जनजातीय कार्य मंत्रालय
ओडिशा के भुवनेश्वर में जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को मजबूत करने पर राष्ट्रीय कार्यशाला शुरू हुआ
जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा विकसित एक अनोखा डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म ‘ट्राइबएक्स’ का शुभारंभ किया गया; मंत्रालय ने संपूरणानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर किया
मंत्रालय ने जनजातीय उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए केआईआईटी टेक्नोलॉजी बिज़नेस इनक्यूबेटर के साथ एक और एमओयू पर हस्ताक्षर किया
प्रविष्टि तिथि:
07 JUL 2026 7:27PM by PIB Delhi
जनजातीय कार्य मंत्रालय ने आज ओडिशा के भुवनेश्वर में जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (टीआरआई) को मजबूत करने पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला शुरू किया। यह कार्यशाला जनजातीय धरोहर को संरक्षित करने एवं समावेशी विकास का समर्थन करने वाले संस्थानों को मजबूत करने के लिए भारत सरकार की प्रतिबद्धता की पुनः पुष्टि करती है।
कार्यशाला का उद्घाटन केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री श्री जुएल ओराम ने श्री दुर्गादास उइके, जनजातीय कार्य राज्य मंत्री; डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम, सदस्य, नीति आयोग; श्री नित्यानंद गोंड, अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति विकास, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग मंत्री, ओडिशा सरकार; श्रीमती रंजना चोपड़ा, सचिव, जनजातीय कार्य मंत्रालय; श्री बी. परमेश्वरन, आयुक्त-सह-सचिव, अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति विकास, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग, ओडिशा सरकार; और श्री अनंत प्रकाश पांडेय, संयुक्त सचिव, जनजातीय कार्य मंत्रालय और केंद्र एवं राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति में की। कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रगान एवं राष्ट्रगीत से हुई, जिसके बाद औपचारिक रूप से दीप प्रज्वलित किया गया।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत जनजातीय विकास में एक परिवर्तनकारी दौर से गुजर रहा है। सरकार जनजातीय भाषाओं, परंपराओं एवं ज्ञान प्रणालियों को संरक्षित करने के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, आजीविका सृजन एवं सतत विकास के माध्यम से सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। अनुसंधान, नवाचार एवं सांस्कृतिक संरक्षण के केंद्र के रूप में जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (टीआरआई) को मजबूत करना इस दृष्टिकोण का एक अहम हिस्सा है।
ओडिशा सरकार के सहयोग से आयोजित इस कार्यशाला में लगभग 200 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, जिनमें जनजातीय अनुसंधान संस्थानों, राज्य जनजातीय कल्याण विभागों, शिक्षाविदों, अनुसंधान संस्थानों, प्रौद्योगिकी संगठनों, उद्योग, विकास भागीदारों एवं नागरिक समाज के प्रतिनिधि शामिल थे।
उद्घाटन सत्र की एक प्रमुख विशेषता ‘ट्राइबएक्स’ का शुभारंभ था, जो भारत की जनजातीय कलाओं, संस्कृति, भाषाओं एवं पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण तथा संवर्धन के लिए एक डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म है। इस प्लेटफॉर्म में एक डिजिटल अकादमी शामिल है, जो जनजातीय कला शैलियों में निःशुल्क प्रमाणपत्र और यूजीसी-अनुरूप डिप्लोमा पाठ्यक्रम प्रदान करती है तथा एक विरासत अभिलेखागार भी है, जिसमें जनजातीय साहित्य, मौखिक परंपराएं एवं सांस्कृतिक प्रथाएं संकलित हैं। मंत्रालय ने सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के साथ एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किया ताकि ट्राइबएक्स के अंतर्गत जनजातीय भाषाओं, पारंपरिक ज्ञान,कला, वस्त्र एवं संग्रहालय विज्ञान पर यूजीसी-स्वीकृत डिप्लोमा कार्यक्रमों को संयुक्त रूप से विकसित किया जा सके।

