपनी स्थिति तैयार करने में मदद मिल सके।
सेंटर फॉर रिजनल ट्रेड (सीआरटी):
सीआरटी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन ट्रेड में सेंटर फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल ट्रेड (सीआरआईटी) के तहत वाणिज्य विभाग द्वारा स्थापित एक स्वायत्त थिंक टैंक है।
यह लैटिन अमेरिका, अफ्रीका, दक्षिण एशिया, आसियान, चीन, यूरोपीय संघ, जापान, कोरिया और अमेरिका सहित विशिष्ट क्षेत्रों एवं देशों के साथ भारत के अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से संबंधित व्यापार एवं निवेश संबंधी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हुए अर्थशास्त्र में अनुसंधान करता है।
द सेंटर फॉर ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट लॉ (सीटीआईएल):
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन ट्रेड (आईआईएफटी) में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा वर्ष 2016 में इसकी स्थापना की गई थी। इसका प्राथमिक उद्देश्य भारत सरकार एवं अन्य सरकारी एजेंसियों को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवं निवेश कानून से संबंधित कानूनी मुद्दों का गहन विश्लेषण प्रदान करना है। यह सेंटर कानूनी विशेषज्ञों का एक समर्पित समूह तैयार करने पर ध्यान केंद्रित करता है जो अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवं निवेश वार्ता और विवाद निपटान में भारत की भागीदारी को बढ़ाने के लिए तकनीकी इनपुट प्रदान कर सके। इस सेंटर का उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक कानून के विभिन्न डोमेन जैसे डब्ल्यूटीओ कानून, अंतरराष्ट्रीय निवेश कानून और आर्थिक एकीकरण से संबंधित कानूनी मुद्दों में अग्रणी स्थिति हासिल करना है।
भारतीय गुणवत्ता परिषद:
भारतीय गुणवत्ता परिषद (क्यूसीआई) सोसायटी पंजीकरण अधिनियम के तहत पंजीकृत एक गैर-लाभकारी स्वायत्त सोसायटी है जो एक राष्ट्रीय गुणवत्ता अभियान चलाकर देश में गुणवत्ता आंदोलन को विस्तार देने और देश में एक प्रत्यायन ढांचा स्थापित करने पर ध्यान केंद्रित करती है। क्यूसीआई कोयला गुणवत्ता परीक्षण, स्वच्छ भारत मिशन के तहत आकलन, शिकायत विश्लेषण अध्ययन एवं शिकायत प्राप्त करने वाली शीर्ष 40 मंत्रालयों एवं विभागों को उपयुक्त सुधार की सिफारिश करती है। यह परिषद सीपीएसई में परियोजना कार्यान्वयन की गुणवत्ता की निगरानी के लिए एक डैशबोर्ड भी तैयार कर रहा है।
नई औद्योगिक नीति:
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग ने मई 2017 में एक नई औद्योगिक नीति तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की थी और इसे जल्द ही मंत्रिमंडल की मंजूरी मिल सकती है। यह 27 वर्ष पुरानी मौजूदा नीति को प्रतिस्थापित करेगी। इससे पहले वर्ष 1991 में घोषित आखिरी औद्योगिक नीति के बाद भारत विश्व की सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था बन चुका है। पिछले तीन वर्षों के दौरान मजबूत वृहत आर्थिक फंडामेंटल्स और कई जबरदस्त सुधारों के साथ भारतीय उद्योग को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए भारत विभिन्न विचारों एवं रणनीतियों से सुसज्जित है। नई औद्योगिक नीति में राष्ट्रीय विनिर्माण नीति भी समाहित होगी।
नई नीति के निर्माण के लिए एक परामर्श दृष्टिकोण अपनाया गया जिसमें छह विषयगत फोकस समूह और डीआईपीपी वेबसाइट पर एक ऑनलाइन सर्वेक्षण का उपयोग हितधारकों से इनपुट प्राप्त करने के लिए किया गया। विशिष्ट क्षेत्रों में उद्योग द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियों की जांच के लिए सरकारी विभागों, उद्योग संगठनों, अकादमिक एवं थिंक टैंक सदस्यों के साथ समूह का गठन किया गया था। छह विषयगत क्षेत्रों में विनिर्माण एवं एमएसएमई, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार, कारोबारी सुगमता, बुनियादी ढांचा, निवेश, व्यापार एवं राजकोषीय नीति, और भविष्य के लिए कौशल एवं रोजगार शामिल हैं। इस नीति के लिए इनपुट मुहैया कराने और भारत में आर्थिक बदलाव के लिए कृत्रिम बौद्धिकता पर एक कार्यबल का भी गठन किया गया है।
यह प्रस्तावित किया गया है कि नई औद्योगिक नीति मेक इन इंडिया को बढ़ावा देकर भारत को एक विनिर्माण केंद्र बनाने के लक्ष्य पर केंद्रित होगी। यह उन्नत विनिर्माण के लिए आईओटी, कृत्रिम बौद्धिकता और रोबोटिक्स जैसी आधुनिक स्मार्ट प्रौद्योगिकी का भी उचित उपयोग करेगी।
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आरके मीणा/अर्चना/संजित – 11778
(रिलीज़ आईडी: 1556288)
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