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एमआईएफएफ 2026 में, बिप्लब गोस्वामी ने आइडिया से स्क्रीनप्ले तक के लंबे, अकेले और खूबसूरत सफ़र को किया बयां

'लापता लेडीज़' के लेखक के मुताबिक, लिखने का कोई फ़ॉर्मूला नहीं है, बस खुद पर भरोसा होना चाहिए

ऐसा कैसे होता है कि एक पल के लिए मन में आया विचार एक पूरा स्क्रीनप्ले बन जाता है? कोई लेखक किसी कहानी के स्क्रीन पर आने से पहले सालों तक उससे कैसे जुड़ा रहता है? ये कुछ ऐसे सवाल थे जिन पर स्क्रीनराइटर, एडिटर और निर्देशक बिप्लब गोस्वामी ने अपनी वर्कशॉप 'फ्रॉम आइडिया टू आउटलाइन: द एनाटॉमी ऑफ़ ए सीन' में बात की। इस कार्यशाला ने आज 19वें मुंबई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव 2026 में बहुप्रतीक्षित वर्कशॉप सीरीज़ की शुरुआत की।

ऑस्कर 2025 के लिए भारत की आधिकारिक एंट्री और हाल के सालों की सबसे चर्चित फ़िल्मों में से एक 'लापता लेडीज़' के लेखक के तौर पर मशहूर गोस्वामी ने कार्यशाला में शामिल लोगों को कहानी कहने की उस प्रक्रिया से रूबरू कराया, जो अक्सर उलझी हुई, बहुत निजी और बहुत ज़्यादा मेहनत वाली होती है।

पूरे सत्र के दौरान उन्होंने कई बार एक ही बात दोहराई,"इसका कोई फ़ॉर्मूला नहीं है।" गोस्वामी के मुताबिक, हर कहानी अलग तरह से शुरू होती है। कभी-कभी यह अपने-आप बनती है, कभी-कभी चीज़ों के अवलोकन से और कभी-कभी किसी भी छोटी सी बात से जो दिमाग में कोई आइडिया जगा देती है। "बतौर लेखक हम हमेशा कुछ न कुछ ढूंढते रहते हैं। कभी-कभी हमें एक आइडिया की ज़रूरत होती है। कभी-कभी कहानी अपने-आप आ जाती है। इसका कोई तय रास्ता नहीं है।"

लेखक ने इस प्रक्रिया में रचनात्मकता के साथ आने वाली भावनात्मक चुनौतियों के बारे में भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी मुश्किलों में से एक है कि आपको तब भी लिखते रहना है, जब इस बात की कोई गारंटी न हो कि कोई प्रोड्यूसर आपकी कहानी को अपना समर्थन देगा।

उन्होंने कहा, "हो सकता है कि आपके पास अच्छी कहानी हो, लेकिन कोई प्रोड्यूसर न हो। यह बात निराश करने वाली हो सकती है। लेकिन अगर आपको सिनेमा से सच में प्यार है, तो आप इसकी परवाह किए बिना लिखते रहते हैं। मैं एक ही समय में लेखक, डायरेक्टर और प्रोड्यूसर के नज़रिए से लिखता हूँ। भले ही कोई प्रोड्यूसर न हो, मैं लिखता रहूँगा।"

सिनेमा को एक ऐसा जुनून बताते हुए, जिसमें इंसान पूरी तरह डूब जाता है, गोस्वामी ने कहा कि फ़िल्म बनाने के लिए आपको जुनूनी होना बहुत ज़रुरी है।

"सिनेमा हर किसी के लिए नहीं है। इसके लिए आपमें जुनून होना चाहिए। इसकी भूख होनी चाहिए। कभी-कभी आप ख्यालों में खोए रहते हैं और चीजें भूल जाते हैं, क्योंकि आप लगातार कहानियों की दुनिया में जी रहे होते हैं। तभी आप इस पूरे सफर में टिके रह सकते हैं।"

उन्होंने कहानी कहने को एक लंबा सफ़र बताया, जिसमें शक और थकान भरे पल भी आते हैं। "हम कुछ बनाने की चाहत के साथ शुरुआत करते हैं। फिर बीच में कहीं हम थक जाते हैं। कभी-कभी मंज़िल तक पहुँचने में सालों लग जाते हैं। लेकिन एक उम्दा कहानी बनाने में समय लगता है। आपको उनके साथ जीना पड़ता है।"

