विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय
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संसदीय प्रश्न: ग्रामीण प्रौद्योगिकी प्रदर्शन परियोजनाएं

प्रविष्टि तिथि: 12 AUG 2026 3:36PM by PIB Delhi

सरकार, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) तथा वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के माध्यम से, देशभर के कृषि-निर्भर क्षेत्रों में आजीविका से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, ग्रामीण नवाचार व वैज्ञानिक समाधानों को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रही है।

 

  1. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) और जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी)

 

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) अपनी विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों के माध्यम से समुदायों को सशक्त बनाने के लिए स्थानीय आवश्यकताओं तथा प्राथमिकताओं के अनुरूप प्रौद्योगिकियों को अपनाने को बढ़ावा दे रहा है। इन प्रौद्योगिकियों के माध्यम से संसाधनों के उपयोग की दक्षता बढ़ाने, पर्यावरणीय संसाधनों के सतत प्रबंधन, अपशिष्ट एवं प्रदूषण को कम करने तथा स्थानीय स्तर पर अपनाए जा सकने वाले समाधानों के विकास को प्रोत्साहित किया जा रहा है, जो सतत कृषि और ग्रामीण आजीविका में योगदान देते हैं। डीएसटी द्वारा समर्थित परियोजनाएँ मानव क्षमता, संस्थागत क्षमता और प्रौद्योगिकियों के कार्यान्वयन की क्षमता को सुदृढ़ कर रही हैं। डीएसटी और डीबीटी की कुछ पहलों का विवरण अनुलग्नक-I में दिया गया है।

 

  1. वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर)

 

सीएसआईआर की प्रयोगशालाएं  विभिन्न मिशनों के माध्यम से ग्रामीण नवाचार और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा देती हैं। इन मिशनों का विवरण अनुलग्नक-II में दिया गया है।

 

पिछले तीन वर्षों के दौरान, सरकार ने खजुराहो लोकसभा क्षेत्र सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक प्रौद्योगिकी प्रदर्शन परियोजनाएं कार्यान्वित की हैं।

 

डीएसटी ने मार्च 2026 में मध्य प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) प्रकोष्ठ की स्थापना की है। यह प्रकोष्ठ निम्नलिखित कार्यों के लिए एक समर्पित तंत्र के रूप में कार्य करेगा:

 

  • विकास योजना में मदद के लिए आजीविका प्रणालियों की मैपिंग करना।
  • तकनीकी कमियों की पहचान करना और समुदाय-विशेष की जरूरतों का आकलन करना।
  • स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार शोध और प्रदर्शन परियोजनाओं को तैयार करना।
  • स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक कौशल का उपयोग करके सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए लक्षित कार्यक्रम तैयार करना।

 

 

इस प्रकोष्ठ की गतिविधियां मध्य प्रदेश के 20 जिलों तक विस्तारित होंगी, जिसमें छतरपुर जैसे अनुसूचित जाति-बहुल क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, ताकि समावेशी और सतत विकास के परिणाम सुनिश्चित किए जा सकें।

 

सीएसआईआर ने इस क्षेत्र में पहले ही निम्नलिखित गतिविधियों में सहयोग प्रदान किया है:

 

  1. बुंदेलखंड के सात जिलों में लगभग 1,000 किसानों ने सुगंधित फसलों की खेती अपनाई। पन्ना जिले में 58.5 एकड़ भूमि पर खेती की गई और रेहुटा में एक ‘फील्ड डिस्टिलेशन यूनिट’ स्थापित की गई। छतरपुर जिले में 189 एकड़ भूमि पर खेती की गई तथा ठाकुर्रा और नंदलालपुरा में दो ‘फील्ड डिस्टिलेशन यूनिट’ स्थापित की गईं।
  2. महिला सशक्तीकरण के लिए छतरपुर में अगरबत्ती निर्माण के प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए।
  3. सीएसआईआर अरोमा मिशन के तहत आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों से कुल 689 किसान लाभान्वित हुए। मध्य प्रदेश के अनूपपुर-शहडोल, कटनी और डिंडोरी जिलों में 65 हेक्टेयर से अधिक भूमि पर लेमनग्रास की खेती की गई।

 

 

