वित्‍त मंत्रालय
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उपभोग और निवेश के दोहरे इंजन से प्रेरित भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर के 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान


वित्त वर्ष 2027 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर के 6.8-7.2 प्रतिशत रहने का अनुमान

जीडीपी में निजी अंतिम उपभोग व्यय बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 61.5 प्रतिशत तक पहुंचा, वित्त वर्ष 2012 से अब तक का सर्वोच्च स्तर

औद्योगिक सेक्टर में मजबूती के संकेत, विनिर्माण क्षेत्र में वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में 8.4 प्रतिशत की वृद्धि

सेवा क्षेत्र के लिए सकल मूल्य संवर्धन में वर्ष 2026 की पहली छमाही में 9.3 प्रतिशत की वृद्धि

सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति अनुपात कई दशकों के निम्न स्तर 2.2 प्रतिशत पर पहुंचा

भारत का कुल निर्यात (वस्तु एवं सेवा क्षेत्र) वित्त वर्ष 2025 में रिकॉर्ड 825.3 बिलियन डॉलर तक पहुंचा

तीन वर्षों की बातचीत के बाद भारत का यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौता

प्रविष्टि तिथि: 29 JAN 2026 1:30PM by PIB Delhi

केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट कार्य मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने आज संसद में आर्थिक समीक्षा 2025-26 पेश करते हुए कहा कि उपभोग और निवेश के दोहरे इंजन से प्रेरित भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर के 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह लगातार चौथे वर्ष सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में भारत की स्थिति की पुष्टि करता है।

समीक्षा में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2027 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर के 6.8-7.2 प्रतिशत रहने का अनुमान है जबकि भारत के लिए सम्भावित वृद्धि के लगभग 7 प्रतिशत रहने का अनुमान है।

समीक्षा में बताया गया है कि घरेलू मांग वित्त वर्ष 2026 में आर्थिक विकास को निरंतर बढ़ावा देती रही है। पहले अग्रिम अनुमान के अनुसार, जीडीपी में निजी अंतिम उपभोग व्यय बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 61.5 प्रतिशत तक पहुंचा जो वित्त वर्ष 2012 से अब तक का सर्वोच्च स्तर (वित्त वर्ष 2023 में भी 61.5 प्रतिशत दर्ज की गई थी) है। उपभोग में यह शक्ति एक सहायक वृहद आर्थिक वातावरण को प्रदर्शित करती है जिसकी मुख्य विशेषताओं में निम्न मुद्रास्फीति दर, स्थिर रोजगार स्थितियां और बढ़ती वास्तविक क्रय शक्ति शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, मजबूत कृषि संबंधी प्रदर्शन से प्रेरित स्थिर ग्रामीण उपभोग और प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों के विवेकीकरण से समर्थित शहरी उपभोग में निरंतर सुधार की पुष्टि करते हैं कि उपभोग मांग में आई तेजी व्यापक है।

उपभोग के साथ, निवेश ने अनुमानित 30.0 प्रतिशत पर अनुमानित सकल निर्धारित पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) के हिस्से के साथ वित्त वर्ष 2026 में विकास को निरंतर बढ़ावा दिया है। जीएफसीएफ के 7.6 प्रतिशत विस्तारित होने के साथ निवेश कार्यकलाप वर्ष की पहली छमाही में मजबूत हुए, जिसने पिछले वर्ष की समान अवधि में दर्ज गति को पीछे छोड़ दिया और 7.1 प्रतिशत के महामारी पूर्व औसत से ऊपर बना रहा।

समीक्षा में रेखांकित किया गया है कि कृषि और संबद्ध सेवाओं के वित्त वर्ष 2026 में 3.1 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान है। वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में कृषि संबंधी गतिविधियों को अनुकूल मानसून से सहायता मिली। कृषि संबंधी जीवीए 3.6 प्रतिशत की दर से बढ़ी जो वित्त वर्ष 2025 की पहली छमाही में दर्ज 2.7 प्रतिशत वृद्धि दर से अधिक है लेकिन 4.5 प्रतिशत के दीर्घ अवधि औसत से कम है। संबद्ध कार्यकलापों, विशेष रूप से पशुधन एवं मत्स्य पालन में लगभग 5-6 प्रतिशत की अपेक्षाकृत स्थिर दर से वृद्धि हुई। चूंकि कृषि जीवीए में उनका हिस्सा बढ़ा है, कुल कृषि संबंधी वृद्धि ने निरंतर एक उतार चढ़ावपूर्ण फसल प्रदर्शन का एक भारित परिणाम और संबद्ध सेक्टरों में अपेक्षाकृत स्थिर विस्तार प्रदर्शित किया है।

