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आयुष मंत्रालय और डीबीटी ने आयुर्वेद में तपेदिक (टीबी) के उपचार में सहायक चिकित्सा के रूप में एक संयुक्त नैदानिक ​​अध्ययन की घोषणा की


विज्ञान आधारित नवाचार और एकीकृत, साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य देखभाल समाधानों द्वारा भारत में टीबी के विरुद्ध लड़ाई में तेज़ी आ रही है: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह

तपेदिक उन्मूलन का अर्थ केवल संख्या कम करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक रोगी स्वास्थ्य, सम्मान और शक्ति के साथ जीवन व्यतीत करे: आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री प्रतापराव जाधव

प्रविष्टि तिथि: 24 MAR 2026 7:12PM by PIB Delhi

विश्व क्षय रोग (टीबी) दिवस के अवसर पर, केंद्रीय आयुष मंत्रालय ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) के साथ साझेदारी में "आयुर्वेद में तपेदिक के लिए सहायक चिकित्सा के रूप में नैदानिक ​​अध्ययन" शीर्षक से एक सहयोगी नैदानिक ​​अध्ययन की औपचारिक घोषणा के साथ एकीकृत स्वास्थ्य सेवा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन राज्य मंत्री, परमाणु ऊर्जा विभाग और अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह और आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री श्री प्रतापराव जाधव ने मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारियों और वैज्ञानिकों की उपस्थिति में इस बारे में संयुक्त रूप से घोषणा की। नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित इस उच्च स्तरीय कार्यक्रम में प्रमुख नीति निर्माता, वैज्ञानिक, विद्वान, शोधकर्ता, चिकित्सक और अन्य महत्वपूर्ण हितधारक भी एकत्रित हुए, ताकि तपेदिक के खिलाफ लड़ाई में पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा के साक्ष्य-आधारित एकीकरण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया जा सके।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के माननीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय, परमाणु ऊर्जा विभाग और अंतरिक्ष विभाग के राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने अपने संबोधन में कहा, “भारत तपेदिक के खिलाफ लड़ाई में सही दिशा में आगे बढ़ रहा है और माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में समर्पित तथा नवोन्मेषी प्रयासों के कारण तपेदिक के मामलों में उल्लेखनीय कमी आई है।उन्होंने कहा, “इस सहयोगात्मक नैदानिक ​​अध्ययन का शुभारंभ विज्ञान-आधारित, साक्ष्य-आधारित नवाचार के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जो आधुनिक जैव चिकित्सा अनुसंधान को मान्य पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के साथ एकीकृत करता है। जैव प्रौद्योगिकी विभाग के नेतृत्व में की गई पहलों के माध्यम से, हम अनुसंधान को मजबूत कर रहे हैं, वैश्विक साझेदारियों को बढ़ावा दे रहे हैं और दवा प्रतिरोध, कुपोषण तथा तपेदिक के दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावों जैसी चुनौतियों का समाधान करने के लिए रोगी-केंद्रित समाधानों को आगे बढ़ा रहे हैं।

आयुष मंत्रालय के माननीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री श्री प्रतापराव जाधव ने अपने संबोधन में जोर देते हुए कहा: “तपेदिक का उपचार केवल संक्रमण को समाप्त करने तक सीमित नहीं है, बल्कि रोगी को पूर्णतः स्वस्थ बनाने के बारे में भी है। इस दृष्टिकोण के साथ, हम एक नए परिप्रेक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ आयुर्वेद और अन्य आयुष प्रणालियाँ केवल उपचार में सहायक हैं, बल्कि रोगियों के स्वास्थ्य लाभ, पोषण और जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

कार्यक्रम का शुभारंभ डीबीटी के सचिव, बीआरआईसी के महानिदेशक और बीआईआरएसी के अध्यक्ष डॉ. राजेश एस. गोखले के उद्घाटन भाषण से हुआ। उन्होंने कहा, “भारत में तपेदिक अनुसंधान ने निदान, टीकों और बड़े पैमाने पर किए गए विभिन्न अध्ययनों में नवाचार के माध्यम से उल्लेखनीय प्रगति हुई है। आयुष मंत्रालय के साथ यह सहयोगात्मक कार्यक्रम एकीकृत, साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य सेवा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आधुनिक विज्ञान को आयुर्वेद के साथ मिलाकर, हमारा उद्देश्य रोगियों के उपचार परिणामों में सुधार करना, जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाना और भारत के तपेदिक उन्मूलन मिशन को गति देना है।

आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने इसके बाद अपने विचार व्यक्त किए। श्री कोटेचा ने कहा, “तपेदिक प्रबंधन के लिए केवल प्रभावी उपचार बल्कि स्वास्थ्य लाभ और जीवन की गुणवत्ता पर भी ध्यान देना आवश्यक है। आयुष-डीबीटी की यह संयुक्त पहल साक्ष्य-आधारित एकीकृत स्वास्थ्य सेवा के लिए हमारी प्रतिबद्धता दर्शाती है। आयुर्वेद को विज्ञान के साथ जोड़कर, हमारा उद्देश्य तपेदिक से संबंधित दुर्बलता को दूर करना, रोगियों के स्वास्थ्य परिणामों को बेहतर बनाना और भारत के तपेदिक उन्मूलन के लक्ष्य में सार्थक योगदान देना है।

आयुर्वेद विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस) के महानिदेशक प्रोफेसर वैद्य रबीनारायण आचार्य और बीआरआईसी-राष्ट्रीय प्रतिरक्षा विज्ञान संस्थान (एनआईआई) के निदेशक डॉ. देबासिसा मोहंती ने सहयोगात्मक नैदानिक ​​अध्ययन का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया। प्रस्तुति में अध्ययन की वैज्ञानिक रूपरेखा, उद्देश्य और अपेक्षित परिणामों का विस्तार से वर्णन किया गया, जिसका उद्देश्य मानक तपेदिक रोधी उपचार (एटीटी) के साथ-साथ वृक्क पोषक तत्वों के पूरक के रूप में आयुर्वेद पद्धति की प्रभावकारिता, सुरक्षा और सहनशीलता का मूल्यांकन करना है।

यह सहयोगात्मक नैदानिक ​​अध्ययन आयुष मंत्रालय और जैव प्रौद्योगिकी विभाग की एक संयुक्त पहल है, जो मई 2022 में एकीकृत और साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य सेवा को बढ़ावा देने के लिए हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन पर आधारित है। आयुर्वेद विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस) के नेतृत्व में और डीबीटी के सहयोग से संचालित यह बहु-केंद्रीय अध्ययन, पोषण संबंधी सहायता के साथ-साथ मानक तपेदिक-रोधी उपचार (एटीटी) के पूरक के रूप में आयुर्वेद उपचार की प्रभावकारिता, सुरक्षा और सहनशीलता का मूल्यांकन करेगा। एम्स, जेआईपीएमईआर और एनईआईजीआरआईएचएमएस सहित प्रमुख संस्थानों में आयोजित होने वाले इस 24 महीने के अध्ययन का उद्देश्य तपेदिक रोगियों में पोषण संबंधी परिणामों में सुधार, शीघ्र स्वस्थ होने और जीवन की गुणवत्ता में सुधार के संबंध में ठोस वैज्ञानिक प्रमाण जुटाना है, जिससे तपेदिक उन्मूलन के लिए नवीन, रोगी-केंद्रित दृष्टिकोणों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को और मजबूती मिलेगी।

इस कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण ब्रिक-ट्रांसलेशनल हेल्थ साइंस एंड टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट (टीएचएसटीआई) और सीसीआरएएस के बीच समझौता ज्ञापन (एमओयू) का आदान-प्रदान था, जिसने संस्थागत सहयोग को औपचारिक रूप दिया। समझौता ज्ञापन का आदान-प्रदान ब्रिक-टीएचएसटीआई के कार्यकारी निदेशक प्रो. जी. कार्तिकेयन और सीसीआरएएस के महानिदेशक प्रो. वैद्य रबीनारायण आचार्य के बीच हुआ।

कार्यक्रम का समापन भारत सरकार की जटिल सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों के समाधान के लिए एकीकृत, साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य देखभाल समाधानों को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता की दृढ़तापूर्वक पुष्टि के साथ हुआ। आयुष-डीबीटी सहयोगात्मक पहल से टीबी की सहायक देखभाल में नई वैज्ञानिक सुझाव और विचार प्राप्त होने की संभावना है, साथ ही बेहतर रोगी परिणामों और टीबी उन्मूलन की दिशा में त्वरित प्रगति के लिए पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक जैव चिकित्सा अनुसंधान के साथ जोड़ने में भारत के नेतृत्व को सुदृढ़ किया जाएगा।

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पीके/केसी/एमकेएस/डीके


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