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भारत में कृषि क्षेत्र की लचीली उत्पादन प्रणालियाँ
प्रविष्टि तिथि:
04 APR 2026 5:39PM by PIB Delhi
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प्रमुख बिंदु
- भारत ने 2024-25 में अधिक मूल्य वाली फसलों की ओर मजबूती से अग्रसर होते हुए रिकॉर्ड 357.73 एमएमटी खाद्यान्न उत्पादन 362.08 एमटी बागवानी उत्पादन हासिल किया।
- वर्ष 2024-25 में भारत 150.18 एमटी चावल, 117.94 एमटी गेहूं, 25.68 एमटी दलहन और 18.59 एमटी मोटे अनाज के उत्पादन के साथ वैश्विक स्तर पर शीर्ष उत्पादकों में शुमार है, जो वैश्विक खाद्य सुरक्षा में इसकी भूमिका को मजबूत करता है।
- वित्त वर्ष 2020 में कृषि निर्यात 34.5 बिलियन डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 51.1 बिलियन डॉलर हो गया, जिसमें प्रसंस्कृत खाद्य का हिस्सा बढ़कर 20.4% हो गया, जो मूल्य-संवर्धित वृद्धि का संकेत देता है।
- बजट आवंटन वित्त वर्ष 2013-14 के 21,933 करोड़ रुपये के से बढ़कर वित्त वर्ष 2026-27 में 1.30 लाख करोड़ रुपये हो गया, जो दर्शाता है कि कृषि विकास पर निरंतर ध्यान दिया जा रहा है।
- पीएम-किसान के तहत 22 किश्तों में 4.27 लाख करोड़ रुपये वितरित किए गए हैं, जबकि फसल बीमा दावों का भुगतान 1.90 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहा, जिससे आय सुरक्षा और जोखिम से सुरक्षा को मजबूती मिली है।
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परिचय
भारत का कृषि क्षेत्र ग्रामीण आजीविका बनाए रखने, आर्थिक मजबूती सुनिश्चित करने और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा की रक्षा करने में लगातार महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। कृषि और इससे संबंधित गतिविधियाँ वर्तमान कीमतों पर देश के सकल मूल्य वर्धन के लगभग पाँचवें हिस्से का योगदान करती हैं, ये लगभग 46.1 प्रतिशत कार्यबल को रोजगार प्रदान करती हैं और करीब 55 प्रतिशत जनसंख्या को संबल प्रदान करती हैं, जो इनके व्यापक सामाजिक-आर्थिक महत्व को दर्शाता है। पिछले पाँच वर्षों में, इस क्षेत्र ने स्थिर मूल्यों पर लगभग 4.4 प्रतिशत की औसत वार्षिक वृद्धि दर हासिल की है, जो बेहतर कृषि पद्धतियों, तकनीकी समावेशन और अधिक लचीली उत्पादन प्रणालियों की सहायता से हुए विस्तार को प्रतिबिंबित करता है।
कृषि उत्पादन में भारत का प्रदर्शन
कृषि वर्ष 2024-25 में, भारत ने 357.73 मिलियन मीट्रिक टन (एमएमटी) का अभूतपूर्व खाद्यान्न उत्पादन दर्ज किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 25.43 मिलियन मीट्रिक टन(एमएमटी) अधिक है। उत्पादकता में ऐसा निरंतर लाभ, बेहतर इनपुट प्रबंधन और किसानों को लचीली संस्थागत सहायता की बदौलत संभव हुआ है। यह बढ़ोतरी मुख्यतः चावल, गेहूं, मक्का और मोटे अनाज (मिलेट्स सहित, जिन्हें ‘श्री अन्न’ के रूप में नामित किया गया है) के अधिक उत्पादन से प्रेरित रही।
बागवानी क्षेत्र समानांतर रूप से कृषि परिवर्तन और मूल्य संवर्धन का प्रमुख चालक बनकर उभरा है। वर्ष 2024-25 में कुल बागवानी उत्पादन 362.08 मिलियन टन (एमटी) तक पहुँच गया, जो अधिक मूल्य वाली फसलों की ओर संरचनात्मक बदलाव को दर्शाता है। द्वितीय अग्रिम अनुमान के अनुसार, उत्पादन वर्ष 2013-14 में 280.70 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 367.72 मिलियन टन हो गया। इस उत्पादन में लगभग 114.51 मिलियन टन फल, 219.67 मिलियन टन सब्जियाँ और 33.54 मिलियन टन अन्य बागवानी फसलें शामिल हैं। खाद्यान्न और बागवानी दोनों के उत्पादन में क्रमिक वृद्धि भारत के मजबूत होते घरेलू कृषि आधार और वैश्विक कृषि-खाद्य प्रणालियों में उसकी बढ़ती भूमिका को दर्शाती है।
वैश्विक कृषि बाज़ारों में भारत की स्थिति

हाल के वर्षों में भारत के कृषि निर्यात में लगातार वृद्धि हुई है। कृषि निर्यात से होने वाली आय वित्त वर्ष 2020 में 34.5 बिलियन डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 51.1 बिलियन डॉलर हो गई, जो 8.2 प्रतिशत की सीएजीआर को दर्शाती है। वित्त वर्ष 2025 में, प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों सहित कृषि-खाद्य निर्यात 49.43 बिलियन डॉलर रहा, जो कुल निर्यात का लगभग 11.2 प्रतिशत है। उल्लेखनीय है कि प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात का हिस्सा भी लगातार बढ़ा है, जो वित्त वर्ष 2018 में 14.9 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 20.4 प्रतिशत हो गया, जो कृषि निर्यात टोकरी में उच्च मूल्य संवर्धन की ओर क्रमिक बदलाव को दर्शाता है।
