जनजातीय कार्य मंत्रालय
अनुसूचित जनजातियों की आवश्यक सेवाओं तक पहुंच और जनजातीय अधिकारों का संरक्षण
प्रविष्टि तिथि:
01 APR 2026 1:27PM by PIB Delhi
आज राज्यसभा में एक अतारांकित प्रश्न का उत्तर देते हुए, केन्द्रीय राज्यमंत्री श्री दुर्गादास उइके ने कहा कि जनजातीय कार्य मंत्रालय (एमओटीए) अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और विकास के लिए विभिन्न योजनाएं लागू कर रहा है। यह मंत्रालय अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के विकास के लिए समग्र नीति, योजना और कार्यक्रमों के समन्वय हेतु नोडल मंत्रालय है। अनुसूचित जनजातियों को बुनियादी सेवाओं तक पहुंच प्रदान करने के उद्देश्य से, जनजातीय कार्य मंत्रालय ने ‘प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महा अभियान’ (पीएम-जनमन) और ‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान’ (डीए-जेजीयूए) जैसी कई योजनाओं के जरिए विभिन्न पहलें की हैं।
पीएम-जनमन एक परिवर्तनकारी नीतिगत पहल है। इसका उद्देश्य 18 राज्यों और 1 केन्द्र -शासित प्रदेश में रहने वाले 75 विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) का समग्र विकास करना है। कुल 24,104 करोड़ रुपये (केन्द्र का हिस्सा: 15,336 करोड़ रुपये और राज्य का हिस्सा: 8,768 करोड़ रुपये) के बजटीय परिव्यय के साथ, 3 वर्षों के लिए मंजूर किए गए पीएम-जनमन को पीवीटीजी समुदायों को जरूरी सेवाओं तक न्यायसंगत पहुंच प्रदान करने, उनके जीवनस्तर को बेहतर बनाने और उनकी सामाजिक-आर्थिक प्रगति को बढ़ावा देने हेतु डिजाइन किया गया है। इसके मुख्य उद्देश्यों में सुरक्षित आवास, साफ पेयजल, शिक्षा तक पहुंच, स्वास्थ्य सेवा, पोषण, सड़क संपर्क, बिजली और आजीविका के बेहतर अवसर उपलब्ध कराना शामिल है।
डीए-जेजीयूए एक बहु-क्षेत्रीय पहल है। इसका उद्देश्य गांवों में रहने वाली जनजातीय आबादी का समग्र और सतत विकास सुनिश्चित करना है। यह महत्वाकांक्षी कार्यक्रम जनजातीय कार्य मंत्रालय (एमओटीए) सहित 17 मंत्रालयों की योजनाओं को 25 लक्षित हस्तक्षेपों के जरिए एकीकृत करता है। इसका मुख्य ध्यान 63,000 से अधिक जनजातीय-बहुल गांवों को आवश्यक सेवाओं से जुड़े बुनियादी ढांचे से पूरी तरह से संतृप्त करने पर है। इस पहल का लक्ष्य जनजातीय गांवों में मौजूद प्रमुख कमियों को दूर करना और इस क्रम में सुरक्षित आवास एवं स्वच्छ पेयजल; बेहतर स्वच्छता एवं स्वास्थ्य सुविधाएं; गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं पोषण तक बेहतर पहुंच; बिजली की आपूर्ति एवं नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को प्रोत्साहन; बेहतर सड़क एवं दूरसंचार कनेक्टिविटी; तथा सहभागी मंत्रालयों की प्रासंगिक योजनाओं के अभिसरण के जरिए स्थायी आजीविका के अवसर पर विशेष जोर देना है।
उपरोक्त बातों के अलावा, जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदायों के कल्याण और विकास के लिए लागू की गई कुछ अन्य योजनाओं का विवरण अनुलग्नक-I में दिया गया है।
भारत सरकार अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है। अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के कल्याण से संबंधित योजनाओं के दिशानिर्देशों में निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुसार धनराशि जारी की जाती है। जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा लागू की जाने वाली योजनाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि जनजातीय समुदायों को राहत, पुनर्वास और सुदृढ़ बनाने के प्रयासों में व्यवस्थित रूप से शामिल किया जाए। इन योजनाओं से लाखों लाभार्थी लाभान्वित होते हैं और इनका विस्तार देश भर के विभिन्न राज्यों तक है। इसके अलावा, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग सुरक्षा उपायों की निगरानी करता है और अधिकारों तथा राहत से वंचित किए जाने से संबंधित शिकायतों का निवारण करता है।