'लापता लेडीज़' का बनना खुद एक ज़बरदस्त मिसाल बन गया। गोस्वामी ने बताया कि उन्होंने सबसे पहले 2014 में इस कहानी को रजिस्टर कराया था, जब यह सिर्फ़ 22 सीन का एक संग्रह थी। "फिर ज़िंदगी आगे बढ़ी। मुझे आर्थिक रूप से भी टिके रहना था। जब तक फ़िल्म रिलीज़ हुई, दुनिया बदल चुकी थी। लेकिन फिर भी मुझे वही कहानी कहनी थी। चुनौती यह थी कि कल की कहानी को आज के दर्शकों को कैसे सुनाया जाए।"

उन्होंने माना कि यह पूरा सफर मुश्किल भरा था। "दिन-रात आप कहानी के बारे में ही सोचते रहते हैं। क्या लिखना चाहिए? दर्शक किस चीज़ से जुड़ेंगे? दबाव होता है। लेकिन आखिरकार आपको कोई न कोई रास्ता मिल ही जाता है।"

वर्कशॉप का एक बहुत दिलचस्प हिस्सा इस बात पर केंद्रित था कि प्रोडक्शन शुरू होने से बहुत पहले ही स्क्रीनप्ले की कल्पना कैसे की जाए। गोस्वामी ने लेखकों को अपनी ही फिल्मों का पहला दर्शक बनने के लिए प्रोत्साहित किया। "जब मैं लिखता हूँ, तो मैं एक काल्पनिक स्क्रीन पर फिल्म देखता हूँ। मैं पहला दर्शक बन जाता हूँ। फिर मैं कल्पना करता हूँ कि दर्शक इसे कैसे देखेंगे। मैं मन ही मन एडिटिंग टेबल पर भी जाता हूँ और देखता हूँ कि सीन कैसे बनाए गए हैं। यह अभ्यास मुझे कई नज़रियों से फिल्म को समझने में मदद करता है।"

एक फिल्म एडिटर के तौर पर उनके अनुभव ने उनके लेखन की प्रक्रिया को काफी प्रभावित किया है। मिलकर काम करने के महत्व पर जोर देते हुए, उन्होंने उभरते फिल्म निर्माताओं को याद दिलाया कि सिनेमा कभी भी किसी एक व्यक्ति का काम नहीं होता।

"फिल्म एक सामूहिक माध्यम है। लेखकों को दूसरे विभागों को भी समझने की जरूरत है। एक बार जब आप कुछ लिख लेते हैं, तो आपको उससे खुद को अलग भी करना होता है। अगर आप किसी चीज़ पर अड़ जाते हैं और जिद करते हैं कि सब कुछ वैसा ही रहे, जैसा आपने सोचा था, तो आपको मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। दूसरे विभागों के अपने नज़रिए होंगे और होने भी चाहिए।"

स्क्रीनप्ले के सिद्धांत और कहानी कहने के फॉर्मूलों के बारे में पूछे जाने पर, गोस्वामी ने किसी एक फ्रेमवर्क के प्रति संदेह जताया। उन्होंने कहा,"मैं थ्योरी पर ध्यान नहीं देता। मैं कहानी पर ध्यान देता हूँ। सिनेमा असल में कहानी कहना ही है"। "कभी-कभी कोई चौंकाने वाली घटना कहानी की शुरुआत करती है। कभी-कभी कहानी में दूसरा मोड़ आता है। हर कहानी अपनी लय खुद खोजती है।"

उनके अनुसार, उभरते हुए लेखक अक्सर तब परेशान हो जाते हैं, जब उनके पास कोई अच्छा आइडिया तो होता है, लेकिन वे उसे एक पूरी पटकथा में बदलने में मुश्किल महसूस करते हैं। "इस बात की ज़्यादा चिंता न करें कि आप कैसे लिख रहे हैं। इस बात पर ध्यान दें कि आप क्या हासिल करना चाहते हैं। कभी-कभी मैं सिर्फ़ एक लाइन से शुरुआत करता हूँ। फिर वह एक सारांश बन जाता है। फिर सीन बनने लगते हैं। कभी-कभी, मैं शुरू से ही सीन-दर-सीन लिखता हूँ। इसका कोई तय नियम नहीं है।"