ये प्रवृत्तियाँ उत्पादन, प्रसंस्करण और वैश्विक बाजारों के एकीकरण में नए अवसरों का सृजन करते हुए निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूती प्रदान करने में प्रसंस्कृत और विविधीकृत कृषि उत्पादों की बढ़ती भूमिका को भी रेखांकित करती हैं।
भारत विविध प्रकार की उत्पादन प्रणालियों और अनाज, दलहन, बागवानी तथा बागान फसलों में क्षेत्र-विशिष्ट क्षमताओं की बदौलत वैश्विक कृषि में मजबूत स्थिति में है। दुनिया के दूसरे सबसे बड़े कृषि भूमि क्षेत्र के साथ भारत कृषि उत्पादन में अग्रणी देश है और कई प्रमुख कृषि उत्पादों में दुनिया के शीर्ष उत्पादकों में शुमार है, जो उसके कृषि उत्पादन के पैमाने और स्थिरता दोनों को दर्शाता है।
अनाज, दलहन और श्री अन्न के क्षेत्र में भारत की अग्रणी स्थिति
चावल और गेहूं: कृषि वर्ष 2024-25 में चावल के 150.18 मिलियन टन उत्पादन और गेहूं के 117.94 मिलियन टन उत्पादन के साथ भारत विश्व में चावल और गेहूं दोनों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। चावल का उत्पादन मुख्यतः उत्तर प्रदेश, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में होता है। वहीं, गेहूं का उत्पादन प्रमुख रूप से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पंजाब में होता है, जो देश में अनाज उत्पादन के भौगोलिक केंद्रीकरण को दर्शाता है।
दलहन और श्री अन्न : दलहन उत्पादन में भारत वैश्विक स्तर पर अग्रणी है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में 25.68 मिलियन टन (2024-25) उत्पादन दर्ज किया गया। देश श्री अन्न के उत्पादन में भी विश्व में पहले स्थान पर है, लगभग 18.59 मिलियन टन उत्पादन (2024-25), हासिल किया गया, जिसमें राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक की भूमिका प्रमुख रही।
व्यापार में प्रदर्शन के संदर्भ में, चावल का निर्यात 2024-25 में 12.95 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया, जबकि दलहन और श्री अन्न का निर्यात क्रमशः 855 मिलियन डॉलर और 59.20 मिलियन डॉलर रहा। ये आँकड़े वैविध्यपूर्ण, अनाज की जलवायु-सहिष्णु फसलों की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय मांग को रेखांकित करते हैं और वैश्विक खाद्य एवं पोषण सुरक्षा में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को मजबूती देते हैं।
बागवानी के क्षेत्र में भारत की वैश्विक स्थिति
फल और सब्जियाँ: भारत विश्व में फल और सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। वर्ष 2024-25 में फलों का उत्पादन 114.51 मिलियन टन और सब्जियों का उत्पादन 219.67 मिलियन टन रहा । फलों का उत्पादन मुख्यतः आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु में , जबकि सब्जियों का उत्पादन प्रमुख रूप से उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, बिहार और गुजरात में होता है। वर्ष 2024-25 में फल और सब्जियों का निर्यात 1,818.56 मिलियन डॉलर रहा, जो भारत के कृषि व्यापार और वैश्विक बाजार एकीकरण में अधिक मूल्य वाली बागवानी फसलों के बढ़ते योगदान को दर्शाता है।
सूखी प्याज: सूखी प्याज के उत्पादन में भी भारत विश्व में पहले स्थान पर है, जो कुल वैश्विक उत्पादन में लगभग 25 प्रतिशत का योगदान देता है, जिसमें मुख्य भूमिका महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात की है।
अधिक मूल्य वाली नकदी फसलों में भारत की अग्रणी भूमिका
गन्ना: अधिक मूल्य वाली नकदी फसलों में भारत विश्व में गन्ने का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। मुख्यतः उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में गन्ने का 454.61 मिलियन टन (वर्ष 2024-25) उत्पादन हुआ।
कपास: भारत कपास का भी विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, जहाँ वर्ष 2024-25 में इसका उत्पादन लगभग 5.05 मिलियन टन (गाँठों से परिवर्तित) आंका गया है। इसका उत्पादन मुख्यतः कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात में केंद्रित है, जो प्रमुख कपास-उत्पादक राज्य हैं। व्यापार के क्षेत्र में, टैरिफ संबंधी वैश्विक चुनौतियों के बावजूद, जनवरी-अक्टूबर 2025 के दौरान भारत से अमेरिका को 31.31 बिलियन डॉलर मूल्य का कपास निर्यात हुआ, जो अंतरराष्ट्रीय बाजार की बदलती स्थितियों के बीच निर्यात प्रदर्शन में तुलनात्मक स्थिरता का संकेत देता है।
