राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग
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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने नई दिल्ली में राज्य मानवाधिकार आयोगों (एसएचआरसी) और उनके विशेष प्रतिवेदकों एवं पर्यवेक्षकों के साथ एक दिवसीय वर्चुअल बैठक का आयोजन किया

एनएचआरसी के अध्यक्ष, न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमणियन ने मानवाधिकार उल्लंघन अधिनियम के अनुसार क्षेत्राधिकार संबंधी स्पष्टता बनाए रखने की सलाह दी ताकि अनावश्यक विवादों को कम किया जा सके और आयोग अधिक प्रभावी और गुणवत्तापूर्ण सेवा प्रदान कर सकें

एनएचआरसी सदस्य, न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन सारंगी ने एनएचआरसी और एसएचआरसी के बीच संवाद को समन्वय मजबूत करने की महत्वपूर्ण पहल बताया

एनएचआरसी सदस्य श्रीमती विजया भारती सयानी ने एसएचआरसी से प्रभावित समुदायों से जुड़ने का आग्रह किया

एनएचआरसी महासचिव श्री भरत लाल ने नीतिगत उद्देश्य और जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन के साथ-साथ वास्तविक जीवन के बीच अंतर कम करने और मानवाधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ समन्वित दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया

प्रविष्टि तिथि: 19 MAY 2026 1:17PM by PIB Delhi

 

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने नई दिल्ली स्थित अपने परिसर में राज्य मानवाधिकार आयोगों (एसएचआरसी) और उनके विशेष प्रतिवेदकों एवं पर्यवेक्षकों के साथ एक दिवसीय वर्चुअल सम्मेलन का आयोजन किया। एनएचआरसी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमणियन ने सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए कहा कि भारत का मानवाधिकार ढांचा अद्वितीय है, इसमें एनएचआरसी और एसएचआरसी दोनों ही अपने विषय-विशिष्ट क्षेत्राधिकार के अतिरिक्त कुछ मामलों पर समवर्ती क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हैं। उन्होंने कहा कि देश के मानवाधिकार प्रदर्शन का मूल्यांकन सभी आयोगों के कार्यों के माध्यम से सामूहिक रूप से किया जाता है। इसलिए मामलों के दोहराव से बचने, सूचना साझाकरण में सुधार करने और सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। इस बैठक में एनएचआरसी के सदस्य न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन सारंगी, श्रीमती विजया भारती सयानी, महासचिव श्री भरत लाल, महानिदेशक श्रीमती अनुपमा नीलेकर चंद्र और वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

न्यायमूर्ति रामासुब्रमणियन ने एसएचआरसी से अपने कामकाज को डिजिटल बनाने और एनएचआरसी के साथ एक एकीकृत एचआरसीनेट पोर्टल से जुड़ने का आग्रह किया। उन्होंने आयोगों को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर न जाने की चेतावनी भी दी और कहा कि हालांकि न्यायालयों ने मौलिक और मानवाधिकारों के दायरे को बढ़ाया है, लेकिन मानवाधिकार संस्थानों को मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम के तहत दी गई परिभाषाओं का पालन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अधिकार क्षेत्र में स्पष्टता बनाए रखने से अनावश्यक विवाद कम होंगे और आयोग अधिक प्रभावी और गुणवत्तापूर्ण सेवाएं प्रदान कर सकेंगे। उन्होंने भविष्य में राज्य मानवाधिकार आयोगों के बीच संवाद और घनिष्ठ सहयोग की आशा भी व्यक्त की।

       

न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन सारंगी ने एनएचआरसी और एसएचआरसी के बीच संवाद को समन्वय को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया। उन्होंने आदेशों के प्रभावी कार्यान्वयन और पीड़ित व्यक्तियों, विशेष रूप से हिरासत में हुई मौतों जैसे संवेदनशील मामलों में, समय पर कार्रवाई के लिए दोनों पक्षों के बीच बेहतर संचार और समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया।

