कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय
एनआरएए के प्रतिनिधिमंडल ने किया काजरी का दौरा
शुष्क एवं वर्षा आधारित कृषि के सतत विकास पर हुई चर्चा
प्रविष्टि तिथि:
09 OCT 2026 4:23PM by PIB Jaipur
भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण (एनआरएए) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) डॉ. चन्द्र शेखर कुमार, आईएएस, तथा जल प्रबंधन विशेषज्ञ डॉ. ए. के. मिश्रा और पंजाब के पूर्व कृषि आयुक्त डॉ. बी. एस. सिद्धू ने ICAR-केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी), जोधपुर का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने संस्थान के वैज्ञानिकों के साथ शुष्क एवं वर्षा आधारित क्षेत्रों में कृषि के सतत विकास, अनुसंधान उपलब्धियों, उभरती चुनौतियों तथा आवश्यक नीतिगत सहयोग पर विचार-विमर्श किया। बैठक की अध्यक्षता संस्थान के निदेशक डॉ. एच. एस. जाट ने की। उन्होंने अतिथियों का स्वागत किया तथा संस्थान के वैज्ञानिकों से उनका परिचय कराया।
बैठक में डॉ. पी. सी. मोहराना ने संस्थान की प्रमुख अनुसंधान उपलब्धियों एवं विकसित तकनीकों का प्रस्तुतिकरण किया। उन्होंने मरुस्थलीकरण नियंत्रण, जल संरक्षण, खड़ीन, नाड़ी एवं टांका जैसी पारंपरिक और उन्नत जल संग्रहण प्रणालियों, ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई, गोंद उत्पादन, सौर ऊर्जा आधारित कृषि उपकरणों तथा विभिन्न आकार के खेतों और आंशिक सिंचित परिस्थितियों के लिए विकसित समन्वित कृषि प्रणाली मॉडलों की जानकारी दी। इसके अतिरिक्त, चरागाह एवं रेंज प्रबंधन, घासभूमियों की वहन क्षमता का आकलन, कार्बन क्रेडिट आधारित वृक्ष खेती, कृषि वानिकी, डिजिटल मृदा मानचित्रण तथा कृषि-फोटोवोल्टिक प्रणालियों पर संस्थान के कार्यों को रेखांकित किया।
प्रस्तुतिकरण में कम वर्षा की परिस्थितियों के लिए उपयुक्त जलवायु-सहिष्णु फसलों तथा शुष्क क्षेत्र की बागवानी में विकसित किस्मों का विशेष उल्लेख किया गया। इनमें अनार, बेर, करोंदा, गोंदा, जीरा तथा हीना प्रमुख हैं। हाइड्रोपोनिक्स, कम एवं मध्यम लागत वाले पॉलीहाउस में संरक्षित खेती तथा केंद्रीय नर्सरी के माध्यम से गुणवत्तायुक्त रोपण सामग्री उपलब्ध कराने के प्रयासों की जानकारी भी दी गई। इन तकनीकों को वर्ष 2047 तक आत्मनिर्भर भारत के राष्ट्रीय लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण बताया गया।
डॉ. एच. एस. जाट ने अपने संबोधन में कम एवं अनियमित वर्षा की परिस्थितियों में मोठ की उन्नत किस्मों की उपयोगिता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सूखे एवं प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों में मोठ जैसी कम वर्षा में बेहतर प्रदर्शन करने वाली फसलें किसानों के उत्पादन जोखिम को कम करने तथा उनकी आय को बनाए रखने में सहायक हो सकती हैं। उन्होंने संस्थान के कार्बन क्रेडिट आधारित वृक्ष खेती संबंधी प्रयासों, हाइपरस्पेक्ट्रल तकनीक से मृदा में पोषक तत्वों की स्थिति के आकलन तथा रेत के टीलों के वैज्ञानिक प्रबंधन की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के साथ कुछ क्षेत्रों में बढ़ती मृदा लवणता तथा प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा (विलायती बबूल) के अनियंत्रित प्रसार पर चिंता व्यक्त की। राजस्थान में कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए कृषि मशीनीकरण, समेकित भूमि प्रबंधन और क्षेत्र-आधारित विकास पर बल देते हुए उन्होंने लगभग 1,000 हेक्टेयर क्षेत्र में खड़ीन आधारित अथवा समेकित परिदृश्य विकास कार्यक्रम के लिए एनआरएए से सहयोग की संभावनाएं तलाशने का सुझाव दिया।
