जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय
वर्षांत समीक्षा-2018: जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय
प्रविष्टि तिथि:
19 DEC 2018 5:07PM by PIB Delhi
1. राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी):
1.1 गंगा संरक्षण:-
- नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत विभिन्न गतिविधियों के लिए रु. 24,672 करोड़ लागत की कुल 254 परियोजनाएं मंजूर की गईं। इनमें अवजल जल ढांचा, घाटों और शमशान गृहों का विकास, नदी तट, नदी सतह स्वच्छता, संस्थागत विकास, जैव विविधता संरक्षण, वृक्षारोपण, ग्रामीण स्वच्छता और जन भागीदारी जैसी गतिविधियां शामिल हैं।
- 254 परियोजनाओं में से 131 परियोजनाएं गंगा एवं यमुना नदी में प्रदूषण के उपशमन के लिए 3076 एमएलडी क्षमता के नए अवजल उपचार संयंत्रों (एसटीपीज़) की स्थापना, 887 एमएलडी क्षमता के मौजूदा एसटीपीज़ के जीर्णोद्धार और 4942 किलोमीटर सीवर नेटवर्क बिछाने/जीर्णोद्धार करने से संबंधित हैं।
- पिछले एक वर्ष में अवजल क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव लाने के लिए 6 एसटीपी परियोजनाओं (50 एमएलडी वाराणसी, 82 एमएलडी हरिद्वार, 30 एमएलडी मथुरा, 50 एमएलडी कानपुर, उन्नाव और शुक्लागंज, 35 एमएलडी फरुखाबाद और 72 एमएलडी इलाहाबाद-झूसी, नैनी और फाफामऊ) का कार्य हाइब्रिड एन्युटी पीपीपी (एचएएम) के अंतर्गत शुरू किया गया है। एचएएम के अंतर्गत स्वीकृत अन्य परियोजनाओं में उत्तर प्रदेश में मिर्जापुर, गाजीपुर और मुरादाबाद; बिहार में दीघा कंकड़बाग और भागलपुर; पश्चिम बंगाल में कोलकाता, हावड़ा, बैली, कमरहाटी और बड़ानगर शामिल हैं।
- नदी तट विकास के लिए 145 घाटों और 53 शमशान गृहों का कार्य प्रगति पर है और इसके मार्च 2019 तक पूरा हो जाने की संभावना है।
- नदी सतह स्वच्छता के लिए हरिद्वार, गढ़मुक्तेश्वर, कानपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, पटना, साहिबगंज, नबद्वीप, हावड़ा, दिल्ली और मथुरा-वृंदावन में 11 ट्रैश स्किमर्स (कचरा साफ करने की मशीन) तैनात किए गए हैं।
- ग्रामीण स्वच्छता के अंतर्गत गंगा नदी के किनारे बसे सभी 4,465 गांवों को खुले में शौच जाने से मुक्त (ओडीएफ) किया गया है और पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय द्वारा 10,83,688 पृथक परिवार शौचालयों का निर्माण कार्य पूरा किया गया है। इस कार्य के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन ने रु. 829 करोड़ जारी किए हैं।
- जैव विविधता संरक्षण और गंगा नदी की जलीय जैव विविधता बहाल करने के लिए कुल 6 परियोजनाएं शुरू की गई हैं, जो डाल्फिन, घड़ियाल, ऊदबिलाव, जल पक्षियों और मत्स्य एवं मत्स्य उद्योग से संबंधित हैं। इनमें से 2 परियोजनाओं का काम पूरा कर लिया गया है।
- गंगा थाले में वृक्षारोपण कार्यक्रम के हिस्से के रूप में उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल को वर्ष 2018-19 के लिए रु. 190.3 करोड़ मंजूर किए गए हैं।
- गंगा से संबंधित पांच राज्यों में परियोजनाओं और गतिविधियों की कारगर निगरानी के लिए 5 राज्य गंगा समितियों और 48 जिला गंगा समितियों का गठन किया गया।
- लंदन और मुम्बई में 2 रोड़ शो सफलतापूर्वक पूरे करके नमामि गंगे कार्यक्रम में कम्पनियों की भागीदारी बढ़ाई गई। कॉर्पोरेट घरानों ने गंगा को स्वच्छ बनाने में रुचि और प्रतिबद्धता व्यक्त की है। आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, जर्मनी, फिनलैंड और इज़राइल जैसे देशों ने गंगा नदी को स्वच्छ बनाने के लिए भारत सरकार के साथ सहयोग करने में रुचि प्रदर्शित की है।
- वित्तीय वर्ष 2018-19 के दौरान (30.11.2018 तक), राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन ने राज्यों, केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र प्रतिष्ठानों को स्थापना के लिए व्यय सहित कार्यक्रमों के कार्यान्वयन हेतु रु. 1,532.59 करोड़ जारी किए।
1.2 ई-फ्लो अधिसूचना
- अक्तूबर, 2018 को केंद्र सरकार ने गंगा नदी के लिए न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह अधिसूचित किए, जो नदी में विभिन्न स्थानों पर सुनिश्चित करने होंगे। पर्यावरणीय प्रवाह स्वीकार्य प्रवाह व्यवस्थाएं हैं, जो वांछित पर्यावरणीय स्थिति अथवा पूर्व निर्धारित स्थिति में किसी नदी में बनाए रखना अपेक्षित है। सरकार द्वारा जारी अधिसूचना यह सुनिश्चित करेगी कि सिंचाई, जल विद्युत, घरेलू और औद्योगिक उपयोग आदि प्रयोजनों के लिए परियोजनाओं एवं ढांचों द्वारा नदी प्रवाह को पथांतर किए जाने के बावजूद जल का न्यूनतम अपेक्षित पर्यावरणीय प्रवाह नदी में बना रहे। नदी का अबाधित या अविरल प्रवाह बनाए रखने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है।
1.3 सिसामऊ नाला अवरोधन
- उत्तर प्रदेश में गंगा नदी को स्वच्छ बनाने संबंधी बड़ी उपलब्धियों में से एक है कानपुर में सिसामउ नाले का अवरोधन और पथांतरण। यह नाला नदी को प्रदूषित करने वाले सबसे बड़े घटकों में से एक रहा है, जो चमड़ा उद्योगों का अवजल नदी में प्रवाहित करता रहा है। इस नाले के 140 एमएलडी अवजल को रोका गया है और पथांतरित करते हुए उपचार के लिए एक एसटीपी में पहुंचाया गया है।