चाय: भारत विश्व में चाय का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, जहाँ अप्रैल- दिसंबर 2024-25 के दौरान चाय का उत्पादन 1.203 मिलियन टन रहा। चाय का उत्पादन मुख्यतः असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में केंद्रित है। अप्रैल से अक्टूबर 2025-26 के दौरान चाय का निर्यात 605.90 मिलियन डॉलर रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 15.16 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है।
मसाले: भारत दुनिया में सबसे ज़्यादा मसाले उत्पादन करने वाला देश बना हुआ है। वर्ष 2023-24 में कुल उत्पादन 12 मिलियन मीट्रिक टन रहा। प्रमुख उत्पादक राज्य मध्य प्रदेश, गुजरात और आंध्र प्रदेश हैं। वित्त वर्ष 2025 में मसालों का निर्यात 4.52 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया , जो इस क्षेत्र में भारत की मजबूत वैश्विक बाजार उपस्थिति को रेखांकित करता है।
नारियल: नारियल उत्पादन में भारत विश्व में पहले स्थान पर है, जहाँ वार्षिक उत्पादन लगभग 21.3 बिलियन फल हैं। वर्ष 2024-25 में नारियल का निर्यात 513 मिलियन डॉलर का रहा, जो अंतरराष्ट्रीय मांग की स्थिरता को दर्शाता है।
कॉफ़ी: भारत सालाना लगभग 0.36 मिलियन टन कॉफ़ी का उत्पादन करता है, जिसमें से करीब 70 प्रतिशत का निर्यात 128 देशों को किया जाता है। इसके प्रमुख उत्पादक राज्य कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु हैं। वित्त वर्ष 2025-26 के अप्रैल-अक्टूबर के दौरान कॉफ़ी का निर्यात 1,176.31 मिलियन डॉलर रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में लगभग 12 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है।

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केंद्रीय बजट 2026-27 में तटीय क्षेत्रों में नारियल, चंदन, कोको और काजू, पूर्वोत्तर राज्यों में अगर के पेड़, और पहाड़ी क्षेत्रों में अधिक -मूल्य वाले मेवे जैसे बादाम, अखरोट और पाइन नट्स के लिए लक्षित समर्थन की घोषणा करते हुए अधिक -मूल्य वाली फसलों के संवर्धन पर विशेष जोर दिया गया है। यह क्षेत्र-विशिष्ट दृष्टिकोण स्थानीय कृषि-जलवायु शक्तियों का उपयोग करने और अधिक आर्थिक लाभ देने वाली फसलों की ओर विविधीकरण को प्रोत्साहित करने की नीतिगत मंशा को दर्शाता है।
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इस प्रकार, भारत का वैविध्यपूर्ण जिंस आधार और भौगोलिक रूप से संतुलित उत्पादन प्रणालियाँ वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं को स्थिरता प्रदान करने की उसकी भूमिका को मजबूत बनाती हैं। उन्नत उत्पादन पद्धतियों को बढ़ते निर्यात बाजारों के साथ जोड़ा जाना लचीली कृषि की ओर उसके अग्रसर होने को दर्शाता है, जो दीर्घकालिक पर्यावरणीय संतुलन को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ आर्थिक वृद्धि को भी बढ़ावा देता है।
मजबूत उत्पादन प्रणालियों की सहायता करने वाले सार्वजनिक नीतिगत हस्तक्षेप
भारत की कृषि नीति का फ्रेमवर्क किसान कल्याण और क्षेत्रीय लचीलेपन को मजबूती प्रदान करने के लिए वित्तीय सहायता, उत्पादकता वृद्धि और जोखिम प्रबंधन के उपायों को संयोजित करता है।
बजट आवंटन
सरकार ने कृषि क्षेत्र के लिए बजटीय आवंटन में महत्वपूर्ण वृद्धि की है, जो किसानों के कल्याण और ग्रामीण आजीविकाओं को मजबूत बनाने की दीर्घकालिक नीतिगत प्रतिबद्धता को दर्शाता है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान यह आवंटन किसानों के कल्याण के प्रति निरंतर समर्पण को भी प्रदर्शित करता है।

कृषि और किसान कल्याण विभाग के लिए बजट आवंटन वर्ष 2013-14 में 21,933.50 करोड़ रुपये (लगभग 2.64 बिलियन डॉलर) से बढ़कर वर्ष 2025-26 में 1,27,290.16 करोड़ रुपये (लगभग 15.34 बिलियन डॉलर) हो गया, जो इस अवधि में सार्वजनिक निवेश में महत्वपूर्ण वृद्धि को दर्शाता है। इसी रास्ते पर आगे बढ़ते हुए, वर्ष 2026-27 के लिए कृषि और किसान कल्याण विभाग को आवंटित बजट 1,30,561.38 करोड़ रुपये (लगभग 15.73 बिलियन डॉलर) रहा, जो कृषि विकास को निरंतर प्राथमिकता देने की प्रतिबद्धता की दोबारा पुष्टि करता है।
इनपुट सहायता से लेकर सुदृढ़ विकास तक: भारत की उत्पादकता-आधारित कृषि रणनीति
