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आदिवासी परंपराओं में छिपे पर्यावरणीय समाधानों की तलाश कर रहा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान जोधपुर का शोध

जनजातीय खगोल ज्ञान, पारंपरिक कृषि पद्धतियों और सामुदायिक पर्यावरण संरक्षण का अध्ययन कर आधुनिक विज्ञान और टिकाऊ ग्रामीण आजीविका से जोड़ने का प्रयास

प्रविष्टि तिथि: 01 SEP 2026 5:54PM by PIB Jaipur

भारत के आदिवासी और ग्रामीण समुदायों ने पीढ़ियों से प्रकृति के साथ अपने गहरे संबंध के आधार पर आकाश, तारों, ऋतुओं, खेती, पौधों और प्राकृतिक संसाधनों को समझने की अपनी विशिष्ट प्रणालियाँ विकसित की हैं। इन पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को अब केवल सांस्कृतिक विरासत के रूप में नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और ग्रामीण आजीविका जैसी आज की चुनौतियों के समाधान की संभावनाओं के रूप में भी देखा जा रहा है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान जोधपुर में स्कूल ऑफ लिबरल आर्ट्स के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. भास्कर कुमार काकती भारत के विभिन्न हिस्सों में जनजातीय समुदायों और राजस्थान के ग्रामीण समुदायों के साथ मिलकर उनके पारंपरिक ज्ञान का अध्ययन कर रहे हैं। शोध का उद्देश्य इस ज्ञान को दर्ज करना, उसके वैज्ञानिक और पर्यावरणीय महत्व को समझना तथा यह देखना है कि इसका उपयोग पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास के लिए किस प्रकार किया जा सकता है।

डॉ. काकती कहते हैं, “पारंपरिक ज्ञान केवल अतीत की जानकारी नहीं है। समुदायों ने प्रकृति के साथ पीढ़ियों तक अपने गहरे जुड़ाव के माध्यम से इन पद्धतियों को विकसित किया है। हमारा शोध इनके वैज्ञानिक और पर्यावरणीय महत्व को समझने तथा यह जानने पर केंद्रित है कि वर्तमान समय की पर्यावरणीय और आजीविका संबंधी चुनौतियों से निपटने में यह ज्ञान किस प्रकार योगदान दे सकता है।”

तारों और ऋतुओं को समझने वाला जनजातीय ज्ञान

डॉ. काकती के शोध का एक महत्वपूर्ण हिस्सा जनजातीय खगोल ज्ञान (Tribal Astronomy) है। इसमें यह समझने का प्रयास किया जा रहा है कि विभिन्न जनजातीय समुदाय आकाश, तारों, ऋतुओं और प्रकृति के चक्रों को किस प्रकार देखते और समझते हैं।

इस शोध में समुदायों द्वारा किए गए पारंपरिक अवलोकनों की तुलना भारतीय ज्ञान प्रणाली (Indian Knowledge System) से भी की जा रही है। इसके तहत भारत के विभिन्न जनजातीय समुदायों में प्रचलित खगोलीय ज्ञान का एक शब्दकोश (Glossary) भी तैयार किया गया है।

इस प्रयास का उद्देश्य इस ज्ञान को सुरक्षित रखना और आधुनिक शोध के संदर्भ में इसके महत्व को समझना है।

राजस्थान की पारंपरिक कृषि पद्धतियों में पर्यावरण संरक्षण की संभावनाएँ

शोध का एक अन्य प्रमुख क्षेत्र राजस्थान में प्रचलित पारंपरिक कृषि पद्धतियों और उनसे जुड़ी मान्यताओं एवं परंपराओं का अध्ययन है।

शोध यह समझने का प्रयास करता है कि खेती और प्रकृति से जुड़ी ये पारंपरिक परंपराएँ जैव विविधता के संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ प्रबंधन में किस प्रकार योगदान दे सकती हैं।

इस अध्ययन में ‘स्पिरिचुअल इकोलॉजी’ (Spiritual Ecology) की अवधारणा को भी देखा जा रहा है। सरल शब्दों में, यह समझने का प्रयास है कि लोगों का प्रकृति के साथ सांस्कृतिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक संबंध उनके पर्यावरण से जुड़े व्यवहार को किस प्रकार प्रभावित करता है।

पारंपरिक ज्ञान से जमीन पर पर्यावरण संरक्षण तक

यह शोध केवल पारंपरिक ज्ञान को दस्तावेजित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी जांच रहा है कि इन पारंपरिक पद्धतियों से वास्तविक पर्यावरणीय लाभ कैसे प्राप्त किए जा सकते हैं।

