रक्षा मंत्रालय
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वैश्विक उद्यम बनने और विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए साझेदारी को बढ़ावा देते हुए अनुसंधान एवं विकास, नवाचार तथा प्रौद्योगिकी उन्नयन में निवेश बढ़ाना चाहिए: रक्षा मंत्री का सूक्षम, लघु एवं मध्यम उद्यमों से आग्रह


“हमारी विनिर्माण संबंधी सोच को ‘मेक इन इंडिया, मेक फॉर इंडिया और मेक फॉर द वर्ल्ड’ के सिद्धांत द्वारा निर्देशित होना चाहिए”

प्रविष्टि तिथि: 01 SEP 2026 7:24PM by PIB Delhi

रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने लघु, सूक्ष्म एवं मध्यम उद्यमों से अपने कारोबार का एक हिस्सा अनुसंधान एवं विकास तथा प्रौद्योगिकी उन्नयन में निवेश करने का आह्वान किया है। उन्होंने विश्वविद्यालयों, आईआईटी, अनुसंधान संस्थानों, डीआरडीओ प्रयोगशालाओं, स्टार्ट-अप्स व बड़े उद्योगों के साथ साझेदारी एवं सहयोग को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया, ताकि ये उद्यम केवल घरेलू आपूर्तिकर्ताओं तक सीमित न रहें, बल्कि वैश्विक उद्यमों के रूप में विकसित हों और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य में योगदान दे सकें। श्री सिंह ने उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में 1 सितंबर 2026 को  सूक्षम, लघु एवं मध्यम उद्यमों के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि विकसित भारत ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना है, जो विनिर्माण के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी हो, प्रौद्योगिकी और नवाचार में अग्रणी हो तथा अपनी रणनीतिक एवं आर्थिक क्षमताओं में आत्मनिर्भर हो। उन्होंने कहा कि ऐसा भारत अपने युवाओं के लिए पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण रोजगार के अवसर सृजित करने में सक्षम होगा। रक्षा मंत्री ने इस बात पर भी बल दिया कि भारत की विनिर्माण संबंधी सोच ‘मेक इन इंडिया, मेक फॉर इंडिया और मेक फॉर द वर्ल्ड’ के सिद्धांत से निर्देशित होनी चाहिए।

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रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने भारतीय लघु, सूक्ष्म एवं मध्यम उद्यमों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने पर जोर देते हुए कहा कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में हो रहे निरंतर बदलाव और विश्वसनीय विनिर्माण साझेदारों की बढ़ती मांग भारत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करती है। उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में प्रमुख देशों के साथ भारत की व्यापारिक साझेदारियों को और मजबूत करने के लिए उठाए जा रहे कदमों का उल्लेख किया। इनमें अमेरिका, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, ओमान, स्विट्जरलैंड और यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौते शामिल हैं। रक्षा मंत्री ने कहा कि ये मुक्त व्यापार समझौते नेटवर्क लघु एवं मध्यम उद्यमों तथा उद्योगों के लिए वैश्विक व्यापार और निर्यात के अपार अवसर खोलते हैं। उन्हें क्रेडिट गारंटी के विस्तार व जीएसटी के युक्तिकरण जैसी सरकारी गतिविधियों का लाभ उठाते हुए इन अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों और व्यापार समझौतों से अधिकतम लाभ प्राप्त करना चाहिए तथा भारतीय उत्पादों को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाना चाहिए। रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत की विनिर्माण दृष्टि ‘मेक इन इंडिया, मेक फॉर इंडिया और मेक फॉर द वर्ल्ड’ के सिद्धांत से निर्देशित होनी चाहिए। यह दृष्टिकोण भारतीय उद्योग को घरेलू मांग पूरी करने के साथ-साथ वैश्विक बाजारों में अपनी उपस्थिति और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है।

श्री राजनाथ सिंह रक्षा मंत्री ने सूक्षम, लघु एवं मध्यम उद्यमों को औपचारिक अर्थव्यवस्था में एकीकृत करने और उनके विकास के लिए अनुकूल वातावरण बनाने की दिशा में सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि एमएसएमई की संख्या 2012-13 में लगभग 4 करोड़ 67 लाख से बढ़कर आज लगभग 8 करोड़ हो गई है। श्री राजनाथ सिंह ने कहा कि यह भारत के उद्यमशीलता तंत्र की बढ़ती गहराई और गतिशीलता को दर्शाता है।

रक्षा मंत्री ने रक्षा विनिर्माण के क्षेत्र में एमएसएमई की अपार क्षमता को रेखांकित करते हुए कहा कि रक्षा उत्कृष्टता के लिए डीईआईडेक्स और आईडेक्स (अदिति) के माध्यम से नवोन्मेषी प्रौद्योगिकियों के विकास में तेजी जैसी पहल स्टार्टअप, नवोन्मेषकों तथा एमएसएमई को सशक्त बना रही हैं। इनके माध्यम से वे भारतीय सशस्त्र बलों के लिए अत्याधुनिक समाधान विकसित करने में सक्षम हो रहे हैं। उन्होंने एमएसएमई उद्यमियों से आग्रह किया कि वे रक्षा क्षेत्र को प्रौद्योगिकी, नवाचार और वैश्विक व्यापार के नए अवसरों के प्रवेश द्वार के रूप में देखें। श्री सिंह ने ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, साइबर सुरक्षा, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, स्वायत्त प्रणालियों, उन्नत सामग्रियों, अंतरिक्ष और क्वांटम प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों को भारतीय एमएसएमई के लिए व्यापक अवसर प्रदान करने वाले महत्वपूर्ण क्षेत्र बताया। रक्षा मंत्री ने एमएसएमई से इन उभरते क्षेत्रों में अपनी तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करने, अनुसंधान एवं विकास तथा नवाचार में निवेश बढ़ाने और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी समाधान विकसित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इससे न केवल भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता को बल मिलेगा, बल्कि भारतीय उद्यम वैश्विक रक्षा विनिर्माण क्षेत्र में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका स्थापित कर सकेंगे।

