कोयला मंत्रालय
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कोयला मंत्रालय ने ‘आरोह’ जारी किया: वैज्ञानिक खान बंदीकरण और पुनः उपयोग पद्धतियों पर भारत की पहली रिपोर्ट


कोयला मंत्रालय ने वैज्ञानिक खान बंदीकरण सहयोग को बढ़ावा देने के लिए जर्मनी की जीआईजेड के साथ कार्यान्वयन समझौते पर हस्ताक्षर किए

कोयला मंत्री ने कोल नीर संयंत्रों का उद्घाटन किया, खदान से निकलने वाले जल को सुरक्षित पेयजल में बदला जाएगा

बीसीसीएल और जेआरडीए ने झरिया पुनर्वास एवं कौशल विकास के लिए हिंडाल्को और राजधानी यूनिवर्सल फैब्रिक्स के साथ त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए

प्रविष्टि तिथि: 22 JUL 2026 8:54PM by PIB Delhi

कोयला मंत्रालय ने आज नई दिल्ली के ओबेरॉय में ‘आरोह: वार्षिक खान बंदीकरण रिपोर्ट’ जारी की, जिसमें वैज्ञानिक खान बंदीकरण, पारिस्थितिक पुनर्स्थापन तथा खनन के बाद भूमि के सतत उपयोग के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने में भारत की प्रगति को रेखांकित किया गया है।

इस कार्यक्रम में केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री श्री जी. किशन रेड्डी; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन, परमाणु ऊर्जा तथा अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह; केंद्रीय कोयला एवं खान राज्य मंत्री श्री सतीश चंद्र दुबे; जर्मनी के राजदूत महामहिम डॉ. फिलिप एकरमैन; यूरोपीय संघ प्रतिनिधिमंडल की उप-प्रमुख डॉ. ईवा सुवारा; कोयला मंत्रालय के सचिव श्री विक्रम देव दत्त; कोयला मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव श्री सनोझ कुमार झा तथा कोयला नियंत्रक श्री सजीश कुमार एन. उपस्थित थे। कार्यक्रम में केंद्र और राज्य सरकारों के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों, कोयला कंपनियों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों, उद्योग जगत, शिक्षाविदों तथा सतत खनन और खनन-उपरांत विकास से जुड़े अन्य हितधारकों ने भी भाग लिया।

केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री श्री जी. किशन रेड्डी ने खान बंदीकरण एवं खान पुनः उपयोग प्रदर्शनी का उद्घाटन किया, जिसमें कोल इंडिया लिमिटेड और उसकी सहायक कंपनियों, एनएलसी इंडिया लिमिटेड, सिंगरेनी कोलियरीज कंपनी लिमिटेड (एससीसीएल), एनटीपीसी तथा निजी खनन संगठनों द्वारा किए गए नवोन्मेषी प्रयासों को प्रदर्शित किया गया। प्रदर्शनी में वैज्ञानिक पुनर्स्थापन, पारिस्थितिक पुनर्बहाली, खान पुनः उपयोग, सामुदायिक विकास तथा खनन-उपरांत भूमि के सतत उपयोग से संबंधित सफल पद्धतियों को रेखांकित किया गया।

मंत्रियों ने औपचारिक रूप से ‘आरोह – वार्षिक खान बंदीकरण रिपोर्ट’ का विमोचन किया, जिसके पश्चात इस प्रकाशन पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म का प्रदर्शन किया गया। कोल कंट्रोलर ऑर्गनाइजेशन द्वारा विकसित आरोह भारत में वैज्ञानिक खान बंदीकरण और पुनः उपयोग पद्धतियों का पहला व्यापक दस्तावेजीकरण प्रस्तुत करता है। इस रिपोर्ट में 42 वैज्ञानिक रूप से बंद की गई कोयला खानों की परिवर्तनकारी यात्रा का दस्तावेजीकरण किया गया है, जिसमें संरचित पुनर्स्थापन प्रक्रियाएं, पारिस्थितिक पुनर्बहाली पहलें, खनन-उपरांत भूमि का सतत उपयोग तथा समुदाय-केंद्रित हस्तक्षेप शामिल हैं, जिन्होंने पर्यावरणीय रूप से पुनर्स्थापित और सामाजिक रूप से लाभकारी परिदृश्यों के निर्माण में योगदान दिया है।

