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सागरमाला: भारत के समुद्री परिदृश्य का रूपांतरण
प्रविष्टि तिथि:
11 APR 2026 10:46AM by PIB Delhi
मुख्य बिंदु
- सागरमाला के तहत कुल 845 परियोजनाएँ लागू की जा रही हैं, जिनकी अनुमानित लागत ₹6.06 लाख करोड़ है, जिनमें से 315 परियोजनाएँ ₹1.57 लाख करोड़ की लागत के साथ पूर्ण हो चुकी हैं।
- देश में 7 तटीय बर्थ परियोजनाओं के पूर्ण होने से 9.84 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA) की अतिरिक्त कार्गो हैंडलिंग क्षमता जुड़ गई है।
- वर्ष 2025–26 में प्रमुख बंदरगाहों ने रिकॉर्ड 915 मिलियन टन कार्गो का संचालन किया।
- सागरमाला 2.0 के लिए ₹85,482 करोड़ के बजटीय समर्थन का प्रस्ताव है, जिसके माध्यम से कुल ₹3.6 लाख करोड़ का निवेश प्रोत्साहित करने का लक्ष्य है।
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परिचय
भारत का समुद्री क्षेत्र देश के व्यापार और आर्थिक गतिविधियों को आकार देने में केंद्रीय भूमिका निभाता है। देश के पास लगभग 11,099 किलोमीटर लंबी समुद्री तटरेखा है, साथ ही लगभग 14,500 किलोमीटर लंबी संभावित नौगम्य अंतर्देशीय जलमार्गों की व्यवस्था है। तटीय क्षेत्रों में स्थित प्रमुख बंदरगाह भारत को वैश्विक समुद्री मार्गों से जोड़ते हैं और माल एवं यात्रियों की आवाजाही को सुगम बनाते हैं। देश के कुल व्यापार का लगभग 95% भाग मात्रा के आधार पर और लगभग 70% भाग मूल्य के आधार पर समुद्री मार्गों के माध्यम से होता है।
भारत में 12 प्रमुख बंदरगाह और 200 से अधिक गैर-प्रमुख बंदरगाह हैं। प्रमुख बंदरगाहों का प्रशासनिक नियंत्रण पोत, नौवहन और जलमार्ग मंत्रालय के पास है, जबकि गैर-प्रमुख बंदरगाह संबंधित राज्य समुद्री बोर्डों/राज्य सरकारों के अधीन आते हैं। ये बंदरगाह कच्चे तेल, कोयला, कंटेनर, उर्वरक और कृषि उत्पादों सहित विभिन्न प्रकार के माल का संचालन करते हैं, जिससे बंदरगाह और शिपिंग देश की लॉजिस्टिक प्रणाली के केंद्र में हैं।
इसी आधार पर, मार्च 2015 में सागरमाला कार्यक्रम को पोर्ट-आधारित (बंदरगाह-प्रेरित) विकास को बढ़ावा देने के लिए शुरू किया गया। इसका उद्देश्य लॉजिस्टिक दक्षता में सुधार, परिवहन लागत में कमी और तटीय शिपिंग तथा अंतर्देशीय जलमार्गों के उपयोग को बढ़ाकर व्यापार को समर्थन देना है, ताकि सड़क और रेल नेटवर्क पर निर्भरता को संतुलित किया जा सके। यह कार्यक्रम बंदरगाहों के आधुनिकीकरण और निर्माण, बंदरगाह कनेक्टिविटी में सुधार तथा सार्वजनिक एवं निजी दोनों क्षेत्रों से निवेश को प्रोत्साहित करने पर केंद्रित है
सागरमाला कार्यक्रम के प्रमुख घटक
सागरमाला कार्यक्रम में भारत के समुद्री क्षेत्र को रूपांतरित करने के लिए कई प्रमुख घटक शामिल हैं। सागरमाला के अंतर्गत समग्र रूप से ली गई परियोजनाओं को 5 स्तंभों और 24 श्रेणियों में विभाजित किया गया है।
बंदरगाह आधुनिकीकरण और नए बंदरगाहों का विकास
यह स्तंभ मौजूदा बंदरगाहों को उन्नत करने और नए बंदरगाह विकसित करने पर केंद्रित है, ताकि क्षमता बढ़ाई जा सके और परिचालन दक्षता में सुधार हो। इसमें अवसंरचना की कमियों को दूर करना तथा बंदरगाह संचालन में आधुनिकीकरण, मशीनीकरण और डिजिटल प्रणालियों की शुरुआत शामिल है।
