अंतरिक्ष विभाग
‘इसरो' पृथ्वी की निचली कक्षा' में उपग्रहों की बढ़ती संख्या के कारण अंतरिक्ष में मलबे के जमाव की समस्या से पूरी तरह अवगत है और इसे कम करने व रोकने के लिए हर संभव कदम उठा रहा है: डॉ. जितेंद्र सिंह
अंतरिक्ष परिसंपत्तियों की सुरक्षा और एडीआर व अन्य माध्यमों से मलबा हटाने में इसरो का 'मलबामुक्त अंतरिक्ष मिशन' निभाएगा प्रमुख भूमिका: डॉ. जितेंद्र सिंह
इसरो 1996 से अंतर-एजेंसी अंतरिक्ष मलबा समन्वय समिति का सदस्य रहा है: डॉ. जितेंद्र सिंह
भारतीय अंतरिक्ष नीति में उपग्रहों का उपयोग खत्म होने पर उनके निपटान के लिए अंतरराष्ट्रीय दिशा-निर्देशों का पालन अनिवार्य
दीर्घकालिक अंतरिक्ष स्थिरता के लिए अंतरिक्ष की स्थिति की जानकारी, सक्रिय मलबा हटाना और स्वदेशी निगरानी क्षमताएं अत्यंत महत्वपूर्ण
प्रविष्टि तिथि:
13 AUG 2026 4:29PM by PIB Delhi
केंद्रीय कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन तथा प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज राज्यसभा में एक उत्तर में कहा कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) निम्न पृथ्वी कक्षा (एलइओ) उपग्रह तारामंडलों या सैटेलाइट इंटरनेट तारामंडलों की बड़ी संख्या में हो रही वृद्धि के कारण अंतरिक्ष में जमा हो रहे मलबे के मुद्दे से पूरी तरह अवगत है और इसके शमन तथा रोकथाम के लिए सभी संभव कदम उठा रहा है।
मंत्री महोदय ने आगे कहा कि इसरो का 'मलबामुक्त अंतरिक्ष मिशन' सक्रिय मलबा हटाने (एडीआर) और अन्य माध्यमों से अंतरिक्ष परिसंपत्तियों की सुरक्षा करने तथा आगे मलबे को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिए उपग्रह तारामंडलों में आमतौर पर कुछ हजार उपग्रह शामिल होते हैं, जिससे उनके संबंधित कक्षीय आवरणों (ऑर्बिटल शेल्स) के आसपास के क्षेत्रों में टक्कर का जोखिम काफी बढ़ जाता है। हालांकि, कई बड़े तारामंडलों में स्वायत्त टकराव बचाव (ऑटोनामस कोलिजन अवॉइडेंस) की क्षमता होती है, लेकिन कुछ उपग्रह कक्षा में खराब हो सकते हैं और टक्कर से बचने के लिए अपनी दिशा बदलने में असमर्थ हो सकते हैं।
मंत्री महोदय ने आगे कहा कि छोटे आकार का ऐसा मलबा जिसे ट्रैक नहीं किया जा सकता, एक अतिरिक्त खतरा पैदा करता है, क्योंकि ऐसे मलबे से टकराने से बचा नहीं जा सकता और न ही उससे बचाव के लिए पर्याप्त सुरक्षा कवच बनाया जा सकता है। टक्कर से मिशन खत्म करने का खतरा हो सकता है, जिससे सैटेलाइट बेकार हो सकता है और ज्यादा मलबा पैदा हो सकता है। बड़ी संख्या में सैटेलाइट होने के कारण, मलबा इकठ्ठा होने का खतरा काफी ज़्यादा है। उन्होंने यह भी बताया कि किसी आबादी वाले कक्षीय आवरण (ऑर्बिटल शेल) के पास टक्कर या अचानक टूटने की वजह से अगर कोई टुकड़ा अलग होता है, तो ये खतरे और बढ़ सकते हैं।
अंतरिक्ष मलबे की निगरानी और शमन पर भारत की संस्थागत भागीदारी को रेखांकित करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने सूचित किया कि 1993 में गठित अंतर-एजेंसी अंतरिक्ष मलबा समन्वय समिति (आईएडीसी) को अंतरिक्ष मलबे की निगरानी और शमन के मामलों से निपटने वाली सबसे मान्यता प्राप्त संस्था माना जाता है। अंतरिक्ष विभाग के तहत इसरो 1996 से आईएडीसी का सदस्य रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि बाहरी अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग पर संयुक्त राष्ट्र समिति (यूएन-कोपूओस) अंतरिक्ष मलबे को कम करने और लंबे समय तक स्थिरता बनाए रखने के मामलों पर काम करती है, जिसमें अंतरिक्ष अभियानों की सुरक्षा भी शामिल है।
