अंतरिक्ष विभाग
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संसद प्रश्न: स्पेस विजन 2047

प्रविष्टि तिथि: 12 AUG 2026 2:44PM by PIB Delhi

इसरो/अंतरिक्ष विभाग द्वारा वर्ष 2026 के दौरान की गई प्रमुख अंतरिक्ष-आधारित गतिविधियां इस प्रकार हैं:

  • कृषि के लिए: दो फसल मौसमों के दौरान उपग्रह आधारित राष्ट्रीय स्तर पर फसल की बुवाई और कटाई वाले क्षेत्र का मानचित्रण किया गया। खरीफ धान, गेहूं और जूट की अखिल भारतीय स्तर पर मैपिंग की गई। धान और गेहूं की फसल के उत्पादन का राष्ट्रीय स्तर पर अनुमान लगाया गया। महाराष्ट्र में सोयाबीन, कपास और धान तथा मध्य प्रदेश में सोयाबीन, गेहूं, चना, सरसों और धान की फसलों के राज्य स्तर पर मानचित्रण के लिए तकनीकी सहायता दी गई। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) के अंतर्गत 10 राज्यों में बीमा इकाई स्तर पर फसल उत्पादन का अनुमान लगाने में भी सहायता दी गई। इसके अलावा, भारत के प्रमुख जूट उत्पादक राज्यों असम, बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में जूट की फसल की निगरानी की गई।
  • आपदा प्रबंधन के लिए: पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों का उपयोग कर बाढ़, भूस्खलन, चक्रवात, जंगल की आग, ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड्स (जीएलओएफ), सूखा और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की लगभग रियल-टाइम निगरानी और मैपिंग की जा रही है। इससे प्राप्त जानकारी भुवन और नेशनल डेटाबेस फॉर इमरजेंसी मैनेजमेंट (एनडीईएम) पोर्टल पर अपलोड की जाती है।

इसके अलावा, भारतीय नौसेना के कोच्चि स्थित नेवल ऑपरेशंस डेटा प्रोसेसिंग एंड एनालिसिस सेंटर (एनओडीपीएसी) में नौसेना के अभियानों के लिए उपग्रह और संख्यात्मक मॉडल आधारित खोज और बचाव उपकरण स्थापित किया गया है।

  • जलवायु निगरानी के लिए: ईओएस-06 उपग्रह मिशन के ओशन कलर मॉनिटर-3 और स्कैटरमीटर सेंसर से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर क्लोरोफिल-ए की मात्रा, समुद्र की सतह पर हवा की गति और दिशा, विंड स्ट्रेस तथा सतही पवन जैसे जलवायु संबंधी मानकों की जानकारी तैयार की जा रही है। इन्सैट-3डीएस से प्राप्त बादलों से जुड़े आंकड़ों को भी समय-समय पर अपडेट कर नेशनल इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर क्लाइमेट एंड एनवायरनमेंट स्टडीज (एनआईसीईएस) वेब पोर्टल पर उपलब्ध कराया जाता है। उपग्रह आधारित अत्यधिक मौसम की एक्सट्रीम वेदर नाउकास्टिंग विकसित की गई है और इसे आईएमडी/एमओईएस में परिचालन स्तर पर लागू करने की दिशा में तैनात किया गया है।
  • अन्य विकास क्षेत्रों के लिए: भू-स्थानिक तकनीक का उपयोग करते हुए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के अंतर्गत गतिविधियों की योजना और निगरानी, वाटरशेड डेवलपमेंट कंपोनेंट-प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (डब्ल्यूडीसी-पीएमकेएसवाई), प्रधानमंत्री आवास योजना-हाउसिंग फॉर ऑल (अर्बन) (पीएमएवाई-एचएफए (यू)) तथा प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के अंतर्गत ग्रामीण भारत में सड़क नेटवर्क की स्थिति का आकलन किया गया है। इसके अलावा, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत बनाई गई परिसंपत्तियों, राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे हरित क्षेत्र तथा भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण से संबंधित कार्यों में भी भू-स्थानिक तकनीक का उपयोग किया गया है।

केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों, राज्य सरकारों और स्थानीय प्राधिकरणों के साथ उपग्रह-आधारित सेवाओं का एकीकरण निम्नलिखित के माध्यम से मजबूत हो रहा है:

  • केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य सरकारों और स्थानीय प्राधिकरणों द्वारा किए जाने वाले कई राष्ट्रीय फ्लैगशिप कार्यक्रमों में भारतीय उपग्रह डेटा और स्वदेशी अंतरिक्ष प्लेटफार्मों का एकीकरण।
  • कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा वित्त पोषित अंतरिक्ष कृषि-मौसम विज्ञान और भूमि आधारित अवलोकन के दूसरे चरण ही परियोजना लागू की जा रही है। इसके अंतर्गत परिचालन स्तर पर फसलों की निगरानी और उत्पादन के आकलन के लिए इसरो-पृथ्वी अवलोकन डेटा और अभिलेखीय प्रणाली (वेदास)  पोर्टल पर जियोक्रेस्ट का उपयोग किया जा रहा है।
  • विभिन्न प्रमुख फसलों के लिए फसल उपज अनुमान उत्पन्न प्रदान करना।
  • प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन, विकास कार्यों की निगरानी और नई गतिविधियों की योजना बनाने में सहायता के लिए राज्य विभागों को तकनीकी जानकारी और भू-स्थानिक समाधान उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
  • आपदा प्रबंधन सहायता कार्यक्रम (डीएमएस) के अंतर्गत केंद्र सरकार के मंत्रालयों, राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों (एसडीएमए), जिला प्रशासन और संबंधित विभागों को लगभग रियल-टाइम उपग्रह आधारित भू-स्थानिक उत्पाद उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
  • हितधारकों के लिए प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, ताकि कृषि और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े कार्यों, आपदा की तैयारी, राहत और बचाव, नुकसान के आकलन और पुनर्वास की योजना में अंतरिक्ष आधारित सूचनाओं के उपयोग को बढ़ावा दिया जा सके।
  • इसरो/अंतरिक्ष विभाग ने फसल मानचित्रण, जलवायु और आपदा जोखिम मूल्यांकन, उपग्रह डेटा-आधारित मौसम पूर्वानुमान, जल संसाधन निगरानी, खनन गतिविधियों की मानचित्रण और निगरानी आदि में प्रौद्योगिकी के कार्यान्वयन के लिए केंद्रीय विभागों/मंत्रालयों और राज्य विभागों के साथ 15 से अधिक समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए हैं।
  • उपग्रह संचार भारतनेट और डिजिटल इंडिया जैसे प्रमुख सरकारी कार्यक्रमों में उपग्रह संचार का उपयोग किया जा रहा है। इसके माध्यम से ग्राम पंचायतों सहित सुशासन के लिए संचार सेवाओं की पहुंच और क्षमता बढ़ाई जा रही है। अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के जरिए भारतनेट की विस्तारित पहुंच डिजिटल विभाजन को कम करने, प्रशासनिक समन्वय बेहतर बनाने और अधिक प्रभावी और आपस में जुड़े शासन को बढ़ावा देने में मदद कर रही है। इससे तथ्यों और आंकड़ों पर आधारित निर्णय लेने में भी सहायता मिलती है। इसके अलावा, उपग्रह संचार के जरिए घरों और उद्यमों के लिए ब्रॉडबैंड सेवाएं, सरकारी उपयोगकर्ताओं के लिए सुरक्षित और व्यापक सेवाएं, रणनीतिक सेवाओं के लिए व्यापक कनेक्टिविटी, डीटीएच टेलीविजन, वेरी स्मॉल एपर्चर टर्मिनल सेवाएं, इन-फ्लाइट और मैरीटाइम कनेक्टिविटी तथा सामाजिक क्षेत्र की सेवाएं, जैसे टेली-शिक्षा, टेली-मेडिसिन और आपदा प्रबंधन, उपलब्ध कराई जा रही हैं।

अनुसंधान, उद्योग और सार्वजनिक संस्थानों के लिए भू-स्थानिक और पृथ्वी अवलोकन डेटा तक पहुंच का विस्तार करने के लिए कई उपाय लागू किए गए हैं। इसमे शामिल है:

  • भारतीय अंतरिक्ष नीति-2023 के दायरे में सभी उपयोगकर्ताओं को 5 मीटर से अधिक ग्राउंड सैंपलिंग डिस्टेंस (जीएसडी) वाले भारतीय पृथ्वी अवलोकन (ईओ) डेटा तक खुली और मुफ्त पहुंच प्रदान करना। मुफ्त डेटा से प्राप्त सभी उत्पादों को सभी उपयोगकर्ताओं को मुफ्त में प्रसारित किया जाता है।
  • 5 मीटर से अधिक जीएसडी वाले ईओ डेटा सरकारी उपयोगकर्ताओं को निशुल्क और गैर-सरकारी उपयोगकर्ताओं को उचित मूल्य पर प्रदान किए जाते हैं।
  • वेब आधारित इंटरफेस को बेहतर बनाया जा रहा है, डेटा से जुड़े नियमों को सरल बनाया जा रहा है और परिचालन स्तर के उपयोगकर्ताओं को लगभग रियल-टाइम उत्पाद उपलब्ध कराए जा रहे हैं। विभिन्न अनुप्रयोगों के लिए अंतरिक्ष आधारित अवलोकन से प्राप्त आंकड़े मौसम और समुद्र विज्ञान उपग्रह डेटा अभिलेखागार केंद्र (एमओएसडीएसी) और वेदस जैसे पोर्टलों के माध्यम से रियल-टाइम में उपलब्ध कराए जाते हैं।
  • उपयोगकर्ताओं की क्लाउड आधारित डेटा प्रोसेसिंग जरूरतों को पूरा करने के लिए ऑन-डिमांड प्रोसेसिंग प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराया जा रहा है।
  • अनुसंधान द्वारा विभिन्न अनुप्रयोगों में अंतरिक्ष-आधारित अवलोकनों के उपयोग को प्रोत्साहित करने और तेज करने के लिए; उद्योग और सार्वजनिक संस्थान, इसरो/डीओएस क्षमता निर्माण के हिस्से के रूप में प्रशिक्षण कार्यक्रमों और कार्यशालाओं का आयोजन करता है।

