शिक्षा मंत्रालय
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भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान छह दशकों की यात्रा का उत्सव मनाएगा

पुस्तकों, कला, विरासत और विचारों से सजेगा डायमंड जुबली सप्ताह

राष्ट्रपति निवास, शिमला में आयोजित होगा पांच दिवसीय सार्वजनिक कार्यक्रम में

इतिहास, भारतीय ज्ञान परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े विषयों पर विद्वान, कलाकार, प्रकाशक, विद्यार्थी और आम नागरिक होंगे एक मंच पर

प्रविष्टि तिथि: 08 OCT 2026 4:43PM by PIB Shimla


शिमला, सितंबर 2026: राष्ट्रपति निवास, शिमला स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (IIAS) 11 से 15 अक्टूबर 2026 तक विशेष सप्ताहव्यापी कार्यक्रमों के साथ अपनी डायमंड जुबली मनाने जा रहा है। इस अवसर पर पुस्तकों, अकादमिक विमर्श, कला, इतिहास, विरासत और समकालीन बौद्धिक संवाद को एक विशिष्ट सार्वजनिक कार्यक्रम के रूप में एक साथ प्रस्तुत किया जाएगा।

डायमंड जुबली सप्ताह केवल एक स्मरणोत्सव नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय स्तर पर उन्नत शोध, संवाद और मानव एवं समाज से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर चिंतन के केंद्र के रूप में संस्थान की निरंतर भूमिका का उत्सव है। इस कार्यक्रम के माध्यम से बौद्धिक विमर्श को अकादमिक समुदाय से आगे व्यापक समाज तक ले जाने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि विद्यार्थी, शिक्षक, शोधकर्ता, कला-प्रेमी, पाठक, पर्यटक और आम नागरिक विचारों, पुस्तकों, कलात्मक अभिव्यक्तियों तथा भारत की विविध बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विरासत से परिचित हो सकें।

वर्ष 2026 भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान सोसायटी का पंजीकरण 6 अक्टूबर 1964 को हुआ था और संस्थान का औपचारिक उद्घाटन भारत के राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने 20 अक्टूबर 1965 को किया था। संस्थान की स्थापना की मूल परिकल्पना उन्नत अकादमिक शोध के लिए एक ऐसा वातावरण तैयार करने और विचारों के ऐसे “मिलन” को प्रोत्साहित करने पर केंद्रित थी, जो ज्ञान और प्रज्ञा के क्षितिज का विस्तार कर सके।

छह दशक बाद डायमंड जुबली समारोह उसी मूल दृष्टि को पुनः पुष्ट करते हुए गंभीर अकादमिक शोध को उन प्रश्नों से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं, जो समकालीन भारतीय समाज के लिए आज भी प्रासंगिक हैं।

 डायमंड जुबली सप्ताह का अकादमिक कार्यक्रम 11 अक्टूबर को प्रो. राघवेंद्र तंवर (पद्मश्री), अध्यक्ष, भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (ICHR), नई दिल्ली, के विशेष व्याख्यान से आरंभ होगा। उनके व्याख्यान का विषय है—“Jammu Kashmir Ladakh Through the Ages: An Overview of Historicity Issues & Event”। यह विषय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का इतिहास तथा ऐतिहासिक स्मृति एक दीर्घ और जटिल सभ्यतागत निरंतरता से जुड़ी हुई है। ऐसे विषयों का अकादमिक अध्ययन इतिहास, प्रमाण, कालक्रम और व्याख्या से जुड़े प्रश्नों को विमर्श में लाकर क्षेत्र के बारे में अधिक सूचित सार्वजनिक समझ विकसित करने में योगदान दे सकता है।

विद्यार्थियों और व्यापक समाज के लिए ऐसा विमर्श इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इतिहास की समझ केवल घटनाओं को याद करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसमें उन विविध शक्तियों, परंपराओं और अंतःक्रियाओं को समझना भी शामिल है, जिन्होंने समय के साथ क्षेत्रों और समाजों को आकार दिया है। पुरातत्व के माध्यम से आर्य आक्रमण सिद्धांत का पुनर्मूल्यांकन 12 अक्टूबर को अकादमिक कार्यक्रम में प्रो. वसंत शिंदे, विश्वप्रसिद्ध पुरातत्वविद् एवं पूर्व कुलपति, डेक्कन कॉलेज, पोस्ट ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट, पुणे, का विशेष व्याख्यान आयोजित किया जाएगा। व्याख्यान का
विषय है—“Evolution of Bharatiya Knowledge System: Archaeological Perspective with Special Reference to Rakhigarhi”।

