भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार का कार्यालय
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प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार ने पान मसाला एवं गुटखा की पैकेजिंग में बायोप्लास्टिक के उपयोग पर हितधारकों के साथ परामर्श बैठक की अध्यक्षता की

प्रविष्टि तिथि: 22 JAN 2026 5:38PM by PIB Delhi

भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार (पीएसए), प्रोफेसर अजय कुमार सूद ने पान मसाला एवं गुटखा की पैकिंग एवं भंडारण के लिए पाउच में बायोप्लास्टिक के उपयोग पर प्रगति की समीक्षा करने एवं समन्वित कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए एक उच्च स्तरीय हितधारक परामर्श बैठक की अध्यक्षता की। इस बैठक में डॉ. परविंदर मैनी, पीएसए कार्यालय के वैज्ञानिक सचिव; डॉ. राजेश गोखले, जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव; श्री तन्मय कुमार, सचिव, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय; श्री राजित पुन्हानी, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई); उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय, उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी), रसायन एवं पेट्रोकेमिकल्स विभाग, भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) और भारतीय पैकेजिंग संस्थान (आईआईपी) के वरिष्ठ अधिकारियों सहित शिक्षा जगत, उद्योग जगत और अन्य हितधारकों के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया।

बैठक में पाउच पैकेजिंग के लिए उपयुक्त जैव-अपघटनशील सामग्रियों की पहचान करने के उद्देश्य से चल रही राष्ट्रीय पहलों एवं अनुसंधान प्रयासों की समीक्षा की गई। अपने आरंभिक संबोधन में, पीएसए प्रोफेसर सूद ने प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) और उपभोक्ता मामलों के विभाग के साथ पहले हुई चर्चाओं का सारांश प्रस्तुत किया और पान मसाला एवं गुटखा पैकेजिंग के लिए एक स्पष्ट, समयबद्ध कार्य योजना को अंतिम रूप देने की आवश्यकता पर बल दिया।

डॉ. गोखले ने पाउच प्लास्टिक की कम अपघटनशीलता के कारण होने वाली महत्वपूर्ण पर्यावरणीय चुनौती पर बल दिया। उन्होंने पॉलिलैक्टिक एसिड (पीएलए) को एक आशाजनक जैव-अपघटनशील विकल्प के रूप में पहचान की, जिसकी लागत कम है और सरकार, उद्योग एवं शैक्षणिक संस्थानों की भागीदारी के साथ समन्वित, समयबद्ध कार्रवाई की आवश्यकता पर बल दिया।

श्री तन्मय कुमार ने कहा कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय जैवप्लास्टिक की मौजूदा परिभाषा की समीक्षा कर रहा है और जैव-अपघटनशील पदार्थों की स्पष्ट परिभाषा तैयार करने की प्रक्रिया में है, जिससे बीआईएस को मानकीकृत परीक्षण प्रोटोकॉल विकसित करने में सहायता मिलेगी। उन्होंने कहा कि एक समान और तकनीकी रूप से सुदृढ़ संरचना तैयार करने के लिए इस प्रकार के परामर्श आवश्यक हैं। श्री राजित पुन्हानी ने इस बात पर बल दिया कि जैव-अपघटनशील पैकेजिंग की लागत उत्पाद लागत से कम होनी चाहिए, साथ ही स्वाद एवं सुगंध की सुरक्षा सुनिश्चित करना, एफएसएसएआई द्वारा निर्धारित माइग्रेशन सीमाओं का सख्ती से पालन करना और पैकेजिंग की सभी परतों से प्लास्टिक और एल्यूमीनियम फॉयल को पूरी तरह से हटाना आवश्यक है।

मानक दृष्टिकोण से, बीआईएस ने इस बात पर प्रकाश डाला कि अधिकांश वर्तमान जैव-अपघटनशील सामग्री केवल औद्योगिक सम्मिश्रण स्थितियों में ही विघटित होती हैं जिससे उनका संग्रह एवं प्रसंस्करण एक महत्वपूर्ण चुनौती बन जाता है। इस चर्चा वाले सत्र में कई मंत्रालयों एवं विभागों के सुझाव, आईआईटी मद्रास, आईआईटी बॉम्बे और रेवेनशॉ विश्वविद्यालय के अकादमिक दृष्टिकोण, बलरामपुर चीनी मिल्स लिमिटेड, यूकेएचआई लिमिटेड और प्राज इंडस्ट्रीज द्वारा प्रस्तुतियां शामिल थीं। इसके बाद नियामक प्राधिकरणों एवं उद्योग संघों ने भी अपने-अपने विचार प्रस्तुत किए। बहु-हितधारक सुझावों के आधार पर, चर्चा इस बात पर केंद्रित हुई कि जैव-अपघटनशील सामग्रियों के लिए प्रारंभिक अनुसंधान एवं प्रायोगिक समाधानों से आगे बढ़कर एक संरचित सत्यापन एवं प्रमाणन प्रक्रिया की आवश्यकता है।

प्रोफेसर सूद ने सभी हितधारकों की सक्रिय भागीदारी की सराहना करते हुए कहा कि कई उद्योगों में पहले से ही जैव-अपघटनशील सामग्री के संभावित समाधान मौजूद हैं, जिन्हें जैव-अपघटनशील सामग्री की परिभाषा को अंतिम रूप देने से पहले कठोर परीक्षण एवं प्रमाणीकरण की आवश्यकता है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि एमओईएफसीसी, एफएसएसएआई, बीआईएस, सीआईपीईटी और आईआईपी को उद्योग एवं शैक्षणिक संस्थानों के साथ मिलकर स्पष्ट प्रक्रिया के साथ काम करने की आवश्यकता है जिससे निर्धारित समयसीमा निर्धारित की जा सके। उन्होंने आगे उद्योग प्रतिनिधियों को निर्देश दिया कि वे प्रस्तावित सामग्री के नमूने को केंद्रीय पेट्रोकेमिकल्स इंजीनियरिंग एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (सीआईपीईटी) को भेजें और अगली बैठक से पहले एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करें।

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पीके/केसी/एके/डीके

 


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