1.4 औद्योगिक प्रदूषण प्रबंधन
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा की गई (2017-18) पुनः सूचीकरण कवायद के बाद गंगा नदी के प्रमुख भाग में भारी प्रदूषण पहुंचाने वाले 961 उद्योगों की पहचान की गई।
- नवम्बर 2018 तक सर्वाधिक प्रदूषण पहुंचाने वाले 961 उद्योगों में से, 795 इकाइयों को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सर्वर की ऑनलाइन सतत प्रदूषक निगरानी प्रणाली से जोड़ा गया है।
- सर्वाधिक प्रदूषण पहुंचाने वाले 961 उद्योगों का निरीक्षण किया गया, जिनमें से 474 उद्योग नियमों का पालन कर रहे थे, 209 को नियमों का पालन न करते हुए पाया गया, 256 अस्थाई रूप से बंद हो गए थे और 22 स्थाई रूप में बंद देखा गया।
- नियमों का पालन न करने वाली 209 औद्योगिक इकाइयों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है, जिनमें से 199 इकाइयों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं और 10 इकाइयों को बंद करने के निर्देश जारी किए गए हैं।
- शीरा आधारित 32 शराब फैक्ट्रियों में शून्य तरल उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल किया गया। अत्याधुनिक प्रोसेस प्रौद्योगिकी अपनाने की बदौलत शराब के कारखानों में स्पेंट वाश का उत्सर्जन शराब उत्पादन के 12-15 केएल/केएल से घट कर 8 केएल/केएल रह गया।
- चीनी उद्योग मे विनिर्माण प्रक्रिया प्रौद्योगिकी, ईटीपी प्रणाली के उन्नयन और उत्कृष्ट पद्धतियों तथा न्यूनतम कचरा पद्धतियों के वास्ते चार्टर तैयार किया गया और जारी किया गया।
- लुगदी और कागज उद्योग में, कृषि आधारित उद्योगों से काले तरल पदार्थ के निपटान पर पाबंदी लगाई गई है और उन्हें कैमिकल रिकवरी प्लांटों (सीआरपीज़) के साथ कार्य संचालन की मंजूरी दी गई है, ताकि काले तरल पदार्थ के शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल किया जा सके।
- लुगदी और कागज क्षेत्र में उत्पादन क्षमता के विस्तार और इकाइयों की संख्या में वृद्धि के बावजूद स्वच्छ जल खपत और प्रदूषण उत्सर्जन में 2012 में अनुमानित प्रदूषण स्तर की तुलना में करीब 45 से 50 प्रतिशत तक कमी आई है।
- कानपुर में जाजमऊ चमड़ा उद्योग समूह में 20 एमएलडी सीईटीपी के निर्माण, संग्रहण और ढुलाई प्रणाली, प्रायोगिक आकार के 200 केएलडी जेएलडी प्लांट और 900 केएलडी साझा क्रोम रिकवरी यूनिट के निर्माण को मंजूरी दी गई है और इसके लिए कुछ वित्तीय शर्तों के साथ रु. 554 करोड़ मंजूर किए गए हैं।
- मथुरा टेक्सटाइल उद्योग समूह के लिए रु. 13.87 करोड़ की मंजूरी के साथ मौजूदा सीईटीपी के उन्नयन का प्रस्ताव इस शर्त के साथ मंजूर किया गया है कि उद्योग को परियोजना लागत का 25 प्रतिशत और शत प्रतिशत प्रचालन एवं रख रखाव खर्च वहन करना होगा।
1.5 जल गुणवत्ता निगरानी
- नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत 36 वास्तविक समय जल गुणवत्ता निगरानी केंद्र (आरटीडब्ल्यूक्यूएमएस) काम कर रहे हैं।
- 130 स्थानों पर जल गुणवत्ता जांच की जा रही है। ----- स्थानों पर विघटित ऑक्सीजन स्तरों में सुधार हुआ है, 42 स्थानों पर बायोलॉजीकल ऑक्सीजन मांग में कमी आई है और 47 स्थानों पर कोलिफोर्म बैक्टीरिया गणना में कमी दर्ज हुई है (2017 और 2018 के आंकड़ों की तुलना में)।
- गंगा नदी में विभिन्न स्थानों (हरिद्वार से पश्चिम बंगाल में डायमंड हार्बर तक) पर जैन निगरानी की गई ताकि बैंथिक मैक्रो इन्वर्टेब्रेट्स (पानी में पत्थर आदि वस्तुओं से चिपके रहने वाली सूक्षम जीव प्रजातियां) का अध्ययन किया जा सके, जो नदी के जैविक स्वास्थ्य के द्योतक होते हैं। यह देखा गया है कि गंगा के जल की गुणवत्ता विविध जीव समुदाय संरचना को जीवन प्रदान करती है और नदी के विभिन्न हिस्से जैविक जल गुणवत्ता मानदंड (बीडब्ल्यूक्यूसी) के संदर्भ में हल्के से सामान्य स्तर के प्रदूषण को दर्शाते हैं। बीडब्ल्यूक्यूसी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा सुझाया गया मानदंड है। गंगा में कुछ स्थानों पर जैविक जल गुणवत्ता में सुधार की प्रवृत्ति परिलक्षित होती है।
2. प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई)
जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय के त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (एआईबीपी), भूमि संसाधन विभाग के समेकित जलसंभर प्रबंधन कार्यक्रम (आईडब्ल्यूएमपी) और कृषि एवं सहकारिता विभाग के खेत जल प्रबंधन (ओएफडब्ल्यूएम) जैसे मौजूदा कार्यक्रमों को मिला कर पीएमकेएसवाई तैयार किया गया है। राज्यों के साथ सलाह मश्विरा करके त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रमों के अंतर्गत पहले से जारी 99 बड़ी/मध्यम परियोजनाओं को उनके कमान क्षेत्र विकास और जल प्रबंधन कार्य के साथ पीएमकेएसवाई के अंतर्गत लाया गया और रु. 77,595 करोड़ की अनुमानित लागत के साथ 7.03 लाख हेक्टेयर में सिंचाई क्षमता की परियोजनाओं को विभिन्न चरणों में दिसम्बर 2019 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया। प्राथमिकता वाली 99 परियोजनाओं को समय पर पूरा करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार के लिए नाबार्ड के जरिए वित्तीय व्यवस्था की गई।