आर्थिक समीक्षा में उल्लेख किया गया है कि औद्योगिक सेक्टर मजबूती के संकेत प्रदर्शित कर रहा है। विनिर्माण सेक्टर ने वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में 8.4 प्रतिशत की वृद्धि प्रदर्शित की जो वित्त वर्ष 2026 के 7.0 प्रतिशत के अनुमान से अधिक है। इसके अतिरिक्त निर्माण उद्योग गतिशील रहा है, जिसे निरंतर सार्वजनिक पूंजी व्यय और संरचना परियोजनाओं में जारी गति से मदद मिली। विनिर्माण सेक्टर का हिस्सा वास्तविक (स्थिर) मूल्य के हिसाब से 17-18 प्रतिशत पर मजबूत बना हुआ है। विनिर्माण का आउटपुट का सकल मूल्य (जीवीओ) सेवा क्षेत्र की तुलना में 38 प्रतिशत पर व्यापक रूप से स्थिर बना हुआ है। जिसे संकेत मिलता है कि आउटपुट में मजबूती जारी है। इसके अतिरिक्त, वित्त वर्ष 2026 में औद्योगिक सेक्टर के गति प्राप्त करने की उम्मीद है, जो वित्त वर्ष 2025 के 5.9 प्रतिशत से अधिक 6.2 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। पीएमआई विनिर्माण, आईआईपी विनिर्माण और ई-वे बिल जनरेशन सहित वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही के हाई-फ्रीक्वेंसी संकेतक मजबूत मांग के कारण विनिर्माण कार्यकलापों के सुदृढ़ीकरण का संकेत देते हैं। इस्पात उपभोग और सीमेंट उत्पाद जैसे निर्माण संकेतकों में निरंतर वृद्धि देखी गई है। आगे देखते हुए, जीएसटी के विवेकीकरण और अनुकूल मांग आउटलुक से प्रेरित औद्योगिक कार्यकलापों में गति के मजबूत बने रहने का अनुमान है।

आर्थिक समीक्षा में रेखांकित किया गया है कि आपूर्ति पक्ष पर, सेवा क्षेत्र विकास का मुख्य वाहक बना हुआ है। वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में सेवाओं के लिए सकल मूल्य संवर्धन (जीवीए) में 9.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि पूरे वित्त वर्ष के लिए 9.1 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान था। यह रुझान सेक्टर के बीच व्यापक विस्तार का संकेत देता है। कोविड से व्यापक रूप से प्रभावित व्यापार, आतिथ्य, परिवहन, संचार एवं संबंधित सेवाओं को छोड़कर सेवा सेक्टर के भीतर सभी उप-श्रेणियों में 9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

आर्थिक समीक्षा में उल्लेख किया गया है कि मुद्रास्फीति में उल्लेखनीय नरमी के साथ-साथ अर्थव्यवस्था में मांग आधारित वृद्धि से वास्तविक क्रय शक्ति में सुधार आया है और उपभोग को मदद मिली है। वित्त वर्ष 2026 (अप्रैल-दिसम्बर) में घरेलू मुद्रस्फीति खाद्य मूल्यों में तेज गिरावट का कारण कीमतों में व्यापक कमी प्रदर्शित करती है। हेडलाइन सीपीआई मुद्रास्फीति गिरकर 1.7 प्रतिशत पर आ गई जिसमें सब्जी और दलहन कीमतों में सुधार की मुख्य भूमिका थी। इसे अनुकूल कृषि स्थितियों, आपूर्ति पक्ष उपायों और एक मजबूत आधार से भी मदद मिली। जहां मुख्य मुद्रास्फीति दर में निरंतरता बनी रही है, यह बेशकीमती धातुओं की कीमतों में तेज वृद्धि से भी प्रभावित रहा है। इन्हें समायोजित करते हुए अंतर्निहित मुद्रास्फीति दबाव नरम प्रतीत होते हैं जिनसे सीमित मांग पक्ष तेजी का संकेत मिलता है। भविष्य के देखते हुए मुद्रास्फीति आउटलुक के नरम बने रहने की उम्मीद है जो अनुकूल आपूर्ति पक्ष स्थितियों और जीएसटी दर विवेकीकरण प्रभावी अवधि से समर्थित है।  

