विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय

वर्षांत समीक्षाः जैव प्रौद्योगिकी विभाग

प्रविष्टि तिथि: 26 DEC 2018 5:39PM by PIB Delhi

विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत जैव प्रौद्योगिकी विभाग के लिए वर्ष 2018 जैव प्रौद्योगिकी विषयक अनुसंधान, जैव प्रौद्योगिकी को सम्पदा अर्जित करने के भविष्य के प्रमुख सटीक साधन के रूप में परिवर्तित करने और सामाजिक न्याय, विशेषकर निर्धनों के लिए न्याय सुनिश्चित करने के लक्ष्य हासिल करने की दृष्टि से उत्साहजनक रहा :

 

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वर्ष के दौरान लिए गए प्रमुख नीतिगत निर्णय और सहायता कार्यक्रमों का ब्यौरा इस प्रकार है :-

 

· केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ‘‘डीएनए प्रौद्योगिकी (इस्तेमाल और अनुप्रयोग) विनियमन विधेयक, 2018’’ को मंजूरी प्रदान की। यह विधेयक डीआक्सिराइबोन्यूक्लिएक एसिड (डीएनए) प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल और अनुप्रयोग के विनियमन के लिए तैयार किया गया, जिसका लक्ष्य पीड़ितों, अपराधियों, संदिग्ध व्यक्तियों, विचाराधीन कैदियों, लापता व्यक्तियों और अज्ञात मृतक व्यक्तियों की पहचान करना और डीएनए विनियामक बोर्ड (डीआरबी) की स्थापना करना है।

 

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  • कैंसर रिसर्च यूनाइटिड किंगडम (सीआरयूके) के सहयोग से भारत-ब्रिटेन कैंसर अनुसंधान कार्यक्रम शुरू किया गया। इसका लक्ष्य कैंसर की रोकथाम और देखभाल को सस्ता बनाना, और कैंसर के दुष्परिणामों के खिलाफ सक्षमता पैदा करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति करना है। सीआरयूके और जैव प्रौद्योगिकी विभाग, दोनों में से प्रत्येक 50 लाख पौंड (47 करोड़ भारतीय रुपये से अधिक) खर्च करेगा।

MoU signed on India-UK Cancer Research Initiative for Affordable Approaches to Cancer

  • जैव प्रौदयोगिकी विभाग (डीबीटी)-इंडिया एलाइंस की संयुक्त भागीदारी का दशक हाल ही में मनाया गया। भारत के राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने विज्ञान भवन में आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लिया। जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी), वेल्कम ट्रस्ट के सहयोग से डॉक्टरल-परवर्ती स्तर पर जैव चिकित्सा अनुसंधान के बारे में त्रिस्तरीय फेलोशिप पाठ्यक्रम संचालित कर रहा है।
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  • स्नात्कोत्तर प्रमाणपत्र/डिप्लोमा के लिए 15 नए कौशल विकास कार्यक्रम कार्यान्वित किए गए, जिनका लक्ष्य चिकित्सा जैव प्रौद्योगिकी, कृषि जैवप्रौद्योगिकी  और कम्प्युटेशनल बायोलॉजी में उपकरणों एवं तकनीकों का उच्च कोटि का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करना था।
  • जीनोम इंजीनियरी/सम्पादन के बारे में भारत-अमरीका सहयोग कार्यक्रम शुरू किया गया, जिसका लक्ष्य स्टुडेंट इन्टर्नशिप, विदेश में फेलोशिप और अतिथि प्रोफेसरशिप कार्यक्रमों के जरिए अत्यंत प्रतिभाशाली भारतीय विद्यार्थियों और वैज्ञानिकों को प्रमुख अमरीकी संस्थानों में विश्व स्तरीय अनुसंधान के अवसर और पहुंच प्रदान करना था।
  • मिशन इनोवेशन यानी नवाचार अभियान के अंतर्गत प्रथम स्वच्छ ऊर्जा अंतर्राष्ट्रीय इन्क्यूबेटर स्थापित किया गया है। इस अभियान के तहत यूरोपीय संघ के 23 प्रतिभागी राष्ट्रों से स्टार्ट-अप्स भारत आ सकते हैं और विकास कर सकते हैं। इसी तरह इस इन्क्यूबेटर से स्टार्टअप्स प्रतिभागी देशों में जा सकते हैं और वैश्विक अवसरों तक अपनी पहुंच कायम कर सकते हैं।

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  • एसएईएन (साएन-सेकेंडरी अग्रिकल्चर आंट्रप्रनरीयल नेटवर्क) का शुभारंभ पंजाब स्टेट काउंसिल एंड टेक्नोलॉजी (पीएससीएसटी) के नेतृत्व में अन्य प्रतिभागियों के साथ 2018 में किया गया। प्रतिभागियों में राष्ट्रीय कृषि खाद्य जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (एनएबीआई), नवीन और अनुप्रयुक्त जैव प्रसंस्करण केंद्र (सीआईएबी), और बीआईआरएसी का बायोनेस्ट-पंजाब

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  • विश्वविद्यालय (बायोनेस्ट-पीयू) शामिल हैं। इस परियोजना का उद्देश्य नए उद्यमियों को प्रोत्साहित करना और अनुषंगी कृषि क्षेत्र में वर्तमान उद्योगों को मदद पहुंचाना है।
  • एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) के बारे में एक प्रमुख मिशन  कार्यक्रम अक्तूबर 2018 में शुरू किया गया। इसके लक्ष्यों में एएमआर के खिलाफ स्वदेशी और किफायती उपचार पद्धतियां विकसित करना; भारत की वरीयता सूची के अनुसार एएमआर-विषयक रोगजनकों का वर्गीकरण; एएमआर-विषयक रोगजनकों के लिए जैव-भंडारघर की स्थापना; और एएमआर-विषयक रोगजनकों की पहचान करने के लिए तीव्र और किफायती नैदानिक किट्स का विकास शामिल है।
  • वाणिज्यिकरण के लिए त्वरित रूपांतरण अनुदान (एटीजीसी) शुरू किया गया, जिसका उद्देश्य बुनियादी अनुसंधान के लिए वित्त पोषण के अवसर प्रदान करते हुए प्रौद्योगिकी नवाचार को प्रोत्साहित करना है। इसका स्पष्ट लक्ष्य अनुप्रयोग विकास को बढ़ावा देना है।
  • एक नया क्षेत्रीय केंद्र, बीआईआरएसी क्षेत्रीय जैव-नवाचार केंद्र (बीआरबीसी) वेंचर सेंटर, पुणे में स्थापित किया गया। बीआरबीसी को स्टार्ट-अप्स का नियामक मार्गदर्शन करने, इन्क्यूबेटर  मैनेजरों को प्रशिक्षण देने, आदि के लिए उच्च गुणवत्तापूर्ण राष्ट्रीय संसाधन केंद्र के रूप में काम करने और लाइफ साइंसेज़ में
  • भारतीय मवेशी प्रजातियों के आनुवांशिक संसाधनों में सुधार के लिए मवेशी जेनोमिक्स कार्यक्रम शुरू किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य उत्तम कोटि के मवेशियों की प्रारंभ में ही पहचान करना और भविष्य में प्रजनन कार्यक्रमों की लागत और समय अंतराल में कमी लाना है।