साथ ही मंत्रालय ने भुवनेश्वर के केआईआईटी टेक्नोलॉजी बिज़नेस इनक्यूबेटर (केआईआईटी-टीबीआई) के साथ एक एमओयू पर भी हस्ताक्षर किया, ताकि क्षमता निर्माण, बाजार लिंक और वित्तपोषण तक पहुंच के माध्यम से जनजातीय उद्यमियों की पहचान की जा सके, उन्हें इनक्यूबेट और मार्गदर्शन प्रदान किया जा सके।

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए, श्री जुएल ओराम, केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री ने कहा:
“भारत के जनजातीय समुदायों के पास भाषाओं, बोलियों, मौखिक परंपराओं एवं पारंपरिक ज्ञान का एक अद्भुत भंडार है, जिसे आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित रखना आवश्यक है। हालांकि कई जनजातीय भाषाओं की अपनी लिपियां विकसित हो चुकी हैं, लेकिन बहुत सी बोलियां मुख्य रूप से मौखिक परंपरा के माध्यम से ही जीवित हैं; इसलिए इनका व्यवस्थित दस्तावेज़ीकरण करना एक ज़रूरी राष्ट्रीय प्राथमिकता है। जनजातीय अनुसंधान संस्थानों की यह अहम ज़िम्मेदारी है कि वे समुदायों के साथ जुड़ें, उनकी भाषाओं एवं पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेज़ीकरण करें और राज्यों के बीच सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करें।”
इस अवसर पर बोलते हुए, श्री दुर्गादास उइके, जनजातीय कार्य राज्य मंत्री ने कहा:
“प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में, पीएम जनमन, धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान और एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों जैसी पहलों के माध्यम से, जनजातीय विकास देश की विकसित भारत@2047 की यात्रा का अभिन्न अंग बन गया है। टीआरआई को अब जनजातीय आजीविका, महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, जलवायु के प्रति लचीलापन, डिजिटल समावेश एवं वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन जैसी उभरती प्राथमिकताओं पर शोध करना चाहिए। शोध का असली महत्व ऐसी नीतियां बनाने की उसकी क्षमता में है जो जनजातीय परिवारों के जीवन में सार्थक बदलाव ला सकें।”
सभा को संबोधित करते हुए डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम,सदस्य नीति आयोग ने कहा:
“जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को पारंपरिक अनुसंधान निकायों से आगे बढ़कर पॉलिसी थिंक टैंक, स्वदेशी ज्ञान भंडारों एवं नवाचार के उत्कृष्टता केंद्रों के रूप में विकसित होना चाहिए। अनुसंधान में जनजातीय समुदायों की आवाज़ों, उनके जीवन के वास्तविक अनुभवों एवं उनकी पारंपरिक बुद्धिमत्ता को समाहित करना चाहिए, क्योंकि विकास तभी सार्थक होता है जब समुदाय स्वयं अपने भविष्य को आकार देने में सक्रिय भागीदार बनते हैं। जैसे-जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता शासन-प्रणाली को परिवर्तित कर रहा है, वैसे-वैसे यह भी समान रूप से महत्वपूर्ण है कि आंकड़ों को मानवीय दृष्टिकोण से समझा जाए और साक्ष्यों को समुदायों की वास्तविक परिस्थितियों से जोड़कर रखा जाए।”
प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए, श्री नित्यानंद गोंड, अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति विकास, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के मंत्री, ओडिशा सरकार ने कहा:
“जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को नीति नवाचार, डिजिटल ज्ञान एवं अंतर्विषयक अनुसंधान केंद्रों के रूप में विकसित होना चाहिए, जिसमें जनजातीय शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य देखभाल, प्रवास, जलवायु सहनशीलता, वन-आधारित आजीविका और जनजातीय भाषाओं का संरक्षण शामिल हो। हमें डिजिटल दस्तावेज़ीकरण, जीआईएस-आधारित मानचित्रण एवं एआई-सक्षम विश्लेषण जैसे आधुनिक अनुसंधान उपकरणों को बढ़ावा देना चाहिए, साथ ही यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि जनजातीय समुदाय अनुसंधान प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनें।”
अपने उद्घाटन भाषण में, श्रीमती रंजना चोपड़ा, सचिव, जनजातीय कार्य मंत्रालय ने कहा:
“जनजातीय विकास में पारंपरिक रूप से स्वास्थ्य, शिक्षा एवं अवसंरचना पर ध्यान दिया गया है। जनजातीय विरासत को संजोने, संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने और नीति-निर्माण के लिए साक्ष्य तैयार करने वाले संस्थानों को मजबूत करने की भी उतनी ही आवश्यकता है। जनजातीय अनुसंधान संस्थान इस खास भूमिका को निभाते हैं लेकिन कई संस्थानों को मानव संसाधन, संस्थागत क्षमता एवं विषयगत-विशेषज्ञता जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यह कार्यशाला टीआरआई के लिए अनुभव साझा करने एवं सर्वोत्तम प्रथाओं का आदान-प्रदान करने का एक मंच है। इसकी सिफारिशें मंत्रालय को टीआरआई को ज्ञान, शोध एवं नीति समर्थन के जीवंत केंद्रों में परिवर्तित करने के लिए रोडमैप तैयार करने में मार्गदर्शन प्रदान करेंगी।”
अपने स्वागत भाषण में, श्री बी. परमेश्वरन, आयुक्त-सह-सचिव, अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति विकास, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग, ओडिशा सरकार ने गणमान्य लोगों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया। उन्होंने ओड़िशा की समृद्ध जनजातीय विरासत एवं जनजातीय कल्याण के लिए राज्य सरकार के प्रयासों पर प्रकाश डाला और आशा व्यक्त किया कि इस कार्यशाला से देशभर में टीआरआई को मजबूत करने के लिए मूल्यवान सुझाव प्राप्त होंगे।
धन्यवाद प्रस्ताव पेश करते हुए, श्री अनंत प्रकाश पांडे, संयुक्त सचिव, जनजातीय कार्य मंत्रालय ने कहा कि यह कार्यशाला नए सिरे से तैयार किए जा रहे जनजातीय अनुसंधान संस्थानों की नींव रखेगी, जिससे पूरे भारत में जनजातीय समुदायों को मजबूती मिलेगी और 'विकसित भारत@2047' के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।
पहले दिन की तकनीकी सत्रों में पूरे देश के टीआरआई ने उनकी उपलब्धियों, बेहतरीन प्रथाओं एवं संस्थागत चुनौतियों पर प्रस्तुतियां दीं, इसके बाद नीति निर्माण में टीआरआई की भूमिका पर चर्चा हुईं।
इसके बाद प्रतिभागियों ने चार खास विषयों पर आधारित अलग-अलग समूहों में हिस्सा लिया: जिसमें ज्ञान एवं सांस्कृतिक संसाधन केंद्रों के रूप में टीआरआई; जनजातीय विकास के लिए अनुसंधान, दस्तावेज़ीकरण एवं साक्ष्य सृजन; प्रौद्योगिकी एकीकरण, जीआईएस, एआई एवं नवाचार; और संस्थागत मजबूती, मानव संसाधन, सुशासन एवं साझेदारी शामिल है।
कार्यशाला के दूसरे दिन कार्य समूहों की सिफारिशों को समेकित किया जाएगा और उन पर चर्चा की जाएगी। समापन सत्रों में अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र, संस्थागत सुधारों एवं डिजिटल परिवर्तन पर विशेषज्ञ पैनल चर्चाएं होंगी और अंत में 'भुवनेश्वर घोषणा' को अपनाया जाएगा तथा पूरे देश में जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को मजबूत करने के लिए एक साझा रोडमैप तैयार किया जाएगा।





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पीके/केसी/एके
(रिलीज़ आईडी: 2282272)
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