समीक्षा में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2026 में देखी गई घरेलू मांग और पूंजी निर्माण में गति को एक विवेकपूर्ण राजकोषीय नीति, रणनीति का समर्थन मिला है जिसकी विशेषताओं में स्थिर राजस्व संग्रह और संयोजित विवेकपूर्ण व्यय शामिल हैं। वर्ष के दौरान सकल कर राजस्व संग्रह निरंतर गतिशील बना रहा है, प्रत्यक्ष कर संग्रह बजटीय वार्षिक लक्ष्य (नवम्बर, 2025 तक) का लगभग 53 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। अप्रत्यक्ष कर संग्रह भी निम्न मुद्रास्फीति दर और आयात में उतार चढ़ाव के बावजूद मजबूत बना रहा है। वर्ष के दौरान सकल जीएसटी संग्रह में कई बार सर्वकालिक ऊंचाई दर्ज की। व्यक्तिगत आय कर के पुनर्गठन और जीएसटी दरों के विवेकीकरण सहित हाल के कर नीति सुधारों ने उपभोग मांग में सहायता की है और राजस्व बनाए रखा है। व्यय पक्ष पर पूंजीगत परिव्ययों ने मजबूत वर्ष दर वर्ष वृद्धि दर्ज की और नवम्बर 2025 के बजट आवंटन के लगभग 60 प्रतिशत तक पहुंच गया। इसके अतिरिक्त राजस्व व्यय में वृद्धि सीमित बनी रही जिससे सार्वजनिक व्यय की गुणवत्ता को मजबूती प्राप्त हुई।

कम सॉवरेन बॉन्ड यील्ड जोकि अमेरिकी बॉन्ड में फैली हुई आधे से भी कम हो गई है के माध्यम से सरकार की वित्तीय अनुशासन की प्रतिबद्धताओं को बाजारों ने भी मान्यता दी और पुरस्कृत किया। एक निम्न रेपो दर के साथ ये गिरते यील्ड जो पूरी अर्थव्यवस्था में उधारी लागतों के लिए बेंचमार्क के रूप में कार्य करते हैं, खुद वित्तीय प्रोत्साहन के रुप में भी कार्य करेंगे। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी, एसएंडपी रेटिंग ने राजकोषीय सुधार की साख और प्रतिबद्धता को स्वीकार किया है तथा भारत की रेटिंग को बीबीबी- से बीबीबी कर दिया है। केयर एज ग्लोबल ने भारत के अपने कवरेज की शुरूआत करते हुए बीबीबी+ की रेटिंग प्रदान की है और भारत के मजबूत आर्थिक प्रदर्शन और राजकोषीय अनुशासन को रेखांकित किया है।

उच्चतर सार्वजनिक पूंजी व्यय तथा कर कटौतियों द्वारा प्रदान किए गए वित्तीय प्रोत्साहन के साथ-साथ फरवरी, 2025 से नीति रेपो दर में 125 आधार अंकों की संचयी गिरावट के माध्यम से मौद्रिक सहायता प्रदान की गई। इसे कैश रिजर्व रेशियो कट (2.5 लाख करोड़ रुपये) के माध्यम से टिकाऊ तरलता के समावेश, ओपन मार्किट ऑपरेशंस (6.95 लाख करोड़ रुपये) और लगभग 25 बिलियन डॉलर के फॉरेक्स स्वैप से भी सहायता मिली है। इन उपायों को प्रभावी रूप से बैंकिंग प्रणाली में समावेशित कर दिया गया है। अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों द्वारा रुपये के नए ऋण पर भारित औसत ऋण दर (डब्ल्यूएलआर) में 59 आधार अंकों (बीपीएस) की गिरावट आई, जबकि बकाया रुपया ऋणों पर डब्ल्यूएलआर में फरवरी और नवम्बर, 2025 में 69 बीपीएस की गिरावट आई। क्रमिक रूप से बैंकिंग सेक्टर ने अपनी बैलेंस सीट को और सुदृढ़ किया है, जिसमें सकल गैर-निष्पादनकारी परिसंपत्ति (एनपीए) अनुपात 2.2 प्रतिशत के कई दशकों के निम्न स्तर पर आ गया, अर्द्ध वार्षिक स्लीपेज रेशियो 0.7 प्रतिशत पर स्थिर बना रहा और लाभ प्रदता में सुधार आया। इसके पीछे उच्चतर करोपरांत लाभ और मजबूत निवल ब्याज मार्जिन की भूमिका रही।