वर्ष 2018-19 की क्षेत्रवार उपलब्धियों का संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है :

मानव संसाधन विकास/क्षमता निर्माण

  • 15 वैज्ञानिक व्यावसायिक तरक्की के लिए राष्ट्रीय जैव विज्ञान पुरस्कार के लिए चुने गए; 9 वैज्ञानिकों को नवीन युवा जैव प्रौद्योगिकीविद् के पुरस्कार से नवाजा गया; 2 महिला वैज्ञानिकों को जैव प्रौद्योगिकी उत्पाद, प्रक्रिया विकास और वाणिज्यीकरण के लिए राष्ट्रीय महिला जैव-वैज्ञानिक (वरिष्ठ, कनिष्ठ) पुरस्कार प्रदान किया गया; 2 प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों को विशिष्ट जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान प्रोफेसरशिप पुरस्कार प्रदान किया गया; 75 शोधार्थियों को रामलिंगास्वामियर-एंट्री फेलोशिप; 160 अनुसंधान असोशिएट्स की सहायता की गई; 942 कनिष्ठ अनुसंधान फेलो की सहायता की गई, 89 विद्यार्थियों को जैव टेक्नोलॉजी के अंतर्गत स्कूल कार्यक्रम पूरा करने के लिए सहायता प्रदान की गई।
  • दो वर्ष की अवधि के लिए "भारत बोस्टन बायो साइंस बिगनिंग-बी-4, चरण-2" का शुभारंभ किया गया, जिसमें 16 डॉक्टरल-परवर्ती विद्यार्थियों को हार्वर्ड विश्वविद्यालय में प्रशिक्षण का प्रावधान था। 100 युवा विद्यार्थियों को उभरती हुई प्रौद्योगिकियों में प्रशिक्षण प्रदान करने का भी लक्ष्य है।

 

उपकरण, औजार, मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, बायोन्क्यूबेटर्स (बीआईआरएसी के सहयोग से)

  • स्टार्ट अप्स और नवीन उद्यमियों के लिए एक सुविधा केंद्र (प्रथम केंद्र) जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (बीआईआरएसी) परिसर में शुरू किया गया।

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  • स्टार्ट अप इंडिया कार्यक्रम के अंतर्गत, जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने पुणे में बायो क्लस्टर स्थापित करने की मंजूरी प्रदान की और बीआईआरएसी ने वर्ष 2018 के दौरान बायोनेस्ट कार्यक्रम के जरिए 4 अतिरिक्त नए जैव इन्क्यूबेटरों के लिए सहायता प्रदान की।
  • मेक-इन-इंडिया कार्यक्रम को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से, बीआईआरएसी और केआईएचटी (कलाम इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ टेक्नोलॉजी) ने स्टार्ट-अप्स, उद्यमियों, अनुसंधानकर्ताओं, शिक्षाविदों, इन्क्यूबेशन केंद्रों और लघु एवं मध्यम उद्यमों को चिकित्सा उपकरणों के परीक्षण एवं मानकीकरण के क्षेत्र में सुविधा पहुंचाने के लिए सहयोग किया।

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  • बीआईआरसी ने 2018 के दौरान बायोनेस्ट कार्यक्रम के जरिए 5 नए बायो-इन्क्यूबेटरों की स्थापना/मदद की। उन्होंने अतिरिक्त उच्च कोटि के इन्क्यूबेशन स्पेस जोड़ने में मदद की, जिससे कुल स्पेस बढ़ कर 3,91,849 वर्गफुट हो गया।

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स्वस्थ भारत के लिए सस्ती चिकित्सा देखभाल