पुरातत्व और भौतिक साक्ष्यों के माध्यम से विषय को देखने से अतीत की केवल पाठ-आधारित समझ से आगे बढ़कर प्राचीन बस्तियों, प्रौद्योगिकियों, सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक विकास से जुड़े विमर्श में पुरातात्विक साक्ष्यों की भूमिका को समझने का अवसर मिलता है। युवा शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए इस प्रकार का अकादमिक अध्ययन प्रमाण-आधारित अनुसंधान तथा अंतर्विषयक दृष्टिकोण के महत्व को समझने के साथ-साथ भारत की पुरातात्विक और सांस्कृतिक विरासत के प्रति नए सिरे से रुचि विकसित करने में सहायक हो सकता है।

“वंदे मातरम्”: साहित्य, इतिहास और सांस्कृतिक स्मृति 13 अक्टूबर को श्री अखिलेश झा, ICAS, ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली, द्वारा “वंदे मातरम्” विषय पर विशेष व्याख्यान दिया जाएगा। यह विषय भारत के राष्ट्रीय आंदोलन और सार्वजनिक जीवन से जुड़े सबसे पहचाने जाने वाले अभिव्यक्तियों में से एक पर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक चिंतन का अवसर प्रदान करता है। ऐसे विषय को अकादमिक वातावरण में रखने से श्रोताओं को इसके साहित्यिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आयामों पर विचार करने तथा यह समझने का अवसर मिलता है कि विभिन्न ऐतिहासिक कालखंडों में शब्द, ग्रंथ और प्रतीक किस प्रकार अपना अर्थ ग्रहण करते हैं।

ऐसा विमर्श विशेष रूप से विद्यार्थियों और युवा नागरिकों के लिए प्रासंगिक है, जो यह समझना चाहते हैं कि साहित्य और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां आधुनिक भारत के निर्माण के साथ किस प्रकार जुड़ी रही हैं। कला: विरासत और समकालीन समाज के बीच सेतुडायमंड जुबली सप्ताह में भारतीय कलात्मक परंपराओं के साथ संस्थान के जुड़ाव और भारतीय कला एवं संस्कृति के संवर्धन को भी प्रदर्शित किया जाएगा।

“Folk and Rural Imagery in Kangra Miniatures: An Indigenous Indian Art Perspective” विषय पर भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में 15 से 19 जून 2026 तक आयोजित कला शिविर में भाग लेने वाले कलाकारों की कला-कृतियों पर आधारित एक आर्ट गैलरी का उद्घाटन समारोह के दौरान किया जाएगा। यह पहल सांस्कृतिक संरक्षण के साथ-साथ सांस्कृतिक निरंतरता की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। कांगड़ा लघुचित्र कला केवल एक कलात्मक शैली नहीं है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण दृश्य परंपरा है, जिसके माध्यम से परिदृश्य, दैनिक जीवन, समुदाय, भावनाओं और सांस्कृतिक स्मृति को अभिव्यक्त किया गया है। समकालीन कलाकारों को इस परंपरा के साथ संवाद का अवसर प्रदान करने से स्वदेशी कलात्मक अभिव्यक्तियों को नई पीढ़ियों के लिए पुनर्व्याख्यायित और संरक्षित करने की संभावनाएं निर्मित होती हैं।

इसके साथ ही, निशा जायसवाल, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिप्राप्त कलाकार, की कला प्रदर्शनी “Bhartiya Forms, Expression and Consciousness” का उद्घाटन 11 अक्टूबर 2026 को किया जाएगा और यह प्रदर्शनी 15 अक्टूबर 2026 तक दर्शकों के लिए खुली रहेगी। उन्होंने इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली; आर्ट सांता फ़े, अमेरिका; बीकानेर हाउस; ललित कला अकादमी; इंडिया आर्ट फेस्टिवल; अमृता कला वीथिका; पूर्वांचल संग्रहालय एवं क्राफ्ट विलेज; तथा दिल्ली स्थित आईसीसीआर की आज़ाद भवन गैलरी सहित अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी कला प्रदर्शित की है।

यह प्रदर्शनी भारतीय महाकाव्यों को एक दृश्य और बौद्धिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करती है तथा दर्शकों को यह समझने का अवसर देती है कि पीढ़ियों से महाकाव्य कथाओं ने कलात्मक अभिव्यक्ति, सांस्कृतिक कल्पना और चेतना की अवधारणाओं को किस प्रकार प्रभावित किया है। दोनों कला पहलें डायमंड जुबली समारोह के एक महत्वपूर्ण सामाजिक उद्देश्य को रेखांकित करती हैं—विरासत
केवल अभिलेखागार और संग्रहालयों में संरक्षित की जाने वाली वस्तु नहीं है; उसे समकालीन समाज द्वारा समझा, व्याख्यायित, विमर्शित और अनुभव भी किया जा सकता है।