कृषि विकास से संबंधित भारत की रणनीति ने बेहतर इनपुट उपयोग दक्षता, तकनीक के समावेशन और सतत कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहन देने के जरिए उत्तरोत्तर रूप से उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में रुख किया है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और पोषण मिशन, दलहन आत्मनिर्भरता मिशन, और राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन –तिलहन और ऑयल पाम जैसे मिशन आधारित हस्तक्षेपों सहित लक्षित विस्तार सेवाएँ और संस्थागत ऋण सहायता, इस संरचनात्मक परिवर्तन को आगे बढ़ा रहे हैं। इसका उद्देश्य उच्च उत्पादकता हासिल करना, आयात पर निर्भरता में कमी लाना और कृषि क्षेत्र में मजबूत लचीलापन सुनिश्चित करना है।
अच्छी गुणवत्ता के बीज और मृदा स्वास्थ्य:
- बीज और रोपण सामग्री उप-मिशन (एसएमएसपी) पहल के तहत (छत्र योजना "हरित क्रांति-कृषोन्नति योजना" के तहत केंद्र प्रायोजित योजना), लगभग 6.85 लाख बीज ग्राम स्थापित किए गए हैं, जिसके परिणामस्वरूप अच्छी गुणवत्ता के 1,649.26 लाख क्विंटल बीजों का उत्पादन हुआ है।
- संतुलित और स्थल की विशिष्टता के अनुसार मृदा के पोषक तत्वों के प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए नवंबर 2025 के मध्य तक लगभग 25.55 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किए गए।
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) के तहत कुल सिंचित क्षेत्र का हिस्सा 55.8 प्रतिशत तक बढ़ गया है, जो सिंचाई कवरेज के विस्तार और जल उपयोग दक्षता में सुधार को दर्शाता है।
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बीज और रोपण सामग्री उप-मिशन (एसएमएसपी) का उद्देश्य प्रमाणित और अच्छी गुणवत्ता के बीजों की आपूर्ति का विस्तार करना है, साथ ही बीज प्रतिस्थापन दर और किसानों द्वारा सुरक्षित रखे गए बीजों के मानक को सुधारना है। यह योजना बीज उत्पादन, प्रसंस्करण, परीक्षण और भंडारण अवसंरचना को आधुनिक बनाने पर भी काम करती है और बीज मूल्य श्रृंखला में उन्नत तकनीकों को अपनाने को प्रोत्साहित करती है।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड किसानों को प्रत्येक जोत या भूखंड के लिए जारी किया जाता है। इसमें मिट्टी की स्थिति को 12 मानकों: नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटेशियम, सल्फर, जिंक, आयरन, तांबा, मैंगनीज, बोरॉन, पीएच, विद्युत चालकता और ऑर्गेनिक कार्बन के आधार पर दर्शाया जाता है। यह कार्ड हर दो साल में जारी किया जाता है तथा यह लंबे अर्से तक मिट्टी की ऊवर्रता बनाए रखने के लिए उपयुक्त उर्वरकों और मिट्टी उपचार के बारे में किसानों का मार्गदर्शन करता है।
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) का उद्देश्य ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणालियों को बढ़ावा देते हुए खेतों में जल उपयोग दक्षता को बेहतर बनाना है। यह योजना छोटे स्तर पर जल भंडारण और संरक्षण उपायों का भी समर्थन करती है, ताकि सूक्ष्म सिंचाई के लिए जल उपलब्धता मजबूत हो सके।
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ऋण, यंत्रीकरण और प्रौद्योगिकी:
- वित्त वर्ष 2024-25 में जमीनी स्तर पर कृषि ऋण वितरण 28.67 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया, जो कृषि क्षेत्र में संस्थागत वित्त के संरचनात्मक विस्तार को दर्शाता है।
- 31 मार्च 2025 तक लगभग 7.72 करोड़ सक्रिय किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) खाते संचालित थे, जिससे समय पर और किफायती ऋण तक किसानों की पहुँच को मजबूती मिली।
- वर्ष 2014-15 से 2025-26 के बीच, कृषि यंत्रीकरण सेवाओं तक छोटे किसानों की पहुँच बढ़ाने हेतु 27,554 कस्टम हायरिंग सेंटर (सीएचसी) स्थापित किए गए। कस्टम हायरिंग सेंटर (सीएचसी) वह इकाई है, जिसमें कृषि मशीनरी, उपकरण एवं औजारों का एक सेट होता है, जिसे किसानों को किराये पर उपलब्ध कराया जाता है।
- पशुपालन क्षेत्र की उत्पादकता को बड़े पैमाने पर तकनीकी और स्वास्थ्य हस्तक्षेपों के माध्यम से सहायता दी गई है, जिसमें खुरपका मुँहपका (एफएमडी) रोग की रोकथाम के लिए वर्ष 2020 से लगभग 125 करोड़ टीकाकरण और 2024-25 में 88.32 मिलियन कृत्रिम गर्भाधान शामिल हैं।