  • जैव प्रौद्योगिकी विभाग के भारत-अमरीका वैक्सीन एक्शन प्रोग्राम (वीएपी) और वैक्सीन ग्रैंड चैलेंज प्रोग्राम (वीजीसीपी) ने सबसे कम कीमत पर रोटावायरस टीका विकसित करने जैसी उपलब्धियों के कारण अधिक अंक हासिल किए। यह टीका सबके लिए टीकाकरण कार्यक्रम का हिस्सा बन गया और साथ ही मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियों  की रोकथाम की दिशा में प्रमुख उपलब्धियां हासिल कीं। दुनिया में 6 में से 1 बच्चे को भारत में निर्मित टीके लगते हैं।
  • फैल्सीपैरम मलेरिया के लिए टीका टॉक्सिकोलॉजी मूल्यांकन (जेएआईवीएसी-2) के अधीन  है और विवेक्स मलेरिया के लिए विकसित टीके ने पहले चरण का ट्रायल (जेएआईवीएसी-1) पूरा कर लिया है।
  • सीकल सेल एनीमिया और थेलेसेमिया के निवारण और नियंत्रण के लिए व्यापक कार्यक्रम ओडिसा के चार जिलों में चरणबद्ध तरीके से शुरू किया गया है। ये जिले हैं – खोर्दा, संबलपुर, कोरापुट (आकांक्षी जिला) और बालेश्वर।
  • बायो डिजाइन प्रोग्राम के अंतर्गत, दो प्रौद्योगियों के लिए स्टार्ट-अप कम्पनियों–मैसर्स आरकुपे लाइफसाइंसेज़ प्राइवेट लिमिटेड, बंगलौर और मैसर्स यूनिनो हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड, मुम्बई को लाइसेंस प्रदान किए गए। ये प्रौद्योगिकियां क्रमशः इस प्रकार हैं- ‘‘इंट्रा-सियस डिवाइस (ओजिन-डी)’’ और ‘‘चेस्ट ट्यूब फिक्सेटर एंड सीलिंग डिवाइस (प्ल्युरा गोह)’’।
  • अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली और टीएचएसटीआई, फरीदाबाद ने संयुक्त रूप से क्षय रोग मेनिन्जाइटिस के लिए एक नैदानिक परीक्षण विकसित किया, जो शत प्रतिशत संवेदनशीलता और 91 प्रतिशत विशिष्टता पर खरा उतरा।
  •  ‘‘मनोभ्रंश (डिमिंशिया) विज्ञान कार्यक्रमः डिमिंशिया की शुरुआत/प्रचलन/जोखिम/उसके उपचारात्मक विश्लेषण और तत्संबंधी बुनियादी अनुसंधान’’ के बारे में भारत में एक व्यापक अध्ययन शुरू किया गया, जिसका लक्ष्य आनुवंशिक संसाधनों के रोगों की शुरुआत, प्रचलन, बायोमार्कर और जोखिम एवं उपचारात्मक घटकों के बारे में भरोसेमंद आंकड़े उपलब्ध कराना था। 
  • विटामिन डी की कमी से सम्बद्ध रोग विश्वभर में व्याप्त है और पिछले दो दशकों के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में भी इसका व्यापक प्रसार हो सकता है। ‘‘भारत में विटामिन डी की कमीः जन स्वास्थ्य का महत्व और उपाय’’ विषय पर परियोजनाओं के प्रस्ताव आमंत्रित किए गए और विभाग विटामिन डी की कमी और इस संकट से निपटने के लिए संभावित उपायों के महत्व के बारे में चुनी हुई दो अनुसंधान परियोजनाओं के कार्यान्वयन में सहायता प्रदान करने की प्रक्रिया में है।  

किसानों की आय दोगुनी करने और खाद्य सुरक्षा के लिए खेती

  • पीएयू लुधियाना द्वारा गेहूं की नई प्रजाति उन्नत पीबीडब्ल्यू 343 विकसित की गई, जो लीफ रस्ट और स्ट्राइप रस्ट जैसी बीमारियों की प्रतिरोधी है। यह प्रजाति विशाल पीबीडब्ल्यू 343 प्रजाति का  उन्नत संस्करण है।  इसके पौधों की ऊंचाई औसतन 100 सेमी होती है और इसकी फसल करीब 155 दिन में तैयार हो जाती है और प्रति एकड़ इसका औसत अनाज उत्पादन 23.2 क्विंटल है।
  • केंद्रीय प्रजाति विकास समिति ने परीक्षण के बाद बासमती चावल की दो प्रजातियां पूसा बासमती 1728 और पूसा बासमती 1718 विकसित कीं और बाद में उन्हें जारी किया, जो बैक्टीरियल ब्लाइट नामक बीमारी की प्रतिरोधी हैं। इनमें से पूसा बासमती 1728 पूर्ववर्ती पूसा बासमती 1401 का और पूसा बासमती 1718 पूर्ववर्ती पूसा बासमती 1121 का स्थानापन्न है। चूंकि ये दोनों प्रजातियां हाल ही में जारी की गईं अतः इनके अंतर्गत खेती क्षेत्र धीरे धीरे बढ़ने की संभावना है।
  • एनआईपीजीआर, नई दिल्ली में सरकारी-निजी भागीदारी पद्धति के अंतर्गत डीबीटी-पीजीजीएफ यानी ‘‘प्लांट जेनोटाइपिंग एंड जिनोमिक्स फेसिलिटी’’ स्थापित की गई। यह राष्ट्रीय केंद्र अत्याधुनिक जेनोमिक्स प्रौद्योगिकी सेवाओं के लिए ‘‘एकल विंडो सेवा प्रणाली’’ है, जो भारतीय बीज उद्योग पर रचनात्मक प्रभाव डाल सकती है। इस केंद्र में जेनोटाइपिंग सेवा प्रदाता और परामर्श केंद्र के रूप में विकसित होने की क्षमता है, जिसका प्रभाव न केवल भारत में खेती पर पड़ेगा, बल्कि वह वैश्विक आधार पर एक  आदर्श के रूप में भी काम कर सकती है।  

मवेशी जैव प्रौद्योगिकी

  • गौजातीय पशुओं के लिए बोवाइन क्षय रोग (बी टीबी) के बारे में एक कार्यक्रम बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के सहयोग से शुरू किया गया, जिसमें बी टीबी प्रसार पर निगरानी रखने, बीसीजी टीकाकरण के जरिए बी टीबी नियंत्रण कार्यक्रम, रिपोजिटरी की स्थापना करने, और युवा वैज्ञानिकों के प्रशिक्षण पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
  • कुत्तों के स्वास्थ्य के बारे में एक अखिल भारतीय कार्यक्रम शुरू किया गया, ताकि पिल्लों के पालन और रख-रखाव की प्रमुख समस्याओं, जैसे उनके स्वास्थ्य, पोषण और उपचार आदि का निदान किया जा सके और मानव एवं पशु चिकित्सा के एकीकरण के जरिए जूनोटिक संक्रमण की रोकथाम की जा सके। इससे पिल्लों में एक स्वास्थ्य धारणा के विकास में मदद मिलेगी।

