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भारत ने विकास केन्द्रित, सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था रणनीति को अपनायाः अपने विकास मॉडल में अनुकूलन, शमन और व्यवहारिक बदलाव को एकीकृत कियाः आर्थिक समीक्षा 2025-26


भारत की अनुकूलन और सहनीयता-संबंधित घरेलू खर्च वित्त वर्ष 2016 के जीडीपी के 3.7 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2022 में जीडीपी का 5.6 प्रतिशत हो गया

वित्त वर्ष 2026 में त्वरित नवीकरणीय क्षमता वृद्धि के जरिए स्वच्छ ऊर्जा और रणनीतिक बदलाव देखा गया, हरित हाइड्रोजन और परमाणु ऊर्जा क्षेत्रों के माध्यम से विविधता आई

दिसंबर 2025 के अंत तक स्थापित विद्युत क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों का हिस्सा 51.93 प्रतिशत रहा

प्रौद्योगिकी के साथ महत्वपूर्ण खनिज पदार्थ वैश्विक ऊर्जा बदलाव में कारक निर्धारित कर रहे हैः आर्थिक समीक्षा 2025-26

भारत की महत्वपूर्ण खनिज से जुड़ी रणनीति, घरेलू क्षमता और अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी पर संतुलित ध्यान को प्रतिबिंबित करती है

जलवायु वित्त को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक मजबूत शासन रूपरेखा, वृहद आर्थिक स्थिरता से समझौता किए बिना, विकास का समर्थन करती है

पिछले तीन वर्षों में शहरी स्थानीय निकायों ने 694 करोड़ रुपये के मूल्य के नगर-निगम हरित बांड जारी किए हैं

प्रविष्टि तिथि: 29 JAN 2026 1:36PM by PIB Delhi

केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट कार्य मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने आज संसद में आर्थिक समीक्षा 2025-26  पेश करते हुए कहा कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन एजेंडा एक ऐसे बिन्दु पर पहुंच गया है, जहां नेट-जीरो भविष्य की ओर जाने का नैतिक और तकनीकी बदलाव आज कठिन व्यापार, क्षमतागत बाधाएं तथा महत्वाकांक्षा और परिचालन वास्ताविकता के बढ़ते अंतर के रूप में सामने आया है।

आर्थिक समीक्षा इस बात पर प्रकाश डालती है कि अतिरिक्त व्यवस्था और संस्थागत क्षमता के बिना शीघ्रता से कठिन प्रणालियों को पेश करने से प्रणाली के  आगे बढ़ने की बजाए कमजोर होने की संभावना रहती है। जलवायु नीति को मानव कल्याण को, विशेषकर गरीब और जलवायु संवेदनशील समुदायों को, प्राथमिकता देनी चाहिए। समीक्षा कहती है कि विकास अपनेआप में अनुकूलन का एक रूप है। इसलिए आर्थिक समीक्षा भारत की जलवायु रणनीति में अनुकूलन को केन्द्रीय मानती है।

भारत के लिए सतत विकास हासिल करने और जीवनस्तर को बेहतर बनाने के लिए किफायती और विश्वसनीय विद्युत आपूर्ति के विस्तार की आवश्यकता होगी। नवीकरणीय ऊर्जा इस विस्तार में प्रमुख भूमिका निभाएंगी, हालांकि केवल क्षमता वृद्धि ही भरोसेमंद आपूर्ति के रूप में परिणत नहीं हो सकती। इसलिए आने वाले दशक में भारत का दृष्टिकोण जलवायु नीति समस्या के रूप में नहीं बल्कि एक व्यापक ऊर्जा प्रणाली रणनीति के रूप में होना चाहिए।

अनुकूलनः जलवायु सहनीयता को सुदृढ़ करना

सतत वृद्धि के लिए विकास नीति में जलवायु अनुकूलन और सहनीयता को एकीकृत करना आवश्यक है। आर्थिक समीक्षा कहती है कि भारत की जलवायु अनुकूलन रणनीति को विकास दृष्टिकोण के जरिए आगे बढ़ाया जा रहा है, जिसमें प्रमुख विकास क्षेत्रों में घरेलू सार्वजनिक निवेश का उपयोग किया जा रहा है। भारत की अनुकूलन और सहनीयता-संबंधित घरेलू खर्च वित्त वर्ष 2016 के जीडीपी के 3.7 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2022 में जीडीपी का 5.6 प्रतिशत हो गया।

राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना (एनएपीसीसी) 9 मिशनों के जरिए जलवायु कार्ययोजना का नेतृत्व करती है। इनमें से कई अनुकूलन केन्द्रित है। राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन जलवायु सहनीय कृषि को बढ़ावा देता है, जबकि राष्ट्रीय जल मिशन एकीकृत संसाधन प्रबंधन के जरिए संरक्षण और न्याय संगत पहुंच पर बल देता है। समीक्षा अन्य मिशनों का उदाहरण देती है ताकि अनुकूलन प्रयासों में उनकी भूमिका को रेखांकित किया जा सके।

राष्ट्रीय रूपरेखा और कार्यक्रम, नीतिगत समन्वय, वित्तीय समर्थन संस्थागत व्यवस्थाएं प्रदान करते है, जबकि राज्य क्षेत्रगत नीतियों, सार्वजनिक कार्यक्रमों और स्थानीय संस्थाओं के जरिए इन हस्ताक्षेप कार्यक्रमों की परिकल्पना करते है और लागू करते है। एनएपीसीसी के व्यापक उद्देश्यों को जमीनी स्तर पर लागू करने में राज्य जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना (एसएपीसीसी) महत्वपूर्ण उपाय है। समीक्षा प्रकाश डालती है कि भारतीय शहर तेजी से विकसित हो रहे है, शहरी विकास में जलवायु जोखिम को शामिल कर रहे है। इसका अर्थ है कि जलवायु परिवर्तन किस प्रकार भूमि उपयोग, अवसंरचना और शहरवासियों के लिए उपलब्ध सेवाओं को प्रभावित करता है।

शमनः कम-कार्बन अर्थव्यवस्था

भारत वैश्विक ताप को कम करने के लिए बहु-आयामी दृष्टिकोण अपना रहा है। इसके लिए ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाई जा रही है, गैर-जीवाश्म ईंधन की हिस्सेदारी बढ़ाई जा रही है। ऊर्जा दक्षता में सुधार किया जा रहा है और ऊर्जा प्रणालियों में स्थिरता को बढ़ावा दिया जा रहा है। आर्थिक समीक्षा नीदरलैंड, जर्मनी, स्पेन जैसे कुछ यूरोपीय देशों का उदाहरण देती है ताकि ऊर्जा स्रोतों में बदलाव से जुड़े जोखिमों को रेखांकित किया जा सके, जो उत्पादन में निवेश, पारेषण और प्रणालीगत नचीलेपन की तुलना में अधिक हो सकते है। भारत का ऊर्जा परिवर्तन विभिन्न क्षेत्रों में कई पहलों के जरिए हासिल किया जा रहा है, जिनमें परमाणु, सौर तथा पवन ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, बैटरी भंडारण महत्वपूर्ण खनिज शामिल हैं, जो एक साथ ऊर्जा सुरक्षा तथा ऊर्जा स्रोतों में बदलाव का समाधान करती है। समीक्षा इन उपायों के हाल  के उदाहरण प्रस्तुत करती है।

भारत ने गैर-जीवाश्म स्रोतों से स्थापित क्षमता का 50 प्रतिशत का लक्ष्य पहले ही हासिल कर लिया है, जो दिसंबर 2025 के अंत में 51.93 प्रतिशत है। इसे नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में रिकॉर्ड वार्षिक वृद्धि का समर्थन मिला है। गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित विद्युत क्षमता के विस्तार में प्रगति को कई पहलों से समर्थन मिला है। इसके अतिरिक्त ऊर्जा के अन्य स्वच्छ स्रोतों को समर्थन देने के लिए कई कदम उठाए गए है जैसे राष्ट्रीय परमाणु मिशन, हरित हाइड्रोजन मिशन और गैर-ऊर्जा कार्यक्रम। गैर-जीवाश्म ईंधन ऊर्जा के विस्तार में हुई प्रगति के बावजूद कई चुनौतियां मौजूद है। समीक्षा इन ऊर्जा स्रोतों के उपयोग में बाधा के तौर पर दो कारकों की पहचान करती है- सामग्री और भंडारण आवश्यकता।

