जनजातीय कार्य मंत्रालय
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महाराष्ट्र में आदिवासी समुदाय द्वारा विरोध प्रदर्शन

प्रविष्टि तिथि: 01 APR 2026 1:38PM by PIB Delhi

केंद्रीय जनजातीय कार्य राज्य मंत्री श्री दुर्गादास उइके ने आज राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि महाराष्ट्र सरकार ने सूचित किया है कि नासिक में व्यापक महाराष्ट्र आदिवासी समुदाय द्वारा विरोध प्रदर्शनों के कारण निम्नलिखित हैं:

(i) अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम, 2006 (संक्षेप में, एफआरए) की धारा 4(1), 4(3) और धारा 6 के तहत दावों के साक्ष्य और अनुमोदन से संबंधित मुद्दे।

(ii) एफआरए की धारा 4(6) के तहत मान्यता प्राप्त भूमि के विस्तार के संबंध में विवाद।

महाराष्ट्र सरकार से प्राप्त जानकारी के अनुसार, जनवरी 2026 के अंत तक महाराष्ट्र में व्यक्तिगत वन अधिकार (आईएफआर) के कुल 14,726 मामले लंबित हैं, जिनमें 6,158 दावे और 8,568 अपीलें शामिल हैं। अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, अनुशंसित दावों के लिए प्रत्येक दावे की निर्धारित प्रक्रिया अवधि लगभग 60 दिन है। हालांकि, यदि किसी भी स्तर पर दावा अस्वीकृत हो जाता है, तो अपीलीय प्रक्रियाओं के कारण कुल प्रक्रिया अवधि छह महीने से अधिक हो सकती है। जनवरी 2026 के अंत तक, जिला स्तर पर प्राप्त कुल दावों में से लगभग 30 प्रतिशत दावों को जिला स्तर पर अस्वीकार कर दिया गया है।

भारत के संविधान (सातवीं अनुसूची - सूची II (राज्य सूची) - प्रविष्टि संख्या (18)) के अनुसार भूमि और उसका प्रबंधन राज्यों के अनन्य विधायी और प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आता है। विभिन्न परियोजनाओं, जैसे राजमार्गों, बांधों और खनन के निर्माण हेतु भूमि अधिग्रहण और उससे संबंधित पुनर्वास कार्य केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा विभिन्न केंद्रीय और राज्य अधिनियमों के अंतर्गत किया जाता है। महाराष्ट्र सरकार ने सूचित किया है कि सांगली, भंडारा, जलगांव, नासिक, वर्धा, धुले, छत्रपति संभाजीनगर, गोंदिया, सतारा और चंद्रपुर जिलों में किसी भी आदिवासी समुदाय को जबरन विस्थापित या उचित प्रक्रिया के बिना पुनर्वासित नहीं किया गया है।

महाराष्ट्र राज्य सरकार ने सूचित किया है कि दिनांक 28.11.2025 के सरकारी संकल्प के अनुसार, महाराष्ट्र के जनजातीय विकास विभाग द्वारा सीएफआर भूमि के मुआवजे के लिए निर्देश जारी किए गए थे। संकल्प के अनुसार, एफआरए के तहत भूमि अधिग्रहण और परियोजना अनुमोदन से पहले ग्राम सभाओं की सहमति अनिवार्य है।

महाराष्ट्र राज्य सरकार ने जानकारी दी है कि सांगली, भंडारा, जलगांव, नासिक, वर्धा, धुले, सी. संभाजीनगर, गोदिया, सतारा, चंद्रपुर जिलों में ऐसा कोई मामला नहीं पाया गया है.

वन अधिकार अधिनियम की धारा 7 में यह प्रावधान है कि, यदि कोई प्राधिकरण या समिति या ऐसे प्राधिकरण या समिति का कोई अधिकारी या सदस्य इस अधिनियम के किसी प्रावधान या इसके अंतर्गत बनाए गए किसी नियम का उल्लंघन करता है, जो वन अधिकारों की मान्यता से संबंधित है, तो उसे या उन्हें इस अधिनियम के अंतर्गत अपराध का दोषी माना जाएगा और उनके विरुद्ध कार्यवाही की जाएगी तथा उन पर एक हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है: बशर्ते कि इस उपधारा में निहित कोई बात प्राधिकरण या समिति के किसी सदस्य या विभाग के प्रमुख या इस धारा में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति को किसी दंड के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराएगी, यदि वह यह सिद्ध कर दे कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध को रोकने के लिए सभी आवश्यक सावधानी बरती थी।इसके अलावा, एफआरए की धारा 8 में यह प्रावधान है कि, "कोई भी न्यायालय धारा 7 के अंतर्गत किसी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं लेगा जब तक कि ग्राम सभा के प्रस्ताव से संबंधित विवाद की स्थिति में या ग्राम सभा द्वारा किसी उच्च अधिकारी के विरुद्ध प्रस्ताव पारित करने के मामले में कोई वनवासी अनुसूचित जनजाति राज्य स्तरीय निगरानी समिति को कम से कम साठ दिन का नोटिस न दे दे और राज्य स्तरीय निगरानी समिति ने ऐसे अधिकारी के विरुद्ध कोई कार्यवाही न की हो।"

वन अधिकार अधिनियम और उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों के अनुसार, राज्य सरकारें/केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के कार्यान्वयन के लिए उत्तरदायी हैं, जबकि जनजातीय कार्य मंत्रालय अधिनियम के उचित कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए समय-समय पर विभिन्न पहलुओं पर निर्देश और दिशानिर्देश जारी करता रहा है। महाराष्ट्र सरकार ने सूचित किया है कि 10 अक्टूबर 2025 को राज्य स्तरीय निगरानी समिति की बैठक हुई, जिसमें मुख्य सचिव ने सभी जिला कलेक्टरों को वन अधिकार अधिनियम के तहत लंबित व्यक्तिगत और सामुदायिक दावों के साथ-साथ अपीलों का यथाशीघ्र निपटारा करने का निर्देश दिया। इसके अतिरिक्त, लंबित मामलों की निगरानी टीआरटीआई आयुक्त कार्यालय स्तर पर की जा रही है।

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पीके/केसी/एसकेएस/एम


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