पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय
डॉ. जितेंद्र सिंह ने लक्षद्वीप में “लो टेम्परेचर थर्मल डिसेलिनेशन (एलटीटीडी) संयंत्र” का निरीक्षण किया और जल सुरक्षा में समुद्री प्रौद्योगिकी की भूमिका पर जोर दिया
यह तकनीक समुद्र के तापमान में अंतर का उपयोग करके समुद्री जल को पीने के पानी में बदल देती है, जिससे लक्षद्वीप में पीने के पानी की कमी को दूर करने में मदद मिली
प्रविष्टि तिथि:
06 MAR 2026 7:58PM by PIB Delhi
केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज लक्षद्वीप के कवरत्ती में लो टेम्परेचर थर्मल डिसेलिनेशन (एलटीटीडी) संयंत्र का दौरा किया और द्वीपसमूह के कई द्वीपों को पीने का पानी उपलब्ध कराने वाली विलवणीकरण सुविधाओं की कार्यप्रणाली की समीक्षा की।
केंद्रीय मंत्री का दौरा लक्षद्वीप के उनके आधिकारिक दौरे का हिस्सा था। इस दौरान उन्होंने पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित की जा रही परियोजनाओं पर अधिकारियों और वैज्ञानिकों के साथ एक समीक्षा बैठक की। एलटीटीडी कार्यक्रम को मंत्रालय के तहत स्वायत्त संस्थान, राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईओटी) द्वारा कार्यान्वित किया गया है।
अधिकारियों ने बताया कि एलटीटीडी तकनीक पर आधारित डिसेलिनेशन संयंत्र अभी लक्षद्वीप के आठ द्वीपों पर प्रचालन में हैं, जिनमें कवरत्ती, मिनिकॉय, अगत्ती, अमिनी, कल्पेनी, कदमत, चेतलाट और किल्टन शामिल हैं। यह तकनीक लगभग 350 से 400 मीटर की गहराई से खींचे गए गर्म सतह के पानी और ठंडे गहरे समुद्र के पानी के बीच के तापमान के अंतर का उपयोग करके समुद्री जल को पीने के पानी में बदलती है।
निरीक्षण के दौरान, मंत्री महोदय को संयंत्रों की कार्यप्रणाली और द्वीप क्षेत्र में मीठे पानी की कमी को दूर करने में उनकी भूमिका के बारे में बताया गया। लक्षद्वीप को लंबे समय से सीमित भूजल संसाधनों, खारेपन और मौसमी बारिश पर बहुत ज़्यादा निर्भरता के कारण पीने के पानी के लिए चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।
वैज्ञानिकों ने बताया कि एलटीटीडी प्रणाली के तहत, गर्म समुद्री जल को कम प्रेशर में फ्लैश-इवैपोरेट किया जाता है और गहरे समुद्र के ठंडे समुद्री जल का उपयोग करके वाष्प को संघनित किया जाता है, जिससे बिना केमिकल एडिटिव्स या हाई-प्रेशर मेम्ब्रेन के इस्तेमाल के पीने लायक पानी बनता है। इस प्रक्रिया से गाढ़े नमकीन पानी के निकलने से भी बचा जा जाता है, जो फ्रैजल कोरल इकोसिस्टम पर असर डाल सकती है।
लक्षद्वीप में पहला एलटीटीडी संयंत्र 2005 में कवरत्ती में स्थापित किया गया। इसके प्रारंभिक के बाद, इसी तरह के संयंत्र अन्य द्वीपों में भी स्थापित किए गए।
अधिकारियों ने कहा कि विलवणीकरण (डिसेलिनेशन) सुविधाओं ने द्वीपों में पीने के पानी की बेहतर पहुंच में मदद की है। स्थानीय अधिकारियों ने जल जनित बीमारियों के मामलों में कमी और साल भर जल आपूर्ति में अधिक विश्वसनीयता की भी सूचना दी, जिससे वर्षा जल संचयन पर निर्भरता कम हुई है।
इन संयंत्रों का प्रचालन लक्षद्वीप प्रशासन के तहत प्रशिक्षित स्थानीय कर्मियों के सहयोग से किया जाती है। परियोजना में शामिल वैज्ञानिकों ने बताया कि चुनौतीपूर्ण समुद्र तल और मानसून की परिस्थितियों में गहरे समुद्र में पाइपलाइन और ऑपरेटिंग सिस्टम लगाने के लिए विशेष इंजीनियरिंग क्षमताओं की आवश्यकता होती है।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि लक्षद्वीप परियोजना से प्राप्त अनुभव से पानी की कमी का सामना कर रहे दूसरे द्वीपों और तटीय इलाकों में भी समुद्र पर आधारित इसी तरह की तकनीक के उपयोग के बारे में जानकारी मिल सकती है, क्योंकि भारत दीर्घकालिक जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए टिकाऊ तरीके तलाश रहे है।



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पीके/केसी/एसके
(रिलीज़ आईडी: 2236203)
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