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भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में डायमंड जुबिली सप्ताह का शुभारंभ

इतिहास, भारतीय सभ्यतागत दृष्टि और सांस्कृतिक विरासत पर केंद्रित रहा प्रथम दिवस

पद्मश्री प्रो. रघुवेंद्र तंवर ने जम्मू-कश्मीर-लद्दाख के इतिहास और ऐतिहासिकता के प्रश्नों पर दिया विशेष व्याख्यान

पद्मश्री श्रीमती शोवना नारायण ने की अध्यक्षता

प्रविष्टि तिथि: 11 OCT 2026 10:08AM by PIB Shimla
Press Release photo

शिमला, 11 अक्टूबर 2026। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, राष्ट्रपति निवास, शिमला में संस्थान के डायमंड जुबिली वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित पांच दिवसीय डायमंड जुबिली सप्ताह समारोह का आज शुभारंभ हुआ। 11 से 15 अक्टूबर 2026 तक आयोजित इस समारोह का उद्देश्य इतिहास, साहित्य, भारतीय ज्ञान परंपरा, कला, संस्कृति और अकादमिक चिंतन से जुड़े विषयों को व्यापक जनसमुदाय के समक्ष प्रस्तुत करना है। समारोह के प्रथम दिवस पर पुस्तक मेले का उद्घाटन, भारतीय कला पर केंद्रित प्रदर्शनी का शुभारंभ, पुस्तक लोकार्पण तथा जम्मू-कश्मीर-लद्दाख के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर विशेष व्याख्यान प्रमुख आकर्षण रहे।

प्रथम दिवस का केंद्रीय अकादमिक आयोजन भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (ICHR), नई दिल्ली के अध्यक्ष एवं पद्मश्री से सम्मानित प्रो. रघुवेंद्र तंवर का विशेष व्याख्यान रहा। “Jammu Kashmir Ladakh Through the Ages: An Overview of Historicity Issues & Event” विषय पर केंद्रित इस व्याख्यान की अध्यक्षता पद्मश्री श्रीमती शोवना नारायण ने की। व्याख्यान में जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के इतिहास, ऐतिहासिकता से जुड़े प्रश्नों तथा इन क्षेत्रों को समझने में ऐतिहासिक साक्ष्यों और उनके विवेचन के महत्व पर अकादमिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया।

*पुस्तक मेले का उद्घाटन: पाठक, प्रकाशक और अकादमिक जगत एक मंच पर*

डायमंड जुबिली सप्ताह का शुभारंभ प्रातः 10:30 बजे संस्थान परिसर में आयोजित पुस्तक मेले के उद्घाटन के साथ हुआ। पुस्तक मेले का उद्घाटन प्रो. रघुवेंद्र तंवर तथा प्रो. रीचा तंवर द्वारा किया गया। मेले में प्रतिष्ठित राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय प्रकाशकों की सहभागिता के माध्यम से विभिन्न विषयों की पुस्तकों और अकादमिक प्रकाशनों को पाठकों के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है।

पुस्तक मेले का उद्देश्य केवल पुस्तकों की प्रदर्शनी और बिक्री तक सीमित नहीं है, बल्कि पठन संस्कृति को प्रोत्साहित करना, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों को उपयोगी अकादमिक साहित्य से परिचित कराना तथा प्रकाशन जगत और शोध समुदाय के बीच संवाद को बढ़ावा देना भी है। इतिहास, समाज विज्ञान, साहित्य, संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपराओं से संबंधित पुस्तकों के माध्यम से यह आयोजन पाठकों को विविध विषयों पर उपलब्ध अध्ययन-सामग्री तक पहुंचने का अवसर प्रदान करता है।

पुस्तक मेला 11 से 15 अक्टूबर तक प्रतिदिन प्रातः 11 बजे से सायं 7 बजे तक आयोजित होगा। समारोह की अवधि में पुस्तक मेले के लिए प्रवेश निःशुल्क रखा गया है तथा आगंतुकों को नियमित प्रवेश टिकट से छूट प्रदान की गई है।

*भारतीय कला और सांस्कृतिक चेतना का उत्सव*

प्रथम दिवस का एक प्रमुख आकर्षण पद्मश्री श्रीमती शोवना नारायण द्वारा “Bharatiya Forms, Expressions and Consciousness” विषय पर आधारित कला प्रदर्शनी का उद्घाटन रहा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिप्राप्त कथक नृत्यांगना और पूर्व वरिष्ठ सिविल सेवक श्रीमती शोवना नारायण की उपस्थिति ने समारोह के सांस्कृतिक आयाम को विशेष गरिमा प्रदान की।