सीएसआईआर-केंद्रीय औषधीय एवं सुगंधित पादप संस्थान (सीएसआईआर-सीआईएमएपी) ने कुल 13 किसान मेले आयोजित किए, जिनमें 33,700 से अधिक किसानों, उद्यमियों और उद्योग प्रतिनिधियों ने भाग लिया। पिछले पांच वर्षों के दौरान, देश के विभिन्न राज्यों में 150 कौशल-सह-प्रौद्योगिकी उन्नयन कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें लगभग 7,863 किसानों, उद्यमियों और महिलाओं ने भाग लिया। इसके अलावा, 192 एक-दिवसीय जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें देश के विभिन्न राज्यों से लगभग 10,000 किसानों ने भाग लिया।

 

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) और वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) पूरे देश में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आधारित विकास कार्यक्रम लागू करते हैं। सरकार खजुराहो लोकसभा क्षेत्र सहित पूरे देश में प्रौद्योगिकी आधारित आजीविका के अवसरों को बढ़ाने तथा कृषि एवं ग्रामीण उद्यमों को वैज्ञानिक सहायता प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है।

 

डीएसटी अपनी विभिन्न योजनाओं के माध्यम से देशभर में प्रतिस्पर्धी, योग्यता-आधारित अनुसंधान एवं नवाचार परियोजनाओं को समर्थन प्रदान करता है, जिसमें खजुराहो के संस्थानों और शोधकर्ताओं की भी समान भागीदारी होती है। इन योजनाओं के तहत प्रस्ताव आमंत्रित करने संबंधी सूचनाएँ डीएसटी की वेबसाइट और ई-पीएमएस पोर्टल पर प्रकाशित की जाती हैं। इस क्षेत्र के पात्र संस्थान और शोधकर्ता योजना के प्रावधानों को पूरा करने तथा निर्धारित योग्यता-आधारित मूल्यांकन प्रक्रिया के माध्यम से चयनित होने पर आवेदन कर सहायता प्राप्त कर सकते हैं।

 (डीएसटी योजनाओं के लिए लिंक- https://dst.gov.in/schemes-programmes)

 

अनुलग्नक I

 

  1. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी)

 

  1. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार (एसटीआई) हब कार्यक्रम ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के उपयोग के माध्यम से देशभर में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदायों के लिए रोजगार के अवसरों को बढ़ावा दिया है। यह पहल आधुनिक वैज्ञानिक प्रौद्योगिकियों और नवीन तकनीकों को अपनाकर सामाजिक कल्याण प्रणाली को सुदृढ़ करने पर केंद्रित है।

 

  1. डीएसटी के महिला प्रौद्योगिकी पार्क (डब्ल्यूटीपी) कार्यक्रम ने लक्षित क्षेत्रों में महिलाओं की आजीविका की कमजोर कड़ियों को मजबूत किया है तथा विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार के माध्यम से सामाजिक उद्यमिता और महिला रोजगार को बढ़ावा दिया है।

 

  1. डीएसटी का ‘सुनील’ (आजीविका के लिए नवाचारों को सशक्त करना, उनका विस्तार करना और उन्हें बढ़ावा देना) कार्यक्रम आजीविका से संबंधित स्थानीय एवं प्रणालीगत समस्याओं की पहचान करने के लिए गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और ज्ञान संस्थानों (केआई) के बीच साझेदारी को बढ़ावा देता है। यह कार्यक्रम अनुप्रयुक्त अनुसंधान के माध्यम से नवीन प्रौद्योगिकियों और उपयुक्त विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आधारित समाधानों के विकास; आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण एवं सामाजिक उद्यमों के मॉडल विकसित करने; तथा ज्ञान संस्थानों के माध्यम से समुदाय-आधारित संगठनों (सीबीओ) और एनजीओ की क्षमता निर्माण एवं इसके विपरीत सहयोग पर केंद्रित है।

 

  1. डीएसटी के ‘राष्ट्रीय अंतर्विषयक साइबर-भौतिक प्रणाली मिशन’ (एनएम-आईसीपीएस) ने आईआईटी रोपड़ में ‘प्रौद्योगिकी नवाचार हब’ को समर्थन प्रदान किया है, जो ‘कृषि और जल के लिए प्रौद्योगिकियों’ के क्षेत्र में अनुसंधान एवं नवाचार को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। इन पहलों में सटीक कृषि, स्मार्ट सिंचाई, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित फसल सलाह, पशुधन प्रबंधन, मौसम संबंधी जानकारी, मिट्टी एवं जल परीक्षण तथा फसल अवशेष प्रबंधन के लिए प्रौद्योगिकी शामिल हैं। इनमें स्वचालित वर्षामापी, एआई और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) आधारित पशुधन स्वास्थ्य निगरानी उपकरण, जैव-विविधता सेंसर, मृदा स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली तथा आईओटी आधारित जल प्रबंधन समाधान शामिल हैं। इन पहलों को स्टार्टअप, उद्योग, अनुसंधान संस्थानों, राज्य सरकार की एजेंसियों, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) और कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) के सहयोग से लागू किया जाता है, जिसमें प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, व्यावसायीकरण, ग्रामीण उद्यमिता और क्षमता निर्माण पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

