विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय
azadi ka amrit mahotsav

संसद प्रश्न: उत्तर प्रदेश के औद्योगिक और नदी घाटी में भूजल प्रदूषण का वैज्ञानिक मूल्यांकन

प्रविष्टि तिथि: 11 MAR 2026 5:22PM by PIB Delhi

वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की एक घटक प्रयोगशाला सीएसआईआर-भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-आईआईटीआर) ने उत्तर प्रदेश के कई जिलों में भूजल गुणवत्ता विश्लेषण एवं मानचित्रण हेतु राज्य के भूजल विभाग के लिए तीन प्रायोजित अध्ययन संपन्न किए हैं।

घाघरा नदी घाटी (अप्रैल 2022): इसमें कुशीनगर, देवरिया, बलिया, महाराजगंज, मऊ और गोरखपुर शामिल हैं।

मध्य गंगा, रामगंगा और यमुना नदी घाटी (जुलाई 2021): इसमें फतेहपुर, कानपुर, प्रयागराज, बरेली, मुरादाबाद, आगरा, अलीगढ़, गाजियाबाद तथा अन्य कई जिले शामिल हैं।

हिंडन नदी घाटी (सितंबर 2020): इसमें सहारनपुर, शामली, मुजफ्फरनगर, मेरठ, भागवत, गाजियाबाद, आगरा और फिरोजाबाद शामिल हैं।

इसके अलावा, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा प्रायोजित एक परियोजना के तहत, सीएसआईआर-राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-एनईआरआई), नागपुर ने उत्तर प्रदेश के कई शहरों, जैसे मेरठ, अलीगढ़, बुलंदशहर, मुजफ्फरनगर, आगरा और मथुरा में अपशिष्ट जल उपचार संयंत्रों (ईटीपी) का मूल्यांकन किया है। यमुना और हिंडन नदियों के निकट औद्योगिक क्षेत्रों से लिए गए बोरवेल के पानी के नमूनों में भारी धातुओं की सांद्रता अनुमेय सीमा (बीआईएस 10500) के भीतर पाई गई।

जल शक्ति मंत्रालय के जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा पुनर्जीवन विभाग के अंतर्गत कार्यरत केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) अनुमोदित मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) के अनुसार संचालित भूजल गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रमों तथा वैज्ञानिक अध्ययनों के माध्यम से उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में क्षेत्रीय स्तर पर भूजल गुणवत्ता संबंधी आंकड़े एकत्रित और विश्लेषित करता है। सीजीडब्ल्यूबी द्वारा हाल ही में जारी वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट–2025 के अनुसार, उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड, आयरन, लवणता, यूरेनियम, मैंगनीज, सीसा तथा नाइट्रेट की मात्रा पेयजल के लिए निर्धारित सीमा से अधिक पाई गई है। इसका जिलावार विवरण अनुलग्नक–I में दिया गया है। वर्ष 2025 की संपूर्ण वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट

https://cgwb.gov.in/cgwbpnm/public/uploads/documents/ 1762854375262680475 file.pdf पर उपलब्ध है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड भूजल की उपलब्धता, दोहन और भूजल विकास के स्तर के अद्यतन अनुमान तैयार करने तथा पुनर्भरण एवं दोहन के रुझानों का विश्लेषण करने के लिए वार्षिक भूजल संसाधन आकलन (जीडब्ल्यूआरई) करता है।

उत्तर प्रदेश राज्य के लिए 2017 से 2025 तक एकत्रित आंकड़ों के आकलन से पता चलता है कि:

कुल वार्षिक भूजल पुनर्भरण 2017 में 69.92 अरब घन मीटर से बढ़कर 2025 में 73.39 अरब घन मीटर हो गया है, यानी इसमें 3.47 अरब घन मीटर की वृद्धि हुई है।

भूजल संग्रह का स्तर 2017 में 70.18% से बढ़कर 2025 में 70.00% हो गया है, यानी इसमें 0.18 प्रतिशत अंकों की कमी आई है।