स्वच्छ ऊर्जा और जैव संसाधन विकास

  • माननीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने 18 सितम्बर, 2018 को नई पीढ़ी के कचरा उपचार प्रौद्योगिकी प्लेटफार्म के बारे में मुम्बई की नई परियोजना डीबीटी-आईसीटी सेंटर फार एनर्जी बायोसाइंसिज़ की घोषणा की। इसके अंतर्गत तीन नवीन प्रौद्योगिकियां शामिल की गई हैं। नई पीढ़ी की उपचार प्रौद्योगिकी को एकीकृत ढंग से प्रदर्शित करने के लिए एक एमएलडी क्षमता का मल-जल प्रोसेसिंग संयंत्र लगाया जाएगा।
  • सुंदरबन मैनग्रोव वासियों के लिए बायो रेस्टोरेशन यानी जैव बहाली पद्धति विकसित की गई। विकृत और गैर-विकृत आबादी क्षेत्रों में न केवल मैनग्रोव के सामुदायिक संघटन को समझने में महत्वपूर्ण प्रगति की गई, बल्कि आस्मोलिट्स के संदर्भ में विकृत स्थलों में मैनग्रोव पर दबाव डालने वाले घटकों की भी पहचान की गई।
  • आईबीएसडी, इम्फाल में माइक्रोबियल रिपोजिटरी सेंटर (एमआरसी) की स्थापना की गई है, जो पूर्वोत्तर भारत के समृद्ध और बेजोड़ पारिस्थितिकीय ठिकानों से उत्पन्न सूक्ष्मजीवी संसाधनों के संग्रहण, संरक्षण, रख रखाव और आपूर्ति के केंद्र के रूप में काम करेगा।
  • 30 अगस्त 2018 को माननीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री डॉ. हर्षवर्धन की उपस्थिति में स्वच्छ ऊर्जा रूपांतरण के लिए नवाचार बढ़ाने के बारे में अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।

सामाजिक विकास कार्यक्रम

  • आकांक्षी जिलों के लिए भारत सरकार के कार्यक्रम की जरूरतें पूरी करने हेतु विभाग ने ‘‘ग्रामीण जैव संसाधन परिषद’’ नाम का एक नया कार्यक्रम शुरू किया। प्रथम चरण के दौरान प्रस्तावित 9 संस्थानों के लिए वित्त पोषण की व्यवस्था की गई, ताकि वे इन आकांक्षी जिलों को मुख्यधारा में लाने के लिए जैव प्रौद्योगिकी विषयक साधनों, तकनीकों और प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करते हुए स्वास्थ्य और पोषण, कृषि और अनुषंगी क्षेत्रों से संबंधित कुछ समस्याओं का समाधान कर सकें।

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग

  • जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने नवाचार प्रणालियों से सम्बद्ध स्वीडन की सरकारी एजेंसी (विन्नोवा) के साथ सहयोग के एक कार्यक्रम पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते के अंतर्गत सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों में जैव पदार्थों सहित जैव आधारित अर्थव्यवस्था; जैव चिकित्सा उपकरणों सहित स्वास्थ्य और लाइफ साइंसिज़ और स्टार्ट अप्स, इन्क्यूबेटर्स, परीक्षण संस्तर और जैव क्लस्टर शामिल हैं, लेकिन सहयोग केवल इन्हीं क्षेत्रों तक सीमित नहीं होगा।
  • 2020 के लिए लक्ष्यः जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने लक्ष्य 2020  के अंतर्गत (सबसे बड़े यूरोपीय संघ अनुसंधान और नवाचार कार्यक्रम) संयुक्त रूप से प्रस्ताव आमंत्रित किए हैं। इसका लक्ष्य ज्ञान, विशेषज्ञता का मुक्त प्रवाह सुनिश्चित करना है, ताकि हमारे समाज के समक्ष उत्पन्न बड़ी चुनौतियों के समाधान में सरकारी और निजी क्षेत्र मिल कर काम कर सकें।

जैव प्रौद्योगिकी और जैव अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में भारत-कोरिया सहयोगः भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग और कोरिया गणराज्य सरकार के विज्ञान एवं आईसीटी मंत्रालय ने 9 जुलाई, 2018 को नई दिल्ली में जैव प्रौद्योगिकी और जैव अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए।

  • भारत-जापान सहयोगः जैव प्रौद्योगिकी विभाग-एआईएसटी इंटरनेशनल लैब (डाईलैब), एआईएसटी, त्सुकुबा की संयुक्त परियोजना के विस्तार के रूप में एआईएसटी, त्सुकुबा ने डाईसेंटर नाम के एक सहयोगात्मक अनुसंधान केंद्र का उद्घाटन एआईएसटी, त्सुकुबा, जापान में किया गया। ओसाका सेंटर (दक्षिण जापान) में एक सिस्टर डाइलैब का भी उद्घाटन किया गया।
  • नवाचार का महत्व सहयोग की नींव के पत्थर के रूप में समझते हुए, जैव प्रौद्योगिकी विभाग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार ने इनोवातिओराहोईतुस्केसकस बिजनेस फिनलैंड के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। इसके अंतर्गत दोनों पक्ष जैव प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम, जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (बीआईआरएसी), के नेतृत्व में आपसी हित की नवाचार और परिवर्तनकारी परियोजनाओं के वित्त पोषण और कार्यान्वयन में निवेश करेंगे।
  • भारत-फिलिपीन्स सहयोग कार्यक्रम के अंतर्गत महिला किसानों के प्रशिक्षण में सहयोग के लिए 7 राज्यों से 35 महिलाओं ने देशभर में ‘‘महिला किसानों के लिए चावल की पैदावार में आधुनिकता’’ विषय पर प्रशिक्षण कार्यक्रम में हिस्सा लिया। कर्नाटक (रायपुर) और असम (दरांग) के आकांक्षी जिलों की चार महिला किसानों ने प्रशिक्षण में हिस्सा लिया। कार्यक्रम के दूसरे चरण में 35 किसानों में से 8 महिला किसानों को लॉस बानोस, फिलिपीन्स में अत्याधुनिक प्रशिक्षण दिया जाएगा।
  • जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने 16 जुलाई, 2018 को यूरोपीय संघ-भारत के सहयोग से ‘‘विश्वभर में नागरिकों की रक्षा के लिए अगली पीढ़ी के इन्फ्लुएंजा टीके’’ की घोषणा की। इस परियोजना के अंतर्गत यूरोपीय आयोग (ईसी) ‘लक्ष्य 2020’ कार्यक्रम के तहत यूरोपीय संघ वित्त पोषण कार्यक्रम के जरिए और जैव प्रौद्योगिकी विभाग समान रूप से 1.5 करोड़ यूरो का योगदान करेंगे।