आरोह में शामिल प्रत्येक खान प्रोफाइल में प्रमुख बंदीकरण पहलें, खनन-उपरांत भूमि उपयोग के परिणाम, पहले और बाद के दृश्य दस्तावेज तथा संबंधित खान स्थलों की परिवर्तन यात्रा को दर्शाने वाले क्यूआर कोड आधारित डॉक्यूमेंट्री वीडियो शामिल हैं। यह प्रकाशन एक ज्ञान भंडार के रूप में कार्य करता है, जो सफल मॉडलों को रेखांकित करता है तथा भविष्य के खान बंदीकरण और पुनः उपयोग प्रयासों के लिए मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।

यह रिपोर्ट भारत के खान बंदीकरण ढांचे के विकास को भी दर्शाती है तथा कोयला मंत्रालय की प्रमुख पहलों, जिनमें रीक्लेम फ्रेमवर्क, एल.आई.वी.ई.एस. फ्रेमवर्क, सुविकल्प – माइन रिपर्पजिंग टूल तथा सुविकल्प संवाद शामिल हैं, को रेखांकित करती है। ये पहलें वैज्ञानिक आकलन, हितधारक सहभागिता, ज्ञान आदान-प्रदान तथा खनन-उपरांत भूमि के सतत उपयोग को बढ़ावा देती हैं।

कार्यक्रम का एक अन्य प्रमुख आकर्षण “टू-बी क्लोज्ड माइन्स” पर तकनीकी सहयोग के लिए कोयला मंत्रालय और डॉयचे गेज़ेलशाफ्ट फ्यूर इंटरनेशनल ज़ुसामेनआर्बाइट (जीआईजेड) के बीच कार्यान्वयन समझौते पर हस्ताक्षर करना था। इस समझौते का उद्देश्य वैज्ञानिक खान बंदीकरण, खान पुनः उपयोग, तकनीकी क्षमता निर्माण, ज्ञान आदान-प्रदान तथा वैश्विक सर्वोत्तम पद्धतियों को अपनाने में सहयोग को सुदृढ़ करना है, जिससे खनन क्षेत्र में भारत-जर्मनी सहयोग को और मजबूती मिलेगी।

यह परियोजना फेडरल मिनिस्ट्री फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (बीएमजेड) द्वारा शुरू की गई है और यूरोपीय संघ द्वारा सह-वित्तपोषित है। वर्ष 2030 तक इस परियोजना की कुल राशि 10 मिलियन यूरो है। यह सहयोग अगले चार वर्षों में भारत में कोयला खानों के बंदीकरण और पुनः उपयोग के लिए नवोन्मेषी एवं सतत दृष्टिकोण विकसित करने पर केंद्रित रहेगा।

जर्मनी और यूरोपीय संघ द्वारा किया गया यह निवेश टीम यूरोप की भारत के साथ सतत आर्थिक विकास के क्षेत्र में सहयोग को गहरा करने की मजबूत साझेदारी को दर्शाता है। इस प्राथमिकता की पुनः पुष्टि 16वें भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन तथा इसी वर्ष भारत की यात्रा पर आए जर्मन चांसलर की यात्रा के दौरान की गई थी।

केंद्रीय मंत्री ने कोल इंडिया लिमिटेड द्वारा उसकी सहायक कंपनियों — भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल), सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल), महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड (एमसीएल) और साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) — के माध्यम से स्थापित कोल नीर संयंत्रों का भी वर्चुअल उद्घाटन किया। इस पहल का उद्देश्य कोयला उत्पादक क्षेत्रों में सुरक्षित और सतत पेयजल सुविधाओं तक पहुंच को सुदृढ़ करना तथा खनन क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के जीवन स्तर में सुधार करना है।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ‘वेस्ट टू वेल्थ’ विजन के अनुरूप, ये संयंत्र खदानों के जल को शुद्ध कर ‘कोल नीर’ ब्रांड नाम से सुरक्षित, उच्च गुणवत्ता वाले बोतलबंद पेयजल के रूप में विपणन करते हैं। इन परियोजनाओं में आरओ, यूवी और सीडीआई प्रौद्योगिकियों सहित उन्नत जल शोधन पद्धतियों का उपयोग किया जाता है, ताकि आसपास के गांवों और स्थानीय समुदायों को सुरक्षित, स्वच्छ और किफायती पेयजल उपलब्ध कराया जा सके।