2017-18 और 2018-19 के दौरान (10.12.2018 तक) धन जारी किए जाने की स्थिति इस प्रकार थीः
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क्र सं
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मद
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जारी धन करोड़ रुपये में
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2017-18
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2018-19
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1
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99 वरीयता परियोजनाओं के लिए केंद्रीय सहायता (एआईबीपी)
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3593.6
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1390.26
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2
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ओलावरम परियोजना
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1400
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3
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एलडीआईएफ से राज्य हिस्सेदारी
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4717.3
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4213.53
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राज्यों ने सूचित किया है कि वरीयता वाली 99 एआईबीपी परियोजनाओं, जिनकी पहचान एक अभियान के रूप में दिसम्बर, 2019 तक पूरा करने के लिए की गई है, में से 9 परियोजनाओं के संदर्भ में सीएडीडब्ल्यूएम कार्य या तो पूरे कर लिए गए हैं, या फिर उनकी आवश्यकता नहीं है। शेष 90 परियोजनाओं में से 86 परियोजनाओं को पीएमकेएसवाई कार्यक्रम के सीएडीडब्ल्यूएम के अंतर्गत शामिल किया गया है। इन 86 परियोजनाओं के संदर्भ में बकाया सीसीए करीब 42 लाख हेक्टेयर और लक्षित सीए रु. 8,176 करोड़ है, जबकि इन 86 परियोजनाओं की कुल लागत रु. 17,800 करोड़ है।
सीएडीडल्ब्यूएम घटक के लिए 2016-17 और 2017-18 के दौरान जारी किया गया धन (31.03.2018 तक) -
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मद
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जारी धनराशि (रुपये करोड़ में)
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2016-17
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2017-18
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सीएडीडब्ल्यूएम
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854
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933
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सतह लघु सिंचाई (एसएमआई) और जल निकायों की मरम्मत, संरक्षण और जीर्णोद्धार (आरआरआर) कार्यक्रमः
सतह लघु सिंचाई (एसएमआई) कार्यक्रम के अंतर्गत राज्यों को वित्तीय वर्ष 2017-18 के दौरान कुल रु. 665.35 करोड़ और वित्तीय वर्ष 2018-19 के दौरान (30.11.2018 तक) रु. 527.90 करोड़ की कुल केंद्रीय सहायता जारी की गई।
जल निकायों की मरम्मत, संरक्षण और जीर्णोद्धार (आरआरआर) कार्यक्रम के अंतर्गत राज्यों को वित्तीय वर्ष 2017-18 के दौरान कुल रु. 79.65 करोड़ और वित्तीय वर्ष 2018-19 के दौरान (30.11.2018 तक) रु. 22.10 करोड़ की कुल केंद्रीय सहायता जारी की गई।
3. शाहपुर कांडी बांध परियोजनाः जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय के तत्वावधान में पंजाब और जम्मू-कश्मीर राज्य के बीच 8 सितम्बर, 2018 को एक समझौता हुआ, जिसके अनुसार पंजाब में रावी नदी पर शाहपुर कांडी बांध परियोजना का कार्य फिर शुरू करने पर सहमति हुई। पंजाब और जम्मू-कश्मीर राज्य के बीच विवाद के बाद इस परियोजना का कार्य 30.8.2014 से निलम्बित कर दिया गया था। 1 नवम्बर, 2018 से इसका कार्य फिर शुरू किया गया।
इस परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया था। 6 दिसम्बर, 2018 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस परियोजना के कार्यान्वयन के लिए रु. 485.38 करोड़ की केंद्रीय सहायता (सिंचाई घटक के लिए) प्रदान करने के इस मंत्रालय के प्रस्ताव का अनुमोदन किया। परियोजना जून 2022 तक पूरी की जाएगी।
इस परियोजना से पंजाब राज्य में 5000 हेक्टेयर और जम्मू-कश्मीर राज्य में 32173 हेक्येयर भूमि में अतिरिक्त सिंचाई क्षमता सृजित करने और पंजाब में यूबीडीसी प्रणाली के अंतर्गत 1.18 लाख हेक्टेयर क्षेत्र के सक्षम प्रबंधन में भी मदद मिलेगी। नतीजतन, इस परियोजना से वर्तमान में माधोपुर हेडवर्क्स के जरिए पाकिस्तान को व्यर्थ जा रहे रावी नदी के कुछ जल को बचाने में भी मदद मिलेगी।
4. बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रम (एफएमपी) – भू-कटाव सहित बाढ़ प्रबंधन का विषय राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है। बाढ़ प्रबंधन और भूमि कटाव कार्यक्रम राज्य सरकारों द्वारा नियोजित, अन्वेषित और कार्यान्वित किए जाते हैं, जो वे राज्य में वरीयता अनुसार अपने संसाधनों से कार्यान्वित करते हैं। केंद्र सरकार तकनीकी मार्गदर्शन और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में वित्तीय सहायता प्रोत्साहन के रूप में राज्यों के प्रयासों में पूरक भूमिका अदा करती है। भारत सरकार ने 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान नदी प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण, भूमि-कटाव प्रतिरोधी निकासी प्रणाली विकास, बाढ़ रोकथाम कार्यों, क्षतिग्रस्त बाढ़ प्रबंधन कार्यों की बहाली और समुद्री कटाव रोकथाम जैसे कार्यों के लिए राज्य सरकारों को केंद्रीय सहायता प्रदान करने हेतु एक बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रम प्रारंभ किया। इस कार्यक्रम के अंतर्गत विभिन्न राज्यों और संघ शासित प्रदेशों को 31.3.2018 तक रु. 5,435.74 करोड़ की केंद्रीय सहायता प्रदान की गई है।
‘‘बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रम’’ (आरएमबीए) और ‘‘नदी प्रबंधन गतिविधियां और सीमावर्ती क्षेत्र कार्यक्रम’’ को मिला कर 2017-18 से 2019-20 तक की तीन वर्ष की अवधि के लिए एकल कार्यक्रम ‘‘बाढ़ प्रबंधन और सीमावर्ती क्षेत्र कार्यक्रम’’ (एफएमबीएपी) का रूप दिया गया है। नवम्बर 2018 तक एफएमबीएपी के अंतर्गत राज्यों को सहायता अनुदान के रूप में रु. 367.94 करोड़ जारी किए गए।
5. फरक्का बांध परियोजनाः फरक्का बांध परियोजना (एफबीपी) 1975 में कोलकाता बंदरगाह के संरक्षण और रख-रखाव तथा भगीरथी-हुगली जलमार्ग की नौवहन गहराई बढ़ाने के लिए शुरू की गई थी। इसे देखते हुए कि फरक्का बांध परियोजना के द्वार अपना आर्थिक जीवन और कार्यावधि पूरी कर चुके हैं, यह निर्णय किया गया कि एफबीपी के अंतर्गत मुख्य बांध और हेड रेग्युलेटर के सभी द्वारों, दूरस्थ नियंत्रण प्रणाली आदि का चरणबद्ध तरीके से स्थानापन्न किया जाए। अभी तक फरक्का बांध के 42 द्वारों का स्थानापन्न किया जा चुका है और एफबीपी के शेष द्वारों को चरणबद्ध तरीके से बदलने का कार्य जारी है। फरक्का बांध के ऊपर पीएससी रोड ब्रिज की विशेष मरम्मत और रख-रखाव का कार्य एफबीपी द्वारा अवार्ड किया गया है और तत्संबंधी कार्य जारी है।
6. लखवार परियोजनाः ऊपरी यमुना नदी थाले में रु. 3966.51 करोड़ की निर्माण लागत के साथ बहु-उद्देश्यीय लखवार परियोजना के लिए 28 अगस्त, 2018 को केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण, जहाजरानी एवं सड़क परिवहन मंत्री श्री नितिन गडकरी तथा उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, हरियाण, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्रियों के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए। लखवार परियोजना प्रारंभ में 1976 में अनुमोदित की गई थी, परंतु, 1992 में इसका कार्य स्थगित कर दिया गया था। लखवार परियोजना में उत्तराखंड के देहरादून जिले में लोहारी गांव के निकट 330.66 एमसीएम की भंडारण क्षमता के साथ 204 मीटर ऊंचे कंकरीट बांध के निर्माण की व्यवस्था है। यह बांध 6 थाला राज्यों में 33,780 हेक्टेयर भूमि के लिए सिंचाई की व्यवस्था करेगा और घरेलू, पेयजल और औद्योगिक उपयोग के लिए 78.83 एमसीएम जल उपलब्ध कराएगा। इस परियोजना से 300 मेगावाट बिजली भी पैदा होगी। परियोजना के कार्यान्वयन की जिम्मेदारी मैसर्स उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड (यूजेवीएल) को सौंपी गई है।
7. नदियों को परस्पर जोड़नाः
i. राष्ट्रीय संदर्श योजनाः
तीन वरीयता नदी सम्पर्क परियोजनाओं - केन-बेतवा सम्पर्क परियोजना (चरण 1 और 2), दमनगंगा-पिंजाल सम्पर्क परियोजना और पार-ताप्ती-नर्मदा सम्पर्क परियोजना के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने का काम पूरा हो गया है। केबीएलपी चरण-1 के लिए सम्बद्ध मंत्रालयों/विभागों द्वारा/से विभिन्न प्रकार की सांविधिक/अन्य मंजूरियां प्रदान/प्राप्त कर दी गई हैं और परियोजना रिपोर्ट कार्यान्वयन के लिए तैयार है। इनमें पर्यावरण मंजूरी, चरण-1 वन भूमि रूपांतरण मंजूरी, वन्यजीव, एमओटीए (जन जातीय कार्य मंत्रालय), तकनीकी-आर्थिक और निवेश मंजूरी शामिल हैं। निचले उर्र बाध के लिए वनभूमि रूपातंरण मंजूरी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ईएसी और एफएएसी द्वारा वन भूमि रूपातंरण मंजूरी की अनुशंसा की गई है। जनजातीय कार्य मंत्रालय ने कुछ शर्तों के अधीन निचले उर्र बाध की पीएएफ्स की पुनर्वास और पुनर्स्थापन (आरएण्डआर) योजना के लिए मंजूरी प्रदान कर दी है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने बीना काम्प्लेक्स के लिए पर्यावरणीय और वन संबंधी मंजूरी प्रदान कर दी है। माननीय मंत्री (जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय) ने केबीएलपी के बारे में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्रियों के साथ विचार-विर्मश किया है तथा जल बंटवारे के बारे में समझौता ज्ञापन पर शीघ्र हस्ताक्षर होने की उम्मीद है। इसके अतिरिक्त माननीय मंत्री (जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय) ने दमणगंगा-पिंजाल