 

  1. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के अंतर्गत आने वाले स्वायत्त संस्थान (एआई) सक्रिय रूप से वैज्ञानिक समाधान विकसित एवं लागू कर रहे हैं, जमीनी स्तर के नवाचारों को बड़े पैमाने पर अपनाने को बढ़ावा दे रहे हैं और प्रयोगशाला से खेत तक की दूरी को कम कर रहे हैं। यह बहुआयामी दृष्टिकोण भारत के कृषि-निर्भर क्षेत्रों में आजीविका और रोजगार को सुदृढ़ करने में योगदान देता है। विभिन्न स्वायत्त संस्थानों की अलग-अलग गतिविधियां नीचे दी गई हैं:-

 

पुणे स्थित आगरकर अनुसंधान संस्थान (एआरआई) ग्रामीण नवाचार और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा देता है। इसके लिए संस्थान जलवायु-अनुकूल फसल किस्मों, विकेंद्रीकृत जैव-ऊर्जा समाधानों और रोग का पता लगाने वाली किटों का विकास करता है, जो कृषि आधारित आजीविका से जुड़ी चुनौतियों का सीधे समाधान करती हैं।

 

जलवायु-अनुकूल फसल का विकास

 

  • जैव-सुदृढ़ गेहूं: किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा बढ़ाने के लिए अधिक उपज देने वाली, रतुआ-रोधी और पोषक तत्वों से भरपूर किस्में, जैसे एमएसीएस 4028 (प्रोटीन, आयरन और जिंक से भरपूर) तथा एमएसीएस 6222/एमएसीएस 6478 विकसित की गई हैं।

 

  • कीट-रोधी सोयाबीन: एमएसीएस 1407 विकसित की गई है, जो अधिक उपज देने वाली सोयाबीन की किस्म है। यह मध्य, पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में वर्षा-आधारित खेती के लिए उपयुक्त है। इसमें प्रमुख कीटों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता है और इसकी कटाई मशीनों के माध्यम से की जा सकती है।

 

  • खेतों में प्रदर्शन: बड़े पैमाने पर क्षेत्र परीक्षण और कृषि पद्धतियों पर तकनीकी प्रशिक्षण के लिए राज्य बीज निगमों, जैसे महाबीज, के साथ साझेदारी की गई है।

 

बायो-एनर्जी और ग्रामीण कचरा समाधान

 

  • पराली जलाने के विकल्प: कृषि अपशिष्ट, विशेष रूप से धान के पुआल से एक कम लागत वाला अवायवीय कवक मिश्रण विकसित किया गया है। यह फसल अवशेषों को दो सप्ताह के भीतर पोषक तत्वों से भरपूर खाद में तेजी से परिवर्तित कर देता है, जिससे पराली जलाने का एक टिकाऊ विकल्प उपलब्ध होता है।

 

  • बौने गेहूं के वैकल्पिक जीन: एआरआई ने गेहूं में आरएचटी14 और आरएचटी18 जैसे जीन की पहचान की है, जिनकी सहायता से खेत में धान की पराली मौजूद होने के बावजूद बीज सफलतापूर्वक अंकुरित हो सकते हैं और उन्हें गहराई में बोया जा सकता है।

 

  • पायलट स्तर पर स्वच्छ ऊर्जा: ग्रामीण क्षेत्रों में अपशिष्ट से संपदा सृजन (वेस्ट-टू-वेल्थ) के ऐसे आर्थिक मॉडल विकसित करने के लिए पायलट स्तर पर जैव-हाइड्रोजन और जैव-मीथेन संयंत्र शुरू किए गए हैं, जिन्हें बड़े पैमाने पर अपनाया जा सके।

 