बंदरगाह कनेक्टिविटी में सुधार
यह घटक बंदरगाहों और उनके हिन्टरलैंड (आंतरिक क्षेत्रों) के बीच कनेक्टिविटी को मजबूत करने पर केंद्रित है, ताकि माल की तेज़ और कम लागत वाली आवाजाही संभव हो सके। इसके अंतर्गत बहु-मॉडल (मल्टीमॉडल) परिवहन नेटवर्क का विकास शामिल है, जो सड़क, रेल, तटीय शिपिंग और अंतर्देशीय जलमार्गों को एकीकृत कर निर्बाध लॉजिस्टिक सुनिश्चित करता है।
बंदरगाह-प्रेरित औद्योगिकीकरण
यह कार्यक्रम, बंदरगाह-निकट क्षेत्रों में औद्योगिक क्लस्टरों के विकास को बढ़ावा देता है, जिससे विनिर्माण और आर्थिक गतिविधियों को समर्थन मिलता है। बंदरगाहों के निकटता से लॉजिस्टिक लागत में कमी आती है और घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक बेहतर पहुंच मिलती है।
तटीय समुदाय विकास
यह स्तंभ तटीय क्षेत्रों में आजीविका में सुधार और सतत विकास को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। इसमें कौशल विकास कार्यक्रम, मत्स्यपालन एवं तटीय पर्यटन को समर्थन, तथा तटीय समुदायों के लिए आर्थिक अवसरों को बढ़ाने वाली पहलें शामिल हैं।
तटीय शिपिंग और अंतर्देशीय जलमार्ग परिवहन
यह घटक माल परिवहन के लिए तटीय शिपिंग और अंतर्देशीय जलमार्गों के अधिक उपयोग को प्रोत्साहित करता है। ये साधन सड़क और रेल परिवहन की तुलना में अधिक किफायती और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प प्रदान करते हैं तथा मौजूदा परिवहन नेटवर्क पर भीड़भार को कम करने में मदद करते हैं।
सफलता की राह: उपलब्धियाँ और मील के पत्थर
पिछले ग्यारह वर्षों में सागरमाला कार्यक्रम ने ठोस और मापनीय परिणाम दिए हैं। समग्र प्रगति इसके पैमाने और समुद्री अवसंरचना विकास पर इसके दीर्घकालिक प्रभाव को दर्शाती है। कार्यक्रम के अंतर्गत लगभग 845 परियोजनाएँ, जिनकी अनुमानित लागत ₹6.06 लाख करोड़ है, ली गई हैं। 24 मार्च 2026 तक, ₹1.57 लाख करोड़ की लागत वाली 315 परियोजनाएँ पूर्ण हो चुकी हैं, 210 परियोजनाएँ क्रियान्वयन के चरण में हैं और 320 परियोजनाएँ योजना चरण में हैं।
इन पहलों के माध्यम से बंदरगाह अवसंरचना को मजबूत करने, कनेक्टिविटी में सुधार करने और तटीय क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने की दिशा में सतत प्रगति हुई है।
बुनियादी अवसंरचना और क्षमता निर्माण
लक्षित निवेशों के माध्यम से तटीय अवसंरचना को मजबूत करने और कार्गो हैंडलिंग क्षमता का विस्तार करने में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।
- मत्स्य बंदरगाह विकास: कुल 11 मत्स्य बंदरगाह परियोजनाएँ ₹1,057 करोड़ की लागत से पूरी की गई हैं, जिनसे 30,000 से अधिक मछुआरों को सीधे लाभ हुआ है। कर्नाटक में, मलपे मत्स्य बंदरगाह के तृतीय चरण के विस्तार और आधुनिकीकरण का कार्य पूर्ण हो चुका है, जबकि कुलई में मत्स्य बंदरगाह का विकास कार्य प्रगति पर है।
