PIB Backgrounder
भारत के स्वास्थ्य परिदृश्य में हुए बदलाव
प्रविष्टि तिथि:
06 JUN 2026 12:29PM by PIB Delhi
पिछले 12 वर्षों में सरकार ने भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था को उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ किया है। 44 करोड़ से अधिक परिवारों को स्वास्थ्य बीमा के दायरे में लाया गया है तथा 1.86 लाख से अधिक प्राथमिक स्वास्थ्य-रक्षा केंद्र संचालित किए गए हैं। 18,000+ जन औषधि केंद्रों के माध्यम से जेनेरिक दवाएँ बाजार मूल्य की तुलना में 50–90 प्रतिशत कम कीमतों पर उपलब्ध कराई जा रही हैं। 47 करोड़ से अधिक टेलीमेडिसिन परामर्श प्रदान किए जा चुके हैं। भारत में मेडिकल कॉलेजों की संख्या दोगुने से अधिक हो गई है। वर्ष 2014 के बाद से 12 नए एम्स कार्यशील हो चुके हैं। पारंपरिक चिकित्सा को औपचारिक रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में एकीकृत किया गया है। वर्ष 2014 के बाद से मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी आई है। तपेदिक (टीबी) की घटनाओं में वैश्विक औसत की तुलना में दोगुनी दर से कमी आई है तथा मलेरिया की रुग्णता में 78 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। विभिन्न अन्य रोगों की व्यापकता में भी कमी आ रही है। समग्र रूप से ये उपलब्धियाँ सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की दिशा में भारत की निरंतर प्रगति को दर्शाती हैं।
सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की ओर
पिछले 12 वर्षों में भारत ने अपनी सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना में व्यापक परिवर्तन किया है। यह अब अधिक सुलभ, किफायती और गुणवत्तापरक बन गई है। इसका प्रभाव बिल्कुल जमीनी स्तर तक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

वर्ष 2025 में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा 1.39 लाख से अधिक परिवारों को लेकर किए गए सर्वेक्षण से पता चलता है कि पहले की तुलना में अधिक भारतीय चिकित्सा सेवाओं का लाभ ले रहे हैं। बाह्य रोगी सेवाओं (ओपीडी) — जैसे परामर्श, निदान, जांच और दवा-पर्चे — के लिए सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में जाने वाले लोगों को कोई भुगतान नहीं करना पड़ रहा है। अस्पताल में भर्ती लगभग आधे मरीजों के इलाज का खर्च 1,100 रुपये से कम है। सबसे गरीब परिवारों को भी इन संस्थानों में अपनी जेब से बहुत कम या शून्य खर्च वाली स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ मिल रहा है। ये संकेत हैं कि लोगों का सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर विश्वास पुनः सुदृढ़ हुआ है।

ऐसा संयोगवश नहीं हुआ है। सरकारी व्यय में वृद्धि और स्वास्थ्य सेवाओं के व्यवस्थित उन्नयन ने भारत को सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की दिशा में आगे बढ़ाया है। स्वास्थ्य बीमा योजनाओं से लेकर स्वास्थ्य अवसंरचनाओं के विस्तार तक, भारत ने पिछले 12 वर्षों में अपनी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की आधारशिला का व्यवस्थित रूप से पुन: निर्माण किया है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन अपनी विभिन्न रोग नियंत्रण एवं स्वास्थ्य-रक्षा योजनाओं के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं की आपूर्ति को अधिक लक्षित और प्रभावी बना रहा है। एक नई एवं सुदृढ़ डिजिटल स्वास्थ्य अवसंरचना तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उभरते एकीकरण, स्वास्थ्य सेवा डिलीवरीगी को एक नए स्तर पर ले जा रहे हैं। बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए सरकार ने डॉक्टरों और नर्सों के प्रशिक्षण की क्षमता को दोगुने से भी अधिक बढ़ाया है। इन परिवर्तनों के केंद्र में विश्व का सबसे महत्वाकांक्षी सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज कार्यक्रम — आयुष्मान भारत योजना — है, जो वर्ष 2018 में लॉन्च किया गया था।

आयुष्मान भारत : प्रत्येक नागरिक के लिए सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज
आयुष्मान भारत — अर्थात् ‘दीर्घायु भारत’ — समाज के सभी वर्गों और जीवन के प्रत्येक चरण के लोगों को किफायती एवं गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराता है। यह सामाजिक एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों तथा 70 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक महत्वपूर्ण जीवनरेखा के रूप में उभरा है। आयुष्मान भारत की संरचना चार प्रमुख स्तंभों पर आधारित है, जो सामूहिक रूप से देशभर में निवारक, संवर्धनात्मक, उपचारात्मक और डिजिटल स्वास्थ्य प्रणालियों को सुदृढ़ करते हैं।
स्तंभ 1 : आयुष्मान भारत–प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी-पीएमजेएवाई) के माध्यम से सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन को जारी रखते हुए सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (एनएचपी), 2017 प्रस्तुत की। इस नीति में भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक परिवर्तनकारी विज़न का प्रतिपादन किया गया। नीति ने स्वास्थ्य क्षेत्र की उभरती चुनौतियों, जिनमें गैर-संचारी रोगों की बढ़ती संख्या और उपचार लागत में वृद्धि शामिल है, को चिन्हित किया। इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार ने वर्ष 2018 में आयुष्मान भारत–प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी-पीएमजेएवाई) शुरू की। यह अब विश्व की सबसे बड़ी सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित स्वास्थ्य आश्वासन योजना के रूप में उभर चुकी है।
एबी-पीएमजेएवाई के तहत सामाजिक एवं आर्थिक रूप से वंचित परिवारों को प्रति परिवार प्रति वर्ष 5 लाख रुपये तक का निःशुल्क सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा प्रदान किया जाता है। ऐसे परिवार देश की कुल जनसंख्या का लगभग 40 प्रतिशत, अर्थात् लगभग 12 करोड़ हैं। यह बीमा इन परिवारों को स्वास्थ्य उपचार पर होने वाले बेहिसाब व्यय से सुरक्षा प्रदान करता है।

