पंचायती राज मंत्रालय
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पंचायती राज संस्थाओं का कामकाज

प्रविष्टि तिथि: 21 JUL 2026 6:18PM by PIB Delhi

पंचायत “स्थानीय स्वशासन” है एवं राज्य विषय है और भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची में राज्य सूची का हिस्सा है। पंचायतों की स्थापना की जाती है और उनका संचालन संबंधित राज्यों के पंचायती राज अधिनियमों के माध्यम से किया जाता है। राज्यों ने संविधान के प्रावधानों के अनुसार अपने-अपने राज्यों में पंचायती राज अधिनियम बनाया है। संविधान का अनुच्छेद 243जी राज्य की विधायिका को यह अधिकार देता है कि वह कानून बनाकर पंचायतों को उचित स्तर पर शक्तियां एवं जिम्मेदारियां प्रदान करे। ये प्रावधान उन शर्तों के अधीन हैं जो निर्दिष्ट किए जा सकते हैं, जिसमें आर्थिक विकास एवं सामाजिक न्याय की योजनाओं की तैयारी और उन्हें लागू करने के कार्य शामिल हैं, जिनमें संविधान की 11वीं अनुसूची में सूचीबद्ध मामलों से संबंधित कार्य भी शामिल हैं। पंचायतों को अधिकार एवं ज़िम्मेदारियां सौंपने के लिए, राज्य विधानसभाओं को 11वीं अनुसूची में शामिल 29 विषयों पर विचार करना होता है। इसी के अनुसार, पंचायतों से जुड़े सभी मामले राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। इनमें पंचायती राज संस्थाओं के कामकाज की समीक्षा करना, ग्राम पंचायतों को ज़्यादा प्रशासनिक, वित्तीय एवं कामकाज से जुड़े अधिकार सौंपना, पंचायतों को हस्तांतरित किए गए कोष, काम एवं कर्मचारियों का विवरण तय करना और स्थानीय स्वशासन को मज़बूत करने तथा पंचायती राज संस्थाओं की ज़्यादा स्वायत्तता, जवाबदेही एवं क्षमता सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाना शामिल है।

हालांकि, पंचायती राज मंत्रालय समय-समय पर अध्ययन, समीक्षा बैठकें, क्षेत्रीय दौरे, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, सूचना प्रौद्योगिकी अनुप्रयोगों आदि के माध्यम पंचायतों के कामकाज की समीक्षा करता है। राज्यों द्वारा पंचायतो को हस्तांतरित किए गए कोष, कार्य और कर्मियों का साल-दर-साल विवरण पंचायती राज मंत्रालय द्वारा नहीं रखा जाता।

मंत्रालय ने फरवरी 2025 में जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को सुदृढ़ करने हेतु शक्तियों के विकेंद्रीकरण की प्रभावशीलता तथा स्थानीय सरकारों की भूमिका का आकलन करने के लिए “राज्यों में पंचायतों को अधिकार सौंपने की स्थिति - एक सांकेतिक साक्ष्य-आधारित रैंकिंग, 2024” शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की। यह रिपोर्ट विकेंद्रीकरण सूचकांक प्रस्तुत करती है, जो संविधान के भाग-IX के अंतर्गत शामिल सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए समग्र अंक एवं रैंक बताता है। यह मूल्यांकन छह पहचाने गए आयामों ढांचा, कार्य, वित्त, कार्मिक, क्षमता संवर्धन और जवाबदेही के आधार पर किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2013-14 से 2021-22 की अवधि मे विकेंद्रीकरण का स्तर 39.9% से बढ़कर 43.9% हो गया है। राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों की अंतरण सूचकांक और उप-सूचकांकों में रैंकिंग अनुबंध-I में संलग्न है।

इन छह पहचाने गए आयामों में, ढ़ांचा में अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों तथा महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण, पंचायत चुनाव एवं राज्य निर्वाचन आयोग, पंचायतों का कार्यकाल, विघटन एवं उपचुनाव, जिला योजना समिति का गठन एवं कार्य, समितियों तथा समानांतर निकायों/संस्थाओं में पंचायतों की भूमिका तथा पंचायतों की स्वायत्तता शामिल हैं। कार्य में पंचायतों को सौंपे गए कार्य शामिल हैं, जैसे गतिविधि मानचित्रण, किया गया व्यय, पंचायतों की वास्तविक भागीदारी और अहम योजनाओं में उनकी भूमिका शामिल है। वित्त में पंचायतों को मिलने वाली 15वें वित्त आयोग के अनुदान, राज्य वित्त आयोग, राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर पंचायतों को धन का हस्तांतरण, राजस्व वसूलने के लिए पंचायतों को अधिकार, पंचायतों के पास उपलब्ध कोष, पंचायतों का व्य्य एवं वित्त, लेखा एवं बजट से जुड़ी पहल शामिल हैं। कार्मिक में जुड़े लोगों एवं संसाधनों में पंचायतों की भौतिक अवसंरचना, ई-कनेक्टिविटी और पंचायत अधिकारी शामिल हैं। क्षमता संवर्धन में प्रशिक्षण संस्थान, प्रशिक्षण गतिविधियां जिसमें निर्वाचित प्रतिनिधियों एवं अधिकारियों का प्रशिक्षण शामिल है। जवाबदेही में पंचायतों का लेखांकन एवं लेखा-परीक्षण, पंचायतों का सामाजिक ऑडिट, ग्राम सभा का कार्य-निष्पादन, पारदर्शिता एवं भ्रष्टाचार-निरोध तथा पंचायतों का मूल्यांकन एवं प्रोत्साहन शामिल है।