- तटीय बर्थ विकास: 7 तटीय बर्थ परियोजनाएँ ₹494 करोड़ की लागत से पूरी की गई हैं, जिनसे 9.84 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA) की अतिरिक्त कार्गो हैंडलिंग क्षमता जुड़ी है।
- कोलकाता स्थित श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट में ऐतिहासिक बास्कुल पुल के नवीनीकरण का कार्य जारी है, ताकि बंदरगाह की विरासत को संरक्षित रखते हुए महत्वपूर्ण अवसंरचना को उन्नत किया जा सके। कार्य पूर्ण होने पर आधुनिकीकृत पुल से बंदरगाह परिसर के भीतर कार्गो और वाहनों की आवाजाही अधिक सुरक्षित, तेज़ और कुशल हो जाएगी, जिससे भारत के सबसे पुराने और व्यस्ततम बंदरगाहों में से एक की लॉजिस्टिक दक्षता में वृद्धि होगी।
- मुंबई पोर्ट के पिर पाउ टर्मिनल पर अग्निशमन सुविधाओं के सुदृढ़ीकरण हेतु ₹52.69 करोड़ की लागत से एक परियोजना क्रियान्वयनाधीन है, जिसका केंद्र बिंदु बंदरगाह की सुरक्षा अवसंरचना को मजबूत करना है।
बेहतर बंदरगाह प्रदर्शन और वैश्विक स्थिति
इस कार्यक्रम के तहत हुए रूपांतरण से बंदरगाहों के परिचालन प्रदर्शन में सुधार और भारतीय बंदरगाहों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
- रिकॉर्ड कार्गो हैंडलिंग: भारत के प्रमुख बंदरगाहों ने वित्त वर्ष 2025–26 के दौरान सामूहिक रूप से 915.17 मिलियन टन (MT) कार्गो का रिकॉर्ड संचालन किया, जो 904 मिलियन टन के वार्षिक लक्ष्य से अधिक है। यह 7.06% की वर्ष-दर-वर्ष वृद्धि को दर्शाता है, जो समुद्री व्यापार में निरंतर प्रगति का संकेत है।
- परिचालन दक्षता: औसत पोत टर्नअराउंड समय 2014 में 96 घंटे से घटकर 2025 में 49.5 घंटे रह गया है, जिससे बंदरगाहों की दक्षता और कार्गो हैंडलिंग की गति में सुधार परिलक्षित होता है।
- वैश्विक मान्यता: भारतीय बंदरगाहों की वैश्विक उपस्थिति मजबूत हुई है, जिसमें 9 भारतीय बंदरगाह दुनिया के शीर्ष 100 बंदरगाहों में शामिल हैं; इनमें विशाखापत्तनम पोर्ट भी है, जो कंटेनर ट्रैफिक के मामले में शीर्ष 20 बंदरगाहों की सूची में आता है।
- अंतर्देशीय जलमार्गों में वृद्धि: अंतर्देशीय जलमार्गों के माध्यम से कार्गो परिवहन FY 2013–14 के 18.10 MTPA से बढ़कर FY 2024–25 में 145.50 MTPA हो गया है, जो लगभग 700% की वृद्धि दर्शाता है और एक अधिक कुशल एवं विविधीकृत लॉजिस्टिक प्रणाली के निर्माण में योगदान देता है।

यात्री कनेक्टिविटी और शहरी जल परिवहन
कार्यक्रम ने तटीय और अंतर्देशीय जलमार्गों के माध्यम से यात्रियों और वाहनों की आवाजाही का विस्तार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे कनेक्टिविटी में सुधार और यात्रा समय में कमी आई है।
- रो- पैक्स और फेरी सेवाएँ: शहरी जल परिवहन प्रणालियों को मजबूत करने के लिए 29 रो-पैक्स (ऐसे पोत जो वाहन और यात्री दोनों को ले जाते हैं) और यात्री फेरी परियोजनाएँ ₹1,233 करोड़ के निवेश के साथ ली गई हैं। इनमें से ₹706 करोड़ की लागत वाली 17 परियोजनाएँ पूरी हो चुकी हैं, जिनसे 35 लाख से अधिक यात्रियों को तेज़ और अधिक कुशल परिवहन विकल्पों का लाभ मिला है।