स्वायत्त संस्थान

जैव प्रौद्योगिकी विभाग के तत्वावधान में 16 स्वायत्त संस्थान काम कर रहे हैं। ये संस्थान राष्ट्रीय अभियान के अनुरूप कृषिजैव प्रौद्योगिकी, मवेशी जैवप्रौद्योगिकी और स्वास्थ्य चिकित्सा जैव प्रौद्योगिकी, स्वच्छ ऊर्जा और जैव संसाधन विकास, अनुषंगी कृषि आदि क्षेत्रों में बुनियादी, अन्वेषणात्मक और परिवर्तनकारी  अनुसंधान में लगे हैं। इन संस्थानों को मानव संसाधन विकास और सामाजिक पहुंच बढ़ाने का भी काम सौंपा गया है। वर्ष के दौरान इन संस्थानों की कुछ उपलब्धियां इस प्रकार रहीं :

  • हैदराबाद स्थित निजाम्स इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसिज़ (एनआईएमएस) में चिकित्सा आनुवंशिक विभाग सीडीएफडी (सेंटर फार डीएनए फिंगर प्रिंटिंग एंड डायग्नोस्टिक्स, हैदराबाद के साथ समझौता ज्ञापन के तहत काम कर रहा है। ये संस्थान आनुवांशिक विकृतियों वाले रोगियों को सेवाएं प्रदान करने के साथ साथ प्रशिक्षण और अनुसंधान का संचालन भी करते हैं। निजाम्स इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसिज़ (एनआईएमएस) सीडीएफडी के सहयोग से चिकित्सा आनुवंशिकी में डीएनबी फेलोशिप संचालित करता है। दो विद्यार्थी यह प्रशिक्षण पूरा कर चुके हैं और पांच विद्यार्थी वर्तमान में पाठ्यक्रम में दाखिल हैं। सीडीएफडी ने चावल की एक गंभीर बीमारी बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट (बीएलबी) के लिए जैव नियंत्रण कार्यनीति विकसित की है। सीडीएफडी 64 अनुसंधान आलेख प्रकाशित कर चुका है और उसने 8 पीएच.डी उपाधियों तथा 6 पोस्ट डॉक्टरल पाठ्यक्रमों में मदद की है।
  • इंस्टिट्यूट ऑफ लाइफ साइंसिज़, भुवनेश्वर ने ट्रांसक्रिप्टोम के जरिए, एक आक्रामक पादप प्रजाति, फ्राग्मितेश्कार्गा में लवणता और सूखेजन्य दबाव के प्रति पृथक प्रभाव वाले कई ट्रांस्क्रिप्शन घटकों का विश्लेषण और पहचान की है। आईएलएस ने 27 उपयोगी पादप अभिव्यक्ति वेक्टर विकसित किए हैं। इसके साथ ही उसने दबावपूर्ण स्थितियों में कृषि उपज बढ़ाने के लिए रीकम्बिनेंट प्रोमोटरों का भी अध्ययन किया है। आईएलएस ने दो प्रौद्योगिकियां हंस्तांतरित की है, दो पेटेंट के लिए आवेदन किया हैं, दो पेटेंट हासिल किए हैं, 55 अनुसंधान आलेख प्रकाशित किए हैं और 30 पीएच.डी विद्यार्थियों की सहायता की है।
  • बंगलौर स्थित इंस्टिट्यूट फॉर स्टेमसेल साइंस एंड रीजेनेरेटिव मेडिसिन (इनस्टैम) में नेशनल क्रायोईएम केंद्र का उद्घाटन किया गया और उसे चालू किया गया। यह केंद्र 300 केवी ट्रांसमिशन इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप (टीईएम) से सुसज्जित है। इन्स्टैम ने 4 पेटेंटों के लिए आवेदन किया है, 26 अनुसंधान आलेख प्रकाशित किए हैं और 60 पीएच.डी विद्यार्थियों की मदद की है।

 

बंगलौर स्थित इंस्टिट्यूट फार स्टेमसेल साइंस एंड रीजेनेरेटिव मेडिसिन (इनस्टैम) में राष्ट्रीय क्रायोईएम केंद्र।

इनस्टैम में स्थापित सेंटर फार केमिकल बायोलॉजी एंड थ्रेप्युटिक्स ने हाल ही में ब्रेक्टोपिन के प्रथम चरण का विकास पूरा किया। यह फोस्फोपेप्टाइड का दवा की तरह का प्रावरोधक है, जिसे मानव के बीआरसीएआई टेंडम (टी) बीआरसीटी डोमेन के रूप में पहचाना गया है जो इन विट्रो अवस्था में नैनोमोलर क्षमता से बाध्यकारी सबस्ट्रेट को चुन चुन कर रोकता है।

  • आनुवांशिकी इंजीनियरी और जैव प्रौद्योगिकी के लिए अंतर्राष्‍ट्रीय केन्‍द्र (आईसीजीईबी), दिल्‍ली ने फसली पौधे में किसी बाहरी जीन के संचरण के बिना दो शाकनाशियों-ग्‍लीफोसैट और सल्‍फोनिलुरिया के लिए महत्‍वपूर्ण सहिष्‍णुता वाली ट्रांसजेनिक प्रजाजियां विकसित की हैं।    आईसीजीईबी जे एक भारतीय कंपनी को डेंगू नैदानिक प्रौद्योगिकी हस्‍तांतरित की है और उसका  सफलतापूर्वक वाणिज्‍यकरण किया है। आईसीजीईबी ने दो प्रक्रियाएं विकसित की हैं, 2 पेटेन्‍ट  के लिए आवेदन किए हैं, एक अंतर्राष्‍ट्रीय पेटेंट हासिल किया, 100 अनुसंधान आलेख प्रकाशित किए और 9 विद्यार्थियों को पीएच.डी कराने में मदद की। 
  • आईसीजीईबी ने एक खास साइटोकिनिन ऑक्सिडासे को निष्क्रिय करते हुए चावल की अधिक पैदावार देने वाली एक प्रजाति विकसित की है, जिससे ''प्रति पादप अधिक पैदावार'' लेना संभव हुआ। हाल ही प्राप्‍त की गई एक अन्‍य उपलब्धि चावल की एक ऐसी प्रजाति का विकास है, जो बहुसंख्‍य ऐबिओटिक और बायोटिक दबाव सहन करने में सक्षम है। इसका विकास ग्‍लियोक्‍सालासे विधि के परिचालन के ज़रिए किया गया, जो दबावपूर्ण स्थितियों में उपज में कम से कम क्षति दर्शाती है।