अक्तूबर 2024 में योजना के एक ऐतिहासिक विस्तार के तहत सरकार ने आयुष्मान भारत वय वंदना की शुरुआत की, जिसके माध्यम से 70 वर्ष से अधिक आयु के सभी वरिष्ठ नागरिकों को स्वास्थ्य बीमा कवरेज के दायरे में शामिल किया गया।
यह बीमा चिकित्सीय परामर्श, अस्पताल में भर्ती होने के खर्च और कैंसर तथा हृदय रोगों सहित विभिन्न प्रकार की बीमारियों के लिए विशेषज्ञ उपचार को कवर करता है।
इस बीमा योजना का लाभ सूचीबद्ध सरकारी तथा निजी अस्पतालों के माध्यम से उपलब्ध कराया जाता है। प्रतिदिन 1,900 से अधिक उपचार पैकेजों के लिए लगभग 40,000 दावों का निपटान किया जाता है।
एबी-पीएमजेएवाई पूरे देश में उपलब्ध है और निम्न आय वर्ग के लोगों तथा वरिष्ठ नागरिकों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की समानता सुनिश्चित करने का एक प्रमुख आधार बन गई है:
- 44.14 करोड़ आयुष्मान कार्ड बनाए गए हैं।
- अस्पताल में भर्ती के 12.03 करोड़ मामलों को कवर किया गया है।
- 1,80,435 करोड़ रुपये मूल्य के उपचार उपलब्ध कराए गए हैं।
- 36,218 अस्पताल सूचीबद्ध हैं — जिनमें 19,659 सरकारी और 16,559 निजी अस्पताल शामिल हैं।
- आयुष्मान भारत वय वंदना योजना के अंतर्गत 1.20 करोड़ वरिष्ठ नागरिक नामांकित किए गए हैं, जिन्होंने 3,000 करोड़ रुपये मूल्य के 13.84 लाख से अधिक उपचारों का लाभ प्राप्त किया है।
आयुष्मान ऐप
पीएम-जेएवाई लाभार्थियों के लिए एकीकृत मंच — एंड्रॉइड और आईओएस दोनों पर 19 क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध। लाभार्थी निम्नलिखित सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं :
- पात्रता का सत्यापन कर सकते हैं।
- आयुष्मान ई-कार्ड डाउनलोड कर सकते हैं।
- उपलब्ध बीमा राशि की शेष सीमा पर नज़र रख सकते हैं।
- सूचीबद्ध अस्पतालों का पता लगा सकते हैं।
- शिकायतें दर्ज करा सकते हैं।
जीवन का दूसरा अवसर
बिहार के मोतिहारी की रहने वाली सोनी खातून, जो एक दिहाड़ी मजदूर की पत्नी हैं, वर्षों से हृदय वाल्व संबंधी बीमारी से पीड़ित थीं, जबकि उनका परिवार आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहा था। उनके पति ने बिहार के एक निजी अस्पताल में उपचार के लिए 2.5 लाख रुपये उधार लिए, लेकिन इससे कोई राहत नहीं मिली। एबी-पीएमजेएवाई के अंतर्गत उन्हें लखनऊ के एक बहु-विशेषज्ञता अस्पताल में निःशुल्क हृदय वाल्व प्रत्यारोपण शल्य चिकित्सा की सुविधा मिली। उपचार के बाद वे स्वस्थ होकर अपने बच्चों के पास घर लौट आईं। आयुष्मान भारत ने सोनी और उनके परिवार को जि़न्दगी भर के आर्थिक संकट से बचाया।
स्तंभ 2 : आयुष्मान आरोग्य मंदिरों (एएएम) के माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएँ
सरकार सामान्य बीमारियों के कम विशेषज्ञतापूर्ण उपचार तथा जन-जागरूकता स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य अवसंरचना का विस्तार कर रही है। प्रत्येक मोहल्ले और समुदाय तक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाने के उद्देश्य से आयुष्मान आरोग्य मंदिर (एएएम) स्थापित किए जा रहे हैं। ये आयुष्मान आरोग्य मंदिर भारत में सामुदायिक स्वास्थ्य व्यवस्था की आधारशिला हैं और सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज का विस्तार कर रहे हैं। इनके माध्यम से निवारक, संवर्धनात्मक, उपचारात्मक, पुनर्वासात्मक तथा उपशामक देखभाल सहित, व्यापक स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान की जाती हैं।
प्रत्येक आयुष्मान आरोग्य मंदिर (एएएम) 12 प्रकार की निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करता है, जो मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य देखभाल से कहीं आगे तक विस्तृत हैं। इनमें विभिन्न रोगों की जांच एवं प्रबंधन, मौखिक स्वास्थ्य देखभाल, नेत्र देखभाल, कान-नाक-गला संबंधी सेवाएँ तथा मानसिक स्वास्थ्य सहायता शामिल हैं। इन केंद्रों पर टेलीकंसल्टेशन, प्राथमिक स्तर की आपातकालीन एवं आघात देखभाल सेवाएँ, तथा निःशुल्क आवश्यक दवाएँ और नैदानिक जांच सुविधाएँ भी उपलब्ध कराई जाती हैं। अब तक इन आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में 540 करोड़ से अधिक लोगों की संचयी उपस्थिति दर्ज की जा चुकी है।
आयुष्मान आरोग्य मंदिर (एएएम) सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (आशा) के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य जागरूकता एवं जनसंपर्क गतिविधियों के केंद्र भी हैं। इन केंद्रों के माध्यम से वे स्वास्थ्य कार्यक्रमों के बारे में जागरूकता फैलाते हैं, रोगियों की नियमित निगरानी करते हैं तथा समुदाय के स्वास्थ्य की स्थिति पर नज़र रखते हैं। सरकार इस अवसंरचना का तीव्र गति से विस्तार कर रही है। वर्तमान में देश में निम्नलिखित उपलब्धियाँ दर्ज की गई हैं:

- 1.86+ लाख आयुष्मान आरोग्य मंदिर कार्यरत हैं, जिनमें शामिल हैं :
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- 1.34 लाख उप-स्वास्थ्य केंद्र (सब-हेल्थ सेंटर)
- 24,483 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र
- 5,474 शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र
- 12,259 आयुष केंद्र
- 9,758 शहरी स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र (5 जून, 2026 तक)
जमीनी स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार
वर्षों तक असम के बोंगाईगांव जिले स्थित लालमती उप-केंद्र 10 गाँवों के 10,000 से अधिक लोगों को केवल बुनियादी मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करता था। आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत इस केंद्र को आयुष्मान आरोग्य मंदिर (एएएम) में उन्नत किए जाने के बाद इसमें वास्तविक परिवर्तन आया। एएएम के रूप में इस केंद्र की सेवाओं का विस्तार किया गया, जिसमें गैर-संचारी रोगों की जांच, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, मौखिक एवं नेत्र देखभाल तथा आपातकालीन सेवाएँ शामिल की गईं। इन सेवाओं के प्रभावी संचालन के लिए प्रशिक्षित सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों को टीम का नेतृत्व करने हेतु नियुक्त किया गया।
इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप वर्ष 2024 से इस क्षेत्र में रोके जा सकने वाले कारणों से होने वाली मातृ एवं शिशु मृत्यु के मामलों की संख्या शून्य दर्ज की गई है। उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की संख्या आधे से भी कम रह गई है। संक्रामक रोगों तथा रक्ताल्पता (एनीमिया) के मामलों में भी कमी आई है।
स्तंभ 3 : प्रधानमंत्री–आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन (पीएम-एबीएचआईएम) के माध्यम से महामारी संबंधी तैयारी
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थितियों के दौरान भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जैसा कि कोविड-19 महामारी के समय देखा गया था। ऐसे केंद्र रोग निगरानी, जांच तथा उपचार के प्रमुख केंद्र बन जाते हैं। महामारी संबंधी तैयारी सुनिश्चित करने के लिए सरकार प्राथमिक स्वास्थ्य अवसंरचना का उल्लेखनीय विस्तार कर रही है।
25 अक्तूबर 2021 को शुरू किया गया प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन (पीएम-एबीएचआईएम) भारत के सबसे बड़े अखिल-राष्ट्रीय कार्यक्रमों में से एक है, जिसका उद्देश्य एक सुदृढ़, सुलभ और आत्मनिर्भर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का विकास करना है। इसका कुल वित्तीय परिव्यय 64,180 करोड़ रुपये है, जो वित्तीय वर्ष 2021–22 से 2025–26 तक विस्तृत है।
यह मिशन स्वास्थ्य प्रणाली के प्रत्येक स्तर पर क्षमता का विकास कर रहा है और यह :
- 10 उच्च-फोकस राज्यों में 23,224 ग्रामीण स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों को सहायता प्रदान कर रहा है।
- सभी राज्यों में 13,736 शहरी स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र, और
- 11 उच्च-फोकस राज्यों में 3,389 ब्लॉक सार्वजनिक स्वास्थ्य इकाइयाँ स्थापित कर रहा है
- सभी जिलों में 744 एकीकृत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशालाएँ स्थापित कर रहा है
- 5 लाख से अधिक जनसंख्या वाले सभी जिलों में 631 क्रिटिकल केयर अस्पताल ब्लॉक स्थापित कर रहा है
भौतिक अवसंरचना के अलावा, पीएम-एबीएचआईएम भारत की महामारी रक्षा संरचना का भी निर्माण कर रहा है। इसमें शामिल हैं :
- जैव-सुरक्षा तैयारी, महामारी अनुसंधान और रोग निगरानी में समर्पित निवेश
- देश में प्रवेश के 50 बिंदुओं पर प्रकोप प्रतिक्रिया और तैयारी
- 12 केंद्रीय संस्थानों में 150 बिस्तरों वाले क्रिटिकल केयर ब्लॉक स्थापित किए जा रहे हैं
स्तंभ 4: आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (एबीडीएम) के माध्यम से डिजिटल स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र