सम्पर्क और पार-तापती नर्मदा सम्पर्क परियोजनाओं के बारे में गुजरात और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्रियों के साथ विचार-विर्मश किया है तथा जल बंटवारे के बारे में समझौता ज्ञापन पर शीघ्र हस्ताक्षर होने की उम्मीद है। माननीय मंत्री (जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय) ने छत्तीसगढ़ के जल संसाधन मंत्री के साथ गोदावरी थाले के इंद्रावती उपथाले में छत्तीसगढ़ की बाढ़ के इस्तेमाल न किये गये प्रवाह को (जीडब्ल्यूडीटी समझौते के अनुसार) गोदावरी-कावेरी सम्पर्क परियोजना के ज़रिए पथांतरित करने के लिए वैकल्पिक अध्ययन के बारे में बातचीत की है। इसके वैकल्पिक अध्ययन की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की जा रही है।
ii. अंतः-राज्य सम्पर्क प्रस्तावः
चार अंतः-राज्य सम्पर्क परियोजनाओं की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की जा चुकी हैं और संबद्ध राज्यों को भेज दी गई हैं। ये हैं- बिहार राज्य में बूढ़ी गंडक-नून-बाया-गंगा सम्पर्क और कोसी-मिचि सम्पर्क, तमिलनाडु में पोन्नाइयार-पालार सम्पर्क और महाराष्ट्र में वेनगंगा (गोशीखुर्द)-नलगंगा(पूर्ण/तापी) सम्पर्क परियोजना। महाराष्ट्र में दमणगंगा (इकडारे)-गोदावरी और दमणगंगा (वाघ/वाल)-वैतरणा-गोदावरी (कडवा देव) सम्पर्क परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने का कार्य प्रगति पर हैं।
8. बिहार और झारखंड की उत्तर कोएल जलाश्य परियोजना का शेष कार्य पूरा, जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय ने बिहार और झारखंड में उत्तर कोएल जलाश्य परियोजना का बकाया निर्माण कार्य शुरू किया है, जो 1993 से बंद पड़ा था। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अगस्त 2017 में रू. 1622.27 करोड़ रूपये की अनुमानित लागत से परियोजना का काम प्रारम्भ होने से तीन वित्तीय वर्षों में उसे पूरा करने की मंजूरी प्रदान की। कैबिनेट ने परियोजना का बकाया कार्य टर्नकी आधार पर परियोजना प्रबंधन परामर्श के रूप में मैसर्ज वापकोस लिमिटेड द्वारा पूरा किये जाने की भी मंजूरी प्रदान की। भारत सरकार केंद्रीय हिस्से के रूप में रू. 1378.61 करोड़ की सहायता प्रदान करेगी और बिहार तथा झारखंड राज्य सरकारें क्रमशः रू 212.43 करोड़ और रू. 31.23 करोड़ की व्यवस्था करेंगी।
इस परियोजना का उद्देश्य बिहार के औरंगाबाद और गया जिलों तथा झारखंड के पलामू और गढ़वा जिलों के सूखे की आशंका वाले क्षेत्रों में हर वर्ष 39,801 हेक्टेयर भूमि में सिंचाई की अतिरिक्त सुविधा प्रदान करना है।
इस परियोजना के अंतर्गत मोहम्मदगंज बांध और लेफ्ट मेन कनाल पर कार्य प्रगति पर हैं। भारत सरकार के जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय ने दूसरे चरण के लिए वन मंजूरी प्रदान कर दी है।
वर्ष 2018-19 के दौरान परियोजना के कार्यान्वयन के लिए रू. 582.70 करोड़ की केंद्रीय सहायता जारी की है।
9. लघु सिंचाई गणना
मंत्रालय देश में भूजल और सतह जल लघु सिंचाई कार्यक्रमों के बारे में मजबूत और भरोसेमंद डेटाबेस तैयार करने के लिए लघु सिंचाई गणना संचालित करता है। मंत्रालय इस गणना के संचालन के लिए राज्यों/संघ शासित प्रदेशों को शत प्रतिशत वित्तीय सहायता और तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान करता है।
छठी लघु सिंचाई गणना और जल निकायों की गणना
- मंत्रालय ने छठी लघु सिंचाई गणना के साथ पहली बार जल निकायों की गणना के संचालन की प्रक्रिया शुरू की, ताकि जल निकायों के बारे में डेटाबेस तैयार किया जा सके।
- जनवरी, 2018 में प्रारंभिक कार्य पूरे किए गए, जैसे अनुसूचियां, अनुदेश, नियमावली, संचालनगत दिशा-निर्देशों आदि के प्रारूप तैयार करना और संचालन समिति द्वारा उनका अनुमोदन।
- छठी लघु सिंचाई गणना और जल निकायों की गणना के लिए अखिल भारतीय प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन 16 मार्च, 2018 को किया गया। प्रशिक्षण कार्यशाला में अधिकतर राज्यों/संघ शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।
- छठी लघु सिंचाई गणना और जल निकायों की गणना के लिए गणना सामग्री, जैसे अनुसूचियां, अनुदेश और तालिका जांच बिंदु आदि, आगे की कार्रवाई के लिए राज्यों/संघ शासित प्रदेशों को भेजे गए।
- जून 2018 से अगस्त 2018 की अवधि में छठी लघु सिंचाई और जल निकायों की गणना के लिए कुल 6 दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशालाओं के आयोजन पूरे किए गए। विभिन्न फील्ड-पूर्व गतिविधियां पूरी करने के लिए सतत निगरानी की व्यवस्था की गई। इन गतिविधियों में राज्यों द्वारा प्रशिक्षण, अनुसूचियों का प्रकाशन, मोबाइल उपकरणों की खरीद आदि शामिल थीं।
- निर्मित निगरानी व्यवस्था और जल निकायों के जियो-टैगिंग के लिए मोबाइल ऐप सहित डेटा एंट्री पोर्टल के लिए सॉफ्टवेयर विकास की प्रक्रिया लगभग पूरी कर ली गई है।
10. राष्ट्रीय जलवाही स्तर प्रबंधन (एनएक्यूयूआईएम)