इसका एक प्रमुख उदाहरण राजस्थान के नांदिया कलां गांव की खराब हो चुकी सामुदायिक भूमि पर विकसित की गई नक्षत्र वाटिका है।

इस पहल में पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और आधुनिक पर्यावरणीय पुनर्स्थापन के प्रयासों को एक साथ जोड़ा गया। इसके परिणामस्वरूप जैव विविधता को पुनर्जीवित करने, औषधीय पौधों के संरक्षण और समुदाय की भागीदारी बढ़ाने में मदद मिली।

यह उदाहरण दिखाता है कि स्थानीय समुदाय के ज्ञान और उसकी अपनी भूमि के प्रति जिम्मेदारी को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ जोड़कर कमजोर हो चुके पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित किया जा सकता है।

डॉ. काकती के अनुसार, “नांदिया कलां में किए गए कार्य से यह स्पष्ट हुआ कि जब स्थानीय समुदाय संरक्षण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनते हैं, तो संरक्षण अधिक प्रभावी और सार्थक हो जाता है। पारंपरिक ज्ञान, सामुदायिक स्वामित्व और वैज्ञानिक दृष्टिकोण मिलकर खराब हो चुके पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करने में मदद कर सकते हैं।”

क्या पारंपरिक ज्ञान ग्रामीणों के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा कर सकता है?

शोध का एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या पारंपरिक ज्ञान को टिकाऊ आर्थिक अवसरों में बदला जा सकता है।

सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय (MSME) की ASPIRE योजना के माध्यम से डॉ. काकती, IIT जोधपुर के Livelihood Business Incubation Centre के साथ मिलकर ग्रामीण समुदायों को कौशल विकास, उद्यमिता प्रशिक्षण और सरकारी सहायता कार्यक्रमों से जोड़ने की दिशा में काम कर रहे हैं।

इसका उद्देश्य यह तलाशना है कि पारंपरिक ज्ञान ग्रामीण समुदायों के लिए उद्यमिता, कौशल विकास और टिकाऊ आजीविका के नए रास्ते खोल सकता है या नहीं। साथ ही, यह ग्रामीण समुदायों की अपनी क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में भी एक प्रयास है।

गांवों के ज्ञान और प्रयोगशालाओं की तकनीक को जोड़ने की दिशा में अगला कदम

अब शोध का अगला चरण पारंपरिक ज्ञान को उपयुक्त तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर जलवायु परिवर्तन और टिकाऊ विकास के लिए व्यावहारिक समाधान तलाशने पर केंद्रित है।

यह कार्य भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान जोधपुर के बहुविषयक शोध दृष्टिकोण को भी दर्शाता है, जिसमें इंजीनियरिंग, पर्यावरण विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और ग्रामीण विकास जैसे विभिन्न क्षेत्रों को एक साथ लाया जा रहा है।

डॉ. काकती कहते हैं, “हमें पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान को दो अलग-अलग दुनिया के रूप में नहीं देखना चाहिए। दोनों से सीखने की काफी संभावनाएँ हैं। गांवों के ज्ञान को वैज्ञानिक शोध और तकनीक के साथ जोड़कर हम ऐसे समाधान विकसित कर सकते हैं जो पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ होने के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक रूप से भी उपयोगी हों।”

भविष्य के समाधान में समुदायों की भूमिका

यह शोध एक महत्वपूर्ण सोच को सामने रखता है—जनजातीय और ग्रामीण समुदाय केवल विकास योजनाओं के लाभार्थी नहीं, बल्कि भविष्य के समाधान तैयार करने में महत्वपूर्ण भागीदार भी हो सकते हैं।

पारंपरिक ज्ञान को दस्तावेजित करने, उसके वैज्ञानिक महत्व को समझने, उसे पर्यावरण संरक्षण में लागू करने और ग्रामीण आजीविका से जोड़ने के माध्यम से IIT जोधपुर का यह शोध भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों और आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक के बीच एक सेतु बनाने का प्रयास कर रहा है।

डॉ. काकती कहते हैं, “मेरा मानना है कि कुछ सबसे सार्थक समाधान प्रयोगशालाओं और गांवों—दोनों से सीखने पर सामने आ सकते हैं। हमारा उद्देश्य प्रकृति की रक्षा करना, समुदायों को मजबूत बनाना और भविष्य के लिए टिकाऊ रास्ते तैयार करना है।”

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान जोधपुर में इस तरह का बहुविषयक शोध भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों और आधुनिक विज्ञान को साथ लाकर पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने, ग्रामीण समुदायों को सशक्त बनाने और अधिक टिकाऊ भविष्य की दिशा में नए रास्ते तलाश रहा है।

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