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किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) योजना कृषि के विभिन्न चरणों में किसानों की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करती है। इस योजना का उद्देश्य किसानों को उनकी खेती और अन्य जरूरतों जैसे - फसलों की खेती के लिए अल्पकालिक ऋण आवश्यकताओं, कटाई के बाद का खर्च, कृषि और संबद्ध गतिविधियों के लिए निवेश ऋण की आवश्यकता, उपज विपणन ऋण, किसान परिवार की उपभोग आवश्यकताएं, कृषि परिसंपत्तियों के रखरखाव के लिए कार्यशील पूंजी और कृषि से संबद्ध गतिविधियों - के लिए लचीली और सरल प्रक्रिया के साथ एकल खिड़की के अंतर्गत बैंकिंग प्रणाली से पर्याप्त और समय पर ऋण सहायता प्रदान करना है।
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टिकाऊ कृषि, विस्तार और मिशन मोड में की जाने वाली पहल:

- 17,632 क्लस्टरों तक प्राकृतिक खेती का विस्तार किया गया , जो 6.39 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करती है, और 15.79 लाख किसान इसमें शामिल हैं।
- किसान कॉल सेंटरों ने वर्ष 2024-25 में 30.65 लाख किसानों के प्रश्नों का समाधान किया।
- तिलहन मिशन के तहत 2014-15 और 2024-25 के बीच तिलहन क्षेत्र में 18 प्रतिशत से अधिक वृद्धि, उत्पादन में लगभग 55 प्रतिशत और उत्पादकता में लगभग 31 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
- वर्ष 2023-24 में घरेलू खाद्य तेल उपलब्धता 121.75 लाख टन तक पहुँच गई।
- एथेनॉल मिश्रण से अगस्त 2025 तक विदेशी मुद्रा में 1.44 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बचत हुई।
ये हस्तक्षेप तकनीक-प्रधान, संसाधन-कुशल और उन्नत उत्पादन प्रणालियों की ओर अग्रसर होने को दर्शाते हैं, जो कृषि उत्पादकता और लचीलेपन को मजबूत करते हैं।

किसानों के कल्याण, जोखिम प्रबंधन और सामूहिक कार्रवाई के लिए एकीकृत सहायता
जलवायु और बाजार से संबंधित बढ़ती अस्थिरता के बीच किसानों की लचीलेपन की क्षमता बढ़ाने और कृषि विकास को बनाए रखने के लिए स्थिर कृषि आय सुनिश्चित करना, जोखिम शमन तंत्रों को संस्थागत रूप देना और सहकारी नेटवर्क को मजबूत किया जाना अनिवार्य हैं।
मूल्य और आय समर्थन:
- न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 22 अनिवार्य फसलों के लिए घोषित किया गया है और इसे उत्पादन लागत का कम से कम 1.5 गुना तय किया गया है, जिसमें खरीफ विपणन मौसम (केएमएस) 2025-26 और रबी विपणन मौसम (आरएमएस) 2026-27 के लिए बढ़ोतरी की गई है।
- प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) के तहत 22 किस्तों में 4.27 लाख करोड़ रुपये से अधिक वितरित किए जा चुके हैं (17 मार्च 2026 तक), जिससे किसानों को आय में सीधे सहायता प्रदान की जा रही है ।
- प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना (पीएमकेएमवाई) 2 फरवरी 2026 तक 24.95 लाख किसानों का नामांकन किया जा चुका है, जिससे छोटे और सीमांत किसानों को सामाजिक सुरक्षा कवरेज मिल रहा है।
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प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) केंद्रीय क्षेत्र की योजना है, जो प्रत्येक पात्र किसान परिवार को 6,000 रुपये की वार्षिक आर्थिक सहायता प्रदान करती है। यह राशि 2,000 रुपये की तीन समान किश्तों में किसानों के आधार-संबद्ध बैंक खातों में डीबीटी के माध्यम से भेजी जाती है।
प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना (पीएमकेएमवाई) का उद्देश्य छोटे और सीमांत किसानों (एसएमएफ) को पेंशन के माध्यम से सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है, क्योंकि उनके पास बुढ़ापे में गुजर-बसर करने के लिए या तो बहुत कम या फिर बिल्कुल भी बचत नहीं होती। इस योजना का उद्देश्य आजीविका का साधन न रहने की स्थिति में उनकी सहायता करना है । इस योजना के तहत कुछ बहिष्करण खंडों के अधीन, पात्र छोटे और सीमांत किसानों को 60 वर्ष के होने पर न्यूनतम मासिक पेंशन के रूप में 3,000 रुपये प्रदान किए जाएंगे। यह स्वैच्छिक और योगदान आधारित पेंशन योजना है, जिसमें प्रवेश आयु 18 से 40 वर्ष के बीच है।
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फसल बीमा सुरक्षा:
• प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) योजना के तहत वर्ष 2024-25 के दौरान 6.2 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र को शामिल करते हुए 4.19 करोड़ किसानों को बीमा कवर प्रदान किया गया।
