विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय
संसद का प्रश्न: सीआरआईएसपीआर और जीन संपादन में आत्मनिर्भरता
प्रविष्टि तिथि:
19 MAR 2026 2:22PM by PIB Delhi
देश में सीआरआईएसपीआर-आधारित उपचारों की नियामक स्वीकृति, सुरक्षा और नैतिक कार्यव्यवहार सुनिश्चित करने के लिए, नियामक निकायों सीडीएससीओ, आईसीएमआर और डीबीटी ने "जीन थेरेपी उत्पाद विकास और नैदानिक परीक्षणों के लिए राष्ट्रीय दिशानिर्देश, 2019" जारी किए हैं। ये हितधारकों को देश में जीन चिकित्सीय उत्पादों (जीटीपी) के अनुसंधान और विकास के लिए नियामक आवश्यकताओं को समझने और उनका अनुपालन करने के लिए मार्गदर्शन करते हैं।
विभाग, विभिन्न चिकित्सा सम्बंधी कार्यक्रमों के माध्यम से, अगली पीढ़ी की कोशिका और जीन थेरेपी पर विशेष बल देते हुए, सटीक चिकित्सा इकोसिस्टम को लगातार आगे बढ़ा रहा है। इसमें जीन संवर्धन, जीन संपादन, जीन साइलेंसिंग और अन्य कोशिका-आधारित दृष्टिकोणों के माध्यम से कोशिकाओं या आनुवंशिक सामग्री को संशोधित करने के तरीके शामिल हैं।
हीमोफिलिया ए के जीन उपचार के लिए प्रथम चरण का नैदानिक परीक्षण विभाग के सहयोग से किया गया था और इसमें महत्वपूर्ण नैदानिक परिणाम सामने आए हैं। इसके तहत रक्तस्राव की घटनाओं को दीर्घकालिक रूप से कम करने के लिए संभावित उपचार प्रदान करने वाला फैक्टर VIII का स्थिर उत्पादन देखा गया है। इस अग्रणी अध्ययन के परिणाम प्रतिष्ठित न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित हुए हैं। मनुष्यों पर आगे के अध्ययन के प्रयास जारी हैं।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 24 अगस्त, 2024 को बीआईओ3 (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव प्रौद्योगिकी) नीति का अनुमोदन किया था। इसका उद्देश्य देश को वैश्विक जैव विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करना, सतत विकास को बढ़ावा देना और आयात पर निर्भरता को कम करना है। जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) द्वारा कार्यान्वित यह नीति रसायन, एंजाइम, कृषि और चिकित्सा उत्पादों के लिए उच्च-प्रदर्शन जैव विनिर्माण पर केंद्रित है।
डीबीटी और बीआईआरएसी द्वारा संयुक्त रूप से कार्यान्वित की जा रही यह नीति अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे, सार्वजनिक-निजी भागीदारी और संस्थागत समर्थन के माध्यम से जैव प्रौद्योगिकी स्टार्टअप और एमएसएमई को अनुसंधान एवं विकास तथा पायलट-स्तरीय विनिर्माण सहायता प्रदान कर रही है। इससे उद्योग और अनुसंधान संस्थानों के बीच तालमेल को बढ़ावा मिल रहा है।
बीआईओई3 नीति के परिशुद्ध जैवचिकित्सीय क्षेत्र के अंतर्गत, अकादमिक परियोजनाओं को समर्थन के लिए अनुशंसित किया गया है, इनमें हीमोफिलिया ए जैसी रक्त सम्बंधी बीमारियों के लिए जीन थेरेपी का विकास; थैलेसीमिया के लिए जीन एडिटिंग थेरेपी; हीमोफिलिया बी के लिए एमआरएनए आधारित प्रोटीन प्रतिस्थापन थेरेपी का प्रूफ-ऑफ-कॉन्सेप्ट शामिल है। सीएआर-टी सेल थेरेपी के क्षेत्र में, अकादमिक परियोजनाएं मल्टीपल मायलोमा में द्वि-विशिष्ट सीएआर के विकास और मानवीकृत माउस मॉडल में वायरल वेक्टर डिलीवरी के माध्यम से इन सीटू सीएआर-टी सेल रीप्रोग्रामिंग के प्रूफ-ऑफ-कॉन्सेप्ट प्रदर्शन पर केंद्रित हैं।