भारत सरकार ने जनजातीय अधिकारों के लिए काम करने वाले नागरिक समाज संगठनों (सीएसओ) द्वारा उठाई गई चिंताओं को दूर करने के लिए एक बहु-स्तरीय ढांचा तैयार किया है। व्हिसल ब्लोअर्स संरक्षण अधिनियम, 2014 और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 सहित विभिन्न कानूनी सुरक्षा उपाय उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करते हैं और कार्यकर्ताओं की गोपनीयता सुनिश्चित करते हैं। इसके अलावा, अप्रैल 2025 में शुरू किए गए राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) के ‘संवाद’ कार्यक्रम जैसी पहलों के जरिए कानूनी सहायता को और सुदृढ़ किया गया है। यह कार्यक्रम हाशिए पर पड़े और कमजोर आदिवासियों के साथ-साथ विमुक्त और घुमंतू जनजातियों के लिए न्याय तक पहुंच बढ़ाने पर केन्द्रित है।
इसके अलावा, सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005; केन्द्रीयकृत लोक शिकायत निवारण एवं निगरानी प्रणाली (सीपीजीआरएएमएस); और ग्राम-सभा के नेतृत्व में होने वाले सामाजिक ऑडिट सहित शिकायत निवारण के विभिन्न पारदर्शी तंत्र जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं। साथ ही, ये प्रशासनिक उत्पीड़न को रोकने में मदद करते हैं और जनजातीय अधिकारों पर काम करने वाले सीएसओ के लिए कामकाज के एक अनुकूल वातावरण को बढ़ावा देते हैं।
सरकार संवैधानिक प्रतिबद्धताओं, विधायी ढांचों और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के बीच एकरूपता सुनिश्चित करके, भेदभाव की रोकथाम संबंधी अपनी घरेलू नीतियों को जनजातीय मुद्दों पर अपने रुख के साथ समन्वित करती है।
घरेलू स्तर पर, भारत का संविधान कानून के समक्ष समानता (अनुच्छेद 14) की गारंटी देता है, भेदभाव को प्रतिबंधित करता है (अनुच्छेद 15), और अनुसूचित जनजातियों के पक्ष में सकारात्मक कार्रवाई का प्रावधान करता है (अनुच्छेद 46)। इन प्रावधानों को अधिकारों, गरिमा और संसाधनों तक पहुंच की सुरक्षा करने वाले ‘अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989’ और ‘वन अधिकार अधिनियम, 2006’ जैसे कानूनों के जरिए लागू किया जाता है।
इसके अलावा, भारत सरकार अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक विकास को बढ़ावा देने तथा भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से विभिन्न संवैधानिक सुरक्षा उपायों, कल्याणकारी योजनाओं और सकारात्मक उपायों को लागू करती है। इन उपायों की समय-समय पर राज्य सरकारों और अन्य हितधारकों के परामर्श से समीक्षा की जाती है तथा उन्हें और अधिक सुदृढ़ बनाया जाता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, भारत बहुपक्षीय मंचों के साथ इस तरह से जुड़ता है जो उसके संवैधानिक मूल्यों, राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और विकासात्मक संदर्भ को दर्शाता है। सरकार संप्रभुता, दृष्टिकोणों की विविधता और राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित समाधानों के प्रति सम्मान पर ज़ोर देते हुए, जनजातीय कल्याण और समावेशन से संबंधित अपनी नीतियों और अनुभवों को प्रस्तुत करती है।
कुल मिलाकर, सरकार की घरेलू कार्रवाइयां और अंतरराष्ट्रीय जुड़ाव समावेशी विकास सुनिश्चित करने, जनजातीय अधिकारों की रक्षा करने और समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से निर्देशित होती हैं, जो संवैधानिक सिद्धांतों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के अनुरूप हैं।
अनुलग्नक-I
दिनांक 01.04.2026 को राज्य सभा के अतारांकित प्रश्न संख्या 4215 के भाग (ए) के उत्तर में संदर्भित अनुलग्नक I
मंत्रालय जनजातीय समुदायों के कल्याण और विकास के लिए निम्नलिखित योजनाएं भी लागू कर रहा है:-
‘प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन (पीएमजेवीएम)’: पीएमजेवीएम का लक्ष्य जनजातीय उद्यमिता पहलों को मजबूत करना और प्राकृतिक संसाधनों, कृषि / एनटीएफपी / गैर-कृषि उद्यमों के अधिक कुशल, न्यायसंगत, स्व-प्रबंधित और अधिकतम उपयोग को बढ़ावा देकर आजीविका के अवसर उपलब्ध कराना है। कुल 1612.27 करोड़ रुपये के वित्तीय परिव्यय के साथ 5 वर्षों (2021-22 से 2025-26) के लिए मंजूर, इस योजना के 3 मुख्य घटक हैं। पहला घटक है “न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के जरिए लघु वन उपज (एमएफपी) के विपणन की व्यवस्था”। इसमें 87 एमएफपी के लिए एमएसपी निर्धारित किया गया है। दूसरा घटक है “एमएफपी के लिए मूल्य श्रृंखला का विकास”। इसके तहत वनधन केन्द्र स्थापित किए जाते हैं। तीसरा घटक है “जनजातीय उत्पादों / उपज के विकास और विपणन हेतु संस्थागत सहायता”। इसके तहत भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास महासंघ (ट्राईफेड) को अनुदान दिया जाता है। ट्राईफेड ही इस योजना के कार्यान्वयन के लिए नोडल एजेंसी है।