स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच में सुधार के लिए मजबूत डिजिटल स्वास्थ्य अवसंरचना भी उतनी ही आवश्यक है, जितनी कि भौतिक अवसंरचना। इसका मूल उद्देश्य नागरिकों को उनके अपने स्वास्थ्य संबंधी डेटा का स्वामित्व प्रदान करना है—जिससे यह डेटा पोर्टेबल, सुलभ और देश के किसी भी स्वास्थ्य प्रदाता के साथ उपयोग योग्य बन जाए। यह स्वास्थ्य संस्थानों, पेशेवरों और फार्मेसियों के लिए एक एकल विश्वसनीय स्रोत (सिंगल सोर्स ऑफ ट्रुथ) स्थापित करता है, जिससे बेहतर चिकित्सकीय निर्णय और उपचार की निरंतरता सुनिश्चित होती है। यह एक राष्ट्रीय डेटाबेस भी तैयार करता है, जिसका उपयोग सरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य रुझानों के विश्लेषण, चिकित्सा अनुसंधान के समर्थन और अधिक लक्षित हस्तक्षेपों के लिए कर सकती है।
चौथा स्तंभ, आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (एबीडीएम), एक व्यापक और नागरिक-केंद्रित डिजिटल अवसंरचना के निर्माण पर केंद्रित है। इसे सितंबर 2021 में शुरू किया गया था। एबीडीएम के केंद्र में आयुष्मान भारत स्वास्थ्य खाता (एबीएचए-आभा) है — एक विशिष्ट 14-अंकीय स्वास्थ्य पहचान संख्या, जिससे नागरिकों के संपूर्ण स्वास्थ्य रिकॉर्ड जुड़े होते हैं। नागरिक की सहमति के साथ, इन रिकॉर्ड्स को एबीडीएम नेटवर्क के किसी भी स्वास्थ्य पेशेवर द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, जिससे कागज़ रहित और निर्बाध स्वास्थ्य सेवाएँ संभव होती हैं। एबीडीएम जनसंख्या स्तर पर अधिक प्रभावी स्वास्थ्य हस्तक्षेपों के लिए साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने को भी सक्षम बनाता है।
इस मिशन को इसके लॉन्च के बाद से तेजी से लागू किया जा रहा है। जून 2026 में एबीएचए से जुड़े स्वास्थ्य रिकॉर्ड्स की संख्या 100 करोड़ को पार कर गई।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण द्वारा संचालित आभा ऐप में क्यूआर-आधारित अपॉइंटमेंट पंजीकरण सेवा उपलब्ध है, जो अस्पतालों या क्लीनिकों में लंबी कतारों को कम करने में मदद करती है। यह रोगी के डेटा के सत्यापन में भी सहायता करता है। यह ऐप एबीडीएम के विस्तार का नेतृत्व कर रहा है :
- ऐप पर 20.49 करोड़ पंजीकरण दर्ज किए गए और
- 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फैली 27,328 स्वास्थ्य सुविधाएँ इस प्लेटफॉर्म से जुड़ी हुई हैं (31 मार्च, 2026 तक)
विभिन्न प्रकार के विकार तथा व्याधियों को लक्षित करता - राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) अपने दो उप-मिशनों — राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन और राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन — के माध्यम से विशिष्ट बीमारियों, जनसंख्याओं और स्वास्थ्य चुनौतियों को संबोधित करने वाले लक्षित कार्यक्रमों का संचालन करता है। एनएचएम ने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, रोग उन्मूलन और टीकाकरण के क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य परिणामों में सुधार किया है।
एनएचएम के केंद्र में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में कार्यरत सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं। आयुष्मान भारत के माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य अवसंरचना के तीव्र विस्तार और उन्नयन के कारण ये स्वास्थ्य कार्यकर्ता पहले की तुलना में अधिक सक्षम हो गए हैं। वे पहले से अधिक लोगों तक, अधिक स्थानों पर तथा बेहतर उपकरणों और डेटा के साथ स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचा रहे हैं। उनका कार्य कई लक्षित कार्यक्रम क्षेत्रों में फैला हुआ है — जिसकी शुरुआत मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य देखभाल से होती है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य देखभाल
प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (पीएमएसएमए) : वर्ष 2016 में शुरू की गई यह योजना सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं में निःशुल्क एवं गुणवत्तापूर्ण प्रसव पूर्व जांच प्रदान करती है।
- 7.47 करोड़ से अधिक गर्भवती महिलाओं की जांच की जा चुकी है और
- देशभर में 22,349 स्वास्थ्य सुविधाएँ पीएमएसएमए सेवाएँ प्रदान कर रही हैं।
जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई) : महिलाओं को प्रसव के दौरान सहायता प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा यह योजना चलाई जाती है। यह विशेष रूप से गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाली गर्भवती महिलाओं तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति समुदायों की महिलाओं को स्वास्थ्य संस्थानों में प्रसव कराने के लिए प्रोत्साहित करती है।
जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (जेएसएसके) : वर्ष 2014 में इस कार्यक्रम का विस्तार गर्भावस्था से संबंधित सभी प्रसव-पूर्व एवं प्रसव-पश्चात जटिलताओं तक किया गया। इस योजना के अंतर्गत प्रत्येक गर्भवती महिला को सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा में सरकार द्वारा वित्तपोषित निःशुल्क प्रसव, दवाएँ, नैदानिक सेवाएँ, आहार तथा परिवहन की सुविधा प्रदान की जाती है। इसमें अपनी जेब से कुछ खर्च नहीं करना होता।

इन सभी कार्यक्रमों ने मिलकर मातृ मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता सुरक्षित संस्थागत प्रसव सुनिश्चित करते हैं
केरल के मलप्पुरम की मुबशिरा की गर्भावस्था को पनक्कड़ अर्बन फैमिली हेल्थ सेंटर में उच्च जोखिम के रूप में चिन्हित किया गया। इसके बाद आशा कार्यकर्ताओं ने पूरी गर्भावस्था के दौरान हर महीने घर पर जाकर निगरानी की। उन्होंने मातृ एवं भ्रूण स्वास्थ्य की नियमित जांच की। उन्होंने गर्भावस्था पूर्व देखभाल प्रदान की और मुबशिरा को टेटनस एवं वयस्क डिप्थीरिया का टीका लगाया। शुरुआत में स्थानीय पुलिस थाने को भी सूचित किया गया। फोन पर नियमित बातचीत ने परिवार के साथ विश्वास स्थापित करने में मदद की। सामुदायिक संपर्क के कारण मुबशिरा ने सुरक्षित रूप से एक कन्या शिशु को अस्पताल में जन्म दिया।

मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य देखभाल को सुदृढ़ करने के लिए एनएचएम कई अतिरिक्त योजनाएँ भी संचालित करता है। इनमें शामिल हैं :
मातृ स्वास्थ्य
- सुरक्षित मातृत्व आश्वासन : प्रत्येक महिला और नवजात शिशु को सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में निःशुल्क और सम्मानजनक स्वास्थ्य सेवाओं की गारंटी देता है।
- मिडवाइफरी पहल : नर्स प्रैक्टिशनर मिडवाइव्स को प्रशिक्षित करती है।
- मृतजन्म निगरानी और प्रतिक्रिया: मृतजन्मों पर नज़र रखती है और उन्हें कम करने का प्रयास करती है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक प्रति 1,000 जन्मों पर 10 से कम मृतजन्म सुनिश्चित करना है।
बाल स्वास्थ्य
- गृह-आधारित नवजात शिशु देखभाल : आशा कार्यकर्ता जन्म के बाद नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य की निगरानी और समय रहते उन्हें उचित उपचार के लिए रेफर करने के लिए छह बार घर का दौरा करती हैं।
- छोटे बच्चों की गृह-आधारित देखभाल : आशा कार्यकर्ता 3 से 15 माह आयु की बच्चों के लिए पोषण एवं प्रारंभिक बाल विकास में सहायता हेतु पाँच बार घर का दौरा करती हैं।
- राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम: बच्चों में जन्मजात दोष, विकासात्मक विलंब, पोषण की कमी तथा बीमारियों की जांच करता है।
पोषण और किशोर स्वास्थ्य
- एनीमिया मुक्त भारत : गर्भवती महिलाओं, बच्चों और किशोरों को आयरन एवं फोलिक एसिड अनुपूरण प्रदान करता है।
- साप्ताहिक आयरन फोलिक एसिड अनुपूरण : किशोरों में खून की कमी की रोकथाम के लिए साप्ताहिक आयरन और फोलिक एसिड की गोलियाँ प्रदान करता है।
- माताओं का पूर्ण स्नेह कार्यक्रम : अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण के माध्यम से स्तनपान और पूरक आहार को बढ़ावा देता है।
- किशोर अनुकूल स्वास्थ्य केंद्र : प्राथमिक स्वास्थ्य स्तर पर किशोरों को परामर्श एवं नैदानिक सेवाएँ प्रदान करते हैं।
- मासिक धर्म स्वच्छता योजना : किशोरियों को जानकारी, स्वच्छता उत्पादों तथा सुरक्षित निपटान व्यवस्था तक पहुँच सुनिश्चित करती है।
मिशन इंद्रधनुष