डीबीटी , प्रोपियोनिक एकेडेमिया (एक दुर्लभ, वंशानुगत चयापचय विकार) के लिए एमआरएनए-आधारित इन विवो जीन-संपादन मंच के स्वदेशी विकास के लिए बैंगलोर स्थित टाटा इंस्टीट्यूट फॉर जेनेटिक्स एंड सोसाइटी में एक अनुसंधान अनुदान में भी सहयोग कर रहा है।
बायोई3 नीति के तहत, मूलांकुर बायोएनबलर्स योजना ने जैव-विनिर्माण केंद्रों के निर्माण को सुगम बनाया है; नैदानिक-श्रेणी की कोशिका और जीन थेरेपी (सीजीटी) के बड़े पैमाने पर, अनुपालन योग्य और लागत प्रभावी उत्पादन के लिए अत्याधुनिक बुनियादी ढांचा प्रदान करना, और प्रयोगशाला नवाचारों को चिकित्सकीय और व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य थेरेपी में बदलने में सहायता करना।
सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम डीबीटी, बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल (बीआईएआरसी) संरचित वित्तपोषण, इनक्यूबेशन सहायता और मेंटरिंग के माध्यम से बायोटेक्नोलॉजी के विभिन्न क्षेत्रों में स्टार्टअप्स को सहयोग प्रदान करता है। इसका उद्देश्य जीन-एडिटिंग प्रौद्योगिकियों सहित किफायती और सुलभ बायोटेक्नोलॉजी समाधान उपलब्ध करवाने के लिए प्रौद्योगिकी विकास, विस्तार और व्यावसायीकरण को सुगम बनाना है। बीआईएआरसी द्वारा शुरू किए गए कुछ प्रमुख कार्यक्रम इस प्रकार हैं:
- बायोटेक्नोलॉजी इग्निशन ग्रांट (बीआईजी),
- सतत उद्यमिता और उद्यम विकास (एसईईडी) कोष,
- उद्यमी संचालित किफायती उत्पाद (एलईएपी) फंड का शुभारंभ, और
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी)
बीआईआरएसी के माध्यम से दो एंटी-सीडी19 निर्देशित ऑटोलॉगस काइमेरिक एंटीजन रिसेप्टर टी (सीएआर-टी) सेल थेरेपी उत्पादों (कार्टेमी और नेक्ससीएआर19) के स्वदेशी विकास और नैदानिक परीक्षण के लिए सहायता प्रदान की गई। ये उत्पाद वर्तमान में व्यावसायिक रूप से उपलब्ध हैं और विशिष्ट रक्त कैंसर के उपचार में उपयोग में हैं।
आईसीएमआर शिक्षा जगत, स्टार्टअप और उद्योग जगत की कई शोध परियोजनाओं को किफायती जीन थेरेपी उपकरणों के स्वदेशी विकास के लिए समर्थन दे रहा है। इसके साथ ही यह विभिन्न अनुदान पहलों के माध्यम से व्यापक पहुंच सुनिश्चित कर रहा है। इनमें अन्वेषक द्वारा शुरू की गई 'विश्व में पहली चुनौती' अनुदान, लघु अनुदान, मध्यवर्ती अनुदान, उन्नत अनुसंधान केंद्र और आईसीएमआर द्वारा शुरू की गई राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान प्राथमिकता परियोजनाएं शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त, आईसीएमआर की पहलें जैसे "बायोमेडिकल इनोवेशन पेटेंट मित्रा" पेटेंट दाखिल करने और उद्योग को प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में सहायता प्रदान करती हैं, "मेडटेक मित्रा" नियमों के अनुरूप विकास को सक्षम बनाती है, और 85 परीक्षण स्थलों वाला "इंडियन क्लिनिकल ट्रायल एंड एजुकेशन नेटवर्क (आईएनटीईएनटी)" नियमों के अनुरूप नैदानिक परीक्षणों में सहयोग करती हैं। ये प्रयास स्वदेशी जीन-संपादन उत्पादों के बड़े पैमाने पर उत्पादन और व्यावसायीकरण में सहयोग कर रहे हैं, इससे उनकी सामर्थ्य और व्यापक पहुंच सुनिश्चित हो रही है।
सीएसआईआर-इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (सीएसआईआर-आईजीआईबी) जीन थेरेपी के व्यावसायीकरण की दिशा में सीरम इंस्टीट्यूट, पुणे के साथ मिलकर काम कर रहा है। सीएसआईआर-आईजीआईबी में विकसित की गई इस नई जीन थेरेपी के नैदानिक अनुवाद और विस्तार के लिए नवंबर 2025 में एक प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे।