सदस्य श्रीमती विजया भारती सयानी ने एसएचआरसी से प्रभावित समुदायों के साथ अधिक संपर्क बढ़ाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि एनएचआरसी और एसएचआरसी के विशेष पर्यवेक्षकों और प्रतिवेदकों के बीच समन्वय से संस्थागत प्रभावशीलता मजबूत हो सकती है। उन्होंने कर्नाटक सरकार द्वारा जन सहायता के लिए एसएचआरसी के संपर्क विवरण प्रदर्शित करने की पहल की भी सराहना की।

इससे पहले एनएचआरसी के महासचिव श्री भरत लाल ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि मानवाधिकार एक जटिल विषय है जिसके लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और उसके विशेष प्रतिवेदकों एवं पर्यवेक्षकों के साथ-साथ एसएचआरसी के बीच सामूहिक कार्रवाई, घनिष्ठ समन्वय और सामंजस्यपूर्ण दृष्टिकोण की आवश्यकता है। आयोग की ऑनलाइन प्रणाली के माध्यम से प्राप्त शिकायतों का उल्लेख करते हुए, उन्होंने बताया कि पिछले 5 वर्षों में 4.28 लाख शिकायतें प्राप्त हुई हैं, जो पुलिस द्वारा मानवाधिकारों का उल्लंघन (18 प्रतिशत), माफियाओं द्वारा संगठित शोषण (17.4 प्रतिशत), सेवा संबंधी मामले- पेंशन/वेतन का भुगतान न होना (6 प्रतिशत), महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन (5.8 प्रतिशत), जेलों और कारागारों की स्थिति (3.5 प्रतिशत), श्रमिकों के अधिकारों का उल्लंघन (2.2 प्रतिशत), स्वास्थ्य संबंधी उल्लंघन (2 प्रतिशत), शैक्षणिक संस्थानों में मानवाधिकारों का उल्लंघन (2 प्रतिशत), बाल अधिकारों का उल्लंघन (1.7 प्रतिशत) आदि से संबंधित हैं।

सक्रिय निगरानी और जमीनी स्तर पर हस्तक्षेप पर जोर देते हुए, उन्होंने हिरासत में हुई मौतों, आश्रय गृहों में दुर्व्यवहार, मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों में दयनीय स्थिति, हाथ से मैला ढोने से हुई मौतों, साथ ही भिखारियों, दिव्यांगजनों और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के पुनर्वास और प्रमाणीकरण तंत्र में कमियों के मामलों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने आशा व्यक्त की कि इस तरह की सहभागिता और संवाद नीतिगत उद्देश्यों और जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन के बीच के अंतर को कम करने, मजबूत संस्थागत समन्वय स्थापित करने में सहायक होंगे, साथ ही मानवाधिकारों के उल्लंघन की रोकथाम भी सुनिश्चित करेंगे।

मानवाधिकारों के उल्लंघन से जुड़े मामलों के शीघ्र और प्रभावी समाधान सुनिश्चित करने में डिजिटल शासन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एनएचआरसी ने शिकायत प्रबंधन प्रणाली के रूप में एचआरसीनेट पोर्टल विकसित किया है। सभी मानवाधिकार संस्थानों द्वारा इसे अपनाने से मामलों की पुनरावृत्ति से बचा जा सकता है और समन्वय में सुधार हो सकता है। अब तक, 23 राज्य मानवाधिकार आयोगों ने इस प्रणाली को अपनाया है। हालांकि, आंध्र प्रदेश, गुजरात, झारखंड और नागालैंड के एसएचआरसी अभी तक इससे नहीं जुड़े हैं, जबकि मध्य प्रदेश और राजस्थान के एसएचआरसी जुड़ने के बावजूद अभी तक पोर्टल के माध्यम से शिकायतों के समाधान की शुरुआत नहीं कर पाए हैं।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, मानवाधिकारों के उल्लंघन की निगरानी वैश्विक तंत्रों के माध्यम से की जाती है, जबकि देश के भीतर, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग 27 राज्य मानवाधिकार आयोग  और विभिन्न क्षेत्रीय आयोग मानवाधिकारों के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में कार्य करते हैं। इसलिए देश भर में किए जा रहे कार्यों की समग्र जानकारी एक ही स्थान पर उपलब्ध होना महत्वपूर्ण है।