- यात्रा दक्षता में सुधार: घोघा–हजीरा रो-पैक्स सेवा ने लगभग 10 घंटे की सड़क यात्रा को घटाकर समुद्र मार्ग से लगभग 4 घंटे कर दिया है, जिससे 36,000 से अधिक ट्रकों, 61,000 कारों और लगभग 4 लाख यात्रियों की आवाजाही संभव हुई है। मुंबई–मांडवा फेरी सेवा ने 109 किलोमीटर लंबी सड़क यात्रा को 18.5 किलोमीटर के समुद्री मार्ग से प्रतिस्थापित कर सड़क जाम को कम किया है और यात्रा समय में उल्लेखनीय कमी की है।
तटीय आजीविका और कौशल विकास
अवसंरचना के परे, कार्यक्रम ने तटीय समुदायों की आजीविका में सुधार के लिए लक्षित कौशल विकास पहलों के माध्यम से भी योगदान दिया है।
- दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना (DDU-GKY) के अभिसरण के तहत 7,600 से अधिक अभ्यर्थियों को कौशल प्रशिक्षण दिया गया है, जिनमें से 3,100 से अधिक व्यक्तियों को समुद्री और संबंधित क्षेत्रों में सफलतापूर्वक प्लेसमेंट मिला है।
सागरमाला कार्यक्रम के तहत लगभग एक करोड़ रोजगार अवसरों की अनुमानित क्षमता आंकी गई है, जिसमें 40 लाख प्रत्यक्ष और 60 लाख अप्रत्यक्ष रोजगार शामिल हैं, जो पोर्ट-नेतृत्व औद्योगिकीकरण तथा समुद्री एवं संबद्ध अवसंरचना के विस्तार से उत्पन्न होंगे।
सागरमाला की संस्थागत रीढ़
सागरमाला कार्यक्रम को एक बहु-स्तरीय ढांचे का समर्थन प्राप्त है, जिसे केंद्र और राज्यों के बीच समन्वित योजना, कुशल क्रियान्वयन और सतत निगरानी सुनिश्चित करने के लिए तैयार किया गया है। इस ढांचे के प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं:
- राष्ट्रीय सागरमाला शीर्ष समिति (NSAC):
मई 2015 में गठित NSAC कार्यक्रम की सर्वोच्च निकाय है, जो समग्र नीतिगत मार्गदर्शन और पर्यवेक्षण प्रदान करती है। यह योजना और क्रियान्वयन से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं की समीक्षा करती है तथा परियोजनाओं को कार्यक्रम के व्यापक उद्देश्यों के अनुरूप सुनिश्चित करती है।
- समुद्री राज्य विकास परिषद (MSDC)
MSDC को समय-समय पर केंद्र–राज्य समन्वय को बढ़ावा देने के लिए बुलाया जाता है। यह केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य सरकारों और समुद्री क्षेत्र के हितधारकों को एक साथ लाकर प्रगति की समीक्षा, अंतर-मंत्रालयी मुद्दों के समाधान और बंदरगाहों एवं संबंधित अवसंरचना के समन्वित विकास को बढ़ावा देती है।
- राज्य सागरमाला समितियाँ (SSCs):
तटीय राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में गठित SSCs राज्य स्तर पर परियोजनाओं की पहचान, क्रियान्वयन के समन्वय और निगरानी के लिए जिम्मेदार हैं। ये समितियाँ राज्य-स्तरीय प्राथमिकताओं को कार्यक्रम के समग्र उद्देश्यों के साथ संरेखित करने में मुख्य भूमिका निभाती हैं।
- सागरमाला फाइनेंस कॉरपोरेशन लिमिटेड (SMFCL):
अगस्त 2016 में स्थापित सागरमाला डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड (SDCL) ने भारत की समुद्री अवसंरचना को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जून 2025 में SDCL में एक बड़ा परिवर्तन किया गया और इसका पुनर्गठन कर इसे सागरमाला फाइनेंस कॉरपोरेशन लिमिटेड (SMFCL) के रूप में स्थापित किया गया। यह परिवर्तन इसके विस्तृत दायरे को दर्शाता है, जिसके तहत SMFCL को समुद्री क्षेत्र पर केंद्रित भारत की पहली नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) के रूप में स्थापित किया गया है।