आर्थिक समीक्षा में उल्लेख किया गया है कि वैश्विक व्यापार अनिश्चितता की पृष्ठभूमि में भारत का कुल निर्यात (वस्तु एवं सेवा) वित्त वर्ष 2025 में रिकार्ड 825.3 बिलियन डॉलर रहा और यह तेजी वित्त वर्ष 2026 में भी जारी है। अमेरिका द्वारा उच्चतर टैरिफ थोपे जाने के बावजूद वस्तु निर्यात में 2.4 प्रतिशत (अप्रैल-दिसम्बर 2025) की वृद्धि हुई जबकि सेवा निर्यात 6.5 प्रतिशत बढ़ा। अप्रैल-दिसम्बर, 2025 के लिए वस्तु आयात में 5.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई। पिछले वर्षों के रुझान को देखते हुए वस्तु व्यापार घाटा में वृद्धि की भरपाई सेवा क्षेत्र व्यापार अधिशेष में वृद्धि से होती रही है जबकि रेमिटेंस में वृद्धि से इस संतुलन को मजबूती मिली है। अधिकांश वर्षों में रेमिटेंस सकल एफडीआई आवक से अधिक रहे हैं जो बाह्य वित्त पोषण के एक प्रमुख स्रोत के रूप में अपने महत्व को रेखांकित करते हैं। इसके परिणामस्वरूप चालू खाता घाटा वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में जीडीपी के 0.8 प्रतिशत के नरम स्तर पर बना हुआ है।

अल्पकालिक अवधि में भारत का बाह्य क्षेत्र मजबूत स्थिति में है। विदेशी मुद्रा भंडार 16 जनवरी, 2026 को 11 महीनों के आयात को कवर करते हैं और सितम्बर, 2025 के आखिर तक बाह्य ऋण शेष का लगभग 94.0 प्रतिशत हैं, जो एक आरामदायक तरलता कुशन प्रस्तुत करते हैं। एक विविधीकृत व्यापार रणनीति का प्रयास जैसा कि ब्रिटेन, ओमान और और न्यूजीलैंड के साथ व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर और तीन वर्षों की बातचीत के बाद यूरोपीय संघ के साथ हाल में मुक्त व्यापार समझौते, जिसे अब यूरोपीय संसद से पुष्टि किए जाने की आवश्यकता होगी, से सिद्ध होता है। इसके अतिरिक्त अमेरिका के साथ सक्रिय बातचीत भारत के लिए अच्छा संकेत है।

केन्द्र सरकार की श्रम संहिता के कार्यान्वयन को अधिसूचित करने का ऐतिहासिक कदम नियामकीय संरचना में उल्लेखनीय सुधार का प्रमाण है। 29 केन्द्रीय कानूनों का चार श्रम संहिताओं में संघटन का उद्देश्य अनुपालन को सरल बनाना, श्रम बाजार लचीलेपन को बढ़ाना और श्रम बल की व्यापक श्रेणी को सुरक्षा प्रदान करना है। साथ ही मजदूरी, पेशागत सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना भी इसका लक्ष्य है।

वित्त वर्ष 2026 बाह्य मोर्च पर अर्थव्यवस्था के लिए असामान्य रूप से एक चुनौतीपूर्ण वर्ष था। वैश्विक व्यापार में अत्यधिक अनुश्चितता और उच्च, दण्डात्मक टैरिफ ने विनिर्माताओं, विशेष रूप से निर्यातको के लिए दबाव सृजित किया और व्यवसाय धारणा को प्रभावित किया। सरकार ने इस संकट का उपयोग जीएसटी युक्तिकरण, विनियमन पर त्वरित प्रगति और सभी सेक्टरों में अनुपालन आवश्यकताओं को और सरल बनाने जैसे प्रमुख उपायों के जरिए सुधार के अवसर के रूप में किया। इसलिए वित्त वर्ष 2027 के समायोजन का वर्ष रहने की उम्मीद है क्योंकि घरेलू मांग और निवेश के बढ़ने के साथ कम्पनियां और लोग खुद को इन बदलावों के अनुरूप ढालेंगे। इसके साथ-साथ यह भी स्वीकार किया जाना चाहिए कि बाहरी वातावरण अनिश्चित बना हुआ है जिससे समग्र परिदृश्य प्रभावित होता है।