जलवाही परतों के मानचित्रण के लिए राष्ट्रीय जलवाही स्तर प्रबंधन कार्यक्रम (एनएक्यूयूआईएम) की योजना तैयार की गई है। इसका उद्देश्य राज्यों में भूमिगत जल प्रबंधन और विकास की क्षमता बढ़ाना है। राष्ट्रीय जलवाही स्तर मानचित्रण और प्रबंधन कार्यक्रम के लिए कुल लक्षित क्षेत्र 12.91 लाख वर्ग किलोमीटर है, जिसका मानचित्रण मार्च 2020 तक किया जाना है, जबकि देश में कुल 24 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की पहचान मानचित्रण के लिए की गई है। अक्तूबर 2018 के अंत तक 8.91 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के लिए जलवाही स्तर मानचित्र और प्रबंधन योजनाएं विकसित की गई हैं। यह कार्य सम्बद्ध राज्य सरकारों की एजेंसियों के साथ साझा किया गया/साझा किया जाएगा।
11. जल संसाधन सूचना प्रणाली का विकास (डीडब्ल्यूआरआईएस)
डीडब्ल्यूआरआईएस कार्यक्रम 12वीं पंचवर्षीय योजना से निरंतर चला आ रहा है, जो जल संसाधन परियोजनाओं के लिए आयोजना एवं नीति निर्माण हेतु भरोसेमंद और सुदृढ़ डेटाबेस तैयार करने और बाढ़ पूर्वानुमान समय पर सम्प्रेषित करने आदि के लिए कार्यान्वयन के अधीन है।
डीडब्ल्यूआरआईएस के अंतर्गत वर्ष 2018 के दौरान उपलब्धियां :
- 319 नए जल वैज्ञानिक पर्यवेक्षण स्थल पूरी तरह चालू किए गए।
- 23 नए बाढ़ चेतावनी केंद्र खोले गए।
- स्वचालित आंकड़ा संग्रहण और उपग्रह आधारित आंकड़ा ट्रांसमिशन प्रणाली के लिए 87 स्थलों पर टेलीमीटरी संस्थापित की गई।
- 85 स्थानों पर टेलीमीटरी प्रणालियां उन्नत बनाई गईं।
- रंजीत सागर बांध के लिए अंतर-प्रवाह मॉडल विकसित किए गए हैं और मानसून के दौरान एकत्र किए गए आंकड़ों के आधार पर पूर्व में विकसित 271 मॉडलों को उन्नत बनाया गया।
- ब्रह्मपुत्र नदी के लिए बाढ़ मॉडल विकसित किए गए हैं।
- 2018-19 के मॉनसून के दौरान 6791 बाढ़ चेतावनी बुलेटिन जारी किए गए।
12. जल-मौसम वैज्ञानिक आंकड़ा सम्प्रेषण नीति, 2018
मंत्रालय ने जल-मौसम वैज्ञानिक आंकड़ा सम्प्रेषण नीति, 2018 तैयार की है, जो केंद्रीय जल आयोग और केंद्रीय भूमिगत जल बोर्ड द्वारा एकत्र किए गए जल-मौसम वैज्ञानिक आंकड़ों के सम्प्रेषण, जल-मौसम वैज्ञानिक आंकड़ों के वर्गीकरण, आंकड़ा इस्तेमाल करने वालों की श्रेणियां, जल-मौसम वैज्ञानिक आंकड़ों के अभिरक्षक और वर्गीकृत एवं अवर्गीकृत जल-मौसम वैज्ञानिक आंकड़ों को जारी करने की प्रक्रिया आदि मुद्दों से सम्बद्ध हैं।
जल-मौसम वैज्ञानिक आंकड़ा सम्प्रेषण नीति 2018 की प्रति जल संसाधन नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय की वेबसाइट http://mowr.gov.in/hydro-meteorological-data-dissemination-policy-2018 पर उपलब्ध है।
12. बांध पुनर्वास और सुधार कार्यक्रम (डीआरआईपी)
लक्ष्य और प्रगतिः
- वर्ष 2018-19 में 38 बांधों के बारे में दरारों संबंधी विश्लेषण किया गया ताकि बाढ़ रिपोर्ट तैयार की जा सके। राज्य कार्यान्वयन एजेंसियों द्वारा तैयार किए गए और केंद्रीय परियोजना निगरानी यूनिट को प्रस्तुत किए गए कुल 64 आपात कार्य योजनाओं के मसौदों में से 57 की समीक्षा की गई।
- वर्ष 2018-19 के दौरान रु. 126 करोड़ की लागत वाली कुल 81 निविदाओं के लिए नोटिस जारी किए गए और आज दिनांक तक रु. 744 करोड़ की लागत के 76 कार्य पैकेज आवंटित किए गए। इस अवधि में रु. 1050.7 करोड़ व्यय किए गए।
- धर्मा नाम का एक वेब आधारित बांध सूची प्रबंधन सॉफ्टवेयर तैयार करने का काम पूरा किया गया है।
दिशा निर्देश और नियमावली तैयार करना
- एक परियोजना के तहत बांध सुरक्षा के विभिन्न पहलुओं के बारे में दिशा निर्देश के दो सेट तैयार किए गए और सम्मेलन के दौरान उन्हें जारी किया गया।
- अलमाटी बांध, कर्नाटक डब्ल्यूआरडी और मीठा बांध, की प्रचालन और रख रखाव नियमावली के दो मॉडल, डीआरआईपी कार्यान्वयन एजेंसियों के मार्गदर्शन के लिए संदर्भ दस्तावेज के रूप में डीवीसी तैयार किए गए, ताकि डीआरआईपी बांधों के लिए प्रचालन और रख रखाव नियमावली तैयार की जा सके।
- हिराकुड बांध की मॉडल ईएपी तैयार की गई और सभी आईएज़ के साथ साझा की गई ताकि वे अन्य डीआरआईपी बांधों के लिए इन समझौतों का अनुकरण कर सकें।
डीआरआईपी-2
डीआरआईपी के अंतर्गत देश के अधिक राज्यों को कवर करने के लिए, केंद्रीय जल आयोग ने नए डीआरआईपी (अर्थात् डीआरआईपी-2) के लिए प्रस्ताव भेजा है, जो मंत्रालय के विचाराधीन है। अभी तक 18 राज्य एजेंसियों और दो केंद्रीय एजेंसियों अर्थात् केंद्रीय जलायोग और बीबीएमपी, ने प्रस्ताव जमा कराए हैं। डीआरआईपी-2 की समग्र लागत, जो सभी राज्यों/केंद्रीय एजेंसियों से प्राप्त हुई है, वह 733 बांधों के लिए रु. 11,487 करोड़ आंकी गई है। डीआरआईपी-2 10 वर्ष के लिए प्रस्तावित की गई है, जिसे दो चरणों अर्थात् चरण-2 और चरण-3 के रूप में कार्यान्वित किया जाएगा। प्रत्येक चरण की अवधि 6 वर्ष होगी।
13. पोलावरम परियोजना प्राधिकरण (पीपीए)
यह परियोजना प्रगति के अग्रिम चरण में है। जल संसाधन विभाग, आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तुत की गई, पोलावरम सिंचाई परियोजना की भौतिक प्रगति इस प्रकार हैः
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क्र सं
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विवरण
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उपलब्धि प्रतिशत (नवम्बर 2018 तक)