सम्मेलन के दौरान आयोजित दो सत्रों में एसएचआरसी के साथ उनकी चुनौतियों को समझने के लिए संवाद शामिल था, जिसके बाद एनएचआरसी ने विशेष प्रतिवेदकों और पर्यवेक्षकों ने देश में मानवाधिकार तंत्र को मजबूत करने के लिए अपने अनुभवों को साझा किया।

हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, गुजरात, गोवा और कर्नाटक के राज्य मानवाधिकार आयोगों के अध्यक्ष, सदस्य और प्रतिनिधि, साथ ही विशेष प्रतिवेदक और पर्यवेक्षक, जिन्हें आयोग को मानवाधिकार स्थिति पर रिपोर्ट और सिफारिशें प्रस्तुत करने के लिए मानवाधिकार विषयगत क्षेत्र सौंपे गए हैं, इस चर्चा में शामिल हुए।

सम्मेलन के दौरान एसएचआरसी को मजबूत करने और संस्थागत समन्वय के लिए दिए गए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव निम्नलिखित हैं:

  • राज्य सरकारों द्वारा कर्मचारियों की संख्या, बुनियादी ढांचे, पहुंच, जमीनी स्तर पर भागीदारी और संस्थागत क्षमता में सुधार के माध्यम से मानवाधिकार नियंत्रण केंद्रों एसएचआरसी को मजबूत बनाना ताकि हिरासत में हिंसा, पुलिस की ज्यादतियों और अन्य मानवाधिकार उल्लंघनों से संबंधित बढ़ती शिकायतों का प्रभावी ढंग से समाधान किया जा सके।
  • मानवाधिकार आयोग की सिफारिशों की प्रवर्तनीयता और कानूनी स्पष्टता को बढ़ाना तथा आयोगों के जनादेश, शक्तियों और अधिकार क्षेत्र के संबंध में जनता में जागरूकता बढ़ाना।
  • समन्वय, निगरानी और कार्यवाही के दोहराव से बचने के लिए एसएचआरसी को एचआरसीनेट पोर्टल से जोड़ना ताकि एनएचआरसी के साथ एकीकृत डिजिटल डेटा साझा किया जा सके।
  • एसएचआरसी और एनएचआरसी के विशेष पर्यवेक्षक और प्रतिवेदक बेहतर जवाबदेही और अनुवर्ती कार्रवाई के लिए सरकारी विभागों और अन्य हितधारकों के बीच तालमेल हेतु पारस्परिक समन्वय में सुधार करेंगे।
  • समन्वित क्षेत्रीय दौरों, निरीक्षणों और संस्थागत अनुवर्ती कार्रवाई को बढ़ाना, जिसमें जेलों, मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों, नशामुक्ति केंद्रों, आश्रय गृहों, अस्पतालों, वृद्धाश्रमों और अन्य संवेदनशील संस्थानों का दौरा शामिल है।
  • एनएचआरसी और एसएचआरसी की कमजोर व्यक्तियों, संस्थानों से संपर्क करने में असमर्थ महिलाओं बच्चों, बेघर बुजुर्ग एवं मानसिक बीमारियों से ग्रस्त व्यक्तियों को सहायता प्रदान करने के लिए पहुंच बढ़ाना।
  • धोखाधड़ी करने वाले संगठनों और मध्यस्थों द्वारा मानवाधिकार से जुड़े मंचों का दुरुपयोग रोकने के लिए एनएचआरसी द्वारा राज्यों को दिए गए निर्देशों का अनुपालन करना।
  • एसएचआरसी को शैक्षणिक संस्थानों, मानवाधिकार प्रकोष्ठों और सामुदायिक पहुंच कार्यक्रमों के माध्यम से मानवाधिकार जागरूकता, शिक्षा और संवेदीकरण के लिए एनएचआरसी की पहलों की शुरुआत।

विशेष प्रतिवेदकों और पर्यवेक्षकों ने विषयगत और क्षेत्र-विशिष्ट मानवाधिकार संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए निम्नलिखित प्रतिक्रियाएं और सुझाव प्रदान किए।