कलाकार निशा जायसवाल की यह प्रदर्शनी भारतीय महाकाव्यों, कलात्मक रूपों, अभिव्यक्तियों और सांस्कृतिक चेतना से जुड़े विषयों को दृश्य कला के माध्यम से प्रस्तुत करती है। भारतीय परंपराओं में कला केवल सौंदर्यबोध का माध्यम नहीं रही है, बल्कि वह समाज की स्मृति, सांस्कृतिक अनुभवों और वैचारिक परंपराओं की अभिव्यक्ति का भी महत्वपूर्ण साधन रही है। इस दृष्टि से प्रदर्शनी दर्शकों को भारतीय सांस्कृतिक विरासत के विविध रूपों से जुड़ने और उन्हें नए दृष्टिकोण से देखने का अवसर प्रदान करती है।

यह प्रदर्शनी 11 से 15 अक्टूबर 2026 तक प्रतिदिन प्रातः 11 बजे से सायं 7 बजे तक दर्शकों के लिए उपलब्ध रहेगी। इसके लिए प्रवेश निःशुल्क है तथा आगंतुकों को नियमित प्रवेश टिकट से छूट दी गई है।

*विशेष व्याख्यान आयोजित*

दोपहर के औपचारिक सत्र का आरंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके बाद संस्थान के निदेशक प्रो. हिमांशु कुमार चतुर्वेदी ने स्वागत संबोधन प्रस्तुत किया। उन्होंने समारोह में उपस्थित अतिथियों का स्वागत करते हुए डायमंड जुबिली सप्ताह को संस्थान की अकादमिक यात्रा, बौद्धिक परंपरा और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़कर देखने की आवश्यकता पर बल दिया।

उन्होंने कहा कि भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान का उद्देश्य गंभीर अकादमिक शोध, स्वतंत्र चिंतन और विभिन्न ज्ञान परंपराओं के बीच संवाद को प्रोत्साहित करना है। डायमंड जुबिली सप्ताह इसी व्यापक दृष्टि को आगे बढ़ाने का अवसर है, जिसमें पुस्तकें, इतिहास, कला और सांस्कृतिक विरासत को अकादमिक परिसर से बाहर व्यापक समाज के साथ साझा किया जा रहा है।

 निदेशक प्रो. हिमांशु कुमार चतुर्वेदी ने इस अवसर पर कहा “डायमंड जुबिली सप्ताह केवल संस्थान की यात्रा का स्मरण नहीं, बल्कि ज्ञान, शोध और विचार-विमर्श की उस परंपरा को आगे बढ़ाने का अवसर है, जिसने भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान की पहचान निर्मित की है। हमारा प्रयास है कि संस्थान की अकादमिक गतिविधियां व्यापक समाज तक पहुंचें और विद्यार्थी, शोधार्थी, लेखक, कलाकार तथा आम नागरिक इतिहास, संस्कृति और ज्ञान के विविध आयामों से संवाद स्थापित कर सकें।”

स्वागत संबोधन के उपरांत मंचासीन अतिथियों का अभिनंदन किया गया। इसके बाद समारोह में अकादमिक लेखन और इतिहास संबंधी विमर्श को प्रोत्साहन देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पुस्तक का लोकार्पण किया गया।

*‘Rethinking History of Punjab in the Indian Civilisational Context’ का लोकार्पण*

समारोह के दौरान संस्थान द्वारा प्रकाशित “Rethinking History of Punjab in the Indian Civilisational Context” शीर्षक पुस्तक का लोकार्पण किया गया। संस्थान के पूर्व अध्येता प्रोफेसर रविंदर सिंह द्वारा संपादित यह पुस्तक पंजाब के इतिहास को भारतीय सभ्यतागत संदर्भ में समझने की दृष्टि प्रस्तुत करती है।

पुस्तक का विषय इतिहास के अध्ययन को केवल क्षेत्रीय घटनाओं के विवरण तक सीमित न रखकर व्यापक सभ्यतागत संदर्भों में देखने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। भारतीय इतिहास के विभिन्न क्षेत्रों, परंपराओं और ऐतिहासिक अनुभवों के बीच संबंधों का अध्ययन अतीत की अधिक समग्र समझ विकसित करने में सहायक हो सकता है।

डायमंड जुबिली सप्ताह के प्रथम दिवस पर पुस्तक का लोकार्पण इस बात को भी रेखांकित करता है कि संस्थान के समारोह में अकादमिक संवाद और शोधपरक लेखन को केंद्रीय स्थान दिया गया है।

*प्रो. रघुवेंद्र तंवर का विशेष व्याख्यान: जम्मू-कश्मीर-लद्दाख के इतिहास को समझने की अकादमिक दृष्टि*