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान डिजिटाइज्ड दुर्लभ पांडुलिपि पुस्तकालय पोर्टल का करेगा शुभारंभ डायमंड जुबली समारोह का एक महत्वपूर्ण आकर्षण 11 अक्टूबर 2026 को सायं 4:00 बजे राष्ट्रपति निवास, शिमला में “IIAS Digitised Rare Manuscripts Library Portal” के उद्घाटन के रूप में सामने आएगा। पोर्टल का उद्घाटन प्रो. रीचा तंवर, प्रोफेसर एवं पूर्व निदेशक, महिला अध्ययन अनुसंधान केंद्र, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, द्वारा किया जाएगा।

यह पहल दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण और डिजिटल तकनीक के माध्यम से उनके प्रसार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसके माध्यम से विद्वानों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और अकादमिक समुदाय के लिए मूल्यवान पाठ्य विरासत तक व्यापक पहुंच को सुगम बनाने का प्रयास किया जाएगा। दुर्लभ पांडुलिपि संसाधनों को डिजिटल मंच पर उपलब्ध कराने से शोध के अवसरों को सुदृढ़ करने, ज्ञान
परंपराओं के दस्तावेजीकरण एवं संरक्षण को समर्थन देने तथा भारत की समृद्ध बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत के साथ आगे के अकादमिक जुड़ाव को प्रोत्साहित करने में सहायता मिलेगी। यह पहल ऐतिहासिक संसाधनों के संरक्षण में प्रौद्योगिकी के बढ़ते महत्व को भी रेखांकित करती है और यह सुनिश्चित करने की दिशा में एक प्रयास है कि मूल्यवान पांडुलिपि संग्रह भावी पीढ़ियों के शोधकर्ताओं एवं ज्ञान-साधकों के लिए उपयोगी बने रहें।

समारोह का एक प्रमुख आकर्षण IIAS Book Fair होगा, जिसका आयोजन 11 से 15 अक्टूबर 2026 तक प्रतिदिन प्रातः 11:00 बजे से सायं 7:00 बजे तक किया जाएगा। देश-विदेश के प्रतिष्ठित प्रकाशक संस्थान में अपने स्टॉल लगाएंगे। पुस्तक मेले में प्रवेश निःशुल्क होगा और इस अवधि में आगंतुकों को नियमित टिकट व्यवस्था से छूट प्रदान की जाएगी। पठन की आदतों और सूचना के उपभोग के तौर-तरीकों में तेजी से हो रहे बदलाव के दौर में पुस्तक मेले का विशेष महत्व है। प्रकाशकों और पाठकों को एक मंच पर लाकर यह मेला पठन संस्कृति को मजबूत करने तथा विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और आम जनता को गंभीर अकादमिक, साहित्यिक और शोधपरक प्रकाशनों तक पहुंच उपलब्ध कराने में सहायक होगा।

IIAS Book Fair में अकादमिक, शोधपरक, साहित्यिक और ज्ञान-केंद्रित प्रकाशकों तथा पुस्तक वितरकों की एक विविध श्रृंखला भाग लेगी। इससे आगंतुकों को विभिन्न विषयों में प्रकाशित पुस्तकों और शोध-संसाधनों को देखने एवं प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। पुस्तक मेले में भाग लेने वाले प्रकाशकों एवं विक्रेताओं में Taylor & Francis India, Cambridge University Press, Manohar Publishers, Orient BlackSwan Pvt. Ltd., Niyogi Books, Motilal Banarsidass Publishers, Indica Publishers & Distributors, Today & Tomorrow Printers and Publishers, Segment Book Distributors, Bharatiya Sahitya Bhavana तथा International Book Distributors शामिल हैं।

इन प्रतिष्ठित प्रकाशकों और वितरकों की भागीदारी से पुस्तक मेला पाठकों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों, शिक्षकों और अकादमिक समुदाय के लिए शोध-संसाधनों, नवीन प्रकाशनों और विविध दृष्टिकोणों को जानने-समझने का महत्वपूर्ण मंच बनने की उम्मीद है। शिमला जैसे शहर के लिए, जिसकी अपनी विशिष्ट शैक्षणिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान है, यह पहल स्थानीय समुदाय तथा देशभर से आने वाले आगंतुकों के लिए अकादमिक संसाधनों को अधिक सुलभ बनाने का अवसर भी प्रदान करती है।

SS/RK


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