जल शक्ति मंत्रालय
जल सुरक्षा के लिए बजटीय प्रावधान
प्रविष्टि तिथि:
23 MAR 2026 4:34PM by PIB Delhi
देश के प्रत्येक ग्रामीण परिवार को सुरक्षित पेयजल की सुनिश्चित उपलब्धता प्रदान करने के लिए, अगस्त 2019 से सरकार राज्यों के साथ साझेदारी में जल जीवन मिशन (जेजेएम) - हर घर जल लागू कर रही है। यह पहल नल के जल कनेक्शन के माध्यम से निर्धारित गुणवत्ता का पर्याप्त पानी नियमित और दीर्घकालिक आधार पर उपलब्ध कराती है।
मिशन की शुरुआत में केवल 3.23 करोड़ (16.7 प्रतिशत) ग्रामीण परिवारों के पास नल जल कनेक्शन था। राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों द्वारा 03.03.2026 तक दी गई जानकारी के अनुसार, अब तक, जल जीवन मिशन (जेजेएम) – हर घर जल के तहत 12.58 करोड़ से अधिक अतिरिक्त ग्रामीण परिवारों को नल जल कनेक्शन प्रदान किया जा चुका है। इस प्रकार, 03.03.2026 तक देश के लगभग 19.36 करोड़ ग्रामीण परिवारों में से लगभग 15.82 करोड़ (81.71 प्रतिशत) परिवारों के घरों में नल जल आपूर्ति उपलब्ध है।
जेजेएम के विस्तारित चरण में “जन भागीदारी” के माध्यम से ग्रामीण पाइप्ड जल आपूर्ति योजनाओं के बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता और संचालन एवं रखरखाव (ओऔरएम) पर ध्यान केन्द्रित किया जाएगा। स्थिरता और नागरिक-केन्द्रित जल सेवा सुनिश्चित करने के लिए राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों के साथ अलग-अलग समझौता ज्ञापन (एमओयू) किए जा रहे हैं। जेजेएम के कार्यान्वयन के लिए वर्ष 2026-27 के बजट अनुमान (बीई) में 67,670 करोड़ रुपये की राशि प्रस्तावित की गई है।
ग्रामीण क्षेत्रों में मिशन के तहत प्रदान किए गए नल जल कनेक्शनों की राज्य/केन्द्र शासित प्रदेश, जिला और गांव-वार स्थिति सार्वजनिक रुप से उपलब्ध है और जेजेएम डैशबोर्ड पर देखी जा सकती है :
https://ejalshakti.gov.in/jjmreport/JJMIndia.aspx
पेयजल एक राज्य विषय होने के कारण, जल जीवन मिशन - हर घर जल के तहत पेयजल आपूर्ति योजनाओं की योजना बनाना, अनुमोदन, क्रियान्वयन, संचालन एवं रखरखाव की जिम्मेदारी राज्य/केन्द्र शासित प्रदेश सरकारों की होती है। सरकार तकनीकी और वित्तीय सहायता प्रदान करके राज्य/केन्द्र शासित प्रदेश सरकारों के प्रयासों को पूरक करती है।
जेजेएम ग्रामीण परिवारों के कवरेज के लिए एक सार्वभौमिक दृष्टिकोण अपनाता है। वर्ष 2019 से, कठिन भौगोलिक क्षेत्रों को प्राथमिकता देने के लिए फंड आवंटन में 30 प्रतिशत वेटेज दिया गया है, जिसमें मरुस्थलीय विकास कार्यक्रम (डीडीपी) और सूखा-प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम (डीपीएपी) जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
सूखा-प्रवण और जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों अथवा कम वर्षा या विश्वसनीय भूजल स्रोतों की कमी वाले क्षेत्रों में नल जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए लंबी दूरी से थोक जल स्थानांतरण और क्षेत्रीय जल आपूर्ति योजनाओं की योजना एवं क्रियान्वयन के लिए भी प्रावधान किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, जल स्रोतों के पुनर्भरण (रिचार्ज) के लिए भी प्रावधान किए गए हैं, जैसे—समर्पित बोरवेल रिचार्ज संरचनाएं, वर्षा जल संचयन, मौजूदा जल निकायों का पुनर्जीवन आदि। यह कार्य अन्य योजनाओं के साथ तालमेल से किया जा रहा है, जैसे इंटीग्रेटेड वाटरशेड मैनेजमेंट प्रोग्राम (आईडब्ल्यूएमपी), 15वें वित्त आयोग के तहत आरएलबी/पीआरआई को दिए गए बंधित अनुदान, राज्य योजनाएं, सीएसआर फंड आदि।