मिशन इंद्रधनुष दिसंबर 2014 में नवजात बच्चों के टीकाकरण के लिए शुरू किया गया था। यह उच्च जोखिम वाले जिलों और शहरी क्षेत्रों में केंद्रित अभियानों के माध्यम से टीकाकरण न करवाई हुई तथा आंशिक रूप से टीकाकरण करवाई हुई आबादी को लक्षित करता है। यह कार्यक्रम सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (यूआईपी) के अंतर्गत नियमित टीकाकरण को सुदृढ़ करता है, जिससे कई जानलेवा बीमारियों से सुरक्षा मिलती है। एनएचएम का सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम प्रतिवर्ष 2.67 करोड़ नवजात शिशुओं और 2.9 करोड़ गर्भवती महिलाओं को लक्षित करता है — और 12 बीमारियों के विरुद्ध निःशुल्क टीके प्रदान करता है।
मिशन इंद्रधनुष के माध्यम से :
- इस कार्यक्रम के माध्यम से 5.46 करोड़ बच्चों और 1.32 करोड़ गर्भवती महिलाओं का टीकाकरण किया गया है, जिससे उन्हें टीके से रोकी जा सकने वाली बीमारियों से सुरक्षा मिली है।
- शून्य-खुराक (जिन्हें एक भी टीका नहीं लगा हो) बच्चों की संख्या साल 2023 में रही 0.11% से घटकर साल 2024 में 0.06% हो गई है।
भारत के टीकाकरण कार्यक्रमों ने मातृ एवं नवजात टेटनस का उन्मूलन भी सुनिश्चित किया है, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मई 2015 में प्रमाणित किया गया।
बच्चों और गर्भवती महिलाओं के समय पर टीकाकरण को सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने अक्तूबर 2024 में यूनिवर्सल इम्युनाइजेशन विन (यू-विन) नामक डिजिटल प्लेटफॉर्म शुरू किया। यह टीकाकरण प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल बनाता है, जिससे परिवार अपने स्वास्थ्य रिकॉर्ड्स नहीं खोते।
- मार्च 2026 तक इस प्लेटफॉर्म पर 11.87 करोड़ बच्चे और 3.96 करोड़ गर्भवती महिलाएँ पंजीकृत हैं।

सरकार ने फरवरी 2026 में तीन माह का गर्भाशय ग्रीवा कैंसर रोकथाम अभियान भी शुरू किया। इस अभियान के तहत देशभर में 14 वर्ष की आयु की लगभग 1.15 करोड़ बालिकाओं को ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) का निःशुल्क टीका प्रदान किया गया।
वर्ष 2023–24 में 12–23 माह की आयु के 95% से अधिक बच्चों को उनके अधिकांश टीके सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में लगाए गए। भारत में टीकाकरण कवरेज में सुधार लाने में मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।
माताओं और बच्चों की सुरक्षा के अलावा, एनएचएम के कार्यक्रमों ने उन संक्रामक रोगों के उन्मूलन में भी उल्लेखनीय प्रगति की है, जो लंबे समय से भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर बोझ रहे हैं।
संक्रामक रोगों का उन्मूलन
सरकार ने पिछले 12 वर्षों के दौरान संक्रामक रोगों की व्यापकता को कम किया है। एनएचएम के रोग उन्मूलन एवं उपचार संबंधी लक्षित कार्यक्रमों ने तपेदिक, मलेरिया और कुष्ठ रोग के क्षेत्रों में मापनीय परिणाम प्रदान किए हैं।
तपेदिक (क्षय रोग)
भारत राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) के माध्यम से तपेदिक (टीबी) की घटनाओं में कमी ले आया है। इस कार्यक्रम का लक्ष्य तपेदिक का उन्मूलन करना है। यह कार्यक्रम बहुआयामी है और इसमें सरकारी सुविधाओं के माध्यम से तपेदिक की जांच तथा उपचार शामिल हैं।

इस कार्यक्रम के कारण तपेदिक के मामलों और इसके चलते होने वाली मौतों की संख्या में गिरावट की गति वैश्विक दर की तुलना में अधिक तेज़ रही है।
3.78 लाख से अधिक नि-क्षय मित्र (स्वयंसेवक, जो तपेदिक रोगियों को पोषण, व्यावसायिक एवं निदान संबंधी सहायता प्रदान करते हैं) ने 20 लाख से अधिक रोगियों की सहायता की है। उन्होंने 45 लाख से अधिक फूड बास्केट (दिसंबर 2025 तक) प्रदान किए हैं। इस पोषण एवं अन्य सहायता ने रोगियों को उपचार की पूरी अवधि तक उपचार के प्रति प्रतिबद्ध बने रहने में मदद की है।
प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान : सितंबर 2022 में शुरू किया गया यह कार्यक्रम राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) का एक अतिरिक्त प्रमुख घटक है। यह वास्तव में एक ‘जन आंदोलन’ के रूप में उभरा है। 7 दिसंबर 2024 तक 20 करोड़ से अधिक संवेदनशील जनसंख्या की तपेदिक जांच की गई तथा 28 लाख से अधिक टीबी रोगियों का निदान किया गया है।
मलेरिया

