जनजातीय कार्य मंत्रालय
जनजातीय गरिमा उत्सव 2026 के तहत जनजातीय कार्य मंत्रालय और आईआईटी दिल्ली ने 'स्थायी जनजातीय विकास को सुदृढ़ करने में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई)और प्रौद्योगिकी की भूमिका' विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया
“विकास के प्रेरक के रूप में प्रौद्योगिकी” विषय के तहत विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और नीति निर्माताओं ने जनजातीय समुदायों के लिए समावेशी एआई समाधानों पर विचार-विमर्श किया
जनजातीय गरिमा उत्सव 2026 के तहत राज्यों में समावेशी जनजातीय विकास को आगे बढ़ाने में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उभरती प्रौद्योगिकियों की भूमिका को उजागर करने के लिए राष्ट्रव्यापी कार्यशालाएं आयोजित की गईं
प्रविष्टि तिथि:
15 MAY 2026 9:56PM by PIB Delhi
जनजातीय गरिमा उत्सव प्रधानमंत्री के विजन से प्रेरित विकसित भारत की यात्रा का एक महीने तक चलने वाला उत्सव है। इसमें जनजातीय कार्य मंत्रालय ने भगवान बिरसा मुंडा सेल (बीबीएमसी), आईआईटी दिल्ली के सहयोग से आईआईटी दिल्ली में 'स्थायी जनजातीय विकास को सुदृढ़ करने में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और प्रौद्योगिकी की भूमिका' विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया। यह सेमिनार 11 से 17 मई 2026 तक मनाए जा रहे “विकास के प्रेरक के रूप में प्रौद्योगिकी” विषयगत सप्ताह के तहत आयोजित किया गया।
जनजातीय गरिमा उत्सव 10 मई से 9 जून 2026 तक राष्ट्रव्यापी स्तर पर मनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य जनजातीय समुदायों की गरिमा, विरासत, योगदान और उपलब्धियों का सम्मान करना है। साथ ही जनजातीय कार्य मंत्रालय की समग्र जनजातीय विकास और सशक्तिकरण के लिए विभिन्न उपक्रमों और योजनाओं के परिवर्तनकारी प्रभाव को सामने लाना है।

इस संगोष्ठी में 'एआई टू लास्ट माइल रोडमैप: वॉइसेस फ्रॉम ट्राइबल कम्युनिटीज' और 'एआई टू लास्ट माइल रोडमैप: सोशल पर्सपेक्टिव' शीर्षक से पैनल चर्चाएं आयोजित की गईं। इनमें प्रख्यात शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं, शोधकर्ताओं और प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों को एक साथ लाकर देश भर के जनजातीय समुदायों के लिए समावेशी और सतत विकास को आगे बढ़ाने में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और उभरती प्रौद्योगिकियों की भूमिका पर विचार-विमर्श किया गया। चर्चा यह सुनिश्चित करने पर केंद्रित रही कि समुदाय-केंद्रित, सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाली जनजातीय आबादी के लिए तकनीकी प्रयास सुलभ रहे।

सभा को संबोधित करते हुए जनजातीय कार्य मंत्रालय के उप सचिव श्री गणेश नागराजन ने 'सबसे दूर, सबसे पहले' के सिद्धांत द्वारा निर्देशित समावेशी और समुदाय-केंद्रित विकास के प्रति मंत्रालय की प्रतिबद्धता को दोहराया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत में 200 से अधिक लुप्तप्राय जनजातीय भाषाएं हैं, जिनमें से कई का दस्तावेजीकरण नहीं हुआ है। साथ ही उन्होंने जनजातीय पहचान और सांस्कृतिक विरासत के अभिन्न अंग के रूप में भाषा के संरक्षण के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने मंत्रालय के एआई-संचालित बहुभाषी मंच आदि वाणी के बारे में बात की, जो वर्तमान में गोंडी, मुंडारी, भीली और संताली भाषाओं का सहयोग करता है और जनजातीय समुदायों के साथ संचार को मजबूत करते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और सरकारी सेवाओं तक पहुंच में सुधार करने में मदद कर रहा है।

पहली पैनल चर्चा का संचालन करते हुए आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर विवेक कुमार ने 'फर्स्ट माइल' ढांचे की दिशा में 'लास्ट माइल' दृष्टिकोण से आगे बढ़ने की आवश्यकता पर जोर दिया, जहां जनजातीय समाज तकनीकी योजना और कार्यान्वयन के केंद्र में स्थित हों। उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी को एक ऐसे साधन के रूप में कार्य करना चाहिए जो संस्थानों को समुदायों की आकांक्षाओं, चिंताओं और वास्तविक अनुभवों को समझने में मदद करे, साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि स्थानीय मूल्य प्रणालियों से अलग विकास मॉडल अप्रभावी और अस्थिर होने का जोखिम रखते हैं।
दूसरे पैनल चर्चा में जनजातीय कार्य मंत्रालय की डीडीजी श्रीमती अंशु सिंह ने आदि वाणी जैसे प्लैटफॉर्मों के माध्यम से राज्यों और मंत्रालयों में डेटा विजुअलाइज़ेशन और बेहतर निर्णय लेने में एआई की बढ़ती भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भविष्य के प्रयासों में ऐसी पहलों को एआई परीक्षण, डेटा गोपनीयता, जवाबदेही और जिम्मेदार संस्थागत डेटा-साझाकरण तंत्र के लिए मजबूत ढांचे द्वारा समर्थित नागरिक-केंद्रित प्लैटफॉर्मों में बदलने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
एनसीएसटी के श्री प्रकाश उइके ने इस बात पर जोर दिया कि जनजातीय समुदायों को बाहरी रूप से थोपे गए विचारों के बजाय उनके अपने सांस्कृतिक और भाषाई ढांचों के माध्यम से समझा जाना चाहिए। उन्होंने ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक समान पहुंच सुनिश्चित करने में एआई की परिवर्तनकारी क्षमता पर भी प्रकाश डाला, जिससे मूलभूत शिक्षण परिणामों को सुदृढ़ किया जा सके और दीर्घकालिक शैक्षिक असमानताओं को कम किया जा सके।

आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर संदीप कुमार ने आदि वाणी पहल के बारे में विस्तार से बताया और समकालीन समाज में एआई की तेजी से बढ़ती भूमिका पर प्रकाश डाला। तकनीकी विशेषज्ञों और स्थानीय भागीदारों के बीच मजबूत सहयोग की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि एआई में अपार परिवर्तनकारी क्षमता है। यह पहले से ही रोजमर्रा की जिंदगी का एक अभिन्न अंग बन चुका है, लेकिन इसके विकास के साथ-साथ उचित नैतिक सुरक्षा और उत्तरदायी फ्रेमवर्क भी होने चाहिए।

चर्चा के दौरान विशेषज्ञों ने संस्थागत समन्वय बढ़ाने, जनजातीय भाषाओं के विकेंद्रीकृत संरक्षण और शिक्षा एवं नीतिगत फ्रेमवर्क के भीतर जनजातीय ज्ञान प्रणालियों के मजबूत एकीकरण की आवश्यकता पर बल दिया। वक्ताओं ने इस बात पर प्रकाश डाला कि विरासत के संरक्षण, स्वदेशी उपचार पद्धतियों और समुदाय के नेतृत्व वाले विकास का समर्थन करने के लिए प्रौद्योगिकी को उपयोगिता से परे जाना चाहिए। इस बात पर जोर देते हुए कि जनजातीय समुदायों के लिए एआई समाधान सहायक, समावेशी और स्वदेशी डेटासेट और स्थानीय वास्तविकताओं में निहित रहना चाहिए ताकि सार्थक और स्थायी प्रभाव सुनिश्चित किया जा सके।
संगोष्ठी के समापन पर जनजातीय कार्य मंत्रालय के अधिकारियों ने इस बात पर जोर दिया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और जनजातीय विकास पर चर्चा निरंतरता, नैतिकता और सामुदायिक भागीदारी पर आधारित रहनी चाहिए। साथ ही भविष्य के तकनीकी समाधान न केवल जनजातीय समुदायों के लिए विकसित किए जाने चाहिए, बल्कि जनजातीय समुदायों के साथ और उनके द्वारा ही विकसित किए जाने चाहिए।
इस संगोष्ठी में भगवान बिरसा मुंडा सेल (बीबीएमसी) के तहत की जा रही पहलों पर भी प्रस्तुतियां दी गईं, जिनमें सतत और समावेशी जनजातीय विकास के लिए आधुनिक प्रौद्योगिकी को पारंपरिक ज्ञान के साथ एकीकृत करने के प्रयासों को प्रदर्शित किया गया।
जनजातीय गरिमा उत्सव 2026 के राष्ट्रव्यापी समारोह और विषयगत सप्ताह “विकास के प्रेरक के रूप में प्रौद्योगिकी” के तहत 15 मई 2026 को 10 राज्यों और जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (टीआरआई) में एआई और प्रौद्योगिकी-सक्षम जनजातीय विकास पर कार्यशालाओं और विचार-विमर्श सत्रों का आयोजन किया गया। इन सत्रों में डिजिटल प्लैटफॉर्मों के माध्यम से शासन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, पोषण, आजीविका सृजन और आदिवासी संस्कृति और विरासत के संरक्षण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उभरती प्रौद्योगिकियों की परिवर्तनकारी भूमिका का पता लगाया गया।
ओडिशा, गुजरात, महाराष्ट्र, मिजोरम, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडु, त्रिपुरा और उत्तर प्रदेश सहित राज्यों ने प्रौद्योगिकी के माध्यम से समावेशी और स्थायी जनजातीय विकास को मजबूत करने के उद्देश्य से क्षेत्र-विशिष्ट नवाचारों और दृष्टिकोणों का प्रदर्शन किया। चर्चाओं में सामुदायिक भागीदारी, डिजिटल पहुंच, स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों के संरक्षण और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील तकनीकी प्रयासों की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं, नवोन्मेषकों और जनजातीय हितधारकों को एक साथ लाते हुए कार्यशालाओं ने जमीनी स्तर पर आदिवासी सशक्तिकरण और सहभागी विकास के साथ प्रौद्योगिकी को एकीकृत करने की दिशा में बढ़ते राष्ट्रव्यापी रुझान को प्रतिबिंबित किया।





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पीके/केसी/आरकेजे
(रिलीज़ आईडी: 2261670)
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