किफायती बोतलबंद पेयजल उपलब्ध कराने के अलावा, ये परियोजनाएं आसपास के गांवों के स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के लिए सतत आजीविका के अवसर भी प्रदान करती हैं।

कार्यक्रम के दौरान भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल) और झरिया पुनर्वास एवं विकास प्राधिकरण (जेआरडीए) द्वारा हिंडाल्को इंडस्ट्रीज लिमिटेड तथा राजधानी यूनिवर्सल फैब्रिक्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर भी किए गए। ये साझेदारियां झरिया कोयला क्षेत्र में पुनर्वास, अवसंरचना विकास, सामुदायिक कल्याण तथा सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए समन्वित प्रयासों को बढ़ावा देंगी।

बीसीसीएल, जेआरडीए और हिंडाल्को के बीच हस्ताक्षरित एमओयू का उद्देश्य एक उद्योग-संबद्ध कौशल केंद्र स्थापित करना है, जो धनबाद क्षेत्र के युवाओं को विश्व-स्तरीय अपैरल मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों में कार्य करने के लिए उद्योग-संबंधित कौशल से सुसज्जित करेगा।

इसी प्रकार, बीसीसीएल, जेआरडीए और राजधानी यूनिवर्सल फैब्रिक्स प्राइवेट लिमिटेड के बीच हस्ताक्षरित एमओयू का उद्देश्य एक विश्व-स्तरीय एकीकृत तकनीकी टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम स्थापित करना है, जिससे बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन होगा तथा कौशल विकास को सुदृढ़ किया जा सकेगा।

अपने मुख्य भाषण में केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री श्री जी. किशन रेड्डी ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के गतिशील नेतृत्व में भारत ने खान बंदीकरण की अवधारणा को मूल रूप से परिवर्तित किया है। उन्होंने कहा कि अब खान बंदीकरण को खनन की समाप्ति के रूप में नहीं, बल्कि लोगों, समुदायों और सतत विकास के लिए नए अवसरों की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।

उन्होंने वैज्ञानिक खान बंदीकरण को राष्ट्रीय प्राथमिकता तथा विकसित भारत 2047 के विजन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बताया। उन्होंने कहा कि भारत ने 42 कोयला खानों का वैज्ञानिक रूप से बंदीकरण किया है, जिनमें से 33 खानों का बंदीकरण केवल पिछले एक वर्ष में किया गया है। साथ ही, अगले दो से तीन वर्षों में 147 और खानों का वैज्ञानिक बंदीकरण करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

मंत्री ने बताया कि मंत्रालय ने रीक्लेम फ्रेमवर्क, सुविकल्प डिजिटल प्लेटफॉर्म, ए.आर.टी.एच.ए. फ्रेमवर्क तथा जिला कलेक्टर के नेतृत्व वाली माइन क्लोजर एडवाइजरी कमेटियों के माध्यम से खान बंदीकरण के लिए एक व्यापक तंत्र विकसित किया है। उन्होंने कहा कि माइन क्लोजर गाइडलाइंस, 2025 में लोगों और सस्टेनेबिलिटी को खान बंदीकरण की प्रक्रिया के केंद्र में रखा गया है।