• इस योजना के तहत वर्ष 2016-17 से अब तक 86 करोड़ से ज़्यादा आवेदनों का निपटान किया गया है, जिनमें 1.90 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा के दावों का भुगतान किया गया है।
• वर्ष 2022-23 की तुलना में कवरेज 32 प्रतिशत बढ़ा है, जिससे जलवायु और बाज़ार से जुड़े जोखिमों से बचाव के लिए सुरक्षा मज़बूत हुई है।
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प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) एक फसल बीमा योजना है, जिसका उद्देश्य किसानों को प्राकृतिक आपदाओं (ओले, सूखा, अकाल), कीट और रोगों के कारण होने वाले फसल के नुकसान से वित्तीय सुरक्षा प्रदान करना है। पीएमएफबीवाई बीमा कंपनियों और बैंकों के नेटवर्क के माध्यम से सभी भारतीय किसानों को किफायती प्रीमियम पर बीमा प्रदान करती है।
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सहकारी समितियों और सामूहिक प्रणालियों को सुदृढ़ बनाना:

- कंप्यूटरीकरण के तहत 67,930 प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पीएसीएस) में से, 54,150 समितियों को एंटरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग (ईआरपी) प्लेटफार्मों पर जोड़ा गया है, जिनमें से 43,658 समितियाँ संचालन में हैं।
- मार्च 2025 तक 18,183 नई बहुउद्देश्यीय सहकारी समितियाँ पंजीकृत की गईं।
- विकेंद्रीकृत अनाज भंडारण कार्यक्रम 11 पीएसीएस में लागू है, और स्थानीय भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए 2024 में 500 नए गोदामों की घोषणा की गई।
- राष्ट्रीय सहकारी नीति और त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय के माध्यम से संस्थागत सुधार किए जा रहे हैं, ताकि सहकारी क्षेत्र में शासन और क्षमता निर्माण को मजबूत किया जा सके।
सामूहिक रूप से, ये हस्तक्षेप आय स्थिरता, संस्थागत जोखिम सुरक्षा को मजबूत करते हैं, और सामूहिक बाजार पहुँच का विस्तार करते हैं, इस प्रकार भारत की कृषि अर्थव्यवस्था का लचीलापन और दीर्घकालिक स्थिरता को और मजबूत बनाते हैं।

बाजार सुधार, मूल्य श्रृंखला आधुनिकीकरण और सार्वजनिक खाद्य वितरण
खाद्य प्रबंधन प्रणालियाँ, बाजार अवसंरचना और मूल्य संवर्धन तंत्रों की मजबूती खेत से बाजार तक भारत की रणनीति का मुख्य स्तंभ बनकर उभरे हैं। भंडारण क्षमता, प्रसंस्करण सुविधाओं, डिजिटल बाजार प्लेटफार्मों, और सार्वजनिक वितरण सुधारों में रणनीतिक निवेश से आपूर्ति श्रृंखला की दक्षता बढ़ रही है, कीमतों में स्थिरता आ रही है और किसानों को बेहतर पारिश्रमिक मिल रहा है। सामूहिक रूप से, ये हस्तक्षेप अधिक मजबूत, पारदर्शी, और समेकित खाद्य इकोसिस्टम विकसित कर रहे हैं, जो उत्पादकों के प्रोत्साहन और उपभोक्ताओं के कल्याण के बीच संतुलन बनाए रखता है।
बाज़ार संपर्क और अवसंरचना:
बाजार संपर्क और फसल कटाई के उपरांत अवसंरचना में किए गए महत्वपूर्ण निवेश ने कृषि मूल्य श्रृंखलाओं को मजबूत किया है और औपचारिक बाजारों के साथ उत्पादकों के सामंजस्य को बेहतर किया है। 28 फरवरी 2026 तक, 49,796 भंडारण परियोजनाओं को 4,832.70 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की गई है, जबकि 25,009 विपणन अवसंरचना परियोजनाओं को कुल 2,193.17 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गई है। ई-राष्ट्रीय कृषि बाज़ार (ई-एनएएम) प्लेटफॉर्म ने अपने दायरे का विस्तार कर 23 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों में 1,656 मंडियों से 1.8 करोड़ किसानों, 2.72 लाख व्यापारियों और 4,724 किसान-उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को जोड़ा है, जिससे डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए कीमतों का पता लगाने और अंतर-बाज़ार व्यापार में सुधार हुआ।
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ई-राष्ट्रीय कृषि बाज़ार (ई-एनएएम) एक अखिल भारतीय इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल है, जिसे देश भर की मौजूदा एपीएमसी (कृषि उपज बाजार समिति) मंडियों को एकीकृत करके एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर लाने के लिए विकसित किया गया है, ताकि खेती की जिंसों के लिए “एक राष्ट्र, एक बाजार” बन सके। यह प्लेटफॉर्म फसलों की आवक की जानकारी, एआई आधारित गुणवत्ता परीक्षण, ई-बिडिंग, और किसानों को सीधा ई-भुगतान जैसी एकल-खिड़की सेवाएँ प्रदान कर कृषि विपणन को सरल बनाता है। इसका उद्देश्य कृषि व्यापार में पारदर्शिता, दक्षता और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाना, किसानों के लिए बाजार तक पहुँच का विस्तार करना और जानकारी में असमानता को कम करना है।