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि सबसे ज़रूरी चीज़ है लगातार कोशिश करते रहना। "पहले खुद पर भरोसा रखें। फिर जिस भी तरीके से आपको आसानी हो, लिखते रहें। बाद में, जब आप इसे पेशेवर तौर पर पेश करेंगे, तो आप इसे इंडस्ट्री के मानकों के हिसाब से व्यवस्थित कर सकते हैं।"

गोस्वामी ने इस सोच को भी गलत बताया कि सिर्फ़ शॉर्टकट या तकनीकी तरकीबों से लेखन में महारत हासिल की जा सकती है। "कोई शॉर्टकट नहीं होता। लिखना मुश्किल काम है। आप तकनीकें सीख सकते हैं, लेकिन वे अपने-आप आपको एक अच्छा लेखक नहीं बना देंगी।"

इसके बजाय, उन्होंने प्रतिभागियों को चीज़ों को ध्यान से देखने और समझने की आदत डालने के लिए प्रेरित किया। "लोगों को देखें। समाज को देखें। हाव-भाव, रिश्तों और हालात को देखें। वही देखी-परखी बातें आपके किरदार और आपकी कहानियाँ बनती हैं।"

इस सत्र में उभरते लेखकों को न सिर्फ़ कहानी के उतार-चढ़ाव, किरदारों की भूमिका और सीन बनाने के बारे में व्यावहारिक जानकारी मिली, बल्कि यह भरोसा भी मिला कि हर पटकथा अपना रास्ता खुद बनाती है। उभरते कहानीकारों और फ़िल्म प्रेमियों से भरे कमरे में, गोस्वामी का संदेश सरल लेकिन असरदार था: कहानी पर भरोसा रखें, प्रक्रिया पर भरोसा रखें और सबसे ज़रूरी बात, लिखते रहें।

सत्यजीत रे फिल्म और टेलीविजन संस्थान (एसआरएफटीआई), कोलकाता से फ़िल्म एडिटिंग में ग्रेजुएट बिप्लब गोस्वामी फिलहाल त्रिपुरा फिल्म और टेलीविजन संस्थान (टीएफटीआई), अगरतला में सलाहकार हैं।

19वें एमआईएफएफ के बारे में

एमआईएफएफ का 19वां संस्करण एक शानदार और ज्ञानवर्धक सिनेमाई अनुभव देने का वादा करता है। इसमें मशहूर अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मों के साथ-साथ सिनेमा जगत से जुड़ी कई रोमांचक पहल भी शामिल हैं।

  • इस साल, महोत्सव के प्रतिस्पर्धात्मक खंड में भारत समेत 47 देशों से 1,459 फ़िल्मों की एंट्री मिली हैं।
  • यह महोत्सव 42 से ज़्यादा भारतीय भाषाओं और भारत के बाहर की 30 से ज़्यादा भाषाओं में फ़िल्में दिखाता है, जो इसकी वैश्विक पहुँच और सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है।
  • दुनिया भर के मशहूर फ़िल्म निर्माताओं की कृतियों को शामिल करते हुए, इस महोत्सव में बेहतरीन डॉक्यूमेंट्री, शॉर्ट फ़िक्शन फ़िल्में, एनिमेशन, नए निर्देशकों की फ़िल्में और छात्रों की फ़िल्मों को पेश किया जाएगा।
  • फ़िल्मों की स्क्रीनिंग के साथ-साथ, 'डॉक बाज़ार' का दूसरा संस्करण, शानदार मास्टरक्लास और आईडीपीए का 'ओपन फ़ोरम' महोत्सव में सिनेमाई और रचनात्मक आदान-प्रदान को और बेहतर बनाएंगे।

आइए, एमआईएफएफ 2026 में कहानी कहने की जीवंत दुनिया में कदम रखें, जहाँ दमदार सिनेमा, रचनात्मक सोच और प्रेरणादायक आवाज़ें मिलकर डॉक्यूमेंट्री, एनिमेशन और शॉर्ट फ़िक्शन फ़िल्ममेकिंग का एक यादगार जश्न मनाती हैं।

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पीके/केसी/एनएस/डीए

 


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