उन्होंने आगे जानकारी दी कि पहली बार स्वीकृत खान बंदीकरण लागत का 25 प्रतिशत हिस्सा सामुदायिक विकास के लिए आरक्षित किया गया है, जिससे अगले दशक में लगभग 10,000 करोड़ रुपये के निवेश की संभावना बनेगी। उन्होंने यह भी घोषणा की कि सरकार ने वैज्ञानिक खान बंदीकरण और प्रगतिशील खान बंदीकरण के लिए 5 बिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 40,000 करोड़ रुपये) से अधिक का एक समर्पित कोष बनाया है। यह सरकार की पर्यावरणीय रूप से उत्तरदायी खनन, पारिस्थितिक पुनर्बहाली तथा खनन-प्रभावित क्षेत्रों के सामाजिक-आर्थिक विकास के प्रति दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

 

वैज्ञानिक खान बंदीकरण की परिवर्तनकारी क्षमता को रेखांकित करते हुए मंत्री ने कहा कि देशभर में पुनर्स्थापित खान भूमि का पुनः उपयोग नवीकरणीय ऊर्जा, इको-टूरिज्म, जल संरक्षण, कृषि, सामुदायिक अवसंरचना तथा सतत आजीविका सृजन के लिए किया जा रहा है। उन्होंने वेस्ट बोकारो, विश्रामपुर तथा विवेकनगर सोलर परियोजना के सफल उदाहरणों का उल्लेख किया।

वैश्विक सर्वोत्तम पद्धतियों, विशेष रूप से खान बंदीकरण और जस्ट ट्रांजिशन के क्षेत्र में जर्मनी के अनुभव का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कोयला मंत्रालय और जीआईजेड के बीच हुआ कार्यान्वयन समझौता जर्मनी की विशेषज्ञता को भारत के वृहद स्तर, नीति नेतृत्व और कार्यान्वयन क्षमता के साथ जोड़कर खान बंदीकरण का एक भारतीय मॉडल विकसित करेगा। यह मॉडल पर्यावरण संरक्षण, तकनीकी नवाचार, सामुदायिक सहभागिता और आर्थिक अवसरों को एकीकृत करेगा।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सफल खान बंदीकरण के लिए सरकारों, उद्योग जगत, शिक्षाविदों, नागरिक समाज, स्थानीय समुदायों तथा अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सभी हितधारक मिलकर प्रत्येक बंद खान को भविष्य की पीढ़ियों के लिए आशा, अवसर और समृद्धि के स्रोत में परिवर्तित करेंगे।

 

सभा को संबोधित करते हुए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन, परमाणु ऊर्जा विभाग तथा अंतरिक्ष विभाग में राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि “अब समय आ गया है कि ‘माइन क्लोजर’ शब्द को बदलकर ‘माइन ऑफ वेल्थ’ कहा जाए।” उन्होंने वैज्ञानिक खान बंदीकरण पर कोयला मंत्रालय की प्रगतिशील नीतियों की सराहना करते हुए कहा कि 42 कोयला खानों के सफल बंदीकरण ने यह प्रदर्शित किया है कि पारिस्थितिक पुनर्बहाली, वनीकरण, जल संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा तथा अन्य सतत समुदाय-केंद्रित पहलों के माध्यम से क्षतिग्रस्त खान भूमि को उत्पादक परिसंपत्तियों में बदला जा सकता है। उन्होंने कहा कि ये प्रयास अपशिष्ट को संपदा में बदलकर परिपत्र अर्थव्यवस्था (सर्कुलर इकोनॉमी) के सिद्धांतों को मूर्त रूप देते हैं। भारत-जर्मनी साझेदारी और वैज्ञानिक खान बंदीकरण में निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी की सराहना करते हुए उन्होंने वर्ष 2070 तक नेट ज़ीरो लक्ष्य प्राप्त करने की भारत की प्रतिबद्धता को पुनः दोहराया।

अपने संबोधन में कोयला एवं खान राज्य मंत्री श्री सतीश चंद्र दुबे ने कहा कि कोयला मंत्रालय यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है कि खनन के लाभ केवल कोयला उत्पादन तक सीमित न रहें, बल्कि कोयला उत्पादक क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के जीवन में सार्थक सुधार के रूप में दिखाई दें। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक खान बंदीकरण के प्रति मंत्रालय का दृष्टिकोण इस सिद्धांत पर आधारित है कि पर्यावरणीय पुनर्स्थापन और सामाजिक-आर्थिक विकास साथ-साथ आगे बढ़ने चाहिए।