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1
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हेड वर्क्स
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50.54
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2
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दाईं मुख्य नहर
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90.00
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3
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बाईं मुख्य नहर
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66.02
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समग्र परियोजना
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61.81
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वर्ष 2018-19 के दौरान पोलावरम सिंचाई परियोजना के कार्यान्वयन के लिए आंध्र प्रदेश सरकार को रु. 2,398.20 करोड़ जारी किए गए।
14. ब्रह्मपुत्र बोर्ड
i. वर्ष के दौरान निम्नांकित भू-कटाव और बाढ़ संरक्षण कार्यक्रम पूरे किए गएः
- असम में ‘‘माजुली द्वीप संरक्षण’’ कार्यक्रम के अंतर्गत चरण-2 और 3 के कार्य।
- असम के धुबरी जिले में मसालाबाड़ी अंतर्राष्ट्रीय सीमा क्षेत्र का संरक्षण।
- जेंगराई नहर विकास कार्यक्रम।
- जकाइचुक नहर विकास कार्यक्रम।
ii. भारत सरकार ने तीन उप-थाला बृहत्त योजनाओं यानी जलढाका, सिमसांग और तोरसा को मंजूरी प्रदान की।
iii. जल संसाधन नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय के सचिव ने 27.09.2018 को ‘‘पूर्वोत्तर क्षेत्र में जल संसाधन के अंतर्गत कार्यरत संगठनों के बीच तालमेल’’ विषय पर एक सेमिनार का उद्घाटन किया, जिसमें 37 केंद्रीय और राज्य सरकार विभागों/संगठनों/शैक्षिक स्थानों के 75 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।
- वर्ष 2018 के दौरान स्वच्छ भारत अभियान के तहत ब्रह्मपुत्र बोर्ड ने निम्नांकित कार्यक्रम आयोजित किएः-
- स्कूली विद्यार्थियों के बीच चित्रकला और निबंध लेखन प्रतियोगिताएं।
- सार्वजनिक स्थलों, स्कूलों और कार्यालयों में ‘श्रमदान’ के जरिए स्वच्छता।
- ब्रह्मपुत्र बोर्ड ने स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत माजुली द्वीप में दो घाटों अर्थात कमलाबाड़ी और अफलामुख के विकास का काम शुरू किया और नेमाती घाट से माजुली द्वीप आने वाले यात्रियों को आवश्यक स्वच्छता सुविधाएं और अन्य सुरक्षित पहुंच सुविधाएं प्रदान कीं।
15. राष्ट्रीय परियोजना निर्माण निगम लिमिटेड (एनपीसीसी)
एनपीसीसी की स्थापना 9 जनवरी 1957 को देश में आर्थिक विकास के लिए आवश्यक ढांचे के निर्माण हेतु एक प्रमुख निर्माण कम्पनी के रूप में की गई थी।
मिनी रत्न का दर्जाः
जल संसाधन नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय ने 5.11.2018 को एनपीसीसी लिमिटेड को ‘‘मिनी रत्न-श्रेणी-1’’ का दर्जा प्रदान किया। एनपीसीसी अखिल भारतीय उपस्थिति के साथ एक आईएसओ 9001-2015 संगठन भी है।
वर्ष 2018-19 के दौरान किए गए प्रमुख कार्यः
- देशभर में विभिन्न स्थानों पर केंद्रीय विद्यालयों का निर्माण।
- मध्य प्रदेश आवास बोर्ड के लिए जबलपुर, रेवसागर और शहडोल में आईटीआई के उन्नयन के लिए निर्माण कार्य।
- श्रीनगर में बोन एंड ज्याइंट अस्पताल।
- जम्मू कश्मीर क्षेत्र में सीएसआईआर के लिए दो स्थानों पर औद्योगिक जैव प्रौद्योगिकी पार्कों की स्थापना (आईटीबीपी)।
- केंद्रीय भूजल बोर्ड (जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संसाधन मंत्रालय) अहमदाबाद, अम्बाला और जम्मू में भवन निर्माण कार्य।
- पश्चिम बंगाल में आईआईटी खड़गपुर में इंडोर स्पोर्ट्स काम्प्लैक्स और फूड कोर्ट का निर्माण।
- पाकुड़, झारखंड में एलएस, यूएस क्वार्टरों का निर्माण और पुलिस लेन परिसर के लिए स्थल विकास कार्य।
- पटना में पटना स्मार्ट सिटी मिशन के अंतर्गत मंदिरी नाले का विकास।
2018-19 के दौरान पूरे किए गए प्रमुख कार्यः-
- पश्चिम मेदिनीपुर में पीएमजीएसवाई सड़क निर्माण कार्य
- झारखंड में विभिन्न स्थानों पर पीएमजीएसवाई सड़क निर्माण कार्य
- ओडिसा (एसवीए) एमसीएल के विभिन्न जिलों में स्कूलों में शौचालयों का निर्माण।
- असम राइफल्स के लिए विभिन्न भवनों का निर्माण।
- गृह मंत्रालय के लिए बीओपी, सड़कों और फेंसिंग कार्यों का निर्माण।
- गृह मंत्रालय के लिए फ्लड लाइटिंग कार्यों का निर्माण।
- मणिपुर में डोलाईथाबी बांध का निर्माण।
- बिहार के छह जिलों अर्थात् भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर, पटना और नालंदा में पीएमजीएसवाई के अंतर्गत सड़कों का निर्माण।
- अमरकंटक (मध्य प्रदेश) में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय परिसर के लिए विभिन्न भवनों का विकास और निर्माण।
मंत्रालय के विचाराधीन प्रस्ताविक कार्यक्रम
- सिंचाई अंतराल दूर करने के लिए प्रोत्साहन विषयक कार्यक्रमः- व्यय वित्त समिति ने रु. 30,485 करोड़ की अनुमानित लागत के साथ 50 लाख हेक्टेयर की सीमित सीसीए के लिए आईएसबीआईजी कार्यक्रम के तहत ईएफसी ज्ञापन का अनुमोदन किया। सीसीईए नोट प्रस्तुत कर दिया गया है और यह कार्यक्रम भारत सरकार के विचाराधीन है।