जीडब्ल्यूआरई वर्गीकरण से पता चलता है कि सुरक्षित मूल्यांकन इकाइयों (<= 70%) की संख्या 2017 में 540 (65%) से बढ़कर 2025 में 563 (67.34%) हो गई है, जबकि अतिशोषण मूल्यांकन इकाइयों (>100%) की संख्या 2017 में 91 (11%) से घटकर 2025 में 54 (6.46%) हो गई है।

सीजीडब्ल्यूबी ने भूजल के कृत्रिम पुनर्भरण के लिए एक मास्टर प्लान- 2020 तैयार किया है, जिसमें उत्तर प्रदेश में लगभग 23,668 कृत्रिम पुनर्भरण और वर्षा जल संचयन संरचनाओं के निर्माण तथा छत पर वर्षा जल संचयन के लिए 20.57 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की परिकल्पना की गई है। इसके अलावा, सीजीडब्ल्यूबी ने उत्तर प्रदेश के लगभग 2.40 लाख वर्ग किलोमीटर के संपूर्ण मानचित्रण योग्य क्षेत्र के लिए राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण (एनएक्यूआईएम) परियोजना को पूरा कर लिया है। जलभृत मानचित्र और प्रबंधन योजनाएं कार्यान्वयन के लिए राज्य एजेंसियों के साथ साझा की गई हैं।

इसके अलावा, राष्ट्रीय जल नीति (2012) वर्षा जल संचयन, जल संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से नदियों तथा जल निकायों के वैज्ञानिक संरक्षण की वकालत करती है। यह जल निकायों एवं जल निकासी चैनलों पर अतिक्रमण या उनके मार्ग परिवर्तन को सख्ती से प्रतिबंधित करती है और जहां ऐसा अतिक्रमण हुआ है, वहां जहां भी संभव हो, उनके जीर्णोद्धार का आह्वान करती है। साथ ही, उत्तर प्रदेश भूजल प्रबंधन और विनियमन अधिनियम-2019 राज्य में भूजल दोहन को विनियमित करने के लिए लागू है।

उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में भूजल की गुणवत्ता में सुधार और प्रदूषकों के उपचार हेतु केंद्र सरकार द्वारा कई कदम उठाए गए हैं। इनमें सुरक्षित पेयजल सुनिश्चित करने और विभिन्न प्रदूषकों से भूजल के दूषित होने को कम करने के लिए निवारक, उपचार एवं प्रबंधन रणनीतियों का संयोजन शामिल है। उपरोक्त का संक्षिप्त विवरण परिशिष्ट – II में दिया गया है।

जल शक्ति मंत्रालय ने उत्तर प्रदेश में भूजल की वास्तविक समय निगरानी एवं बेहतर प्रबंधन के लिए भूजल निगरानी नेटवर्क को मजबूत और स्वचालित बनाने की पहल की है। इस उपाय के तहत, राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना (एनएचपी) के अंतर्गत मौजूदा पीजोमीटरों पर 172 डिजिटल जल स्तर रिकॉर्डर (डीडब्ल्यूएलएलआर) स्थापित किए गए हैं, जो हर 6 घंटे के अंतराल पर उच्च आवृत्ति वाले भूजल स्तर के आंकड़े उपलब्ध कराते हैं। विस्तारित एवं स्वचालित निगरानी नेटवर्क व्यापक व सघन कवरेज तथा लगभग वास्तविक समय के आंकड़े सुनिश्चित करेगा, जिससे भूजल संसाधन अनुमान की सटीकता में सुधार होगा और भूजल पुनर्भरण जैसे विशेष अध्ययनों में सहायता मिलेगी। इससे उत्तर प्रदेश राज्य में साक्ष्य-आधारित योजना और स्थानीय स्तर पर भूजल प्रबंधन में मदद मिलेगी।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज लोकसभा में लिखित उत्तर में यह जानकारी दी।

परिशिष्ट-I

उत्तर प्रदेश राज्य के लिए भूजल गुणवत्ता की स्थिति (वार्षिक भूजल गुणवत्ता वर्षपुस्तिका-2025 के अनुसार)

 