ऊर्जा स्रोतों में बदलाव के निर्धारक के रूप में महत्वपूर्ण खनिज

आर्थिक समीक्षा कहती है कि वैश्विक ऊर्जा बदलाव केवल तकनीक से निर्धारित नहीं होता। इसका निर्धारण इस बात से भी होता है कि महत्वपूर्ण खनिजों को कौन नियंत्रित कर रहा है। कम-कार्बन अर्थव्यवस्ता को आकार देने में लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, तांबा और रेयर अर्थ एलीमेंट जैसे धातु नई रणनीतियों के रूप में सामने आए है। जब मांग बढ़ती है तो विकसित अर्थव्यवस्थाएं मानक आधारित महत्वपूर्ण खनिज बाजारों को बढ़ावा देते हुए तथा सतत विकास, पता लगाने और शासन पर जोर देकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती है।

भारत की रणनीति संतुलन को प्रतिबिंबित करती है, जिसमें राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन के जरिए घरेलू क्षमता तथा उपयुक्त प्रोत्साहन व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया गया है। इसके साथ ही खनिज सुरक्षा साझेदारी और भारत-प्रशांत आर्थिक फ्रेमवर्क जैसे अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियों को अंतिम रूप दिया गया है। भारत सरकार ने राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन का शुभारंभ किया है, जो नवीकरणीय ऊर्जा और भंडारण तकनीकों के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करनी की रणनीति पहल है। इसी बीच सरकार के संयुक्त उद्यम खनिज विदेश इंडिया लिमिटेड (केएबीआईएल) ने लिथियम खनन के लिए अर्जेंटीना में 15,703 हेक्टेयर क्षेत्र हासिल किया है। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया और चिली में भी साझेदारी की गई है।

भारत ने दिसंबर, 2025 में भारत परिवर्तन के लिए परमाणु ऊर्जा सतत उपयोग और प्रगति (शांति) अधिनियम लागू किया है। नई रूपरेखा प्रमुख गतिविधियों में निजी क्षेत्र की सहभागिता को सक्षम बनाती है, जिनमें शामिल हैं- संयंत्र परिचालन, विद्युत उत्पादन, उपकरण निर्माण और परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के क्षेत्र में अनुसंधान और नवाचार।

कार्बन क्रेडिट व्यापार योजनाः रूपरेखा से कार्यान्वयन तक

सरकार ने जून, 2023 में कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना लागू की। इसके लिए दोहरी व्यवस्था की गई है, जिसमें अनिवार्य अनुपालन और स्वैच्छिक शमन को शामिल किया गया है। यह रूपरेखा वर्तमान के प्रदर्शन, हासिल और व्यापार (पीएटी) योजना की अवसंरचना को पूर्णतः परिचालित अनुपालन कार्बन बाजार में बदल रही है। कम करने की व्यवस्था के तहत गैर-अनिवार्य इकाई स्वैच्छिक रूप से ऐसी परियोजनाएं पंजीकृत कर सकती है, जो ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को कम करती है या हटाती है, ताकि सीसीसी हासिल किया जा सके। यह व्यवस्था उन इकाईयों से कम करने का परिणाम प्राप्त करती है जो अनुपालन रूपरेखा से बाहर है। यह व्यवस्था इन क्षेत्रों में जलवायु कारकों प्रोत्साहन देती है।