भारत-जर्मन तकनीकी सहयोग पहल का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह साझेदारी संस्थागत क्षमताओं को सुदृढ़ करेगी, वैश्विक विशेषज्ञता के आदान-प्रदान को सुगम बनाएगी तथा वैज्ञानिक खान बंदीकरण और सतत खनन-उपरांत विकास में सर्वोत्तम पद्धतियों को अपनाने में सहयोग करेगी। इससे बंद खानों को ऐसी परिसंपत्तियों में परिवर्तित करने में सहायता मिलेगी, जो पारिस्थितिक पुनर्बहाली, सतत आजीविका और दीर्घकालिक क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा दें।

 

कोल नीर तथा झरिया मास्टर प्लान के अंतर्गत त्रिपक्षीय एमओयू के महत्व को रेखांकित करते हुए श्री दुबे ने कहा कि ये पहलें सतत खनन पद्धतियों को मूर्त सामुदायिक लाभों में परिवर्तित करने के प्रति मंत्रालय की प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं। उन्होंने कहा कि जहां कोल नीर सुरक्षित पेयजल तक पहुंच में सुधार करेगा, जल संसाधनों के कुशल प्रबंधन को बढ़ावा देगा तथा स्थानीय स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी), विशेषकर महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से आजीविका के अवसर सृजित करेगा, वहीं झरिया पहल पुनर्वास को उद्योग-संबद्ध कौशल विकास और रोजगार के अवसरों के साथ जोड़कर पुनर्वासित परिवारों के दीर्घकालिक सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण को सुनिश्चित करेगी।

सभा को संबोधित करते हुए कोयला मंत्रालय के सचिव श्री विक्रम देव दत्त ने इस बात पर बल दिया कि खनन को संवेदनशीलता के साथ संचालित किया जाना चाहिए, जिसमें खनन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों और उनके जीवन को विकास के केंद्र में रखा जाए। उन्होंने खान बंदीकरण को खनन के जीवन चक्र का एक महत्वपूर्ण चरण बताया, जहां उत्तरदायी संसाधन दोहन को दीर्घकालिक पर्यावरणीय पुनर्स्थापन, भूमि के पुनः उपयोग और सतत सामुदायिक विकास में परिवर्तित होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि माइन क्लोजर गाइडलाइंस, 2025, व्यापक फ्रेमवर्क तथा कोल कंट्रोलर ऑर्गनाइजेशन द्वारा विकसित डिजिटल उपकरणों के माध्यम से कोयला मंत्रालय ने खान बंदीकरण को मात्र एक नियामक आवश्यकता से आगे बढ़ाकर एक नियोजित और जन-केंद्रित प्रक्रिया में परिवर्तित किया है। इससे यह सुनिश्चित किया गया है कि पर्यावरणीय पुनर्वास, सामुदायिक सहभागिता और भविष्य के भूमि उपयोग को खान बंदीकरण की योजना के प्रत्येक चरण में समाहित किया जाए।

उन्होंने भारत-जर्मनी हरित एवं सतत विकास साझेदारी के अंतर्गत “टू-बी-क्लोज्ड कोल माइन्स” पर भारत-जर्मन तकनीकी सहयोग परियोजना के लिए कार्यान्वयन समझौते पर हस्ताक्षर का उल्लेख करते हुए कहा कि जर्मनी सरकार और यूरोपीय संघ से प्राप्त 10 मिलियन यूरो का अनुदान भारत को वैज्ञानिक खान बंदीकरण में वैश्विक सर्वोत्तम पद्धतियों को अपनाने में सक्षम बनाएगा। साथ ही यह उस साझा दृष्टि को भी सुदृढ़ करेगा कि खान बंदीकरण केवल खनन का अंत नहीं, बल्कि लोगों, समुदायों और पर्यावरण के लिए नए अवसरों की शुरुआत है।