वर्ष 2016 में सरकार ने राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन रूपरेखा लॉन्च की, जो वर्ष 2027 तक मलेरिया के उन्मूलन के लिए एक रोडमैप प्रदान करती है।
इस रूपरेखा के आधार पर, राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन रणनीतिक योजना (2023–2027) ने उन्नत निगरानी प्रणाली और मामलों के प्रबंधन के लिए “टैस्ट, ट्रीट और ट्रैक” (जांच, उपचार और निगरानी) दृष्टिकोण को अपनाया है। इसने रियल-टाइम डेटा ट्रैकिंग प्रणाली भी विकसित की है।
अन्य संक्रामक रोग
एनएचएम के लक्षित कार्यक्रमों ने केवल तपेदिक और मलेरिया तक ही नहीं, बल्कि अन्य संक्रामक रोगों के क्षेत्र में भी मापनीय प्रगति को प्रेरित किया है—जिससे संक्रमण में कमी आई है, मृत्यु दर घटी है, और कई रोगों को उन्मूलन की दिशा में आगे बढ़ाया गया है।
- एचआईवी-एड्स : वर्ष 2010 से 2024 के बीच माँ से बच्चे में संक्रमण की दर में लगभग 74.5% की कमी आई है। यह इसी अवधि के दौरान वैश्विक स्तर पर आई लगभग 56.5% की गिरावट से अधिक है।
- कालाजार : 54 जिलों के 633 प्रभावित ब्लॉकों में प्रति 10,000 की जनसंख्या पर एक से कम मामला दर्ज किया गया है।
- जापानी एन्सेफलाइटिस : केस फैटॅलिटी रेट (मृत्यु दर) 2014 में रहे 17.6% से घटकर 2024 में 7.1% हो गया।
- डेंगू : साल 2024 में केस फैटॅलिटी रेट घटकर 0.13% रह गया।
- 348 प्रभावित जिलों में से 143 जिले (41%) मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एमडीए) रोक चुके हैं और संक्रमण मूल्यांकन सर्वेक्षण (टीएएस) पास कर चुके हैं, जबकि साल 2014 में यह आंकड़ा केवल 15% था। (एमडीए का अर्थ है—रोग की स्थिति की परवाह किए बिना पूरी आबादी को दवाएँ देना)
- एमडीए कवरेज कुल जनसंख्या के संदर्भ में साल 2014 के 75% से बढ़कर साल 2025 में 85% हो गई।
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- जिलों की संख्या, जिन्होंने प्रति 10,000 की जनसंख्या पर < 1 मामले का उन्मूलन स्तर प्राप्त किया, 2014-15 में रही 542 से बढ़कर वर्ष 2024-25 में 638 हो गई।
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- नए मामलों की पहचान दर 2014-15 में प्रति 1,00,000 की जनसंख्या पर 9.73 से घटकर वर्ष 2024-25 में 7.0 रह गई है।
कोविड-19 और महामारी प्रतिक्रिया
भारत की महामारी प्रतिक्रिया सबसे सक्रिय रही। सरकार ने देश में पहला घरेलू मामला दर्ज होने से पहले ही हवाई अड्डों पर स्क्रीनिंग शुरू कर दी थी। अप्रैल 2020 में एक समर्पित वैक्सीन टास्क फोर्स का भी गठन किया गया। भारत विश्व के उन पहले देशों में से था जिन्होंने रैपिड एंटीजन टेस्ट शुरु किया।
16 जनवरी 2021 को भारत ने राष्ट्रीय कोविड-19 टीकाकरण कार्यक्रम शुरू किया, जो दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण अभियानों में से एक बन गया। 220 करोड़ से अधिक खुराकें — जिनमें दो स्वदेशी टीके भी शामिल थे — सरकारी स्कूलों, क्लीनिकों, अस्पतालों और अन्य स्थानों पर निःशुल्क प्रदान किए गए। प्रमाणपत्रों को डिजिटाइज़ किया गया और उन्हें कोविन डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से उपलब्ध कराया गया।
महामारी के दौरान सरकार ने अपने इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से विस्तार किया :
- परीक्षण प्रयोगशालाएँ 14 से बढ़कर 3,400 हो गईं।
- आईसीयू बेड 2,168 से बढ़कर 1.45 लाख हो गए।
- ऑक्सीजन-सहायता प्राप्त बेड 50,583 से बढ़कर 5.15 लाख हो गए।
- महामारी से पहले भारत में पीपीई किट का घरेलू उत्पादन नहीं होता था। कोविड-19 के दौरान घरेलू पीपीई निर्माण शून्य से बढ़कर प्रतिदिन 5 लाख से अधिक किट तक पहुँच गया।
- 1,563 से अधिक प्रेशर स्विंग एडसॉर्प्शन (पीएसए) ऑक्सीजन संयंत्र स्वीकृत किए गए, और लगभग 900 ऑक्सीजन एक्सप्रेस ट्रेनों ने संकट के समय 36,840 टन से अधिक तरल चिकित्सीय ऑक्सीजन का परिवहन किया।
वैक्सीन मैत्री के तहत भारत ने लगभग 100 देशों को टीके उपलब्ध कराए — जिनमें 48 देशों को निःशुल्क उपलब्ध कराए गए टीके भी शामिल थे। इस मानवीय पहल के अंतर्गत भारत ने लगभग 30 करोड़ खुराकें प्रदान कीं। ज़रूरत के समय में विश्व के साथ खड़े रहकर भारत ने वास्तव में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ — “विश्व एक परिवार है” — की भावना को साकार किया।
गैर-संक्रामक रोगों की रोकथाम और उपचार
गैर-संक्रामक रोग (एनसीडी) — जैसे हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर और स्ट्रोक — भारत में होने वाली मौतों के 60% के लिए जिम्मेदार हैं। इस बढ़ते बोझ को संबोधित करने के लिए, एनएचएम का राष्ट्रीय गैर-संक्रामक रोग रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम (एनपी-एनसीडी) शीघ्र पहचान, निदान और उपचार के लिए अवसंरचना को सुदृढ़ कर रहा है।
शीघ्र पहचान और स्क्रीनिंग
आयुष्मान आरोग्य मंदिर (एएएम) एनसीडी, जिसमें कैंसर भी शामिल है, की सामुदायिक स्क्रीनिंग के लिए आधार स्तंभ के रूप में कार्य करते हैं। सरकार कैंसर की स्क्रीनिंग, निदान और रोग प्रबंधन के लिए विभिन्न क्लीनिक और देखभाल केंद्र भी संचालित करती है।
ये स्क्रीनिंग रोगों की शीघ्र पहचान के लिए एक सक्रिय दृष्टिकोण को दर्शाती हैं।
- एएएम में मुख, स्तन और गर्भाशय ग्रीवा कैंसर के लिए 60 करोड़ से अधिक स्क्रीनिंग की जा चुकी हैं।
- 35.3 करोड़ लोगों की मुख कैंसर के लिए स्क्रीनिंग की गई है, जिनमें से :
- 2.3 लाख लोगों में कैंसर का पता चला है।
- लगभग 2 लाख लोगों का उपचार चल रहा है।
- 16.5 करोड़ से अधिक लोगों की स्तन कैंसर के लिए स्क्रीनिंग की गई है।
- 8.73 करोड़ लोगों की गर्भाशय ग्रीवा कैंसर के लिए स्क्रीनिंग की गई है, जिनमें से :
- 1.1 लाख महिलाओं में रोग का निदान किया गया है।
- लगभग 97,000 महिलाओं का उपचार चल रहा है।
- फरवरी 2026 में, सरकार ने राष्ट्रीय एचपीवी टीकाकरण अभियान के तहत देशभर में 14 वर्ष की सभी बालिकाओं के लिए निःशुल्क एचपीवी टीकाकरण की भी घोषणा की।
- 2017 से अब तक 41.5 करोड़ लोगों की उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन) के लिए स्क्रीनिंग की गई है, जिनमें से:
- 7.1 करोड़ लोगों में इसका निदान किया गया, और
- 5.7 करोड़ लोगों को सूचित किया गया।
- 41.3 करोड़ लोगों की मधुमेह (डायबिटीज) के लिए स्क्रीनिंग की गई है, जिनमें से:
- 4.7 करोड़ लोगों में मधुमेह पाया गया है।
- 3.4 करोड़ लोगों का उपचार चल रहा है।
उपचार और देखभाल
कैंसर में देखभाल
पिछले 12 वर्षों में सरकार ने कैंसर उपचार को प्राथमिकता दी है। यह जिला स्तर से लेकर तृतीयक स्तर तक कैंसर देखभाल का विस्तार कर रही है। यह कार्य “तृतीयक कैंसर देखभाल केंद्र सुविधाओं के सुदृढ़ीकरण योजना” के माध्यम से किया जा रहा है। इस योजना के अंतर्गत :
- 19 राज्य कैंसर संस्थान और 20 तृतीयक कैंसर देखभाल केंद्र स्थापित किए गए हैं।
देश के सभी 22 नए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थानों (एम्स) में कैंसर उपचार सुविधाएँ स्वीकृत की गई हैं। ये सुविधाएँ निदान, चिकित्सा और शल्य चिकित्सा क्षमताओं से सुसज्जित हैं। राष्ट्रीय कैंसर निगरानी व्यवस्था का विस्तार 600 से अधिक कैंसर रजिस्ट्री साइटों और 100 से अधिक स्ट्रोक रजिस्ट्री साइटों के माध्यम से किया गया है।