वैश्विक आर्थिक परिदृश्य मध्य अवधि में निराशाजनक प्रतीत होता है जहां डाउनसाइड जोखिम का प्रभुत्व है। वैश्विक स्तर पर विकास के मंद बने रहने की उम्मीद है जिससे व्यापक रुप से स्थिर कमोडिटी मूल्य रूझान के आसार हैं। सभी देशों में मुद्रास्फीति निम्न बनी हुई है इसलिए मौद्रिक नीतियों के अधिक समावेशी और विकास में सहायक होने की उम्मीद है।

समीक्षा में बताया गया है कि वैश्विक वातावरण अनिश्चित बना हुआ है जहां विकास अपेक्षा से बेहतर है लेकिन भू-राजनीतिक तनाव, व्यापार विभाजन और वित्तीय निर्बलताओं के बीच जोखिम अधिक है। इन आघातों का प्रभाव अभी भी देखा जा सकता है। भारत के लिए वैश्विक स्थितियां तात्कालिक वृहद आर्थिक दबाव की तुलना में बाहरी अनुश्चितताओं की प्रतीक हैं। प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में धीमी वृद्धि व्यापार में टैरिफ से जुड़ी बाधाएं तथा पूंजीगत प्रवाह में उतार-चढ़ाव का निर्यात और निवेशक धारणा पर प्रभाव पड़ सकता है। इसके साथ-साथ अमेरिका के साथ जारी व्यापार वार्ता के वर्ष के दौरान सम्पन्न हो जाने की उम्मीद है जिससे बाहरी मोर्च पर अनिश्चितता कम होने में सहायता मिलेगी। जहां यह जोखिम प्रबंधित किए जाने योग्य हैं, ये पर्याप्त बफर और नीति विश्वसनीयता बनाए रखने के महत्व पर बल देते हैं।

इस पृष्ठभूमि, घरेलू अर्थव्यवस्था स्थिर बनी हुई है। मुद्रास्फीति ऐतिहासिक रूप से निम्न स्तर पर है, हालाकि भविष्य में इसमें कुछ मजबूती आ सकती है। घरों, कम्पनियों और बैंकों में बैलेंस सीट मजबूत हैं और सार्वजनिक निवेश निरंतर गतिविधियों में सहायता कर रहा है। उपभोग मांग गतिशील बनी हुई है और निजी निवेश इरादों में सुधार हो रहा है। ये स्थितियां बाहरी आघातों के विरुद्ध गतिशीलता प्रदान करती हैं और विकास गति की निरंतरता में सहायता करती हैं। आगामी वर्ष में सीपीआई सीरीज के बेस का पुनर्निधारण का भी मुद्रास्फीति आकलन पर प्रभाव पड़ेगा और इसके लिए मूल्य गतिकी की चौकस व्याख्या करने की आवश्यकता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसा लगता है कि पिछले कुछ वर्षों में नीतिगत सुधारों के संचयी प्रभावों ने अर्थव्यवस्था की मध्यकालिक विकास संभावना को 7 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है। घरेलू वाहकों के प्रमुख भूमिका निभाने और वृहद आर्थिक स्थिरता के मजबूत होने के साथ विकास के आसपास जोखिमों का संतुलन व्यापक रूप से सम बना हुआ है। इन सभी विचारों के साथ, आर्थिक समीक्षा वित्त वर्ष 2027 में 6.8 से 7.2 प्रतिशत के दायरे में वास्तविक जीडीपी विकास अनुमान व्यक्त करता है। इसलिए यह अनुमान वैश्विक आवश्यकता के बीच एक निरंतर वृद्धि  का संकेत है जिसके लिए सावधानी बरतने की आवश्यकता है, निराश होने की नहीं। 

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एनबी/एमजी/केसी/हिन्दी इकाई - 07


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