खनन-उपरांत समावेशी विकास के प्रति मंत्रालय की प्रतिबद्धता को रेखांकित करते हुए सचिव ने कहा कि संशोधित झरिया मास्टर प्लान पुनर्वास से आगे बढ़कर कौशल विकास तथा पुनर्वासित परिवारों के लिए प्लग-एंड-प्ले टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी की स्थापना के माध्यम से सतत आजीविका के अवसर सृजित कर रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि कोयला सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा प्रतिवर्ष लगभग 300 लाख किलोलीटर उपचारित खदान जल की आपूर्ति की जा रही है, जिससे चेन्नई को पेयजल आपूर्ति सहित लगभग तीन लाख लोग लाभान्वित हो रहे हैं।

कोल नीर के शुभारंभ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह पहल दर्शाती है कि उपचारित खदान अपशिष्ट जल को आसपास के समुदायों के लिए सुरक्षित पेयजल में परिवर्तित किया जा सकता है। यह मंत्रालय की वैज्ञानिक नवाचार, सतत संसाधन प्रबंधन और सामुदायिक कल्याण के प्रति प्रतिबद्धता का उत्कृष्ट उदाहरण है।

सभा को संबोधित करते हुए भारत और भूटान में जर्मनी के राजदूत महामहिम डॉ. फिलिप एकरमैन ने सतत विकास को आगे बढ़ाने में भारत-जर्मनी की निरंतर साझेदारी को रेखांकित किया। कोयला मंत्रालय और जीआईजेड के बीच हुए कार्यान्वयन समझौते का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह सहयोग वैज्ञानिक खान बंदीकरण और सतत खान पुनः उपयोग के लिए तकनीकी विशेषज्ञता तथा वैश्विक सर्वोत्तम पद्धतियों के आदान-प्रदान को सुगम बनाएगा, साथ ही खनन क्षेत्रों में न्यायसंगत और सतत परिवर्तन के लिए भारत-जर्मन सहयोग को और सुदृढ़ करेगा।

अपने संबोधन में भारत में यूरोपीय संघ प्रतिनिधिमंडल की उप-प्रमुख डॉ. ईवा सुवारा ने कहा कि भारत और यूरोपीय संघ की साझेदारी साझा लोकतांत्रिक मूल्यों, पारस्परिक सम्मान और सतत विकास के प्रति समान प्रतिबद्धता पर आधारित है। उन्होंने कहा कि परित्यक्त खानों के सतत बंदीकरण के प्रति भारत सरकार की प्रतिबद्धता दूरदर्शी और उत्तरदायी दृष्टिकोण को दर्शाती है। उन्होंने आगे कहा कि खानों के सफल बंदीकरण के लिए दीर्घकालिक योजना, हितधारकों की सक्रिय भागीदारी, कौशल विकास और पुनः कौशल विकास में निवेश, भूमि पुनर्स्थापन तथा यह सुनिश्चित करने की दृढ़ प्रतिबद्धता आवश्यक है कि परिवर्तन न्यायसंगत और समावेशी हो। उन्होंने कहा कि इस संदर्भ में आज का कार्यान्वयन समझौता एक महत्वपूर्ण और व्यावहारिक कदम का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने यह भी कहा कि यह समझौता साझा महत्वाकांक्षा को ठोस अभिव्यक्ति देता है और तकनीकी सहायता तथा क्षमता निर्माण के माध्यम से ठोस सहयोग की आधारशिला रखता है।

इस कार्यक्रम ने प्रगतिशील नीतियों, तकनीकी नवाचार, संस्थागत साझेदारियों और समुदाय-केंद्रित पहलों के माध्यम से वैज्ञानिक खान बंदीकरण को आगे बढ़ाने के प्रति कोयला मंत्रालय की प्रतिबद्धता को पुनः पुष्ट किया। आरोह जैसी पहलों के माध्यम से मंत्रालय उत्तरदायी खनन, पारिस्थितिक पुनर्बहाली और सतत खनन-उपरांत विकास के लिए भारत के ढांचे को निरंतर सुदृढ़ कर रहा है, जो विकसित भारत के विजन को साकार करने में योगदान दे रहा है।

पीके/केसी/एके


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