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  • फरीदाबाद स्थित क्षेत्रीय जैव प्रौद्योगिकी केन्‍द्र (आरसीबी) ने बायोइंफोर्मैटिक्‍स में पीएच.डी पाठ्यक्रम प्रारंभ किया और अत्‍याधुनिक प्रौद्योगिकी प्‍लेटफॉर्म केन्‍द्र परिचालित किया। इस केन्‍द्र का लक्ष्‍य विभिन्‍न विषयों के बीच परस्‍पर संबंध कायम करते हुए जैव प्रौद्योगिकी शिक्षा, प्रशिक्षण और अनुसंधान के लिए एक मंच प्रदान करना  है। आरसीबी ने यूरोपीय सिंक्रोटन रेडिएशन फैसिलिटी (ईएसआरएफ) के साथ भागीदारी के ज‍़रिए अनुसंधान के प्रयोजन से 200 अनुसंधानकर्ताओं को अत्‍याधुनिक बीमलाइन के लिए फ्रांस में प्रशिक्षण दिलवाया। आरसीबी ने 2 पेटेंटों के लिए आवेदन किया, 28 अनुसंधान आलेख प्रकाशित किए और 8 विद्यार्थियों को पीएच.डी कराने में सहायता की। 
  • राष्‍ट्रीय कृषि-खाद्य जैव प्रौद्योगिकी संस्‍थान (नाभी), मोहाली ने केले में जीनोम संशोधन आधारित सीआरआईएसपीआर अवधारणा को अंजाम दिए जाने की संभाव्‍यता का प्रमाण प्रदर्शित किया। इस प्रौद्योगिकी का इस्‍तेमाल केले तथा गेहूं, चावल और लैथिरस जैसी फ़सलों में गुणों के विकास के लिए किया जा रहा है। नाभी ने ओलिगोसैक्‍राइड्स-आधारित प्राकृतिक फल कोटिंग का विकास भी किया है जो फलों और सब्जियों की शेल्‍फ-लाइफ में बढ़ोतरी करती है। इस प्रौद्योगिकी के दोहरे लाभ हैं, पहला यह कि यह कृषि कचरे का सद्उपयोग करती है और दूसरा यह कि यह एक किटाणु से प्राप्‍त कोटिंग सामग्री शलैक यानी लाख का विकल्‍प प्रदान करती है। नाभी ने दो प्रौद्योगिकियों का विकास किया, एक प्रौद्योगिकी हस्‍तांतरित की, एक उत्‍पाद का वाणिज्यीकरण किया, 26 अनुसंधान आलेख प्रकाशित किए और 4 पीएच.डी और 5 डॉक्‍टरल परवर्ती विद्यार्थियों को सहायता प्रदान की।

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फसल कटाई परवर्ती नुकसान में कमी लाने के लिए खाद्य तेल कोटिड सामग्री का प्रयोग। 22 डिग्री सेंटिग्रेड तापमान और 65 प्रतिशत सापेक्षिक ह्युमिडिटी पर भंडारित बिना कोटिड किए सेबों के चित्र (क) और 1% डब्‍ल्‍यूपी-एसएओपी (डब्‍ल्‍यूपी: व्हीट स्‍ट्रॉ पोलिसैक्‍राइड, एसओएपी : स्‍टेअरिक एसिड-ओट ब्रान पोलिसैक्‍राइड इस्‍टर्स) मिश्रित कोटिंग फॉम्‍यूलेशन वाले सेबों के चित्र(ख)

  • राष्‍ट्रीय सेल विज्ञान केन्‍द्र (एनसीसीएस) ने वृद्ध दानकर्ताओं द्वारा दान किए गए स्‍टेम सेल्‍स को फिर से युवा बनाने की एक नवीन पद्धति का आविष्‍कार किया है, जो ल्‍यूकेमिया, लिम्‍फोमा, और अप्‍लास्टिक ऐनिमीआ जैसी विकृतियों में स्‍टेम सेल प्रत्‍यारोपण आधारित उपचारात्‍मक परिणामों को बेहतर बना सकती है। मवेशी सेल कल्‍चर के राष्‍ट्रीय भंडार के रूप में काम करते हुए, एनसीसीएस ने अखिल भारतीय अनुसंधान/शैक्षिक संगठनों को 8086 सेल प्रजातियां प्रदान की हैं। एनसीसीएस ने    51 अनुसंधान आलेख प्रकाशित किए, 8 पेटेंट के लिए आवेदन दाखिल किए,  8 पेटेन्‍ट प्राप्‍त किए और 26 पीएचडी विद्यार्थियों को सहायता प्रदान की।
  • सेंटर ऑफ इनोवेटिव एंड अप्‍लाइड बायोप्रोसेसिंग (सीआईएबी) ने रोज ऑक्‍साइड मूल्य संवर्द्धित सिट्रोनेला ऑयल के उत्‍पादन के लिए उन्‍नत प्रक्रिया का विकास किया, फ्रक्‍टोस में ग्‍लुकोस के बड़े पैमाने पर आइसोमेराइजेशन के लिए ऐटिटानिया आधारित उत्‍प्रेरक का विकास किया और कार्बनिक सोल्‍वेंट निष्‍कर्षण के ज़रिए अम्लीय (एसिडिक) गहन गलनक्रांतिक विलायक द्रव (सोल्‍वेंट) में से लिग्‍नो सेलूलोसिक बायोमास से काष्‍ठ अपद्रव्‍यता (लिग्‍निन) को पृथक करने की एक पद्धति विकसित की। सीआईएबी ने असामान्‍य शूगर के लिए एन्‍ज़ाइम आधारित प्रक्रिया और छाछ आधारित पेय पदार्थ के बारे में दो प्रौद्योगिकियां हस्‍तांतरित कीं तथा 7 प्रक्रियाएं/प्रौद्योगिकियां विकसित कीं, 7 पेटेंट के लिए आवेदन किया और 21 अनुसंधान आलेख प्रकाशित किए।
  • राष्‍ट्रीय पशु जैव प्रौद्योगिकी संस्‍थान (एनआईएबी), हैदराबाद ने उच्च प्रवाह वाले शॉर्ट इंटरफेरिंग आरएनए या सिलेंसिंग आरएनए के ज़रिए ऐसे मेजबान प्रोटीन की पहचान की है, जो ब्रुसेला के आक्रमण और इंट्रासेलूलर संवर्द्धन में मदद करता है।  एनआईएबी में एलिसा आधारित नैदानिकों के विकास के लिए ब्रुसेला के दो इम्‍यून-डोमिनेंट प्रोटीन एंटीजन (बीएम-5 और बीएम-7) का इस्‍तेमाल किया जा रहा है।    एनआईएबी ने 12 अनुसंधान आलेख प्रकाशित किए हैं और 29 विद्यार्थियों को पीएच.डी में मदद की है।
  • मिलान (मीटिंग ऑफ इंडियन लाइवस्‍टॉक फार्मर्स एंड ऐग्रिकल्‍चरिस्‍ट विद एनएआईबी) कार्यक्रम के अंतर्गत एनआईएबी वैज्ञानिकों ने स्‍वाइन फीवर, पोर्सिन रीप्रोडॅक्टिव और रेस्पिरेटरी सिंड्रोम वाइरस (पीआरआरएस) जैसे संक्रमणों के कारण बकरी पालन में आ रही कठिनाइयों के समाधान में मदद करने के लिए पूर्वोत्‍तर के 8 राज्‍यों सहित देश के 18 राज्‍यों के किसानों के साथ बैठकें कीं। इन संक्रमणों से बड़ी संख्‍या में नवजात शिशुओं और सुअरों की मौत हो रही थी।   
  • राष्‍ट्रीय पादप जीनोम अनुसंधान संस्‍थान (एनआईपीजीआर), दिल्‍ली ने एक नए बैक्‍टीरियम (जीवाणु) की खोज की है, जो चावल के पौधे के भीतर रह सकता है और उस राइज़ोक्‍टोनिआसोलानी (आरएस) फंगस को खा जाता है, जो चावल की गंभीर बीमारी शेएथ ब्‍लाइट का रोगाणु है। एक नवीन प्रोटीन की भी पहचान की गई है जिसका इस्‍मेमाल जीवाणु द्वारा आरएस फंगस को मारने के लिए किया जाता है। एनआईपीजीआर ने काबुली चने की अधिक पैदावार देने वाली और अधिक प्रोटीन की मात्रा वाली एक प्रजाति का भी विकास किया है। एनआईपीजीआर ने 6 पेटेन्‍टों के लिए आवेदन किए हैं, 81 अनुसंधान आलेख प्रकाशित किए हैं, 134 पीएच.डी और 66 डॉक्‍टरल-परवर्ती विद्यार्थियों की मदद की है।    