बेंगलुरु स्थित जवाहरलाल नेहरू उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र (जेएनसीएएसआर) ने सेमीओकेमिकल्स, विशेष रूप से फेरोमोन, के नियंत्रित एवं धीमे उत्सर्जन के लिए एक नैनोमैट्रिक्स विकसित किया है। यह ‘व्यवस्थित मेसोपोरस सिलिका नैनोमैट्रिक्स’ रेड पाम वीविल के फेरोमोन के लिए डिस्पेंसर के रूप में कार्य करता है। यह तकनीक किसानों को नारियल के बागानों में रेड पाम वीविल के प्रकोप को नियंत्रित करने में सहायता करती है। इसमें एक विशेष ट्रैप का उपयोग किया जाता है, जो लंबे समय तक फेरोमोन का उत्सर्जन करता है। इससे कम मात्रा में फेरोमोन की आवश्यकता होती है और डिस्पेंसर को बार-बार बदलने की जरूरत भी कम हो जाती है। इस तकनीक को जेएनसीएएसआर और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने संयुक्त रूप से विकसित किया है। इस तकनीक ने रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने और पर्यावरण-अनुकूल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने में योगदान दिया है। इसका उपयोग कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में 5,000 एकड़ से अधिक क्षेत्र में किया गया है।

 

गुवाहाटी स्थित विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में उन्नत अध्ययन संस्थान (आईएएसएसटी) ने प्रौद्योगिकी हस्तांतरण नीति विकसित की है। यह नीति प्रौद्योगिकी हस्तांतरण प्रकोष्ठ (टीटीसी) के माध्यम से बौद्धिक संपदा संरक्षण, पेटेंट दाखिल करने और लाइसेंसिंग समझौतों का प्रबंधन करती है, ताकि प्रयोगशाला में विकसित खोजों को सुगमता से बाजार के लिए तैयार वाणिज्यिक उत्पादों में परिवर्तित किया जा सके। आईएएसएसटी की सामाजिक उद्यम एवं उद्यमिता परिषद (आईएसवीईसी) और इसका बायोनेस्ट इनक्यूबेटर कृषि-तकनीक और जैव-प्रौद्योगिकी स्टार्टअप को कानूनी मान्यता, व्यावसायिक मार्गदर्शन और तकनीकी अवसंरचना प्रदान करते हैं। साथ ही, संस्थान देश के जैव-संसाधनों से आर्थिक मूल्य सृजित करने के लिए बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों के साथ सहयोग करता है। उदाहरण के लिए, आईएएसएसटी ग्राम अंगीकरण कार्यक्रम, स्वदेशी पारंपरिक ज्ञान (आईटीके) को शामिल करने और स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) को समर्थन देने जैसी पहलों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में नवाचार को बढ़ावा देता है। आईएएसएसटी ने आजीविका से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक समाधान विकसित किए हैं, जो नीचे दिए गए हैं:

 

  • फसल सुरक्षा और प्रबंधन: कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण नवाचार किए गए हैं, जैसे वाणिज्यिक चाय बागानों में ‘फ्यूजेरियम डाइबैक’ रोग को नियंत्रित करने के लिए एंडोफाइटिक एक्टिनोमाइसीट्स आधारित जैव-फॉर्मूलेशन विकसित करना।

 

  • कृषि के वैकल्पिक तरीके: पारंपरिक फसलों से जुड़े जोखिमों को कम करने के लिए ग्रामीण किसानों को अधिक उपज देने वाली मशरूम और पपीते की खेती, वर्मीकम्पोस्टिंग तथा उच्च मूल्य वाले काले चावल की खेती के लिए प्रशिक्षित किया गया और इन विधियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

 

  • रेशम जैव-प्रौद्योगिकी में सुधार: एरी रेशम पालन में व्यवस्थित और वैज्ञानिक पद्धतियाँ अपनाई गईं, जिससे कोकून के नष्ट होने की दर में उल्लेखनीय कमी आई और स्थानीय बुनकरों के लिए कच्चे माल के उत्पादन में सुधार हुआ।

 

  • मूल्यवर्धित कृषि-खाद्य उत्पाद: जल्दी खराब होने वाले पारंपरिक खाद्य पदार्थों को अधिक समय तक सुरक्षित रहने वाले वाणिज्यिक कार्यात्मक खाद्य उत्पादों में परिवर्तित किया गया—जैसे मोटापा-रोधी किण्वित बांस के अंकुर, अधिक समय तक सुरक्षित रहने वाला सोया-दही और प्रसंस्कृत मछली (जिडोल) के लिए सुरक्षित स्टार्टर कल्चर।

 

नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन-इंडिया (एनआईएफ), अहमदाबाद विभिन्न राज्यों में स्थानीय चुनौतियों की पहचान करने तथा आजीविका बढ़ाने, श्रम कम करने और उत्पादन एवं कार्यक्षमता में सुधार लाने वाले जमीनी स्तर के नवाचारों को लागू करने के लिए सक्रिय रूप से कार्य करता है। एनआईएफ स्थानीय सहयोगियों के साथ मिलकर लाभार्थियों के लिए प्रदर्शन और व्यावहारिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करता है।

 

शिलांग स्थित ‘नॉर्थ ईस्ट सेंटर फॉर टेक्नोलॉजी एप्लीकेशन एंड रीच’ (एनईसीटीएआर) देश के प्रमुख संस्थानों के साथ मिलकर प्रौद्योगिकी-आधारित उपायों के माध्यम से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और ग्रामीण नवाचार को बढ़ावा देता है। इनमें पीएम-डेवाइन (पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए प्रधानमंत्री की विकास पहल) योजना के तहत केले के तने (स्यूडोस्टेम) से मूल्यवर्धित उत्पाद बनाने की प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण; सीएसआईआर-एनआईआईएसटी (वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय अंतर्विषयक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान) से केले के रेशे पर आधारित वीगन लेदर प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण; तथा आईसीएआर-एनआईएनएफईटी (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–प्राकृतिक रेशा इंजीनियरिंग एवं प्रौद्योगिकी राष्ट्रीय संस्थान) से केले के धागे बनाने की प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण शामिल है।

इन प्रयासों में प्रौद्योगिकी प्रदर्शन केंद्रों की स्थापना, फलों एवं सब्जियों के लिए मोबाइल प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना तथा सौर डिहाइड्रेटर की स्थापना भी शामिल है। इसके अलावा, सतत कृषि और ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देने के लिए किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को प्रोत्साहित करने तथा जमीनी स्तर की प्रौद्योगिकियों—जैसे कम लागत वाली अनानास छीलने की मशीन, हाथ से झाड़ू बांधने की तकनीक, हाइड्रोलिक रैम पंप और ‘वसुंधरा’ मृदा जैविक कार्बन पहचान प्रौद्योगिकी—को समर्थन देने को प्राथमिकता दी जा रही है।

 

मोहाली स्थित नैनो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएनएसटी) ने कृषि के लिए नैनो-प्रौद्योगिकी आधारित समाधान विकसित किए हैं। इनमें नैनो-उर्वरक, लक्षित पोषक तत्व आपूर्ति, स्मार्ट कृषि सेंसर और खाद्य संरक्षण के लिए रैपर शामिल हैं। आईएनएसटी संयुक्त अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी), उद्योग के साथ सहयोगात्मक परियोजनाओं और ग्रामीण क्षेत्रों में शैक्षिक कार्यक्रमों के माध्यम से क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव उत्पन्न कर रहा है। आईएनएसटी द्वारा कृषि के लिए विकसित वैज्ञानिक समाधानों का विवरण नीचे दिया गया है।

 

  • लक्षित नैनो-पोषक तत्व: विशेष रूप से तैयार किए गए स्मार्ट पदार्थ पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों को नियंत्रित तरीके से जारी करते हैं, जिससे कृषि क्षेत्रों में रासायनिक अपशिष्ट कम होता है और फसल की पैदावार बढ़ती है।

 

  • कृषि संवेदन और निदान: नैनोकण-आधारित प्रकाशीय और विद्युत सेंसर मिट्टी की गुणवत्ता में होने वाले बदलावों और फसल रोगजनकों का प्रारंभिक स्तर पर पता लगाने में सक्षम हैं।

 

  • कटाई के बाद संरक्षण: जल्दी खराब होने वाले फलों और सब्जियों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए उन्नत नैनो-आधारित कार्बन रैपर और भंडारण सामग्री विकसित की गई हैं, जिनमें विषैले रासायनिक परिरक्षकों का उपयोग नहीं किया जाता।

 

 

(II) जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी)

 

  • देशभर के 115 आकांक्षी जिलों में बायोटेक-किसान (बायोटेक-किसान और जैव प्रौद्योगिकी आधारित सामाजिक विकास कार्यक्रम जैसे कार्यक्रम लागू किए गए हैं।

 