मानदण्ड

विश्लेषण किए गए नमूनों की संख्या

अनुमेय सीमा से अधिक नमूनों की संख्या

अनुमेय सीमा से अधिक नमूनों का प्रतिशत

आंशिक रूप से प्रभावित जिलों की संख्या

आंशिक रूप से प्रभावित जिलों के नाम

विद्युत चालकता (ईसी)/लवणता

(25°C पर ईसी> 3000 µS/cm)

1333

31

2.33

11

आगरा, अलीगढ, अमेठी, इटावा, फिरोजाबाद, जी.बी. नगर, ग़ाज़ियाबाद, ग़ाज़ीपुर, हाथरस, मैनपुरी, मथुरा

फ्लोराइड (एफ-)

(एफ > 1.5 मिलीग्राम/लीटर)

1333

54

4.05

24

आगरा, अलीगढ, औरैया, आज़मगढ़, फर्रुखाबाद, फ़तेहपुर, फ़िरोज़ाबाद, जी.बी. नगर, ग़ाज़ीपुर, झाँसी, कन्नौज, कानपुर देहात, कानपुर नगर, कौशांबी, लखनऊ, महोबा, मैनपुरी, मथुरा, मेरठ, प्रतापगढ़, प्रयागराज, रायबरेली, सोनभद्र, उन्नाव

नाइट्रेट (एनओ32-)

(नाइट्रेट > 45 मिग्रा/लीटर)

1333

107

8.03

48

आगरा,अलीगढ़,अमेठी,अमरोहा,औरैया,बागपत,बलरामपुर,बांदा,बिजनौर,बदायूं,चित्रकूट,एटा,इटावा,फतेहपुर,फिरोजाबाद,जी.बी. नगर, गाजियाबाद, गाज़ीपुर, गोरखपुर, हमीरपुर, हापुड, हाथरस, जालौन, जौनपुर, झाँसी, कानपुर देहात, कानपुर नगर, कासगंज, कौशांबी, ललितपुर, लखनऊ, महोबा, मैनपुरी, मथुरा, मेरठ, मिर्ज़ापुर, मोरादाबाद, मुज़फ्फरनगर, पीलीभीत, प्रयागराज, रामपुर, संभल, संत रविदास नगर, शामली, सिद्धार्थ नगर, सोनभद्र, उन्नाव, वाराणसी

आर्सेनिक (एएस)

(एएस > 10 पीपीबी)

612

23

3.76

14

बहराईच ,बलरामपुर ,बलिया,बाराबंकी,बरेली,बिजनौर,फर्रुखाबाद,फतेहपुर,लखीमपुर खीरी,मुरादाबाद,पीलीभीत,रामपुर,सम्भल,शाहजहांपुर

आयरन (एफई)

(एफई > 1.0 मिलीग्राम/लीटर)

601

144

23.96

46

अमेठी,अमरोहा,औरैया,अयोध्या,बहराइच,बलरामपुर,बलिया,बाराबंकी,बरेली,बिजनौर,बदायूं,चंदौली,चित्रकूट,एटा,फर्रुखाबाद,फतेहपुर,गोंडा,हमीरपुर,हरदोई,जालौन,झांसी,कन्नौज,कानपुर नगर,कुशीनगर,लखीमपुर खीरी, ललितपुर, महोबा, महराजगंज,मऊनाथ भंजन,मेरठ,मिर्जापुर,मुरादाबाद,मुजफ्फरनगर,पीलीभीत,प्रतापगढ़,रायबरेली,रामपुर,सहारनपुर,संत कबीर नगर,श्रावस्ती,सिद्धार्थ। नगर,सीतापुर,सोनभद्र,उन्नाव,वाराणसी

यूरेनियम

(यू > 30 पीपीबी)

612

29

4.74

22

अमेठी,अमरोहा,औरैया,अयोध्या,बहराइच,बलरामपुर,बलिया,बाराबंकी,बरेली,बिजनौर,बदायूं,चंदौली,चित्रकूट,एटा,फर्रुखाबाद,फतेहपुर,गोंडा,हमीरपुर,हरदोई,जालौन,झांसी,कन्नौज,कानपुरनगर,कुशीनगर,लखीमपुर खीरी, ललितपुर, महोबा, महराजगंज,मऊनाथ भंजन,मेरठ,मिर्जापुर,मुरादाबाद,मुजफ्फरनगर,पीलीभीत,प्रतापगढ़,रायबरेली,रामपुर,सहारनपुर,संत कबीर नगर,श्रावस्ती,सिद्धार्थ। नगर,सीतापुर,सोनभद्र,उन्नाव,वाराणसी