डॉ. बी. एस. सिद्धू ने नहरी सिंचाई से जुड़ी मृदा लवणता, भूमि क्षरण तथा दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा की चुनौतियों पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक उपयोग, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन तथा स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप वैज्ञानिक फसल नियोजन की आवश्यकता पर बल दिया।
डॉ. ए. के. मिश्रा ने मरुस्थलीय कृषि की चुनौतियों के समाधान में काजरी के योगदान की सराहना करते हुए जल संरक्षण, सिंचाई दक्षता बढ़ाने, भूजल भंडारों के समुचित प्रबंधन तथा मोठ जैसी वर्षा आधारित फसलों के लिए नीतिगत सहयोग की आवश्यकता बताई। उन्होंने अनुसंधान निष्कर्षों, वैज्ञानिक सूचनाओं और आंकड़ों के प्रभावी आदान-प्रदान को भी महत्वपूर्ण बताया।
डॉ. चन्द्र शेखर कुमार ने संस्थान की अनुसंधान उपलब्धियों की सराहना करते हुए यूरिया एवं अन्य कृषि आदानों के अनुचित उपयोग, असंतुलित उर्वरक प्रयोग और मृदा स्वास्थ्य पर उनके प्रतिकूल प्रभावों की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने प्राकृतिक एवं सतत खेती को बढ़ावा देने, कृषि उपज के भंडारण और कटाई-पश्चात सुविधाओं को मजबूत करने तथा जलवायु संबंधी अनिश्चितताओं का सामना करने में सक्षम कृषि प्रणालियों के विकास पर जोर दिया। उन्होंने विभिन्न संस्थानों द्वारा विकसित अनुसंधान परिणामों और वैज्ञानिक आंकड़ों के साझा उपयोग के लिए एक साझा मंच विकसित करने का सुझाव दिया, जिससे उपलब्ध ज्ञान का बेहतर उपयोग हो सके और अनुसंधान कार्यों की अनावश्यक पुनरावृत्ति से बचा जा सके। उन्होंने क्षेत्र-आधारित समेकित विकास की संभावनाओं पर भी सहमति व्यक्त की।
चर्चा के दौरान डॉ. एच. आर. महला ने मोठ, ग्वार, मूंग एवं बाजरा जैसी फसलों को शुष्क क्षेत्र की कृषि और किसानों की आजीविका का आधार बताते हुए वर्षा आधारित कृषि के लिए अधिक नीतिगत सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। डॉ. धीरज सिंह ने शुष्क क्षेत्र की बागवानी एवं कृषि वानिकी की संभावनाओं को रेखांकित किया, जबकि डॉ. मचिवाल ने जल संरक्षण, उपलब्ध जल के विवेकपूर्ण उपयोग तथा उपयुक्त तकनीकों के विस्तार के लिए संस्थागत सहयोग की आवश्यकता बताई।
दौरे के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने संस्थान के इको-टूरिज्म पार्क का भी भ्रमण किया। यहां संरक्षित मरुस्थलीय क्षेत्र की दुर्लभ प्रजातियों तथा मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी भूमिका के बारे में जानकारी दी गई। इसके बाद प्रतिनिधिमंडल ने शुष्क बागवानी खंड का अवलोकन किया, जहां बेर, अनार, गोंदा एवं खेजड़ी जैसी महत्वपूर्ण प्रजातियों के जर्मप्लाज्म संरक्षण तथा उन्नत किस्मों के विकास में संस्थान के प्रयासों को प्रदर्शित किया गया।
इस दौरे के दौरान जल सुरक्षा, मृदा स्वास्थ्य सुधार, जलवायु-सहिष्णु कृषि, बागवानी विविधीकरण, कृषि वानिकी तथा सतत भूमि प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक विचार-विमर्श हुआ। चर्चा में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि वैज्ञानिक अनुसंधान को किसानों की आवश्यकताओं और उपयुक्त नीतिगत सहयोग से जोड़कर व्यावहारिक स्तर पर लागू किया जाए। काजरी एवं एनआरएए के बीच समन्वय को मजबूत करने से राजस्थान सहित देश के अन्य शुष्क एवं वर्षा आधारित क्षेत्रों में कृषि उत्पादकता बढ़ाने, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा किसानों की आजीविका और कृषि प्रणालियों की जलवायु-सहिष्णुता को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण योगदान मिल सकता है।


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(रिलीज़ आईडी: 2321332)
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