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  • जैव संसाधन और स्‍थायी विकास संस्‍थान (आईबीएसडी), इंफाल ने किसानों और बेरोजगार युवाओं के समक्ष प्रदर्शन और उनके प्रशिक्षण के लिए मणिपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में ऑर्किड (नाना भांति के फूलों) की खेती की इकाइयां विकसित की हैं। अभी तक 950 किसानों और बेरोजगार युवाओं को ऑर्किड जैव-उद्यमिता कार्यक्रम के अंतर्गत प्रशिक्षित किया जा चुका है। आईबीएसडी ने 46 अनुसंधान आलेख प्रकाशित किए हैं।
  • आईबीएसडी का एक पूर्वोत्‍तर सूक्ष्‍मजीव भंडार गृह है, जिसमें झीलों, परम्‍परागत किण्वित (फर्मेंटड) खाद्य पदार्थों, गुफाओं, गर्म झरनों, ऊंचाई वाले स्‍थानों, कम तापमान वाले पर्वतों, वन क्षेत्रों, पौधों के निचलों भागों, आदि विभिन्‍न पारिस्थितिकी ठिकानों से सर्जित 27466 सूक्ष्मीजीव संगृहीत हैं।   
  • राष्‍ट्रीय प्रतिरक्षा विज्ञान संस्‍थान (एनआईआई), दिल्‍ली ने सेल्‍स के भीतर एचआईवी के रेप्लिकेशन को प्रभावित करने वाले  नए सेलूलर घटकों और स्‍ट्रेप्‍टोकोकस न्‍यूमो‍निया से एक नवीन डीऑक्सिराइबोन्‍युक्लियस का पता लगाया जो बैक्‍टीरियल अस्तित्‍व के लिए महत्‍वपूर्ण है। एनआईआई ने रीकम्बिनैंट इंसुलिन की बड़े पैमाने पर रीफोल्डिंग के लिए उद्योग को प्रौद्योगिकी हस्‍तांतरित की, 10 पेटेंटों के लिए आवेदन किया और 94 अनुसंधान आलेख प्रकाशित किए।   
  • ट्रांसलेशनल स्‍वास्‍थ्‍य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्‍थान, फरीदाबाद ने एचआईवी इंफेक्‍शन के उपचार की पद्धति विकसित करने के लिए बायोनीड्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और एनसीसीएस, पुणे के साथ साझा परियोजना शुरू की है। इस संस्‍थान ने 11 प्रौद्योगिकियों का विकास किया, एक प्रौद्योगिकी उद्योग को हस्‍तांतरित की, 11 पेटेन्‍ट आवेदन किए, 1 पेटेंट हासिल किया, 35 अनुसंधान आलेख प्रकाशित किये और 3 पीएच.डी विद्यार्थियों  को सहायता पहुंचायी।
  • राष्‍ट्रीय मस्तिष्‍क अनुसंधान केन्‍द्र (एनबीआरसी) ने न्‍यूरोन्‍स में रीसेप्‍टर्स (मेजबान प्रोटीन) की पहचान की, जो कोशिकाओं में जैपनीज इंसेफलाइटिस के वाइरस के प्रवेश की सुविधा प्रदान करता है; न्यूरो डीजेनेरेशन में इन्फ्लेमेटरी पाथवेज़ के महत्व का पता लगाया, जिनके बाद चांदीपुरा वायरस से मस्तिष्क में इन्फेक्शन होता है; यूबीक्युटिन लीगेसे, आरएनएफ2 की भूमिका का पता लगाया, जो प्रोटीन यूबीक्यूटिनेशन के नॉन-डीग्रेडेटिव कार्य के जरिए सिनैप्स परिपक्वता को नियंत्रित करता है और जो एंजेलमैन सिंड्रोम नामक स्नायु विकास संबंधी विकृति से सम्बद्ध है। एनबीआरसी ने 24 अनुसंधान आलेख प्रकाशित किए और एक एमएससी तथा पांच पीएच.डी विद्यार्थियों की सहायता ली।
  • राजीव गांधी जैव प्रौद्योगिकी केंद्र (आरजीसीबी), त्रिवेंद्रम ने एचपीवी टीके की एकल डोज़ के इस्तेमाल की जानकारी प्रकाशित की, जिससे सर्विकल कैंसर में नियमित तीन खुराक की बजाए एक खुराक से काम चल सकता है, टाइप-2 मधुमेह के रोगियों में वेस्कुलर बीमारी के बढ़ने में मेटफोर्मिन की भूमिका उजागर की तथा एक परम्परागत भारतीय आयुर्वेदिक उत्पाद अमलकीरसायन द्वारा हाइपरट्रोपी में कार्डिएक माइटोकोंड्रियल कार्यों के संवर्धन को उजागर किया। आरजीसीबी ने पांच प्रौद्योगिकियां विकसित कीं, एक प्रौद्योगिकी उद्योग के लिए हस्तांतरित की, पेटेंट के लिए आठ आवेदन किए, एक पेटेंट हासिल किया, 89 अनुसंधान निबंध प्रकाशित किए, 12 पीएच.डी विद्यार्थियों और 27 डॉक्टरल परवर्ती विद्यार्थियों की मदद की।