भारत अंतरिक्ष मलबे से निपटने वाले अंतर्राष्ट्रीय मंचों में प्रतिनिधित्व करता है, जिनमें आईएडीसी, संयुक्त राष्ट्र वैज्ञानिक और तकनीकी उपसमिति (यूएन-एसटीएससी) का दीर्घकालिक स्थिरता संबंधी कार्य समूह और अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता (एसएसए) पर विशेषज्ञ समूह शामिल हैं। डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि आईएडीसी के सदस्य अंतरिक्ष मलबे से जुड़े मामलों पर नियमित रूप से विचार-विमर्श करते हैं और बदलते अंतरिक्ष मलबे के माहौल के अनुसार इसके शमन के दिशा-निर्देशों में संशोधन करते हैं। अंतरिक्ष मलबे की निगरानी और अंतरिक्ष उड़ान सुरक्षा के पहलुओं पर दीर्घकालिक स्थिरता और अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता कार्य समूहों में भी चर्चा की जाती है।
उन्होंने आगे बताया कि आईएए अंतरिक्ष मलबा कार्य समूह और आईएसओ कार्य समूह 7 जैसे अन्य मंच भी हैं। ऐसे मंच अंतरिक्ष मलबे की निगरानी और उसके रोकथाम के लिए अंतरिक्ष विभाग और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के बीच तालमेल बनाने में मदद करते हैं।
उपग्रहों के जीवन-काल के अंत में उनके निपटान के बारे में डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारतीय अंतरिक्ष नीति के तहत भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम में अंतरिक्ष मलबे को कम करने से जुड़े अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त दिशा-निर्देशों को अपनाना ज़रूरी है; इसमें जीवन-काल के अंत में निपटान से जुड़े उपाय भी शामिल हैं। इसरो के नेतृत्व में शुरू किया गया 'डेब्रिस फ्री स्पेस मिशन' (मलबा-मुक्त अंतरिक्ष मिशन) उपग्रहों के जीवन-काल के अंत में निपटान संबंधी दिशा-निर्देशों को लागू करने की दिशा में एक सक्रिय कदम है।
मंत्री महोदय ने यह भी कहा कि 2024 में 'इन-स्पेस' द्वारा जारी मानकों, दिशा-निर्देशों और प्रक्रियाओं के तहत सभी भारतीय अंतरिक्ष हितधारकों को मिशन के बाद निपटान के पर्याप्त उपायों को अपनाने या यह सुनिश्चित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है कि उनकी अंतरिक्ष परिसंपत्तियों का कक्षीय जीवन प्राकृतिक कक्षीय क्षय के कारण बहुत कम हो।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस (एसएसए) को लंबे समय तक अंतरिक्ष की स्थिरता बनाए रखने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि अन्य ज़रूरी बातों में ऑपरेटरों का तकनीकी ज़रूरतों (जैसे कि दिशा बदलने और ट्रैक किए जा सकने की क्षमता) को पूरा करना, रजिस्ट्रेशन और संपर्क की जानकारी साझा करने जैसी बुनियादी ज़िम्मेदारियों को निभाना और एक मज़बूत नियामक ढांचे को सुनिश्चित करना शामिल है।
मंत्री महोदय ने आगे कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माने गए अंतरिक्ष मलबे को कम करने के उपायों को बड़े पैमाने पर लागू करने और'मलबामुक्त अंतरिक्ष मिशन' की ज़रूरतों का बेहतर पालन करने से अंतरिक्ष संपत्तियों की सुरक्षा और मलबे के और ज़्यादा बनने को रोकने में अहम भूमिका मिलेगी। उन्होंने अंतरिक्ष मलबे के बढ़ने को रोकने में 'एक्टिव डेब्रिस रिमूवल' (एडीआर) के महत्व पर भी ज़ोर दिया। एडीआर के शुरुआती चरण के रूप में कार्य करने वाली गतिविधियों को पहले ही शुरू कर दिया गया है और उम्मीद है कि समय के साथ ये और बेहतर होंगी।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग और घरेलू क्षमताओं, दोनों के महत्व पर ज़ोर देते हुए कहा कि व्यापक 'स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस' (अंतरिक्ष की स्थितियों की जानकारी) और लंबे समय तक बनाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और डेटा साझा करना ज़रूरी है। साथ ही, अंतरिक्ष की निगरानी के लिए घरेलू क्षमता विकसित करके आत्मनिर्भरता हासिल करने की कोशिश की जाएगी और उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए नए-नए उपाय और अनुसंधान और विकास पर भी ध्यान दिया जाएगा। उन्होंने दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए अंतरिक्ष के उपयोग योग्य क्षेत्रों की संवेदनशीलता के प्रति अंतरिक्ष हितधारकों के बीच जागरूकता बढ़ाने के महत्व पर भी बल दिया।

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पीके/केसी/एसके/एसएस
(रिलीज़ आईडी: 2299155)
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