केन्द्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) द्वारा भूजल प्रबंधन और नियमन (जीडब्ल्यूएमएंडआर) योजना के अंतर्गत भूजल की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए एक व्यापक और वैज्ञानिक रणनीति अपनाई गई है। इस योजना में व्यवस्थित निगरानी, वैज्ञानिक आकलन, भूजल दोहन का नियमन तथा उपयुक्त रिचार्ज और संरक्षण उपायों के कार्यान्वयन पर जोर दिया जाता है, ताकि भूजल स्तर में गिरावट को रोका जा सके, रिचार्ज बढ़ाया जा सके, जल उपयोग दक्षता में सुधार हो और देशभर में भूजल संसाधनों की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित की जा सके। इस योजना के अंतर्गत निधियां इन गतिविधियों के क्रियान्वयन के लिए सीजीडब्ल्यूबी के फील्ड कार्यालयों को आवंटित की जाती हैं।
भूजल की उपलब्धता का आकलन करने के लिए, वर्ष 2022 से केन्द्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) और राज्य सरकारों द्वारा संयुक्त रूप से देश के गतिशील भूजल संसाधनों का हर वर्ष मूल्यांकन किया जा रहा है। वर्ष 2025 के आकलन के अनुसार, कुल वार्षिक भूजल रिचार्ज 448.52 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) है और वार्षिक दोहन योग्य भूजल संसाधन 407.75 बीसीएम है। वर्ष 2025 के लिए देश में कुल वार्षिक भूजल दोहन 247.22 बीसीएम अनुमानित किया गया है। भूजल दोहन का स्तर, जो कि सभी उपयोगों (सिंचाई, औद्योगिक एवं घरेलू) के लिए वार्षिक भूजल दोहन का वार्षिक दोहन योग्य भूजल संसाधन के अनुपात को दर्शाता है, पूरे देश के लिए 60.63 प्रतिशत है।
आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय ने बताया है कि सरकार विभिन्न योजनाओं/मिशनों के माध्यम से राज्यों को वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करती है, जैसे अटल मिशन फॉर रीजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (अमृत) और अमृत 2.0. अटल मिशन फॉर रीजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (अमृत) को 25 जून 2015 को केन्द्र सरकार द्वारा देश के सभी राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों के 500 शहरों (485 शहर, जिनमें 15 विलयित शहर शामिल हैं) में शुरू किया गया था। इस मिशन का कुल बजट 1,00,000 करोड़ रुपये था, जिसमें 36,036 करोड़ रुपये की केन्द्रीय सहायता शामिल थी, जिसका उद्देश्य शहरों में बुनियादी ढांचे की कमी से जुड़ी चुनौतियों का समाधान करना था। मिशन के प्रमुख फोकस क्षेत्र जल आपूर्ति, सीवरेज एवं सेप्टेज प्रबंधन, वर्षा जल निकासी, हरित क्षेत्र एवं पार्क, तथा गैर-मोटर चालित शहरी परिवहन थे। जल आपूर्ति क्षेत्र में राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों ने 43,378 करोड़ रुपये की लागत से 1,403 परियोजनाएं शुरू की हैं। अमृत 2.0 योजना वर्ष 2021 में सभी शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी)/शहरों में शुरू की गई, जिसका उद्देश्य शहरों को “आत्मनिर्भर” और “जल सुरक्षित” बनाना है। अमृत 2.0 के प्रमुख लक्ष्यों में 500 अमृत शहरों में सीवरेज एवं सेप्टेज प्रबंधन का सार्वभौमिक कवरेज सुनिश्चित करना शामिल है। जल निकायों का पुनर्जीवन तथा हरित क्षेत्रों और पार्कों का विकास भी इस मिशन के अन्य घटक हैं। अमृत 2.0 के लिए कुल अनुमानित बजट 2,77,000 करोड़ रुपये है, जिसमें 76,760 करोड़ रुपये का केन्द्रीय हिस्सा शामिल है। इसके अंतर्गत राज्य जल कार्य योजना (एसडब्ल्यूएपी) को मंजूरी दी गई है, जिनमें 1,19,670.51 करोड़ रुपये की लागत वाली 3,531 जल आपूर्ति परियोजनाएं, 6,083.32 करोड़ रुपये की 2,991 जल निकाय पुनर्जीवन परियोजनाएं और 1,103.71 करोड़ रुपये की 1,665 पार्क परियोजनाएं शामिल हैं। इनका उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में पेयजल प्रणालियों की दीर्घकालिक स्थिरता, भूजल स्तर में गिरावट की समस्या और जल स्रोतों की स्थिरता सुनिश्चित करना है।