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विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्री माननीय डॉ. हर्षवर्धन ने कजाकूतम में किनफ्रा फिल्म और वीडियो पार्क में आरजीसीबी बायो-इनोवेशन सेंटर (बीआईसी) का प्रथम चरण समर्पित किए जाने के अवसर पर आरजीसीबी का दूसरी बार दौरा किया।

  • राजीव गांधी जैव प्रौद्योगिकी केंद्र और केरल स्टार्ट-अप मिशन, केरल सरकार द्वारा प्रबंधित आरजीसीबी बायो-नेस्ट फेसिलिटी युवा उद्यमियों को इन्क्यूबेशन सुविधा प्रदान करती है और वहां अनुसंधान और विकास को प्रोत्साहित करने के लिए अत्याधुनिक उपकरण लगे हैं। बायो-नेस्ट का उद्देश्य उभरती हुई बायो-टेक/फार्मा कम्पनियों को नई प्रौद्योगिकियों की लाइसेंसिंग के लिए व्यवहार्य व्यवस्था कायम करना और नए स्थानीय उद्यम प्रारंभ करना तथा न्यूनतम वित्तीय लागत के साथ प्रौद्योगिकी के मामले में शीघ्र राज्य मूल्य संवर्धन करना है।
  • राष्ट्रीय जैव चिकित्सा जिनोमिक्स संस्थान (एनआईबीएमजी) ने क्षेत्रीय जैव प्रौद्योगिकी केंद्र (आरसीबी) और ग्लैक्सो स्मिथक्लिन प्राइवेट लिमिटेड (जीएसके) के साथ संयुक्त रूप से बायो सांख्यिकी और बायो सूचना विज्ञान में डॉक्टरल पाठ्यक्रम प्रारंभ किया। एनआईबीएमजी ने जिनोमिक प्रयोगशालाओं और आनुवंशिक परीक्षण जैसी सुविधाओं को चिकित्सकों की दहलीज पर पहुंचाने का काम शुरू किया है। इसके लिए सरकारी क्षेत्र में सबसे बड़े तृतीयक देखभाल संस्थान, कोलकाता के एसएसकेएम अस्पताल में एक यूनिट की स्थापना की। इस यूनिट में करीब 800 रोगियों ने विभिन्न प्रकार की बीमारियों के लिए आनुवंशिक परीक्षणों का लाभ उठाया। एनआईबीएमजी ने 20 अनुसंधान आलेख प्रकाशित किए और दो पीएच. डी विद्यार्थियों को सहायता पहुंचाई।
  • एनआईबीएमजी ने भारत की अंतर्राष्ट्रीय कैंसर जीनोम कंसोर्टियम नामक परियोजना के जरिए ऐसे दस जीनों में डीएनए परिवर्तन किए, जो मुंह के कैंसर का कारण बनते हैं। सर्विकल कैंसर के लिए ह्यूमन पैपीलोमा वायरस पर नियंत्रण की एक नई विधि की खोज की गई। इसके साथ ही इस विधि से संबंधित एक जीन का पता लगाया गया और एक औषधि के विकास की संभावना तलाशी गई।
  • एनआईबीएमजी-कल्याणी सिस्टम्स मेडिसिन क्लस्टर के अंतर्गत छह प्रमुख संस्थान शामिल हैं, जो क्लिनिकल और बुनियादी विज्ञान, दोनों से सम्बद्ध हैं। यह चिकित्सकों, बुनियादी वैज्ञानिकों और जैव प्रौद्योगिकीविदों के बीच वार्तालाप का एक अनूठा उदाहरण है, जो बायोलॉजीकल प्रणालियों के स्तर पर बीमारियों की गहरी समझ में मदद करता है। नतीजतन बीमारियों के उपचार और रोकथाम में तेजी आती है। यह क्लस्टर दो सामान्य बीमारियों (जिन्जिवो-बक्कल ओरल और सर्विकल कैंसर, जो भारत में क्रमशः पुरुषों और महिलाओं के लिए कैंसर के सर्वाधिक प्रचलित रूप हैं) का उदाहरण देकर यह समझाता है कि विविध विषयों के विशेषज्ञ मिल कर कैंसर के रोग विज्ञान को समझने का लक्ष्य हासिल कर सकते हैं और इसके उपचार के प्रबंधन में जीव वैज्ञानिक प्रणालियां तैयार कर सकते हैं।

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जैव प्रौद्योगिकी विभाग वर्ष 2019 में आधुनिक जीव विज्ञान में विभिन्न अनुसंधान कार्यक्रमों में सहायता पहुंचाने के अपने प्रयास जारी रखेगा; अनुसंधान के प्रभावकारी क्षेत्रों में क्षमता बढ़ाएगा; उपयुक्त प्रकार का ढांचा विकसित करेगा, नई साझेदारी बनाएगा और मौजूदा भागीदारी को सुदृढ़ बनाएगा।

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आरकेमीणा/एएम/आरएसबी/पीबी

 


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