स्पेस विजन 2047 के अंतर्गत राष्ट्रीय विकास के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए स्वदेशी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों के उपयोग को बढ़ाने की रूपरेखा में निम्नलिखित प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं:

पृथ्वी अवलोकन अनुप्रयोग: भविष्य में पृथ्वी अवलोकन से जुड़े अनुप्रयोगों और बुनियादी ढांचे की आवश्यकताओं की पहचान 22 अगस्त 2025 को नई दिल्ली में आयोजित नेशनल मीट-2025 में की गई। इन बुनियादी ढांचा आवश्यकताओं को नेशनल मीट-2025 की परिणाम रिपोर्ट: विकसित भारत 2047 के लिए अंतरिक्ष तकनीक और अनुप्रयोगों का लाभ उठानामें शामिल किया गया है। इन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए स्वदेशी प्रौद्योगिकियों का विकास संबंधित इसरो और अंतरिक्ष विभाग के केंद्रों द्वारा अनुसंधान और विकास गतिविधियों के अंतर्गत किया जा रहा है।

उपग्रह संचार: डिजिटल अनुप्रयोगों को बढ़ावा देने के लिए फ्लेक्सिबल पेलोड, डायरेक्ट-टू-डिवाइस, 5G/6G मानकों पर आधारित नॉन-टेरेस्ट्रियल नेटवर्क और मशीन-टू-मशीन संचार के लिए उपग्रह आधारित जैसी नई तकनीकों को अपनाने के लिए स्वदेशी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियां विकसित की जा रही हैं। बीमफॉर्मिंग क्षमता वाले उच्च फ्रीक्वेंसी बैंड में मल्टी-ऑर्बिट अनुकूल ब्रॉडबैंड टर्मिनल का भी स्वदेशी विकास किया जा रहा है। भविष्य में एचटीएस फीडर लिंक की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए ऑप्टिकल और लेजर संचार के लिए ग्राउंड स्टेशन नेटवर्क का बुनियादी ढांचा विकसित किया जा रहा है। इसके साथ ही परिचालन स्तर पर क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन प्रणालियां स्थापित करने का काम भी जारी है। ब्रॉडबैंड सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए स्वदेशी और संप्रभु एन-जीएसओ उपग्रह समूहों की भी योजना बनाई जा रही है।

उपग्रह नेविगेशन: परिवहन, लॉजिस्टिक्स, विमानन, समुद्री परिवहन, रेलवे, रक्षा, कृषि, आपदा प्रबंधन और स्मार्ट सिटी जैसे क्षेत्रों में नाविक (एनएवीआईसी-नेविगेशन) को प्रमुख पोजिशनिंग, नेविगेशन और टाइमिंग सेवा के रूप में विकसित किया जाएगा। नाविक आधारित प्रिसाइज प्वाइंट पोजिशनिंग और रियल-टाइम किनेमेटिक्स के लिए रिसीवर तकनीक विकसित की जाएगी। इससे उच्च सटीकता वाले अनुप्रयोगों में नाविक को अपनाने का मार्ग प्रशस्त होगा। वर्तमान और आगामी दूरसंचार तकनीकों, जैसे 5G/6G, में नाविक के एकीकरण की भी योजना है। इसके साथ ही नाविक-सक्षम जी एन एस एस बेसबैंड ए एस आई सी (एप्लिकेशन-स्पेसिफिक इंटीग्रेटेड सर्किट) का स्वदेशी विकास प्राथमिकता में है। इससे चिपसेट निर्माण में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा। बाजार में नाविक के तेजी से विस्तार के लिए इसे उद्योग मानकों में शामिल करना भी महत्वपूर्ण है। इस दिशा में भी तेजी से प्रयास किए जाएंगे। नाविक उपग्रह समूह के विस्तार, सिग्नल की विविधता, सटीकता और वैश्विक कवरेज बढ़ाने पर मुख्य रूप से ध्यान दिया जाएगा। उपभोक्ता उपकरणों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे में नाविक के एकीकरण के जरिए इसके व्यापक उपयोग को बढ़ावा दिया जाएगा। इसके साथ ही स्वदेशी चिपसेट और रिसीवर के निर्माण को समर्थन देने तथा अनुप्रयोगों के विकास के लिए निजी क्षेत्र के मजबूत इकोसिस्टम को बढ़ावा देने पर भी जोर रहेगा। चंद्रमा पर पोजिशनिंग, नेविगेशन और टाइमिंग  सेवाओं के विस्तार की दिशा में भी कदम उठाए जाएंगे।

यह जानकारी विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन, परमाणु ऊर्जा तथा अंतरिक्ष विभाग के राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज लोकसभा में एक लिखित उत्तर में दी।

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पीके/केसी/एसके/डीए


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