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2020 में शुरू की गई 10,000 एफपीओ के गठन और संवर्धन योजना के तहत, 28 फरवरी 2026 तक 10,000 एफपीओ पंजीकृत हो चुके थे। मत्स्य पालन क्षेत्र में भी सामूहिकरण को मजबूत किया गया है, जिसके तहत 2,195 किसान मत्स्य उत्पादक संगठन (एफएफपीओ) का गठन किया गया और 4.39 लाख मछुआरों को किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) लाभ प्रदान किए गए, जिससे संस्थागत ऋण तक पहुँच बढ़ी और क्षेत्रीय मजबूती संवर्धित हुई।
खाद्य प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन:
खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र भारत के औद्योगिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, और यह संगठित विनिर्माण क्षेत्र में 12.91 प्रतिशत रोजगार प्रदान करता है। प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना (पीएमकेएसवाई) के तहत, 30 नवंबर 2025 तक 1,185 परियोजनाएँ पूरी की जा चुकी हैं, जिससे आधुनिक प्रसंस्करण और कोल्ड-चेन अवसंरचना को मजबूत किया गया। इसके साथ ही, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना (पीएलआईएसएफआई) ने 169 आवेदन स्वीकृत किए, जिससे 9,207 करोड़ रुपये के निवेश जुटाए गए और 31 दिसंबर 2025 तक 2,162.55 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि वितरित की जा चुकी है।
इसके अतिरिक्त, प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम औपचारिकरण योजना (पीएमएफएमई) ने 4,04,062 आवेदनों को सहायता प्रदान की, जिसके तहत 14.19 हजार करोड़ रुपये के सावधि ऋण के साथ 1,72,707 ऋण की सुविधा प्रदान की गई और महिला स्व-सहायता समूहों (एसएचजी) को 1,277.45 करोड़ रुपये की बीज पूंजी सहायता दी गई। इस तरह, योजना विकेंद्रीकृत मूल्य संवर्धन और समावेशी उद्यम विकास को बढ़ावा देती है।
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प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना (पीएमकेएसवाई) एक व्यापक पहल है, जिसका उद्देश्य खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के लिए आधुनिक अवसंरचना का विकास करना है। यह योजना खेत स्तर से लेकर खुदरा बाजारों तक एक एकीकृत और दक्ष आपूर्ति श्रृंखला स्थापित करने का प्रयास करती है। यह योजना किसानों को बेहतर कीमत दिलाती है, फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करती है, मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देती है और आय बढ़ाने में मदद करती है। इसके अलावा, यह गांव में रोज़गार सृजित करती है, प्रसंस्करण क्षमता बढ़ाती है और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को मज़बूत करती है।
खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना (पीएलआईएसएफआई) खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को आधुनिक बनाने और उसकी प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन की पेशकश करती है। इसके अंतर्गत उन विशिष्ट खाद्य उत्पाद श्रेणियों के निर्माण को प्रोत्साहन दिया जाता है, जिनमें उत्पादन और मूल्य संवर्धन की उच्च संभावनाएं होती हैं।
प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम औपचारिकरण योजना (पीएमएफएमई) खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय द्वारा चलायी जाने वाली केंद्र प्रायोजित योजना है। यह योजना सूक्ष्म उद्यमों के समक्ष आने वाली चुनौतियों को दूर करने तथा समूहों और सहकारी समितियों की क्षमता का उपयोग करते हुए इन उद्यमों के आधुनिकीकरण और उन्हें विधिसंगत बनाने में सहायता देने के लिए बनाई गई है।
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खरीद और खाद्य सुरक्षा:
केंद्र सरकार खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए खाद्यान्नों की खरीद करती है, साथ ही किसानों को कृषि और किसान कल्याण एवं सहकारिता विभाग द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य के माध्यम से मूल्य समर्थन भी प्रदान करती है। खाद्यान्नों की खरीद का विवरण निम्नानुसार है:
• आरएमएस 2025-26 (गेहूं): 300.35 एलएमटी खरीदा गया; 25.13 लाख किसानों को फायदा हुआ।
