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अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की परिसंपत्ति गुणवत्ता बेहतर हुई, एनपीए की प्राप्ति दर वित्त वर्ष 2018 के 13.2 प्रतिशत से दोगुनी होकर वित्त वर्ष 2025 में 26.2 प्रतिशत हुई


वित्त वर्ष 2024 के दौरान ग्रामीण बैंकों का समेकित कुल लाभ 7.6 हजार करोड़ रुपये पहुंचा, जबकि वित्त वर्ष 2025 के दौरान समेकित कुल लाभ 6.8 हजार करोड़ रुपये रहा

01 अप्रैल से 30 नवंबर, 2025 के बीच ऋण आकलन प्रारूप के ऋण कार्यक्रम के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने 3.2 लाख करोड़ रूपये मूल्य के एमएसएमई ऋण आवेदनों के संदर्भ में 41.5 हजार करोड़ रुपये के ऋण मंजूर किए

सूक्ष्म ऋण क्षेत्र में सक्रिय ऋण प्राप्तकर्ताओं की संख्या वित्त वर्ष 2014 के 330 लाख से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 627 लाख हो गई, एमएफआई शाखा नेटवर्क समान अवधि के दौरान 11,687 शाखाओं से बढ़कर 37,380 हो गई

मार्च 2025 तक पीएमजेडीवाई के तहत 55.02 करोड़ खाते खोले गए हैं, जिनमें से 36.63 करोड़ खाते ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में खोले गए हैं, यूपीआई सफलता का प्रतीक बन गई है

आईबीसी के तहत ऋण प्रदाता व्यवसाय के उचित मूल्यों का 94 प्रतिशत तक प्राप्त कर लेते है, भारत में कॉरपोरेट संकट के समाधान के लिए आईबीसी ने एकीकृत फ्रेमवर्क स्थापित किया, एसएंडपी ने भारत की वैश्विक रेटिंग को बेहतर किया

प्रविष्टि तिथि: 29 JAN 2026 2:22PM by PIB Delhi

केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट कार्य मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने आज संसद में आर्थिक समीक्षा 2025-26  पेश करते हुए कहा कि अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (एससीबी) की परिसंपत्ति गुणवत्ता बेहतर हुई है। कुल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति अनुपात (जीएनपीए) और कुल एनपीए अनुपात क्रमशः कई दशकों की निम्न सीमा और रिकॉर्ड निम्न सीमा पर पहुंच गए है। सितंबर, 2025 तक एससीबी का पूंजी-जोखिम-भारित परिसंपत्ति अनुपात (सीआरएआर) 17.2 प्रतिशत पर मजबूत बना रहा। इसके अलावा एससीबी में एनपीए की रिकवरी दर वित्त 2018 के 13.2 प्रतिशत से दोगुनी बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 26.2 प्रतिशत हो गई। दिवालिया और दिवालियापन संहिता 2016 (आईबीसी कोड) के माध्यम से रिकवरी दर बेहतर हुई है।

इसके अतिरिक्त केन्द्रीय बजट 2025-26 में घोषित किए गए उपाय भी क्षेत्र के लिए लाभकारी रहे हैं जैसे एमएसएमई के लिए गारंटी सुविधा के साथ ऋण उपलब्धता में महत्वपूर्ण वृद्धि, सूक्ष्म उद्यमों व अन्य के लिए क्रेडिट कार्ड की सुविधा आदि। एमएसएमई वर्गीकरण में किए गए संशोधनों ने भी इस उच्च वृद्धि दर में योगदान दिया है, जहां निवेश सीमा और कारोबार सीमा में महत्वपूर्ण रूप से वृद्धि की गई थी। एमएसएमई क्षेत्र को दिए जाने वाले बैंक ऋण में गति बनी हई है और इसकी स्थिति सुदृढ़ है।

क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का प्रदर्शन (आरआरबी)

आर्थिक समीक्षा 2025-26 में कहा गया है कि आरआरबी के संसाधनों में वृद्धि करने और उनके प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए सरकार ने विभिन्न उपाय किए है। इन उपायों में शामिल है- एक राज्य-एक आरआरबी सिद्धांत के आधार पर ग्रामीण बैंकों का चार चरणों में समेकन। इससे उनकी संख्या 1 मई, 2025 तक 196 से घटकर 28 रह गई है।

इसके अतिरिक्त विलय किए गए आरआरबी में कोर बैंकिंग समाधान और अन्य आईटी प्रणालियों के एकीकरण को एकीकृत प्लेटफॉर्म में शामिल किया गया है।

इन उपायों के कारण उनके प्रदर्शन में सुधार हुआ है। हाल के वर्षों में आरआरबी की वित्तीय स्थिति बेहतर हुई है। वित्त वर्ष 2024 के दौरान ग्रामीण बैंकों ने 7.6 हजार करोड़ का रिकॉर्ड समेकित कुल लाभ हासिल किया। इसके बाद वित्त वर्ष 2025 में 6.8 हजार करोड़ का दूसरा सबसे अधिक समेकित कुल लाभ हासिल किया।