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) – हर खेत को पानी (एचकेकेपी)-भूमिगत जल
- पीएमकेएसवाई कार्यक्रम 2015 में मंजूर किया गया था। इसका लक्ष्य ट्यूबवैल/सामान्य कुओं आदि के जरिए 2015-16 से 2019-20 की अवधि में 2.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करते हुए भूजल का विकास करना है।
- 2015-20 के लिए पहले से अनुमोदित कार्यक्रमों के वास्ते दिशा निर्देश संशोधित किए गए तथा सभी राज्यों और संघ शासित प्रदेशों को भेजे गए, ताकि वे संशोधित दिशा निर्देशों के अनुसार अपने प्रस्ताव/विस्तृत परियोजना रिपोर्टें भेज सकें।
- कार्यक्रम के अंतर्गत ट्यूबवेल, सामान्य कुओं, बोरवेल्स और अन्य कुओं के जरिए सिंचाई सुविधाओं का विकास किया जाएगा।
- पीएमकेएसवाई-जलसंभर घटक के मनरेगा अथवा केंद्र/राज्य के किसी मिलते जुलते कार्यक्रम के साथ समाभिरूपण की संभावनाओं का लाभ उठाना, ताकि लम्बी अवधि तक भूमिगत जल का विकास किया जा सके।
- इस कार्यक्रम के अंतर्गत निम्नांकित घटकों के लिए वित्त पोषण प्रस्तावित किया जाता है-
- सामग्री सहित कुएं के निर्माण की लागत।
- पंप (विद्युत और सोलर) की लागत।
- जलवितरण के लिए 200 मीटर कैनवस पाइप की लागत।
- स्थल चयन के लिए अन्वेषण की लागत।
- किसी क्लस्टर/प्रस्ताव में 75 प्रतिशत विद्युत और 25 प्रतिशत सोलर पम्पों का प्रावधान रखा गया है।
- वित्तीय वर्ष 2019-20 के लिए पीएमकेएसवाई-एचकेकेपी के अंतर्गत भूजल सिंचाई के तहत केंद्रीय सहायता के रूप में रु. 200 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
3. महाराष्ट्र में सूखे की आशंका वाले जिलों के लिए विशेष पैकेजः
कैबिनेट ने 18-07-2018 को हुई आर्थिक मामलों की समिति की बैठक में महाराष्ट्र के लिए विशेष पैकेज में 83 सतह लघु सिंचाई और 8 बड़ी/मध्यम सिंचाई परियोजनाओं को शामिल किए जाने का अनुमोदन किया। विशेष पैकेज के अंतर्गत केंद्र सरकार 01.04.2018 तक 91 परियोजनाओं की शेष लागत का 25 प्रतिशत केंद्रीय सहायता के रूप में देगी। इसके अतिरिक्त 2017-18 के दौरान इन परियोजनाओं के अंतर्गत खर्च की गई राशि का 25 प्रतिशत भी केंद्र सरकार अदा करेगी, क्योंकि ये परियोजनाएं 2017-18 से वित्त पोषण के लिए विचाराधीन थीं। 01.04.2018 तक उक्त परियोजनाओं की समग्र शेष लागत रु. 13,651.16 करोड़ आंकी गई।
4. पंजाब के सरहिंद फीडर (एसएफ) की आरडी 119700 से 447027 तक रीलाइनिंग और राजस्थान फीडर (आरएफ) की आरडी 179000 से 496000 तक रीलाइनिंग।
कैबिनेट ने 26.9.2018 की अपनी बैठक में पंजाब के सरहिंद फीडर की रीलाइनिंग और राजस्थान फीडर की रीलाइनिंग का अनुमोदन किया। सरहिंद फीडर नहर की रीलाइनिंग की अनुमोदित लागत रु. 671.478 करोड़ और राजस्थान फीडर नगर की रीलाइनिंग की लागत रु. 1,305.758 करोड़ है। कुल अनुमानित लागत में से रु. 826.168 करोड़ की केंद्रीय सहायता प्रदान की जाएगी (रु.205.758 करोड़ सरहिंद फीडर के लिए और रु. 620.41 करोड़ राजस्थान फीडर के लिए)। यह राशि इन परियोजनाओं के लिए पहले जारी रु. 156 करोड़ की केंद्रीय सहायता के अतिरिक्त होगी। परियोजना 3 कार्य सत्रों (मार्च से जून) में पूरी की जाएगी। प्रत्येक सत्र की अवधि 70 दिन होगी। इसकी शुरुआत मार्च-जून 2019 से होगी और इसे मार्च-जून 2021 तक पूरा किया जाएगा।
5. कावेरी थाले तक गोदावरी नदी के पथांतरण का प्रस्ताव
- राष्ट्रीय संदर्श योजना (एनपीपी) के प्रायद्वीपीय घटक की योजना के अनुसार महानदी और गोदावरी नदी से 20796 एमसीएम जल नौ सम्पर्क प्रणालियों के जरिए हस्तांतरित किया जाएगा। ये हैं-
(i) महानदी – गोदावरी सम्पर्क (ii) इंचम्पल्ली-नागार्जुनासागर सम्पर्क (iiI) इंचमपल्ली-पुलिचिंताला सम्पर्क (iv) पोलावरम-विजयवाड़ा सम्पर्क (आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा कार्यान्वित) (v) अलमाटी - पेन्नर सम्पर्क (vi) श्रीसेलम-पेन्नर सम्पर्क (vii) नागार्जुन सागर-सोमासिला सम्पर्क (viii) सोमासिला – ग्रांड अनिकट सम्पर्क (ix) कावेरी-वैगई-गुंडर सम्पर्क से कृष्णा, पेन्नार, कावेरी, वैगई और गुंडर थाला।
- महानदी पर मणिभद्र बांध और गोदावरी पर इंचमपल्ली बांध पर सहमति लम्बित रहते गोदावरी थाले के इंद्रावती उपथाले में छत्तीसगढ़ राज्य के हिस्से के इस्तेमाल न किए गए पानी को गोदावरी-कावेरी सम्पर्क परियोजना के जरिए कावेरी नदी में स्थानांतरित (जीडब्ल्यूडीटी समझौते के अनुसार) करने के लिए वैकल्पिक अध्ययन संचालित किए गए हैं।
- माननीय मंत्री (जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण) ने गोदावरी-कावेरी (ग्रैंड अनिकट) सम्पर्क परियोजना के इस वैकल्पिक अध्ययन के बारे में छत्तीसगढ़ के माननीय जल संसाधन मंत्री के साथ विचार विमर्श किया। इस वैकल्पिक अध्ययन की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की जा रही है।
- महानदी-गोदावरी सम्पर्क को कार्यरूप मिलने के बाद 9 सम्पर्कों वाली प्रणाली के शेष सम्पर्कों का काम शुरू किया जाएगा।
आर.के.मीणा/अर्चना/राधेश्याम-
(रिलीज़ आईडी: 1556833)
आगंतुक पटल : 1663