SMFCL का उद्देश्य समुद्री क्षेत्र की जरूरतों के अनुरूप वित्तीय समाधान उपलब्ध कराना है, जिससे महत्वपूर्ण वित्तीय अंतरालों को पाटा जा सके और बंदरगाहों, शिपिंग अवसंरचना तथा संबंधित उद्योगों के विकास को समर्थन मिल सके। कंपनी ने दिसंबर 2025 में लगभग ₹4,300 करोड़ के ऋण अनुमोदन को स्वीकृति दी, जिससे उसने औपचारिक रूप से समुद्री ऋण क्षेत्र में प्रवेश किया और इस क्षेत्र के लिए एक समर्पित एवं विश्वसनीय वित्तीय संस्थान के रूप में अपनी भूमिका को मजबूत किया।
नवाचार की अगली लहर
सागरमाला 2.0
सागरमाला 2.0, मार्च 2015 में शुरू किए गए सागरमाला कार्यक्रम के अगले चरण के रूप में प्रस्तावित है, जो इसकी उपलब्धियों पर आधारित है और MIV (मैरीटाइम इंडिया विज़न) 2030 तथा MAKV (समुद्री अमृत काल विज़न) 2047 में उल्लिखित समुद्री क्षेत्र की व्यापक एवं एकीकृत राष्ट्रीय दृष्टि को अपनाता है। इस योजना का उद्देश्य बंदरगाहों के व्यापक आधुनिकीकरण, बंदरगाह-प्रेरित औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देने, बंदरगाहों से तटीय और हिन्टरलैंड कनेक्टिविटी में सुधार, अंतर्देशीय जलमार्ग और तटीय शिपिंग सेवाओं के सुदृढ़ीकरण, द्वीपीय और तटीय समुदायों के विकास तथा सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप नवाचार को प्रोत्साहित करते हुए भारत को वैश्विक समुद्री हब के रूप में स्थापित करना है।
सागरमाला 2.0 को समावेशी आर्थिक वृद्धि, रोजगार सृजन और लॉजिस्टिक लागत में कमी का एक प्रमुख सक्षम कारक भी माना गया है, जो विकसित भारत 2047 (Viksit Bharat 2047) की राष्ट्रीय दृष्टि के अनुरूप है। प्रस्तावित योजना के तहत ₹85,482 करोड़ की कुल बजटीय सहायता और ₹3.6 लाख करोड़ के कुल निवेश की परिकल्पना की गई है, जिसे बंदरगाहों, अंतर्देशीय जलमार्ग एवं तटीय अवसंरचना, समुद्री सेवाओं, तटीय विकास, अनुसंधान एवं विकास तथा संस्थागत सुदृढ़ीकरण से संबंधित पहचानी गई पहलों पर योजना अवधि के दौरान व्यय किया जाएगा।
निष्कर्ष
पिछले दशक में भारत के समुद्री क्षेत्र में क्षमता, कनेक्टिविटी और परिचालन दक्षता के संदर्भ में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। सागरमाला कार्यक्रम ने बंदरगाहों के आधुनिकीकरण, तटीय एवं अंतर्देशीय जलमार्ग अवसंरचना के विकास और कार्गो हैंडलिंग क्षमताओं में वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। पूर्ण हुई परियोजनाओं ने अतिरिक्त क्षमता जोड़ी है, पोत टर्नअराउंड समय को कम किया है और बंदरगाह-प्रेरित औद्योगिक विकास तथा तटीय समुदाय विकास को समर्थन दिया है। सामूहिक रूप से, ये पहलें व्यापार और औद्योगिक गतिविधियों के लिए भारत की समुद्री अवसंरचना को मजबूत और टिकाऊ तरीके से विकसित करने के लिए एक सुव्यवस्थित ढांचा प्रदान करती हैं।
संदर्भ
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