अमृत 2.0 के माध्यम से तथा राज्यों के साथ तालमेल कर, देश के शहरी क्षेत्रों में अब तक 246 लाख जल नल कनेक्शन प्रदान किए गए हैं, लगभग 93,457 किमी जल नेटवर्क बिछाया/प्रतिस्थापित किया गया है और कुल 5,178 एमएलडी जल शोधन क्षमता का सृजन किया गया है। इसके अतिरिक्त, अमृत 2.0 के तहत सभी राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों में स्वीकृत परियोजनाओं में 11,395 एमएलडी जल शोधन संयंत्र क्षमता की योजना बनाई गई है।
इसके अलावा, जेजेएम के अंतर्गत, वर्तमान दिशानिर्देशों के अनुसार, पाइपलाइन वाली जल आपूर्ति योजनाओं के माध्यम से आपूर्ति किए जाने वाले जल की गुणवत्ता के लिए भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस:10500) के मानकों को मानक के रूप में अपनाया गया है।
संचालन दिशानिर्देशों के अनुसार, राज्य/केन्द्र शासित प्रदेश जेजेएम के तहत अपने वार्षिक निधि आवंटन का अधिकतम 2 प्रतिशत जल गुणवत्ता निगरानी एवं सर्विलांस (डब्ल्यूक्यूएमएंडएस) गतिविधियों के लिए उपयोग कर सकते हैं। इसमें, अन्य बातों के साथ-साथ, जल गुणवत्ता परीक्षण प्रयोगशालाओं की स्थापना एवं सुदृढ़ीकरण, उपकरणों, यंत्रों, रसायनों, कांच के बर्तनों और उपभोग करने योग्य सामग्रियों की खरीद, कुशल जनशक्ति की नियुक्ति, फील्ड टेस्ट किट (एफटीके) के माध्यम से समुदाय द्वारा निगरानी, जागरूकता सृजन, जल गुणवत्ता पर शैक्षिक कार्यक्रम, प्रयोगशालाओं का मान्यता/प्रमाणीकरण आदि शामिल हैं।
विभिन्न हितधारकों के परामर्श से ‘ग्रामीण परिवारों को पाइपलाइन के जरिये पेयजल आपूर्ति की जल गुणवत्ता की निगरानी हेतु संक्षिप्त हैंडबुक’ दिसम्बर 2024 में राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों के मार्गदर्शन के लिए जारी की गई है। इस हैंडबुक में पेयजल के नमूनों का स्रोत, उपचार संयंत्र, भंडारण तथा वितरण बिंदुओं जैसे विभिन्न परीक्षण स्थलों पर व्यापक परीक्षण करने तथा आवश्यकता होने पर सुधारात्मक कार्रवाई करने की सिफारिश की गई है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि घरों को आपूर्ति किया जाने वाला जल निर्धारित गुणवत्ता का हो।
सभी को नल जल कनेक्शन के माध्यम से सार्वभौमिक कवरेज सुनिश्चित करने के लिए, विभाग ने कार्यक्रम के क्रियान्वयन की निगरानी एवं मूल्यांकन के लिए एक व्यापक बहु-स्तरीय और बहु-प्रारूप प्रणाली विकसित की है। इसमें लक्षित वितरण और विशिष्ट परिणामों की निगरानी के लिए परिवार के मुखिया के आधार को जोड़ना (वैधानिक प्रावधानों के अधीन), निर्मित परिसंपत्तियों का जियो-टैगिंग, भुगतान से पहले तृतीय-पक्ष निरीक्षण, तथा पायलट आधार पर सेंसर-आधारित आईओटी समाधान के माध्यम से गांवों में जल आपूर्ति का मापन और निगरानी आदि शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त, जल जीवन मिशन के अंतर्गत कार्यान्वयन में तेजी लाने तथा मौजूदा निगरानी तंत्र को सुदृढ़ कर उसकी दक्षता और प्रभावशीलता बढ़ाने के उद्देश्य से हाल ही में कई कदम उठाए गए हैं। इनमें ग्राम/जिला डैशबोर्ड तथा ग्राम स्तरीय डैशबोर्ड को ईग्रामस्वराज पोर्टल से जोड़ना, जिला कलेक्टरों का ‘पेयजल संवाद’, आईएमआईएस मॉड्यूल के माध्यम से राष्ट्रीय डब्ल्यूएएसएच विशेषज्ञों (एनडब्ल्यूई) की भूमिका का संस्थानीकरण, टीपीआईए की भूमिका, संबद्ध मंत्रालयों के साथ सुदृढ़ समन्वय, स्रोत स्थिरता को मजबूत करने हेतु निर्णय सहायता प्रणाली, सामुदायिक प्रबंधित पाइप्ड जल प्रणाली पर हैंडबुक, एकीकृत पाइपलाइन जल प्रणाली के लिए यूनिक आईडी आदि शामिल हैं।
यह जानकारी जल शक्ति राज्य मंत्री श्री वी. सोमन्ना ने आज राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में दी।
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पीके/केसी/केपी/डीके
(रिलीज़ आईडी: 2244188)
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