मिशन लाइफ

पर्यावरण के लिए जीवनशैली अर्थात मिशन लाइफ का शुभारंभ कॉप-26, ग्लासगो में 2021 में किया गया था। यह मिशन व्यक्तिगत और सामुदायिक व्यवहार बदलाव को जोड़ता है, ताकि जलवायु परिवर्तन का सामना किया जा सके। आर्थिक समीक्षा मिशन लाइफ को भारत के राष्ट्रीय निर्धारित योगदान का अभिन्न हिस्सा मानती है। भारत की अधिकांश जलवायु उन्मुख योजनाएं मिशन लाइफ की भावना से जुड़ी है क्योंकि वे सरकारी योजनाओं को परिवार, समुदाय और उद्यम स्तर पर व्यवहारिक और जीवनशैली बदलावों के साथ जोड़ती है। भारत की जलवायु रणनीति उत्सर्जन लक्ष्यों या तकनीकों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह उपभोग प्रारूप, सामाजिक नियम और दैनिक विकल्प को आकार देने के लिए डिजाइन की गई है, जिससे मिशन लाइफ एक समानांतर पहल ही नहीं बल्कि व्यवहारिक आधार बन जाती है, जो अधिकांश पर्यावरण नीतियों को रेखांकित करती है।

पर्यावरण वित्त

पर्यावरण वित्त का वर्तमान स्तर, विकासशील देशों की जलवायु महत्वाकांक्षा को पूरा करने की जरूरतों से काफी कम है। आर्थिक समीक्षा प्रकाश डालती है कि वैश्विक प्रयासों के बावजूद सतत विकास महत्वाकांक्षा और उपलब्ध वित्त के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है, विशेषकर विकासशील देशों के संदर्भ में यह अंतर बढ़कर अनुमानित चार ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए अंतर्राष्ट्रीय सार्वजनिक वित्त सीमित है और घरेलू संस्थाओं का वैश्विक पर्यावरण वित्त पर प्रभुत्व है, जो कुल 80 प्रतिशत प्रवाह में योगदान देती है। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था के ये प्रारूप विकसित देशों के पक्ष में लगातार और स्पष्ट पूर्वाग्रह को प्रतिबिंबित करती है।

समीक्षा कहती है कि भारत को पर्यावरण वित्त में वैश्विक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जो सौर, पवन ऊर्जा तथा ऊर्जा कुशलता से जुड़ी है।

अनुकूलन, एमएसएमई को वित्त पोषण, शहरी अवसंरचना और उद्योग जहां उत्सर्जन कम करना मुश्किल है, जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में वित्त पोषण की कमी है। वर्तमान में शमन के लिए भारतीय वित्त का 83 प्रतिशत और अनुकूलन के लिए वित्त का 98 प्रतिशत घरेलू स्तर पर प्राप्त किया जाता है।

भारतीय संदर्भ में वित्तीय अंतर को समाप्त करना

भारत ने पर्यावरण के लिए वित्त के पैमाने को बढ़ाने हेतु द्वि-आयामी रणनीति अपनाई है- घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय स्रोत।

घरेलू वित्तीय प्रणाली को मजबूत करना

इरेडा, नाबार्ड, सिडबी, पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन लिमिटेड और ग्रामीण विद्युतीकरण कॉरपोरेशन लिमिटेड जैसी विशिष्ट संस्थाएं कम-कार्बन/नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में पहले से ही कार्यरत है, जो प्रमुख पहलों और योजनाओं के माध्यम से सतत प्रथाओं को अपनाने और हरित निवेशों को प्रोत्साहित करने को बढ़ावा दे रही है। ये संस्थाएं पर्यावरण परियोजना तैयारी को समर्थन देती है तथा पूंजी के जरिए परियोजनाओं पर निर्भरता को बढ़ाती है।

सेबी का व्यापार उत्तरदायित्व और विकास रिपोर्टिंग (बीआरएसआर) रूपरेखा, हरित बांड दिशा-निर्देश और सतत विकास से जुड़े ऋण पर आईएफएससीए के निर्देश ने पर्यावरण संबंधी निवेशों में निवेशकों के विश्वास को बढ़ाया है।

नगद बांड बाजार

पर्यावरण अवसंरचना के वित्त पोषण के लिए बांड बाजार महत्वपूर्ण है, जिसमें तुरंत पूंजी और लंबी अवधि के भुगतान की आवश्यकता होती है। अधिक नगदी वाले बांड बाजार लंबी अवधि के, स्थिर और पैमाना बढ़ाने योग्य वित्त पोषण की सुविधा दे सकते है।