  • मानवाधिकारों के उल्लंघन के बाद दंडात्मक कार्रवाई पर निर्भर रहने के बजाय, पुलिस, सुधार गृह कर्मचारियों और सीएपीएफ के नियमित प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के माध्यम से निवारक हस्तक्षेपों पर ध्यानकेंद्रित किया जाना चाहिए।
  • जेलों में भीड़ कम करने, रहने की बेहतर स्थिति, बेहतर संचार सुविधाएं, जेल में वेतन का मानकीकरण और निगरानी गृहों और आश्रय गृहों के विस्तार सहित जेल सुधारों को लागू करके उनका पालन किया जाना चाहिए।
  • जिला अधिकारियों और पुलिस के बीच मजबूत समन्वय, कानूनी प्रवर्तन और जागरूकता के माध्यम से बचाए गए बाल श्रमिकों, बंधुआ मजदूरों और अन्य कमजोर बच्चों के उचित पुनर्वास को सुनिश्चित करना।
  • बाल कल्याण समितियों को मजबूत करना, बाल संरक्षण प्रणालियों को सुदृढ़ बनाना और जिलों और राज्यों में बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए हेल्पलाइनों को बहाल करना।
  • पुनर्वास, कलंक निवारण, कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच और समुदाय आधारित निगरानी के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य, कुष्ठ रोग और दिव्यांगों के अधिकारों पर अधिक जोर देना।
  • अंतर्लिंगी शिशुओं, लैंगिक गैर-अनुरूप बच्चों और अन्य कमजोर समूहों की सुरक्षा और मान्यता सुनिश्चित करना, जिसमें उन्हें प्रभावित करने वाली संस्थागत और चिकित्सा पद्धतियों की निगरानी करना शामिल है।
  • सार्वजनिक सेवा वितरण दुकानों और असुरक्षित आबादी की सेवा करने वाली संस्थाओं सहित कल्याणकारी वितरण प्रणालियों में गरिमा और पहुंच में सुधार करना।
  • प्रदूषण, जल संदूषण और जलवायु संबंधी मानवाधिकार चिंताओं को दूर करने के लिए वैज्ञानिक और वास्तविक समय में पर्यावरण निगरानी प्रणालियों, साक्ष्य-आधारित अनुसंधान और पर्यावरणीय न्याय मानचित्रण का उपयोग करना।
  • सफाईकर्मियों, कचरा उठाने वाले श्रमिकों, ट्रक चालकों, खदान श्रमिकों और अन्य कमजोर श्रमिक समूहों के लिए व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, बीमा और कल्याणकारी सुरक्षा उपायों में सुधार करना।
  • सुरक्षित प्रौद्योगिकियों, सुरक्षात्मक उपायों और नैदानिक ​​अवसंरचना के माध्यम से सिलिकोसिस जैसी बीमारियों के लिए जागरूकता अभियान और निवारक तंत्र को मजबूत करना।
  • नियमित निरीक्षण, शिकायत निवारण और निगरानी तंत्र के माध्यम से विद्यालयों, आदिवासी छात्रावासों, अस्पतालों, कारागारों और अन्य संस्थानों में स्थितियों में सुधार करना।
  • दिव्यांग बच्चों के लिए विशेष शिक्षकों की उपलब्धता और समावेशी शैक्षिक सहायता प्रणालियों में सुधार करना।
  • राज्यों में सफल कल्याण और पुनर्वास मॉडलों को अपनाना, जिसमें जेलों में आंगनवाड़ी से जुड़ी बाल देखभाल सुविधाएं और समुदाय आधारित सहायता प्रणाली शामिल हैं।
  • अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं और आपदा प्रभावित कर्मियों के लिए मुआवजे, पुनर्वास और कल्याणकारी सहायता सुनिश्चित करना और
  • स्वास्थ्य अधिकार ढांचे के अंतर्गत भर्ती मानकों और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता से संबंधित समस्याओं का समाधान करना।

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पीके/केसी/जेके/एचबी


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