  • पिछले तीन वर्षों के दौरान, आईआईटी, आईसीएआर संस्थानों, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) सहित 40 से अधिक संस्थानों को इन कार्यक्रमों में शामिल किया गया है। इससे लगभग 20,000–25,000 किसानों को प्रत्यक्ष लाभ मिला है। इसके अलावा, बायोटेक-किसान और ग्रामीण हब के माध्यम से 5,000 ग्रामीण युवाओं और स्थानीय उद्यमों को उद्यमिता का प्रशिक्षण दिया गया है। 600 से अधिक स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) को सुदृढ़ किया गया है, जिसके परिणामस्वरूप जैव प्रौद्योगिकी के विभिन्न क्षेत्रों में 350 से अधिक ग्रामीण उद्यम स्थापित हुए हैं।

 

 

अनुलग्नक II

अरोमा मिशन:

सीएसआईआर-केंद्रीय औषधीय एवं सुगंधित पादप संस्थान (सीआईएमएपी), लखनऊ किसानों की आय बढ़ाने, जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने और ग्रामीण रोजगार सृजित करने के लिए विभिन्न परियोजनाओं के तहत औषधीय एवं सुगंधित फसलों की खेती, गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री, कटाई के बाद प्रसंस्करण, मूल्यवर्धन, आसवन प्रौद्योगिकी, कौशल विकास, बाजार संपर्क और उद्यमिता के लिए प्रौद्योगिकियों का विकास एवं हस्तांतरण करता है।

सीएसआईआर-सीआईएमएपी, लखनऊ कौशल विकास, प्रशिक्षण, जागरूकता कार्यक्रम और किसान मेलों आदि के आयोजन के माध्यम से किसानों के बीच औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती को भी बढ़ावा दे रहा है।

 

आरएसएसए मिशन:

सीएसआईआर ने ‘मृदा एवं पौध स्वास्थ्य के लिए क्षेत्र-विशिष्ट स्मार्ट कृषि-तकनीक (आरएसएसए)’ पर अपने राष्ट्रीय मिशन के तहत कई उन्नत प्रौद्योगिकियाँ विकसित करने की दिशा में कार्य किया है। इन प्रौद्योगिकियों में डिजिटल मृदा इंटेलिजेंस प्रणाली, एआई-आधारित रोग पहचान प्रणाली, आवश्यकता-आधारित उर्वरक प्रयोग तकनीक, आईओटी-आधारित मौसम निगरानी प्रणाली, यूएवी (मानवरहित हवाई वाहन) आधारित फसल विश्लेषण तथा विशेष रूप से भारतीय कृषि परिस्थितियों के लिए विकसित मृदा पोषक तत्व पहचान समाधान शामिल हैं।

 

समुद्री शैवाल मिशन:

सीएसआईआर-केंद्रीय नमक एवं समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान (सीएसएमसीआरआई) की व्यावसायिक रूप से लाइसेंस प्राप्त समुद्री शैवाल जैव-उत्तेजक प्रौद्योगिकियों, जिनमें कप्पाफाइकस और सारगासम आधारित उत्पाद शामिल हैं, की भारतीय समुद्री शैवाल जैव-उत्तेजक बाजार में वर्तमान अनुमानित हिस्सेदारी 18–20% है, जिसका कारोबारी मूल्य लगभग ₹360–400 करोड़ है। क्षेत्रीय मूल्यांकन से किसानों को भी महत्वपूर्ण आर्थिक लाभ हुआ है। बेहतर फसल उत्पादकता और इनपुट उपयोग दक्षता के माध्यम से किसानों को प्रति हेक्टेयर ₹9,403 तक का अतिरिक्त लाभ प्राप्त हुआ है।

 

स्मार्ट विलेज” पर मिशन मोड परियोजना

सीएसआईआर ने अक्टूबर 2025 में “स्मार्ट विलेज” पर एक मिशन मोड परियोजना शुरू की। इस परियोजना का उद्देश्य आधुनिक प्रौद्योगिकियों, बेहतर अवसंरचना और सतत विकास के तरीकों के माध्यम से ग्रामीण भारत में परिवर्तन लाना है। इस परियोजना के तहत गुजरात, असम, मध्य प्रदेश, ओडिशा और राजस्थान जैसे विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में मॉडल स्मार्ट गांव विकसित किए जा रहे हैं। इसके लिए सीएसआईआर की अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों और पर्यावरण-अनुकूल समाधानों का उपयोग किया जा रहा है, जो ग्रामीण समुदायों की विशिष्ट चुनौतियों का समाधान करने में सहायक हैं।

यह जानकारी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन तथा परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष विभाग के राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज लोकसभा में एक लिखित उत्तर में दी।

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