स्थानीय स्व-शासन को मजबूत बनाने तथा पंचायत राज संस्थाओं के लिए अधिक स्वतंत्रता, जवाबदेही एवं क्षमता सुनिश्चित करने के लिए, मंत्रालय ने वित्तीय वर्ष 2022-23 से 'संशोधित राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान' (आरजीएसए) नामक एक केंद्र-प्रायोजित योजना लागू की है। इस योजना का उद्देश्य चुने हुए प्रतिनिधियों और अन्य हितधारकों को प्रशिक्षण देकर उनमें नेतृत्व क्षमता विकसित करना और पंचायती राज संस्थाओं को सहयोग देना है ताकि सभी राज्यों/केंद्र-शासित प्रदेशों में ग्राम पंचायतें प्रभावी रूप से काम कर सकें। योजना के अंतर्गत, विभिन्न श्रेणियों के तहत पंचायतों के निर्वाचित प्रतिनिधियों, पदाधिकारियों तथा अन्य हितधारकों को क्षमता निर्माण सहायता प्रदान की जाती है, जैसे कि बुनियादी जानकारी एवं रिफ्रेशर कार्यक्रम, विषयगत मध्यवर्तन, विशेषीकृत प्रशिक्षण तथा पंचायत विकास योजना से संबंधित कार्यक्रम आदि। यह योजना अनुभव से सीखने को बढ़ावा देने तथा पंचायत शासन को सुदृढ़ बनाने के लिए सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाने के उद्देश्य अध्ययन दौरों का भी समर्थन करती है। साथ ही, प्रशिक्षण मॉड्यूल एवं प्रशिक्षण सामग्री आदि के विकास में भी सहायता प्रदान करती है।

इसके अलावा, कौशल एवं ज्ञान को बढ़ाने के लिए, नेतृत्व/प्रबंधन विकास कार्यक्रम (एमडीपी) के अंतर्गत आईआईएम/आईआईटी जैसे उत्कृष्टता संस्थानों के माध्यम से पंचायतों के निर्वाचित प्रतिनिधियों एवं पदाधिकारियों की क्षमता निर्माण तथा प्रशिक्षण के लिए भी एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है।

पंचायती राज मंत्रालय ने, आईआईएम अहमदाबाद के सहयोग से, ग्राम पंचायतों की वित्तीय आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करने के लिए स्वयं के स्रोत से प्राप्त राजस्व (ओएसआर) पर एक प्रशिक्षण मॉड्यूल भी विकसित किया है। यह मॉड्यूल निर्वाचित प्रतिनिधियों एवं पंचायत पदाधिकारियों को कर तथा गैर-कर स्रोतों के माध्यम से ओएसआर उत्पन्न करने की समझ विकसित करने में सहायता प्रदान करता है।

इसके अलावा, मंत्रालय ने पंचायती राज संस्थाओं की निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों में क्षमता निर्माण को बढ़ावा देने लिए “सशक्त पंचायत नेत्री अभियान” के अंतर्गत एक विशेष प्रशिक्षण मॉड्यूल भी शुरू किया है। इस प्रशिक्षण मॉड्यूल का उद्देश्य ग्रामीण शासन के विभिन्न पहलुओं में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की क्षमता का विकास करना तथा निर्वाचित प्रतिनिधियों के रूप में उनकी भूमिकाओं एवं जिम्मेदारियों का प्रभावी तरीके से निर्वहन करने के लिए उनके ज्ञान एवं व्यावहारिक कौशल को सुदृढ़ बनाना है, जिससे महिला-नेतृत्व वाले शासन को बढ़ावा मिल सके।

यह जानकारी केंद्रीय मंत्री श्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ​​ललन सिंह ने 21 जुलाई 2026 को लोकसभा में एक लिखित उत्तर में दी।

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पीके/केसी/एके


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