ये कार्यक्रम उन्नत जीन-संपादन उपचार किफायती और व्यापक रूप से सुलभ बनाने के लिए स्वदेशी जीन-संपादन तकनीकों की एक स्थायी श्रृंखला बनाने और यह सुनिश्चित करने के लिए अनुवाद सम्बंधी अनुसंधान, अवसंरचना विकास और उद्योग-अकादमिक सहयोग को मजबूत करते हैं।
देश में आनुवंशिक अभियांत्रिकी सीआरआईएसपीआर आधारित चिकित्सा पद्धतियों (जो जीन संपादन का एक प्रकार है) को नियंत्रित करने वाले नियामक ढांचे कई प्राधिकरणों के समन्वित प्रयास से संचालित होते हैं। इन ढांचों में कई दिशानिर्देश और नियम शामिल हैं जो इन चिकित्सा पद्धतियों के सुरक्षित और नैतिक विकास को सुनिश्चित करते हैं।
खतरनाक सूक्ष्मजीवों/आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों या कोशिकाओं के निर्माण, उपयोग/आयात/निर्यात और भंडारण के लिए नियम, 1989 ("नियम, 1989") के तहत जैव सुरक्षा ढांचा स्थापित किया गया है, इसे पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (ईपीए) के तहत अधिसूचित किया गया है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफ एंड सीसी) के पास ईपीए प्रशासन की जिम्मेदारी है। सीआरआईएसपीआर-आधारित उपचारों का विकास सख्त नियंत्रित प्रयोगशाला स्थितियों के तहत किया जाता है। इस चरण के दौरान, संस्थागत जैव सुरक्षा समितियों (आईबीएससी) और आनुवंशिक हेरफेर समीक्षा समिति (आरसीजीएम) द्वारा नियामक निगरानी की जाती है।
जैवसुरक्षा ढांचे के अंतर्गत, इस प्रकार की चिकित्सा पद्धतियों की नियामक निगरानी "पुनर्संयोजित डीएनए अनुसंधान और जैवनियंत्रण के लिए विनियम और दिशानिर्देश, 2017" और "संस्थागत जैवसुरक्षा समितियों (आईबीएससी) के लिए हैंडबुक, 2020" से निर्देशित होती है।
जीन-संपादन पर आधारित स्वास्थ्य देखभाल प्रौद्योगिकियां (इनमें सीआरआईएसपीआर आधारित उपचार भी शामिल हैं) औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम, 1940 के तहत नई औषधि एवं नैदानिक परीक्षण (एनडीसीटी) नियम, 2019 के अंतर्गत केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) की कड़ी निगरानी में हैं। इसके अतिरिक्त, ये नैतिक दिशा-निर्देशों और नियामक मानकों के एक ढांचे द्वारा शासित हैं। यह मुख्य रूप से संस्थागत नैतिकता समितियों (आईईसी) के माध्यम से मानव अनुसंधान प्रतिभागियों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। ये समितियां मानव प्रतिभागियों से सम्बंधित जैव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अनुसंधान के लिए आईसीएमआर के राष्ट्रीय नैतिक दिशा-निर्देश (2017) और नई औषधि एवं नैदानिक परीक्षण नियम (2019) के अंतर्गत कार्य करती हैं।
इसी प्रकार, आईसीएमआर, सीडीएससीओ और डीबीटी द्वारा जारी जीन थेरेपी उत्पाद विकास और नैदानिक परीक्षणों के लिए राष्ट्रीय दिशानिर्देश (2019) जीन थेरेपी उत्पादों के सुरक्षित, नैतिक विकास और परीक्षण के लिए एक ढांचा प्रदान करते हैं।
सफल नैदानिक परीक्षणों के बाद, गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावकारिता पर एक व्यापक डोजियर अंतिम विपणन अनुमोदन के लिए सीडीएससीओ को प्रस्तुत किया जाता है।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज राज्यसभा में लिखित उत्तर में यह जानकारी दी।
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(रिलीज़ आईडी: 2242574)
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