● केएमएस 2024-25 (धान): 832.17 एलएमटी खरीदा गया; 118.59 लाख किसानों को फायदा हुआ।
● केएमएस 2025-26 (धान) (17.11.2025 तक): 243.48 एलएमटी खरीदा गया; 21.22 लाख किसानों को फायदा हुआ।
● मोटे अनाज/ श्रीअन्न 2024-25: 11.72 एलएमटी खरीदा गया।
• केएमएस 2025-26 (मोटे अनाज/श्रीअन्न) (16.11.2025 तक): 64,365 एमटी खरीदा गया (प्रक्रिया जारी है)।
इसलिए, सरकार खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बफर मानकों के अनुरूप पर्याप्त खाद्यान्न भंडार बनाए रखती है, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करती है तथा खुले बाज़ार में कीमतों को स्थिर रखने के लिए बाज़ार हस्तक्षेप का सक्षम बनाती है।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत, ग्रामीण आबादी के 75 प्रतिशत और शहरी आबादी के 50 प्रतिशत तक कवर करते हुए 81.35 करोड़ लाभार्थियों को रियायती दरों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराया गया है।
भंडारण और सार्वजनिक वितरण प्रणाली:

वन नेशन वन राशन कार्ड (ओएनओआरसी) के कार्यान्वयन के तहत राशन कार्डों की 99.8 प्रतिशत आधार सीडिंग की जा चुकी है। यह योजना देश के सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू की जा चुकी है, जिससे लाभार्थियों की पोर्टेबिलिटी और समावेशन बढ़ा है। 5.43 लाख से अधिक उचित मूल्य की दुकानों में से 99 प्रतिशत से अधिक में इलेक्ट्रॉनिक-पॉइंट ऑफ सेल (ईपीओएस) डिवाइस लगाए गए हैं, जिससे 98 प्रतिशत से अधिक लेनदेन डिजिटाइज़ हुए और वितरण में पारदर्शिता मजबूत हुई। वित्तीय वर्ष 2024 में, 10 लाख से अधिक लाभार्थियों को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के माध्यम से 267.6 करोड़ रुपये अंतरित किए गए, जिससे लक्षित वितरण की दक्षता और जवाबदेही में सुधार हुआ। कुल मिलाकर, ये सुधार बाजार समेकन को मजबूत करते हैं, वितरण में अक्षमताओं को कम करते हैं, और तेज़ी से डिजिटल होते फ़ार्म-टू-डिस्ट्रीब्यूशन इकोसिस्टम में खाद्य सुरक्षा को मज़बूत करते हैं।
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सतत विकास लक्ष्यों से संबंध
कृषि के क्षेत्र में भारत की पहलें संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के साथ निकटता से जुड़ी हुई हैं, जो राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं को वैश्विक स्थिरता प्रतिबद्धताओं के साथ जोड़ती हैं। उत्पादकता वृद्धि, सार्वजनिक खरीद और खाद्य सुरक्षा उपाय सीधे एसडीजी 2 (भूख से मुक्ति) में योगदान देते हैं। सतत कृषि को बढ़ावा देने वाली पहल, जैसे मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, प्राकृतिक खेती और संसाधन-कुशल प्रथाएं, एसडीजी 12 (जिम्मेदार उपभोग और उत्पादन) और एसडीजी 13 (जलवायु के अनुकूल कार्रवाई) का समर्थन करती हैं। फसल कटाई के उपरांत अवसंरचना, मूल्य संवर्धन, भंडारण और डिजिटल कृषि बाजारों में रणनीतिक निवेश एसडीजी 9 (उद्योग, नवाचार और अवसंरचना) को सुदृढ़ करता है। ये सभी हस्तक्षेप मिलकर एक मजबूत और टिकाऊ कृषि इकोसिस्टम तैयार करते हैं, जो वैश्विक विकास प्राथमिकताओं के अनुरूप है।
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निष्कर्ष
भारत में कृषि क्षेत्र में आया बदलाव संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाता है, जो मजबूत उत्पादन वृद्धि, वैश्विक बाजार में बढ़ती मौजूदगी और खेत से बाजार तक की मूल्य श्रृंखला में लक्षित नीतिगत हस्तक्षेप का समन्वय करता है। रिकॉर्ड खाद्यान्न और बागवानी उत्पादन, निर्यात में वृद्धि, और फसलों में विविधीकरण इस क्षेत्र की स्थिरता और आर्थिक व जलवायु परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलन क्षमता को दर्शाते हैं। लागत, आय सुरक्षा, बाज़ार अवसंरचना और डिजिटल खाद्य प्रणालियों के माध्यम से मिशन-आधारित सहायता ने उत्पादकता को मजबूत किया है, किसानों की भलाई में सुधार किया है, और खाद्य सुरक्षा परिणामों को बेहतर बनाया है। जैसे-जैसे मजबूत उत्पादन प्रणालियाँ विकसित हो रही हैं, कृषि की बढ़ती भूमिका सहायक गतिविधियों के साथ गहरे जुड़ाव का मजबूत आधार प्रदान करती है, जो ग्रामीण आजीविका, मूल्य संवर्धन और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता को और सुदृढ़ करती है।
संदर्भ
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