सॉवरेन हरित बांड (एसजीबी) जारी किए गए है ताकि कम-कार्बन सार्वजनिक अवसंरचना का वित्त पोषण किया जा सके।

एक तरफ संस्थागत निवेशकों से निवेश आकर्षित करने के लिए सुदृढ़ बाजारों की जरूरत होती है, जिनके पास खर्च करने के लिए लंबी अवधि पूंजी होती है। दूसरी तरफ, बांड बाजार स्थानीय शासन निकायों को एक महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म प्रदान करते है, ताकि वे अपने पर्यावरण से जुड़े कार्य के लिए स्थानी मुद्रा में वित्त पोषण प्राप्त कर सकें, जैसे जल आपूर्ति, अपशिष्ट प्रबंधन, हरित ऊर्जा, क्षेत्र विशेष अनुकूलन और सतत विकास आवश्यकताएं। समीक्षा कहती है कि सेबी के हरित बांड रूपरेखा के अनुसार इंदौर, गाजियाबाद, अहमदाबाद और वडोदरा के शहरी स्थानीय निकायों ने हरित बांड जारी किए हैं। नगर निगम हरित बांड के जरिए स्थानीय निकायों के लिए अगले 5 से 10 वर्षों में पर्यावरण संबंधी कार्यों के लिए 2.5-6.9 बिलियन डॉलर तक प्राप्त किया जा सकता है। इसके अलावा भारत सरकार ने वित्त वर्ष 2026 में 15,000 करोड़ रुपये मूल्य के सॉवरेन हरित बांड जारी किए है, जिनका 2023 से संचित मूल्य 72,697 करोड़ रुपये हो गया है।

समीक्षा ग्रीनियम का भी जिक्र करती है, जो पारम्परिक बांड की तुलना में हरित बांड की प्राप्ति को रेखांकित करती है। इस संदर्भ में पूरे देश का अनुभव बताता है कि ग्रीनियम के परिणाम निवेशक के आशय पर कम निर्भर करते है, जबकि यह बाजार के डिजाइन, तरलता, विश्वसनीयता और रिपोर्टिंग फ्रेमवर्क पर अधिक निर्भर करते है। भारत का ग्रीनियम को स्पष्ट सॉवरेन बांड हरित रूपरेखा के आधार पर मध्यवर्ती (0-6 बीपीएस) के रूप में श्रेणीबद्ध किया गया हैं, मजबूत घरेलू संस्थागत मांग, नीति जो मूल्य का संकेत देती है।  

अंतर्राष्ट्रीय जलवायु वित्त और बहु-पक्षीय विकास बैंकों की भूमिका

समीक्षा स्पष्ट रूप से वर्णन करती है कि वैश्विक पूंजीगत बाजार निधियों से भरे पड़े है, लेकिन वैश्विक दक्षिण की सतत विकास और पर्यारवण के लिए पूंजी प्रवाह बाधित रही है। यह बाधा वैश्विक वित्त व्यवस्था में जोखिम हटाने से जुड़ी है। यह बहु-पक्षीय विकास बैंकों (एमडीबी) के परिचालन प्रारूपों तथा विकसित देशों के विनियमों में स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। एमडीबी कम जोखिम, सॉवरेन समर्थक ऋण, एएए रेटिंग को बनाए रखना, बैलेंसशीट पुनर्चक्रण को सीमित करना और निजी पूंजी जुटाने को निरंतर प्राथमिकता देती है। बैलेंसशीट अनुकूलन में बदलाव-शुरूवात से धारण करने की जगह पर शुरूवात से साझा करने-एमडीबी को वैश्विक जोखिम प्रबंधक के रूप में फिर से स्थापित करने के लिए आवश्यक है, जिसमें निजी निवेश आकर्षित करने के लिए गारंटी, बीमा और मिश्रित वित्त का उपयोग किया जा सकता है।

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एनबी/एमजी/केसी/हिन्दी इकाई/  -29


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