सीसा (पीबी > 0.01 मिलीग्राम/लीटर)

581

2

0.34

2

बदायूं, चंदौली

मैंगनीज

(एमएन > 0.3 मिलीग्राम/लीटर)

610

49

8.03

26

अमरोहा, औरैया, बरेली, बिजनोर, बदायूँ, चित्रकूट, एटा, फ़तेहपुर, ग़ाज़ियाबाद, ग़ाज़ीपुर, गोरखपुर, हरदोई, झाँसी, कुशी नगर, लखीमपुर खीरी, ललितपुर, महोबा, मथुरा, मेरठ, मिर्ज़ापुर, मोरादाबाद, पीलीभीत, प्रतापगढ़, सोनभद्र, उन्नाव, वाराणसी

परिशिष्ट - II

केंद्र सरकार द्वारा देश में भूजल की गुणवत्ता में सुधार/प्रदूषकों के उपचार हेतु उठाए गए कदम, जिनमें उत्तर प्रदेश भी शामिल है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) के राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण कार्यक्रम (एनएक्यूआईएम) के तहत, भूजल की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया गया है, जिसमें भूजल में आर्सेनिक जैसे विषैले पदार्थों से होने वाले प्रदूषण को भी शामिल किया गया है। सीजीडब्ल्यूबी ने एनएक्यूआईएम अध्ययन के तहत उत्तर प्रदेश के गंगा के बाढ़ के मैदानों में सीमेंट-सीलिंग तकनीक का उपयोग करके सफलतापूर्वक आर्सेनिक-मुक्त कुओं का निर्माण किया है। उत्तर प्रदेश में एनएक्यूआईएम के तहत आर्सेनिक-मुक्त जलभृतों का दोहन करने वाले कुल 294 अन्वेषणात्मक कुओं का निर्माण किया गया है।

सफल कुओं को उनके उचित उपयोग के लिए राज्य सरकारों को सौंप दिया गया है। इसके अलावा, सीजीडब्ल्यूबी गंगा के बाढ़ के मैदानों में प्रदूषण मुक्त जलभृतों का दोहन करने के लिए सीमेंट सीलिंग तकनीक साझा करके राज्यों को तकनीकी सहायता प्रदान कर रहा है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) उत्तर प्रदेश सहित प्रदूषित और अप्रदूषित क्षेत्रों की पहचान करने के लिए समय-समय पर भूजल गुणवत्ता निगरानी करता है। निगरानी की दक्षता बढ़ाने के लिए, भूजल गुणवत्ता निगरानी के लिए एक नई मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) शुरू की गई है, जिसमें संवेदनशील क्षेत्रों में अधिक बार और सघन नमूनाकरण को शामिल किया गया है।

सीजीडब्ल्यूबी के पास उपलब्ध भूजल गुणवत्ता संबंधी डेटा रिपोर्टों के साथ-साथ वेबसाइट (http://www.cgwb.gov.in) के माध्यम से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाता है, ताकि विभिन्न हितधारक इसका उपयोग कर सकें। आवश्यक सुधारात्मक उपाय करने के लिए यह डेटा राज्य सरकारों के साथ भी साझा किया जाता है।

भूजल गुणवत्ता संबंधी जानकारी के प्रसार को और अधिक गति देने के लिए, सीजीडब्ल्यूबी ने भूजल गुणवत्ता वार्षिक पुस्तिका और अर्धवार्षिक भूजल गुणवत्ता बुलेटिन जारी करने की प्रथा शुरू की है, ताकि प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल कार्रवाई की जा सके।

17 जून 2024 से रासायनिक विश्लेषण डेटा के पाक्षिक परिणाम भूजल गुणवत्ता अलर्ट के रूप में राज्य सरकारों के साथ साझा किए जाते हैं।