यह भी ध्यान देने लायक है कि आरआरबी पिछले कई वर्षों में प्राथमिक क्षेत्र के ऋण लक्ष्य के  75 प्रतिशत सीमा से अधिक ऋण वितरित कर रहा है, जो उनके मूलभूत उद्देश्यों को पूरा करने की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है।

बैंकिंग क्षेत्र में प्रमुख नीतिगत कार्य

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने 2025 में एमएसएमई के लिए डिजिटल उपस्थिति के आधार पर ऋण आकलन प्रारूप (सीएएम) का शुभारंभ किया। आर्थिक समीक्षा 2025-26 कहती है कि 01 अप्रैल से 30 नवंबर, 2025 के बीच सीएएम के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने 3.2 लाख करोड़ रूपये मूल्य के एमएसएमई ऋण आवेदनों के संदर्भ में 41.5 हजार करोड़ रुपये के ऋण मंजूर किए।

एमएसएमई प्रारूप डिजिटल डेटा और जांच योग्य डेटा उपलब्ध कर एमएसएमई के लिए ऋण सुविधा को स्वचालित कर देगा। इसके लिए सभी ऋण आवेदनों पर उद्देश्य आधारित निर्णय प्रक्रिया और प्रारूप आधारित सीमा आकलन का उपयोग किया जाएगा। यह सुविधा दोनों प्रकार के ऋण प्राप्तकर्ताओं के लिए लागू रहेगी- बैंकों के वर्तमान और बैंकों के नए एमएसएमई ऋण प्राप्तकर्ता। एमएसएमई के लिए व्यवसाय करने में आसानी में सुधार करने के अलावा यह प्रारूप ऋण गारंटी योजनाओं के एकीकृत करता है, जैसे सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के लिए ऋण गारंटी निधि।

आरबीआई ने अपने नियामकीय निर्देशों के पुनर्गठन की शुरूआत की है, जो नियामकीय संवाद में महत्वपूर्ण बदलाव को रेखांकित करता है।

इसके अलावा नाबार्ड के परामर्श से नाबार्ड द्वारा आरआरबी, राज्य सहकारी बैंक और केन्द्र सहकारी बैंकों को जारी निर्देश भी समेकित किए गए है।

नियमों की समीक्षा के लिए संस्थागत व्यवस्था को मजबूत करने के लिए आरबीआई ने एक नियामकीय समीक्षा प्रकोष्ठ का गठन किया है जो कम से कम प्रत्येक 5-7 सालों में एक बार व्यापक, उद्देश्यपरक और प्रणालीगत तरीके से प्रत्येक नियम की समीक्षा करेगा। 1 अक्टूबर, 2025 से प्रकोष्ठ संचालन में है।

नियामकीय शासन संरचना के तहत आरबीआई ने एआई के उपयोग के लिए सिद्धांत आधारित दिशा-निर्देश जारी किए है। इसने उत्तरदायी एआई के लिए निःशुल्क एआई रूपरेखा पेश की है, जिसे वित्तीय नवाचार को बढ़ावा देने तथा सुदृढ़ जोखिम प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए डिजाइन किया गया है।

सूक्ष्म वित्त और वित्तीय समावेश

ऋण प्राप्तकर्ताओं में 95 प्रतिशत महिला एवं 80 प्रतिशत ग्रामीण आबादी के साथ सूक्ष्म वित्त क्षेत्र ऐसे क्षेत्रों को संबोधित करता है, जहां ऋण सुविधा ऐतिहासिक रूप से बहुत सीमित रही है।

आर्थिक समीक्षा 2025-26 कहती है कि पिछले दशक में लघु वित्त क्षेत्र में निरंतर वृद्धि हुई है। जहां सक्रिय ऋण प्राप्तकर्ताओं की संख्या वित्त वर्ष 2014 के 330 लाख से दोगुनी बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 627 लाख हो गई है। इस अवधि के दौरान एमएफआई के सकल ऋण में लगभग 7 गुनी वृद्धि हुई जो वित्त वर्ष 2014 के 33,517 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 2,38,198 करोड़ रुपये हो गया। इसी अवधि के दौरान एमएफआई शाखा नेटवर्क 11,687 शाखाओं से बढ़कर 37,380 हो गया।

हालांकि पिछले दशक में सूक्ष्म वित्त क्षेत्र में  महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है, लेकिन इसकी निरंतर वृद्धि सक्षम अवसंरचनाओं को मजबूत करने, जवाबदेह ऋण प्रथाएं सुनिश्चित करने और चक्रीय उथल-पुथल को प्रबंधित करने के लिए संस्थागत सुदृढ़ता को मजबूत करने पर निर्भर करेगी।