गुर्दा रोग और डायलिसिस
एनसीडी (गैर-संक्रामक रोग) द्वितीयक स्थितियों को भी उत्पन्न कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, अनियंत्रित मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अन्य कारणों से क्रॉनिक किडनी डिज़ीज़ (दीर्घकालिक गुर्दा रोग) हो सकता है। एंड-स्टेज रीनल डिज़ीज़ (अंतिम चरण का गुर्दा रोग) क्रॉनिक किडनी डिज़ीज़ का सबसे अंतिम और गंभीर चरण होता है। डायलिसिस, इसका प्रमुख उपचार है, जो महँगा होता है।
रोगियों की सहायता के लिए सरकार ने 2016 में प्रधानमंत्री राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम (पीएमएनडीपी) शुरू किया, जो गरीबों को निःशुल्क डायलिसिस उपचार प्रदान करता है।
इस कार्यक्रम के माध्यम से (5 जून 2026 तक) :
- 31.74 लाख रोगियों को डायलिसिस उपचार प्राप्त हुआ है।
- 1,816 केंद्रों पर 4 करोड़ से अधिक सत्र आयोजित किए गए हैं।
- इस कार्यक्रम ने रोगियों के बीमारियों पर खर्च होने वाले लगभग ₹10,102.25 करोड़ रुपये की बचत कराई है।
एनसीडी के कई उपचार आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी-पीएमजेएवाई) के अंतर्गत भी कवर किए जाते हैं, जिससे समाज के गरीब वर्ग को उपचार के लिए सुलभ और किफायती विकल्प प्राप्त होता है।
रोकथाम: मूल कारणों का समाधान
एक निष्क्रिय और अस्वस्थ जीवनशैली अक्सर एनसीडी का प्रमुख कारण होती है, विशेषकर मोटापा और मधुमेह के लिए। साल 2014 से, सरकार ने एनएचएम के बाहर भी एनसीडी से निपटने और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देने के लिए कई पहल शुरू की हैं।
ईट राइट इंडिया
स्वस्थ आहार मोटापा, मधुमेह, कुपोषण और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से निपटने या उनकी रोकथाम के लिए महत्वपूर्ण है। जुलाई 2018 में शुरू किया गया ‘ईट राइट इंडिया’ आंदोलन सुरक्षित, स्वस्थ और स्थायी भोजन को बढ़ावा देता है। यह खाद्य प्रतिष्ठानों में स्वच्छता, स्वस्थ खान-पान की आदतों और प्रदूषकों से मुक्त भोजन को प्रोत्साहित करता है। यह पहल संपूर्ण-सरकार दृष्टिकोण पर आधारित है—जो विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के बीच समन्वय के माध्यम से परिणाम सुनिश्चित करती है। इस पहल ने समुदाय को भी शामिल किया है, जिससे लोगों के आहार और जीवनशैली में बदलाव को प्रभावित किया जा सके।
मुख्य उपलब्धियाँ :
- 182 स्वच्छ स्ट्रीट फूड हब प्रमाणित किए गए हैं
- 546 प्रमाणित फल एवं सब्ज़ी बाज़ार
- रेलवे स्टेशनों पर 411 ईट राइट स्टेशन प्रमाणित किए गए हैं
- वित्त वर्ष 2024–25 में 21 हजार किलोग्राम से अधिक उपयोग किया गया खाद्य तेल (यूज़्ड कुकिंग ऑयल) एकत्र किया गया है।
फिट इंडिया
शारीरिक गतिविधियों में भाग लेना भी एनसीडी से लड़ने का एक महत्वपूर्ण तरीका है, साथ ही स्वस्थ आहार अपनाना भी आवश्यक है। साल 2019 में शुरू किया गया ‘फिट इंडिया मूवमेंट’ लोगों को अपनी दैनिक दिनचर्या में फिटनेस को शामिल करने के लिए प्रोत्साहित करता है। ‘फिट इंडिया संडे ऑन साइकिल’ अभियान शहरी क्षेत्रों में साइकिलिंग को एक सरल, सुलभ और पर्यावरण-अनुकूल तरीके के रूप में बढ़ावा देता है, जिससे लोग सक्रिय रह सकें।
- लॉन्च के बाद से ‘फिट इंडिया संडे’ अभियान ने 2.8 लाख से अधिक स्थानों पर 30 लाख से अधिक नागरिकों को जोड़ा है।
तंबाकू नियंत्रण

तंबाकू का उपयोग भारत में एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है, जिससे प्रतिवर्ष 13 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु होती है। तंबाकू का सेवन कैंसर का भी एक प्रमुख कारण है।
राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम के माध्यम से भारत ने पिछले दशक में तंबाकू सेवन में कुल 17.3% की कमी हासिल की है। यह कार्यक्रम देशभर में विभिन्न तंबाकू छोड़ो (सेसशन) केंद्रों का संचालन करता है।
- स्कूल जाने वाले बच्चों (13–15 वर्ष) में तंबाकू सेवन 14.6% (ग्लोबल यूथ टोबैको सर्वे-3, 2009) से घटकर 8.5% (ग्लोबल यूथ टोबैको सर्वे-4, 2019) हो गया है।
सरकार ने 2023 में ‘तंबाकू मुक्त युवा अभियान’ शुरू किया — जो अब अपने तीसरे संस्करण में है — जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि स्कूली बच्चे और युवा तंबाकू की लत न लगाएँ। लगातार चलाए गए 60-दिवसीय अभियानों के दौरान :
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- 3.09 लाख से अधिक शैक्षणिक संस्थान और 39,000 गाँव तंबाकू-मुक्त घोषित किए गए हैं।
- 2.1 करोड़ रुपये से अधिक का जुर्माना वसूला गया है।
2016 में सरकार ने टोल-फ्री राष्ट्रीय तंबाकू छोड़ो हेल्पलाइन (1800-112-356) शुरू की, जो निःशुल्क परामर्श और सहायता के साथ-साथ फॉलो-अप सपोर्ट भी प्रदान करती है। जून 2016 से अप्रैल 2026 तक इस हेल्पलाइन के माध्यम से 6.5 लाख से अधिक लोगों की सहायता की गई। निरंतर परामर्श के माध्यम से 34.5% कॉलर्स ने तंबाकू छोड़ दिया।
देशभर में जिला अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों, डेंटल कॉलेजों और एनसीडी क्लीनिकों में 2,000 से अधिक तंबाकू छोड़ो (सेसशन) केंद्र भी स्थापित किए गए हैं।
इन विभिन्न पहलों के कारण भारत को तंबाकू नियंत्रण के लिए 2025 का ब्लूमबर्ग फिलैंथ्रोपीज़ अवॉर्ड प्राप्त हुआ। इस पुरस्कार में सरकार की उस प्रगति को मान्यता दी गई जिसमें राष्ट्रीय टोल-फ्री क्विटलाइन और देशभर की स्वास्थ्य सुविधाओं में उपलब्ध तंबाकू छोड़ने संबंधी सहायता सेवाओं के माध्यम से तंबाकू सेवन को नियंत्रित किया गया।
रोग की रोकथाम एक स्वस्थ समाज के निर्माण का केवल एक हिस्सा है। जब बीमारी हो जाती है, तो उपचार तक पहुँच व्यक्ति की आवश्यकता पर आधारित होनी चाहिए—न कि उसकी भुगतान क्षमता पर।
किफ़ायती दवाओं और आपातकालीन परिवहन की उपलब्धता
स्वास्थ्य सेवा वास्तव में सुलभ और न्यायसंगत तब बनती है जब लोग उपचार के लिए आवश्यक दवाओं, परीक्षणों और परिवहन का खर्च वहन कर सकें। सरकार की तीन पहलों ने इन समस्याओं का सीधे समाधान किया है।