चूंकि कृत्रिम पुनर्भरण गतिविधियों को अपनाकर भी भूजल गुणवत्ता में कुछ हद तक सुधार किया जा सकता है, इसलिए जल शक्ति मंत्रालय और अन्य केंद्रीय मंत्रालय इस दिशा में कई कार्यक्रम लागू कर रहे हैं, जिनसे भूमिगत जल स्तर में सुधार होने और तनुकरण प्रभाव के माध्यम से भूजल की गुणवत्ता में सुधार होने की उम्मीद है।

सुरक्षित पेयजल सुनिश्चित करने और विभिन्न प्रदूषकों द्वारा भूजल प्रदूषण को कम करने के लिए निवारक, उपचार और प्रबंधन रणनीतियां निम्नानुसार हैं:

फ्लोराइड से प्रभावित क्षेत्रों में, उचित स्रोत चयन, उच्च और निम्न फ्लोराइड वाले पानी के मिश्रण, समुदाय आधारित उपचार संयंत्रों की स्थापना और जन जागरूकता पहलों के माध्यम से जल की गुणवत्ता की रक्षा की जा सकती है।

नाइट्रेट प्रदूषण के निवारण हेतु, उर्वरक प्रबंधन पर विशेष बल दिया जाता है, जिसमें नियमित मृदा परीक्षण, उर्वरक प्रयोग का उचित समय और जैविक उर्वरकों का उपयोग शामिल है। इसके अतिरिक्त, नाइट्रोजन को भूजल में रिसने से रोकने के लिए सेप्टिक सिस्टम का रखरखाव और पशु अपशिष्ट का उचित प्रबंधन जैसे उपाय भी किए जाते हैं।

आर्सेनिक प्रदूषण को कम करने के लिए अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों उपाय शामिल हैं। अल्पकालिक रणनीतियों में घरेलू और सामुदायिक जल उपचार इकाइयों की स्थापना, दूषित कुओं पर प्रतिबंध और सतही तथा भूजल का संयुक्त उपयोग शामिल है। दीर्घकालिक उपायों में वैकल्पिक सुरक्षित जलभंडारों का विकास, वर्षा जल संचयन और सीलिंग तकनीकों का उपयोग करके गहरे कुओं का निर्माण शामिल है।

यूरेनियम प्रदूषण के मामले में, सोखना, जमाव, निष्कर्षण, रिवर्स ऑस्मोसिस और वाष्पीकरण सहित कई उपचार तकनीकें उपलब्ध हैं। उपयुक्त विधि का चयन लागत, दक्षता और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है, और सर्वोत्तम परिणामों के लिए संयुक्त या आवश्यकता-आधारित दृष्टिकोणों की अनुशंसा की जाती है।

लोहा और मैंगनीज के लिए, उपचार विकल्पों में वातन, निस्पंदन, लोहा या मैंगनीज निष्कासन संयंत्रों का उपयोग और रासायनिक ऑक्सीकरण शामिल हैं। रिवर्स ऑस्मोसिस और विशेष मीडिया फिल्टर छोटे पैमाने या घरेलू उपयोग के लिए उपयुक्त हैं।

सीसा प्रदूषण से निपटने के लिए, प्रमुख उपायों में फ़िल्टरेशन सिस्टम (सक्रिय कार्बन, आरओ या आयन एक्सचेंज) की स्थापना, औद्योगिक अपशिष्टों का सख्त विनियमन, सार्वजनिक भवनों में सीसा परीक्षण, जलभूरासायनिक मानचित्रण और सुरक्षित जल उपयोग प्रथाओं पर सार्वजनिक परामर्श शामिल हैं। कुल मिलाकर, प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षित और टिकाऊ भूजल गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए स्रोत संरक्षण, उपचार प्रौद्योगिकियों, नियामक प्रवर्तन और सामुदायिक भागीदारी का एकीकृत कार्यान्वयन महत्वपूर्ण है।

***

पीके/केसी/एनके/डीए


(रिलीज़ आईडी: 2238611) आगंतुक पटल : 29
इस विज्ञप्ति को इन भाषाओं में पढ़ें: English