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श्री सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि केवल प्रौद्योगिकी से ही सूक्षम, लघु एवं मध्यम उद्यमों की वृद्धि और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। इसके लिए गुणवत्ता, कौशल विकास, प्रौद्योगिकी उन्नयन, बाजार तक पहुंच और वित्त पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारतीय सूक्षम, लघु एवं मध्यम उद्यमों को गुणवत्ता और विश्वसनीयता के माध्यम से वैश्विक बाजारों में अपनी पहचान स्थापित करनी होगी। रक्षा क्षेत्र में इन विशेषताओं का महत्व और भी अधिक है, जहां प्रत्येक घटक की विश्वसनीयता रक्षा बलों की परिचालन क्षमता को सीधे प्रभावित करती है। श्री राजनाथ सिंह ने कहा कि रक्षा विनिर्माण तंत्र को ‘शून्य दोष’ और ‘गुणवत्ता पर कोई समझौता नहीं’ के सिद्धांत के प्रति प्रतिबद्ध रहना चाहिए। उन्होंने युवाओं को उद्योग से संबंधित कौशल से लैस करने और सूक्षम, लघु एवं मध्यम उद्यमों को आधुनिक उद्योग की मांगों को पूरा करने के लिए अपने कार्यबल को लगातार प्रशिक्षित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

रक्षा मंत्री ने डिजिटल विनिर्माण, स्वचालन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तथा आधुनिक उत्पादन विधियों जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों को सूक्षम, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए अधिक सुलभ और किफायती बनाने का आह्वान किया। उन्होंने बाजार तक पहुंच को विकास का एक प्रमुख कारक बताते हुए सरकारी खरीद, बड़े उद्योगों के विक्रेता तंत्र और निर्यात बाजारों में एमएसएमई की अधिक भागीदारी का आग्रह किया। एमएसएमई के विकास के लिए वित्त को सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकताओं में से एक बताते हुए श्री सिंह ने कहा कि समय पर और किफायती पूंजी की उपलब्धता वित्तीय अनुशासन और सुदृढ़ व्यावसायिक कार्य प्रणालियों के साथ-साथ चलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ये पांच स्तंभ भारत के लघु एवं मध्यम उद्यमों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनने और विकसित भारत@2047 की परिकल्पना में सार्थक योगदान देने में सक्षम बनाने के लिए आवश्यक होंगे।

श्री राजनाथ सिंह ने भारत के औद्योगिक विकास में उत्तर भारत के सूक्षम लघु एवं मध्यम उद्यम क्षेत्र के विशेष महत्व पर प्रकाश डाला और विनिर्माण, इंजीनियरिंग, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, वस्त्र, खाद्य प्रसंस्करण तथा सेवाओं सहित विभिन्न क्षेत्रों में इसकी मजबूत उपस्थिति का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि रक्षा औद्योगिक गलियारों ने रक्षा विनिर्माण के लिए नए अवसर पैदा किए हैं, जिसमें उत्तर प्रदेश विशेष रूप से शामिल है। इससे राज्य न केवल एक बड़े बाजार के रूप में उभर रहा है, बल्कि भारत के नए विनिर्माण और रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में भी विकसित हो रहा है। रक्षा मंत्री ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली व हरियाणा के एमएसएमई से इन अवसरों का पूरा लाभ उठाने तथा बड़ी रक्षा कंपनियों के आपूर्तिकर्ता होने से आगे बढ़कर प्रौद्योगिकी विकासकर्ता, प्रणाली आपूर्तिकर्ता और निर्यातक बनने का आग्रह किया।

रक्षा मंत्री ने देश के युवाओं को नौकरी चाहने वालों के बजाय नौकरी सृजनकर्ता बनने के लिए प्रेरित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि उद्यमिता राष्ट्र निर्माण का एक महत्वपूर्ण साधन है। उन्होंने महिलाओं एवं युवाओं के लिए अधिक अवसर सृजित करने तथा छोटे शहरों और कस्बों को आर्थिक विकास के नए केंद्रों के रूप में विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। श्री राजनाथ सिंह ने कहा कि 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य केवल सरकार का उद्देश्य नहीं है, बल्कि एक सामूहिक आकांक्षा है, जिसके लिए सरकार, उद्योग, सूक्षम लघु एवं मध्यम उद्यमों, स्टार्टअप, शिक्षा जगत और नागरिक समाज के संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि एमएसएमई की प्रगति ही भारत की उन्नति है।

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पीके/केसी/एनके


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