प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना बाजार मूल्य की तुलना में काफी कम कीमत पर गुणवत्तायुक्त जेनेरिक दवाएँ उपलब्ध कराती है। ये दवाएँ देशभर में जनऔषधि केंद्रों (जेएके) पर खरीदी जा सकती हैं। इस पहल ने गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाओं को ब्रांडेड दवाओं की तुलना में बहुत कम कीमत—आमतौर पर 50–80% सस्ती—पर उपलब्ध कराया है।
अमृत (उपचार के लिए सस्ते और विश्वसनीय इम्प्लांट्स एवं दवाएँ) फार्मेसी पहल 2015 में शुरू की गई थी। ये फार्मेसियाँ जीवनरक्षक और आवश्यक दवाएँ 50% से 90% की छूट पर उपलब्ध कराती हैं। इससे विशेष रूप से निम्न-आय वर्ग के रोगियों के लिए उपचार लागत में कमी आई है। अब तक 255 से अधिक आउटलेट्स के माध्यम से अमृत फार्मेसियों ने 6.85 करोड़ से अधिक रोगियों को लाभ पहुँचाया है। इस योजना के तहत मरीजों ने लगभग ₹8,400 करोड़ की बचत की है।
सरकार ने 2015 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत निःशुल्क आवश्यक निदान पहल शुरू की, जिसका उद्देश्य लोगों के डायग्नोस्टिक सेवाओं पर होने वाले खर्च को कम करना है। इस पहल के अंतर्गत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के हर स्तर पर आवश्यक परीक्षण निःशुल्क प्रदान किए जाते हैं।
इस पहल के अंतर्गत शामिल हैं:
- उप-स्वास्थ्य केंद्र स्तर पर 9 परीक्षण
- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर 19 परीक्षण
- सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर 39 परीक्षण
- जिला अस्पताल स्तर पर 57 परीक्षण
इस पहल के अंतर्गत शामिल विशेषज्ञताएँ हैं:
- हेमेटोलॉजी (रक्त विज्ञान)
- बायोकेमिस्ट्री (जैव रसायन)
- क्लिनिकल पैथोलॉजी (नैदानिक रोग विज्ञान)
- माइक्रोबायोलॉजी (सूक्ष्मजीव विज्ञान)
- रेडियोलॉजी (विकिरण/इमेजिंग विज्ञान)
- कार्डियोलॉजी (हृदय विज्ञान)
निःशुल्क निदान पहल
आंध्र प्रदेश 2016 में निःशुल्क निदान पहल लागू करने वाला पहला राज्य था। इससे पहले, राज्य में मरीजों को सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में बुनियादी लैब टेस्ट और रेडियोलॉजी के लिए अपनी जेब से भुगतान करना पड़ता था। राज्य सरकार ने सरकारी सुविधाओं में निःशुल्क निदान पहल को लागू करने के लिए सभी 13 जिलों में एनटीआर वैद्य परीक्षा पहल शुरू की। निःशुल्क प्रयोगशाला और रेडियोलॉजी सेवाएँ निम्न तक विस्तृत की गईं:
- 1,182 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र
- 192 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र
- 31 क्षेत्रीय अस्पताल, और
- 8 जिला अस्पताल
जिन 120 सुविधाओं में योग्यता-प्राप्त रेडियोलॉजिस्ट उपलब्ध नहीं थे, वहाँ टेली-रेडियोलॉजी शुरू की गई। पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल पर 4 नए सीटी केंद्र स्थापित किए गए।
प्रतिक्रिया तत्काल थी:
- इस पहल के माध्यम से प्रतिदिन 45,000 से 55,000 परीक्षण और 1,200 एक्स-रे किए गए।
- टेली-रेडियोलॉजी के माध्यम से प्रतिदिन लगभग 60–70 कंप्यूटेड टोमोग्राफी (सीटी) अध्ययन रिपोर्ट किए गए।
- जनवरी–जून 2016 के दौरान, साल 2015 की समान अवधि की तुलना में बाह्य रोगी (ओपीडी) विज़िट में 16 लाख से अधिक और अंतः रोगी (आईपीडी) भर्ती में 2.72 लाख की वृद्धि हुई।
- पूरे राज्य में 1,400 स्वास्थ्य केंद्रों पर संचालन पर आने वाली लागत लगभग ₹10 करोड़ प्रति माह थी।
यह मॉडल राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के अंतर्गत अन्य राज्यों में अपनाने (प्रतिरूपण) के लिए तैयार किया गया था।
आपातकालीन परिवहन भी सरकार द्वारा उपलब्ध कराया जाता है। पिछले 12 वर्षों में सरकार ने भारत के प्राथमिक आपातकालीन एम्बुलेंस नेटवर्क का विस्तार करके रोगी और अस्पताल के बीच की दूरी को व्यवस्थित रूप से कम किया है।
डायल 108 और डायल 102 सेवाएँ 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में संचालित होती हैं। डायल 108 गंभीर देखभाल, आघात (ट्रॉमा) और दुर्घटना जैसी चिकित्सीय आपात स्थितियों को संभालती है। डायल 102 मुख्य रूप से गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए कार्य करती है तथा जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (जेएसएसके) के लाभार्थियों का एंड-टु-एंड प्रबंधन करती है। विभिन्न आपातकालीन सहायता वाहन जो इस दूरी को कम कर रहे हैं:
- 3,044 उन्नत लाइफ़ सपोर्ट एम्बुलेंस
- 15,283 बुनियादी लाइफ़ सपोर्ट एम्बुलेंस
- 3,918 रोगी परिवहन वाहन, 19 नावें और दुर्गम क्षेत्रों के लिए 81 बाइकें
लोगों तक वहीं पहुँचना जहां वे हैं: डिजिटल और अंतिम-छोर (लास्ट-माइल) तक स्वास्थ्य सेवाएँ
साल 2014 से सरकार ने डिजिटल स्वास्थ्य प्राद्योगिकी के माध्यम से अंतिम-छोर (लास्ट-माइल) तक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार किया है। अब भौगोलिक दूरी लोगों और उनके स्वास्थ्य के बीच बाधा नहीं रही है। पहले दूरस्थ गाँवों में रहने वाले मरीजों के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर से मिलना कठिन था, लेकिन अब वे वर्चुअल रूप से परामर्श ले सकते हैं। इस प्रयास में तीन प्लेटफ़ॉर्म प्रमुख रहे हैं।
ई-संजीवनी: राष्ट्रीय टेलीमेडिसिन सेवा
ई-संजीवनी, भारत का राष्ट्रीय टेलीमेडिसिन प्लेटफ़ॉर्म, इस डिजिटल बदलाव के केंद्र में है। दूरस्थ या कम सेवा-प्राप्त क्षेत्रों में रहने वाले नागरिक अब स्मार्टफोन, कंप्यूटर या निकटतम प्राथमिक एवं उप-स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से डॉक्टर से परामर्श ले सकते हैं।

ई-संजीवनी को प्रारंभ में स्वास्थ्य केंद्रों के डॉक्टरों द्वारा एक-दूसरे से परामर्श लेने के लिए डिज़ाइन किया गया था। हालांकि, जब महामारी के दौरान लोगों का अस्पतालों और क्लीनिकों में जाना बंद हो गया, तब इस प्लेटफ़ॉर्म की मांग में अत्यधिक वृद्धि हुई।
अब यह प्लेटफ़ॉर्म लोगों को सीधे देश के शीर्षस्थ चिकित्सा संस्थानों में बैठे विशेषज्ञों से जोड़ता है।
लॉन्च के बाद से:
- 47 करोड़ से अधिक परामर्श (कॉल्स) दर्ज किए गए हैं
- 2.34 लाख से अधिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाता—जिनमें सरकारी अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों और आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के डॉक्टर, विशेषज्ञ और सुपर-स्पेशलिस्ट शामिल हैं—को इस प्लेटफ़ॉर्म से जोड़ा गया है।
टेली-मानस: फोन पर मानसिक स्वास्थ्य सहायता
जो लोग मानसिक स्वास्थ्य देखभाल की तलाश में हैं, उनके लिए सरकार द्वारा अक्तूबर 2022 में टेली-मानस टेलीमेडिसिन सेवा शुरू की गई है। यह सेवा मानसिक स्वास्थ्य देखभाल—जो ऐतिहासिक रूप से तिरस्कृत और संसाधन-सीमित रही है—को उन लोगों तक पहुँचाती है जो शहरों, जहाँ लंबे समय से यह उपचार केंद्रित रहा है, से बाहर रहते हैं। यह सेवा देशभर में गुणवत्तापूर्ण मानसिक स्वास्थ्य परामर्श और उपचार सेवाओं तक पहुँच को बेहतर बनाती है।
यह सेवा सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 20 भाषाओं में उपलब्ध है। लोग टेली-मानस के माध्यम से टेलीफोन-आधारित परामर्श, मनोचिकित्सा (साइकोथेरपी), मनोरोग (साइकेट्रिक) परामर्श और रेफरल सेवाएँ प्राप्त कर सकते हैं, जिसमें आपातकालीन देखभाल भी शामिल है।