प्रथम दिवस के अकादमिक कार्यक्रम का प्रमुख केंद्र प्रो. रघुवेंद्र तंवर का विशेष व्याख्यान रहा। भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष और पद्मश्री से सम्मानित प्रो. तंवर ने “Jammu Kashmir Ladakh Through the Ages: An Overview of Historicity Issues & Event” विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए। व्याख्यान की अध्यक्षता पद्मश्री श्रीमती शोवना नारायण ने की।

जम्मू, कश्मीर और लद्दाख का इतिहास भौगोलिक विविधता, सांस्कृतिक अंतःक्रियाओं, ऐतिहासिक प्रक्रियाओं और विभिन्न कालखंडों में हुए परिवर्तनों से जुड़ा हुआ है। इन क्षेत्रों की ऐतिहासिकता पर विमर्श करते समय ऐतिहासिक स्रोतों, साक्ष्यों, कालक्रम और उनकी व्याख्या का अध्ययन विशेष महत्व रखता है। व्याख्यान का विषय इन प्रश्नों को अकादमिक दृष्टिकोण से समझने और इतिहास के अध्ययन में प्रमाण-आधारित विवेचन की भूमिका पर विचार करने का अवसर प्रदान करता है।

ऐतिहासिक अध्ययन का महत्व केवल अतीत की घटनाओं को याद रखने में नहीं, बल्कि उनके संदर्भ, कारणों, निरंतरताओं और परिवर्तनों को समझने में भी निहित है। जम्मू, कश्मीर और लद्दाख जैसे क्षेत्रों के इतिहास पर विमर्श करते समय विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों और दृष्टिकोणों का गंभीर अध्ययन वर्तमान समय में क्षेत्र की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक समझ को अधिक व्यापक बनाने में योगदान दे सकता है।

प्रो. तंवर का व्याख्यान डायमंड जुबिली सप्ताह के उस अकादमिक उद्देश्य के अनुरूप रहा, जिसके अंतर्गत इतिहास और भारतीय सभ्यतागत अनुभवों से जुड़े विषयों पर गंभीर विचार-विमर्श को प्रोत्साहित किया जा रहा है। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान जैसे बहुविषयक अकादमिक मंच पर इस विषय का चयन इतिहास, क्षेत्रीय अध्ययन और राष्ट्रीय बौद्धिक विमर्श के बीच संबंधों को रेखांकित करता है।

मुख्य अतिथि प्रो. रघुवेंद्र तंवर ने कहा “जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के इतिहास को समझने के लिए आवश्यक है कि हम ऐतिहासिक स्रोतों, उपलब्ध साक्ष्यों और विभिन्न कालखंडों के संदर्भों का गंभीरता से अध्ययन करें। इतिहास का अनुशीलन केवल घटनाओं का क्रम प्रस्तुत करना नहीं है; यह उन प्रक्रियाओं और परिस्थितियों को समझने का प्रयास भी है, जिन्होंने किसी क्षेत्र की सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को आकार दिया है।”

*अध्यक्षीय संबोधन: पद्मश्री श्रीमती शोवना नारायण*

व्याख्यान की अध्यक्षता पद्मश्री श्रीमती शोवना नारायण ने की। वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिप्राप्त कथक नृत्यांगना और पूर्व वरिष्ठ सिविल सेवक हैं। भारतीय शास्त्रीय नृत्य के क्षेत्र में उनके योगदान ने उन्हें कला एवं सांस्कृतिक जगत में विशिष्ट पहचान प्रदान की है।

उनकी अध्यक्षता ने व्याख्यान को एक व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ भी प्रदान किया। इतिहास और कला दोनों ही समाज की स्मृति, सांस्कृतिक अनुभवों और परंपराओं को समझने के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। डायमंड जुबिली सप्ताह के अंतर्गत अकादमिक व्याख्यान और कला प्रदर्शनी का एक ही दिन आयोजित होना इसी अंतर्संबंध को सामने लाता है।

 इस अवसर पर उन्होंने कहा “इतिहास को समझना केवल अतीत की घटनाओं का अध्ययन करना नहीं है, बल्कि उन सभ्यतागत अनुभवों, सांस्कृतिक परंपराओं और मानवीय विचारों को समझना भी है, जिन्होंने हमारे वर्तमान को आकार दिया है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे क्षेत्रों का ऐतिहासिक अध्ययन हमें भारत की बहुलतापूर्ण सांस्कृतिक विरासत और उसकी निरंतरता को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने का अवसर प्रदान करता है। ऐसे अकादमिक संवाद हमारी ऐतिहासिक समझ को समृद्ध करने के साथ-साथ विभिन्न दृष्टिकोणों के बीच सार्थक संवाद को भी प्रोत्साहित करते हैं।”