मैट्रिक-पूर्व छात्रवृत्ति: यह केन्द्र द्वारा प्रायोजित एक योजना है। इसे संबंधित राज्य/केन्द्र-शासित प्रदेशों के प्रशासन के जरिए लागू किया जाता है। यह एक खुली योजना है। इसमें कक्षा 9वीं और 10वीं में पढ़ने वाले अनुसूचित जनजाति के उन सभी विद्यार्थियों को शामिल किया गया है, जिनके माता-पिता की वार्षिक आय 2.50 लाख रुपये तक है। इसमें भारत सरकार का योगदान 75 प्रतिशत और राज्य का योगदान 25 प्रतिशत होता है। पूर्वोत्तर राज्यों और पहाड़ी राज्यों के मामले में, भारत सरकार का योगदान 90 प्रतिशत और राज्य का योगदान 10 प्रतिशत होता है। अंडमान एवं निकोबार जैसे उन केन्द्र-शासित प्रदेशों के मामले में, जहां कोई विधानसभा नहीं है और न ही उनके पास अपने अनुदान हैं, भारत सरकार का योगदान शत-प्रतिशत होता है।
मैट्रिक-उपरांत छात्रवृत्ति: यह केन्द्र द्वारा प्रायोजित एक योजना है। इसे संबंधित राज्य/केन्द्र-शासित प्रदेशों के प्रशासन के जरिए लागू किया जाता है। यह एक खुली योजना है। इसमें ग्यारहवीं और उससे ऊपर की कक्षाओं में पढ़ने वाले अनुसूचित जनजाति के उन सभी विद्यार्थियों को शामिल किया गया है, जिनके माता-पिता की वार्षिक आय 2.50 लाख रुपये तक है। इस योजना में भारत सरकार का योगदान 75 प्रतिशत और राज्य सरकार का योगदान 25 प्रतिशत होता है। पूर्वोत्तर राज्यों और पहाड़ी राज्यों के मामले में, भारत सरकार का योगदान 90 प्रतिशत और राज्य सरकार का योगदान 10 प्रतिशत होता है। अंडमान एवं निकोबार जैसे उन केन्द्र-शासित प्रदेशों के मामले में, जहां कोई विधानसभा नहीं है और न ही उनके पास अपने अनुदान हैं, भारत सरकार का योगदान शत-प्रतिशत होता है।
जनजातीय अनुसंधान संस्थान (टीआरआई) को सहायता: ‘टीआरआई को सहायता' योजनाओं के तहत, राज्य सरकारों/केन्द्र-शासित प्रदेशों को उनके प्रस्तावों के आधार पर अनुसंधान, दस्तावेजीकरण आदि के लिए धनराशि प्रदान की जाती है।
एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (ईएमआरएस): 1997-98 में शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य दूरदराज के इलाकों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति (एसटी) के विद्यार्थियों (कक्षा 6 से 12 तक) को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना है। वर्ष 2018-19 में, सरकार ने इसे एक केन्द्रीय क्षेत्र योजना के रूप में नया रूप दिया। इसके तहत हर उस प्रखंड में एक ईएमआरएस स्थापित किया जाना है जहां 50 प्रतिशत या उससे अधिक एसटी आबादी हो और कम से कम 20,000 आदिवासी लोग रहते हों। तदनुसार, पूरे देश में 728 ईएमआरएस स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। इससे 3.5 लाख से अधिक एसटी बच्चों को लाभ मिलने की संभावना है। इस योजना के प्रबंधन के लिए 'नेशनल एजुकेशन सोसाइटी फॉर ट्राइबल' (एनईएसटीएस) नाम की एक स्वायत्त संस्था की स्थापना की गई है। अब तक, मंत्रालय द्वारा सभी विद्यालयों को मंजूरी दी जा चुकी है, जिनमें से 477 विद्यालयों के कार्यरत होने की जानकारी मिली है। इनसे 1,30,000 से अधिक एसटी बच्चों को लाभ मिल रहा है।
संविधान के अनुच्छेद 275(1) के परंतुक के तहत अनुदान: जनजातीय कार्य मंत्रालय, संविधान के अनुच्छेद 275(1) के परंतुक के तहत अनुदान के रूप में राज्य सरकारों को धनराशि भी उपलब्ध कराता है। यह भारत सरकार की ओर से शत-प्रतिशत अनुदान है। इस कार्यक्रम के तहत वित्तपोषण का उद्देश्य राज्यों को उन विकास योजनाओं की लागत वहन करने में सक्षम बनाना है, जिन्हें राज्य द्वारा अपने यहां अनुसूचित जनजातियों के कल्याण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू किया जा सकता है।
अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए कार्यरत स्वैच्छिक संगठनों को सहायता अनुदान: अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए कार्यरत स्वैच्छिक संगठनों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
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पीके/केसी/आर
(रिलीज़ आईडी: 2247903)
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