अक्तूबर 2024 में सरकार ने टेली-मानस मोबाइल ऐप लॉन्च किया, जिससे इस सेवा का उपयोग और आसान हो गया। यह ऐप विशेष रूप से दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए भी सुलभ है, क्योंकि इसमें एक विशेष रूप से डिज़ाइन किया गया उपयोगकर्ता-अनुकूल डिजिटल इंटरफ़ेस और टोल-फ्री फोन लाइन शामिल है, जिसमें स्क्रीन उपयोग की आवश्यकता नहीं होती। ऐप लॉन्च के बाद इस टेलीमेडिसिन सेवा के उपयोग में वृद्धि हुई।
- अब इस प्लेटफ़ॉर्म से 53 टेली-मानस सेल और 23 मेंटरिंग संस्थान जुड़े हुए हैं।
दवाओं की डिलीवरी के लिए आई-ड्रोन
दवाओं की डिलीवरीण अक्सर दूरस्थ और पहाड़ी क्षेत्रों या कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में चुनौतीपूर्ण होता है। अब उन लोगों तक दवाएँ पहुँचाने के लिए ड्रोन का उपयोग किया जा रहा है, जिन्हें भौतिक या अन्य बाधाओं के कारण दवाएँ नहीं मिल पातीं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने 2021 में आई-ड्रोन सेवा शुरू की। इन ड्रोन का उपयोग दवाएँ, टीके और रक्त नमूनों को परीक्षण के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने में किया जाता है।
- ड्रोन के माध्यम से 7,700 किलोमीटर के दायरे में 22,000 दवाओं की डिलीवरी की गई है।
- 65 स्वास्थ्य केंद्र अब इस सेवा के माध्यम से दवाओं की डिलीवरी कर रहे हैं।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से स्वास्थ्य सेवा डिलीवरी में परिवर्तन
सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का उपयोग कर रही है, जिससे समानता, सुलभता, वहनीयता और गति को और अधिक बढ़ाया जा सके।
एआई-संचालित क्लिनिकल डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (सीडीएसएस) ई-संजीवनी परामर्श के दौरान डॉक्टरों की सहायता करते हैं, जो संरचित डेटा संग्रह और क्लिनिकल अलर्ट प्रदान करते हैं।
- अप्रैल 2023 में इसके शुरू होने के बाद से नवंबर 2025 तक 28.2 करोड़ ई-संजीवनी परामर्शों को मानकीकृत एआई-सक्षम सहायता का लाभ मिला है।
एआई उपकरण रोगों की स्क्रीनिंग को भी मजबूत कर रहे हैं। ‘कफ अगेंस्ट टीबी’ टूल खाँसी के विश्लेषण के माध्यम से संभावित तपेदिक (टीबी) मामलों की पहचान करता है।
- इस उपकरण के उपयोग से अतिरिक्त 12–16% टीबी मामलों की पहचान हुई—ऐसे मामले जो पारंपरिक तरीकों से स्क्रीनिंग करने पर छूट सकते थे।
- मार्च 2023 से नवंबर 2025 तक इस उपकरण के माध्यम से 1.62 लाख से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग की गई है।
गैर-संचारी रोगों के क्षेत्र में, मधुरनेत्रएआई स्वचालित डायबिटिक रेटिनोपैथी स्क्रीनिंग को सक्षम बनाता है, जिससे रोकी जा सकने वाली दृष्टिहीनता से बचने में सहायता मिलती है। यह स्क्रीनिंग के स्तर पर विशेषज्ञ नेत्र चिकित्सक की आवश्यकता को समाप्त कर देता है।
- यह समाधान 11 राज्यों के 38 स्वास्थ्य संस्थानों में लागू किया गया है।
- दिसंबर 2025 तक, इसने 14,000 से अधिक रेटिनल छवियों की स्क्रीनिंग के दौरान एआई सहायता प्रदान की है, जिससे 7,100 मरीज लाभान्वित हुए हैं।
चिकित्सा शिक्षा और कार्यबल
पिछले 12 वर्षों में सरकार ने स्वास्थ्य पेशेवरों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए चिकित्सा शिक्षा का विस्तार किया है।
चिकित्सा शिक्षा का विस्तार: 12 वर्ष बनाम 7 दशक

नर्सिंग पर भी समान ध्यान दिया गया है।
- नए मेडिकल कॉलेजों के साथ-साथ 157 नए नर्सिंग कॉलेज स्थापित किए जा रहे हैं — जिससे प्रतिवर्ष लगभग 15,700 नर्सिंग स्नातक तैयार होंगे।
- साल 2014 के बाद से नर्सिंग सीटों की संख्या में भी वृद्धि हुई है (जून 2025 तक):
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- बी.एससी. नर्सिंग सीटें: 53% की वृद्धि के साथ 1,27,290 हो गई हैं।
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- एम.एससी. नर्सिंग सीटें: 39% की वृद्धि के साथ 14,986 हो गई हैं।
वैकल्पिक स्वास्थ्य सेवा
आधुनिक चिकित्सा के साथ-साथ, सरकार ने वर्ष 2014 से पारंपरिक स्वास्थ्य प्रणालियों को भी औपचारिक रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे में एकीकृत किया है।
नवंबर 2014 में गठित आयुष (आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी) मंत्रालय ने पारंपरिक चिकित्सा को भारत की स्वास्थ्य प्रणाली का एक सक्रिय हिस्सा बनाया।
- साल 2025 तक 942 आयुष संस्थान खोले जा चुके हैं
राष्ट्रीय आयुष मिशन के अंतर्गत आयुष सुविधाओं को सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों में सह-स्थित (को-लोकेट) किया गया है। अब पारंपरिक चिकित्सा आधुनिक चिकित्सा के साथ एक ही अवसंरचना साझा करती है। आयुष को निम्न क्षेत्रों में मुख्यधारा में शामिल किया गया है:
- 13,093 एनएचएम सह-स्थित सुविधाएँ (दिसंबर 2025 तक), जिनमें शामिल हैं:

- 6,158 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी), 3,103 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी), 482 जिला अस्पताल, 3,109 उप-खंड स्तर की सुविधाएँ, और 241 ब्लॉक स्तर या उससे ऊपर लेकिन जिला स्तर से नीचे की सुविधाएँ।
भारत युष को भी एक वैश्विक सेवा के रूप में स्थापित कर रहा है। जुलाई 2023 में उन विदेशी नागरिकों के लिए एक विशेष आयुष वीज़ा शुरू किया गया है जो भारत में उपचार प्राप्त करना चाहते हैं। इससे देश की विश्व स्वास्थ्य और वेलनेस केंद्र बनने की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। पारंपरिक स्वास्थ्य प्रणाली को एकीकृत करने के लिए, आयुष ग्रिड पूरे देश में सभी आयुष अस्पतालों और प्रयोगशालाओं को डिजिटल रूप से जोड़ेगा।
विकसित भारत 2047 की ओर
पिछले 12 वर्षों में चिकित्सा अवसंरचना, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा और चिकित्सा शिक्षा में निवेश ने भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र को मजबूत किया है। ये प्रयास देश को सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की ओर निरंतर आगे बढ़ा रहे हैं। यह सरकार के आदर्श वाक्य — “सबका साथ, सबका विकास” — का व्यावहारिक रूप में साकार होना है।
एक स्वस्थ जनसंख्या केवल नैतिक उपलब्धि नहीं है — यह एक आर्थिक उपलब्धि भी है। जब लोग चिकित्सा खर्चों के कारण गरीबी में नहीं धकेले जाते, तो वे अपने विकास पर अधिक खर्च कर सकते हैं। जब श्रमिकों का समय रोकी जा सकने वाली बीमारियों के कारण नहीं खोता, तो वे कार्यस्थल पर अधिक उत्पादक होते हैं। जब बच्चे अपने शुरुआती वर्षों में जीवित रहते हैं और बेहतर पोषण प्राप्त करते हैं, तो वे सीखते हैं, कमाते हैं और समाज में योगदान देते हैं।
पिछले 12 वर्षों के लाभ आने वाली पीढ़ियों में और अधिक प्रभावी रूप से संचित होंगे। आज ऐसे स्वास्थ्य तंत्र में जन्म लेने वाले बच्चे, जहाँ लगभग सार्वभौमिक टीकाकरण कवरेज, सुलभ प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएँ और प्रारंभिक रोग-जांच उपलब्ध है, अपने माता-पिता की तुलना में अधिक लंबा और स्वस्थ जीवन जिएँगे। वे आगे चलकर एक अधिक मजबूत स्वास्थ्य आधार को भी विरासत में प्राप्त करेंगे। भारत निरंतर “विकसित भारत @ 2047” के अपने लक्ष्य — एक अधिक स्वस्थ, मजबूत और समृद्ध राष्ट्र, जो प्रत्येक नागरिक के लिए हो — की ओर बढ़ रहा है ।
संदर्भ
पत्र सूचना कार्यालय
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय
अन्य
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पीआईबी शोध
पीके/केसी/पीके
(रिलीज़ आईडी: 2269702)
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