 अपने द्वारा उद्घाटित कला प्रदर्शनी के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा “इतिहास और कला, दोनों ही हमारी सभ्यतागत स्मृति और सांस्कृतिक चेतना को अभिव्यक्त करने के सशक्त माध्यम हैं। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में आयोजित इस डायमंड जुबिली समारोह के अंतर्गत कला दीर्घा का उद्घाटन करना मेरे लिए प्रसन्नता का विषय है। मैं कलाकार श्रीमती निशा जायसवाल को उनकी कलात्मक प्रस्तुति और भारतीय परंपराओं, रूपों एवं अभिव्यक्तियों को कला के माध्यम से सामने लाने के लिए हार्दिक बधाई देती हूँ।“ 

*दुर्लभ पांडुलिपियों के डिजिटाइज्ड पुस्तकालय पोर्टल का उद्घाटन*

डायमंड जुबिली सप्ताह के प्रथम दिवस की एक अन्य महत्वपूर्ण पहल IIAS Digitised Rare Manuscripts Library Portal का उद्घाटन हुआ। पोर्टल का उद्घाटन प्रो. रीचा तंवर द्वारा किया गया । वे कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के महिला अध्ययन अनुसंधान केंद्र की प्रोफेसर एवं पूर्व निदेशक हैं।

दुर्लभ पांडुलिपियां इतिहास, साहित्य, दर्शन, भाषा और सांस्कृतिक अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इनका डिजिटलीकरण तथा डिजिटल माध्यम से उपलब्धता शोधकर्ताओं और अध्येताओं के लिए अध्ययन की नई संभावनाएं खोल सकती है। यह पहल ज्ञान-संसाधनों के संरक्षण, दस्तावेजीकरण और व्यापक अकादमिक पहुंच की दिशा में महत्वपूर्ण है।

डिजिटल पोर्टल की पहल पारंपरिक ज्ञान-संसाधनों के संरक्षण को आधुनिक तकनीक से जोड़ने का प्रयास है। इससे दुर्लभ पांडुलिपियों से संबंधित जानकारी तक पहुंच को सुगम बनाने तथा भावी शोध के लिए उपयोगी संसाधनों को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करने की संभावनाएं बढ़ती हैं।

*ज्ञान, इतिहास और संस्कृति के संवाद का मंच*

डायमंड जुबिली सप्ताह का प्रथम दिवस पुस्तक संस्कृति, ऐतिहासिक अध्ययन और भारतीय कला परंपराओं के बीच संवाद को केंद्र में रखता है। पुस्तक मेले ने पाठकों और प्रकाशकों को एक मंच प्रदान किया; कला प्रदर्शनी ने भारतीय सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को सामने रखा; पुस्तक लोकार्पण ने अकादमिक लेखन को प्रोत्साहित किया; और प्रो. रघुवेंद्र तंवर के व्याख्यान ने इतिहास संबंधी प्रश्नों पर गंभीर विमर्श का अवसर प्रदान किया।

दुर्लभ पांडुलिपियों के डिजिटाइज्ड पुस्तकालय पोर्टल की पहल ज्ञान-संसाधनों के संरक्षण और उनकी पहुंच को बढ़ाने की दिशा में इस आयोजन को एक अतिरिक्त आयाम प्रदान करती है। इन सभी गतिविधियों के माध्यम से संस्थान शोध, पठन-पाठन, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और सार्वजनिक संवाद के बीच संबंधों को मजबूत करने का प्रयास कर रहा है।

11 से 15 अक्टूबर 2026 तक चलने वाले डायमंड जुबिली सप्ताह में आगे भी भारतीय ज्ञान परंपरा, पुरातत्त्व, इतिहास और सांस्कृतिक विषयों पर विशेष व्याख्यान तथा अन्य अकादमिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इस क्रम में 12 अक्टूबर को प्रो. वसंत शिंदे द्वारा “Evolution of Bharatiya Knowledge System: Archaeological Perspective with Special Reference to Rakhigarhi” विषय पर विशेष व्याख्यान तथा 13 अक्टूबर को श्री अखिलेश झा द्वारा “Vande Mataram” विषय पर व्याख्यान निर्धारित है।

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान का यह आयोजन संस्थान की अकादमिक भूमिका को व्यापक समाज से जोड़ने का अवसर है। पुस्तकें, विचार, कला और इतिहास को एक साझा मंच पर लाकर डायमंड जुबिली सप्ताह ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत के प्रति सार्वजनिक सहभागिता को प्रोत्साहित करता है।

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, राष्ट्रपति निवास, शिमला का यह पांच दिवसीय आयोजन संस्थान की बौद्धिक परंपरा का उत्सव मनाने के साथ-साथ इतिहास, साहित्य, कला और ज्ञान के विविध आयामों पर संवाद को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

SS/RK


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