वित्तीय समावेश- रूझान और संरचनात्मक संचालक

पिछले दशक में भारत ने वित्तीय समावेश के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। सरकार ने विभिन्न लक्षित कार्यक्रम पेश किए हैं। 2014 में शुरू की गई प्रधानमंत्री जन-धन योजना के तहत मार्च, 2025 तक 55.02 करोड़ बैंक खाते खोले गए हैं, जिनमें से 36.63 करोड़ खाते ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में खोले गए हैं। इससे बैंकिंग सुविधा से वंचित आबादी के लिए मूलभूत बचत और लेन-देन अवसंरचना की स्थापना हुई है। आर्थिक समीक्षा 2024-25 के अनुसार इन बैंक खातों को ध्यान में रखते हुए ऋण आधारित योजनाओं का विस्तार वंचित क्षेत्रों के लिए औपचारिक ऋण के रूप में हुआ है।

स्टैंड-अप इंडिया योजना ग्रीनफील्ड उद्यम स्थापित करने के लिए एससी, एसटी और महिला उद्यमियों को 10 लाख से लेकर 1 करोड़ रुपये का ऋण उपलब्ध कराती है। 2020 में लांच की गई पीएम स्ट्रीट वेंडर आत्मनिर्भर निधि (पीएम स्वनिधि) योजना स्ट्रीट वेंडर को गिरवीमुक्त ऋण उपलब्ध कराती है। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (पीएमएमवाई) का शुभारंभ अप्रैल 2015 में हुआ था, जो विनिर्माण, व्यापार, सेवा और सम्बद्ध कृषि गतिविधि के क्षेत्र में सूक्ष्म और लघु उद्यमों को ऋण की सुविधा देती  है।

इन कार्यक्रमों के सकारात्मक परिणाम मिले है। बैंक खातों की सुविधा वाले वयस्कों की संख्या 2011 के 35 प्रतिशत से दोगुनी होकर 2021 में 89 प्रतिशत हो गई है।

इन संरचनात्मक बदलावों के दो प्रमुख आधार है- भारत की डिजिटल अवसंरचना के माध्यम से नियामक नवाचार और सरकार के नेतृत्व में सूक्ष्म वित्त पहलें। इन सभी संचालकों ने साथ मिलकर देशभर में वित्तीय समावेश के पैमाने का विस्तार किया है। इसके अतिरिक्त यूपीआई ने वित्तीय समावेश को गति दी है और सफलता की गाथा बन गई है।

ये सभी प्रयास आरबीआई के वित्तीय समावेश (एफआई) सूचकांक में परिलक्षित होते है जो वित्तीय समावेश हासिल करने में देश की प्रगति को मापता है। संयुक्त एफआई सूचकांक मार्च, 2024 के 64.2 से बढ़कर मार्च, 2025 में 67 हो गया, सभी उप सूचकांकों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है।

दिवाला और दिवालियापन संहिता का प्रदर्शन

भारत में कॉरपोरेट जगत के संकटग्रस्त व्यवसायों के समाधान के लिए आईबीसी ने एक एकीकृत फ्रेमवर्क स्थापित किया है। पहले के विभिन्न कानूनों और दोहराव वाले क्षेत्राधिकारों की व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया है। पिछले 9 वर्षों में आईबीसी ने ऋण  व्यवस्था को बेहतर बनाने, बैंकिंग क्षेत्र के एनपीए को कम करने और दिवाला प्रकिया के परिणामों का बेहतर आकलन करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

समाधान प्रक्रिया के 1300 मामलों में ऋण प्रदात्ताओं को 3.99 लाख करोड़ रुपये प्राप्त हुए है। ऋण प्रदाताओं को समाधान व्यवसायों के उचित मूल्य का 94 प्रतिशत तक और परिसमापन से प्राप्त होने वाली राशि का 170 प्रतिशत तक प्राप्त किया है। यह आकड़ा बताता है कि परिसमापन की तुलना में समाधान से ऋण प्रदाताओं को बेहतर परिणाम प्राप्त होते है।

इन प्रणालीगत सुधारों को प्रतिबिंबित करते हुए एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग ने भारत की दिवाला व्यवस्था को 3 दिसंबर, 2025 को ग्रुप सी से ग्रुप बी में अपग्रेड कर दिया है। रेटिंग एजेंसी ने उल्लेख किया है कि आईबीसी पूर्व की 15-20 प्रतिशत की रिकवरी दर में सुधार हुआ और यह वर्तमान में लगभग 30 प्रतिशत हो गई है, जबकि समाधान प्रक्रिया की अवधि 6-8 वर्षों से घटकर लगभग दो साल रह गई है।

रिपोर्ट में ऋण प्रदाता के अधिकारों की न्यायिक सुदृढ़ता की भूमिका को भी रेखांकित किया गया है जिसने समाधान प्रक्रिया में आकलन करने और बेहतर अनुशासन में योगदान दिया है।

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एनबी/एमजी/केसी/हिन्दी इकाई - -06

 


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