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विविध

दो पीढ़ियां, एक छतः अपने बुजुर्गों से भारत का वायदा

सुधांश पंत
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सुधांश पंत

05 Sep, 2026

वसुधैव कुटुंबकम, यानी सारी दुनिया एक परिवार है की भावना के अनुसार, बुज़ुर्गों की असली शान उनकी समझ, उनका ज्ञान और उनकी बुद्धिमानी है।

हमारे हिंदुस्तानी घरों में हर किसी के दिल में बुजुर्गों से जुड़ी खूबसूरत यादें जरूर होती हैं। किसी के दादाजी ने उसे अपने बचपन से जुड़ा कोई साहसिक कारनामा सुनाया होगा। किसी की दादी ने सर्दियों की गुनगुनी दोपहरी में बालकनी में बैठ कर उसे स्वेटर बुनना सिखाया होगा। इन मामूली से पलों में ही किसी परिवार की असली विरासत खामोशी से आगे बढ़ती है। कभी किसी छोटे से हुनर ​​के ज़रिए, तो कभी किसी साझा कहानी के ज़रिए।

हम अक्सर पीढ़ियों के बीच फासले की बात करते हैं। दादा-दादी को स्मार्टफोन समझ में नहीं आता। बच्चे हैं कि उनके पास सुनहरे बीते कल की लंबी कहानियों के लिए सब्र ही नहीं। लेकिन मुझे लगता है कि हम पीढ़ियों को जोड़ने वाले पुल की बात कम करते हैं। वह ओझल तरीके जिनके जरिए बुजुर्ग और नौजवान आज भी एक-दूसरे को पूरा करते हैं।

कोई पीढ़ी क्या देती है अपने वंशजों को

बच्चों को दादा-दादी से कुछ ऐसा मिलता है जो कोई भी स्कूल उन्हें नहीं दे सकता। बुजुर्गों के पास देने के लिए समय है जिसका कोई मोल नहीं होता। बढ़ते शहरीकरण और माता-पिता दोनों के काम करने की वजह से बच्चे अकेले रह जाते हैं। उनका दिन आम तौर पर सख्त टाइमटेबल में बंधा होता है। ऐसे में घर के बुजुर्ग ही बच्चों के साथ इत्मीनान से बैठने के लिए तैयार रहते हैं। उन्हें एक ही कहानी पांचवीं दफा सुनने से कोई एतराज नहीं होता। वे जूते के तसमे बांधे जाने तक इंतजार कर सकते हैं। बच्चों को बिना किसी जल्दबाजी के दी गई ये तवज्जो उन्हें इस बात का एहसास दिलाती है कि उनकी भी अहमियत है। इसे हम शायद ही किसी पैमाने पर कभी नाप पाते हैं।

इन बच्चों के पास बुजुर्गों को बदले में देने के लिए क्या होता है? सिर्फ उनका साथ जो देखने में भले ही बहुत मामूली लगे लेकिन ऐसा है नहीं। पोते-पोती का मिलने आना एक बुजुर्ग के पूरे हफ्ते का मिजाज बदल देता है। कॉलेज गए पोते का वीडियो कॉल, पोती का अपनी दादी को यह बताना कि वह उनके हाथ के खाने को कितना याद करती है या परपोते का बस उनकी गोद में चढ़ जाना - ये पल किसी बुजुर्ग के लिए वह काम करते हैं जो कोई दवा नहीं कर सकती। ‘एजिंग एट होम’ यानी अपने घर में बुढ़ापा गुज़ारने के पीछे यही सोच है। बुजुर्ग किसी आश्रम में नहीं, बल्कि खुद के घर में, अपने उस परिवार और पड़ोस के बीच सबसे ज्यादा खुश और सेहतमंद रहते हैं जिसे उन्होंने हमेशा जाना और प्यार किया है।

 

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यह हमारे लिए कोई नई बात नहीं है। भारत के ज़्यादातर हिस्सों में, बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेना उन पहली सीखों में से एक है जो बच्चा सीखता है। यह एक छोटा सा कार्य वह सबक देता है जो कोई उपदेश नहीं सिखा सकता कि उम्र का सम्मान किया जाना चाहिए। संस्कृत का यह उपदेश 'मातृ देवो भव, पितृ देवो भव' ('अपनी माता और पिता को ईश्वर तुल्य मानो'), उन मूल्यों की नींव बना हुआ है जो भारतीय परिवार अपने बच्चों में सिंचित करने का प्रयास करते हैं। जो हमारा पालन-पोषण करते हैं, वे बदले में हमारे आदर और सम्मान के हकदार हैं। एक और सुन्दर कहावत है, "माँ के कदमों के नीचे जन्नत है", जो एक बार फिर माता-पिता और दादा-दादी/नाना-नानी के प्रति प्रेम, देखभाल और सेवा के माध्यम से प्राप्त होने वाले आशीर्वाद और संतोष के शाश्वत स्रोत को दर्शाता है। इसका अर्थ है कि माँ की सेवा करना, उनका सम्मान करना और उनकी देखभाल के लिए स्वयं को समर्पित कर देना ईश्वर को प्रसन्न करने और स्वर्ग प्राप्त करने का सीधा मार्ग है। इसके अलावा, यह उस असीम कष्ट, कठिनाई और जीवनभर के त्याग को भी स्वीकारता है जो एक माँ अपने बच्चों का पालन-पोषण करते हुए सहती है।

यही वजह है कि जब परिवार में कई पीढ़ियों एक ही छत के नीचे साथ रहते हैं, तो उनके बीच आपस में बहुत कुछ साझा होता है। जो बच्चे दादा-दादी या नाना-नानी के साथ बड़े होते हैं, वे उन कहानियों को जानते हैं जिनसे उनका परिवार बना है और उन मूल्यों को समझते हैं जिन्हें उनके बड़े-बुजुर्गों ने अपनाया है; साथ ही, वे असल ज़िंदगी में धैर्य का मतलब भी सीखते हैं। और जो बुजुर्ग परिवार की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बने रहते हैं, वे ज़्यादा स्वस्थ और कम चिंतित रहते हैं और उनमें अकेलेपन की भावना भी कम होती है।

क्या यह रिश्ता कमज़ोर पड़ रहा है?

अगर हम यह स्वीकार न करें कि आज कई भारतीय घरों में विभिन्न संस्कृतियों के बीच यह रिश्ता कमज़ोर पड़ रहा है, तो हम सिर्फ़ आधी सच्चाई ही बता रहे होंगे। काम के लिए पलायन, छोटे परिवार और आधुनिक जीवन की तेज़ रफ़्तार,  इन सबने चुपचाप हमारे कई बुज़ुर्गों को खाली घरों में दिन बिताने पर मजबूर कर दिया है; वे ऐसे फ़ोन कॉल का इंतज़ार करते रहते हैं जो पहले के मुकाबले अब बहुत कम आते हैं।

यह प्यार का कम होना नहीं है। यह अक्सर समय और दूरी की वजह से होता है। और चूँकि हर परिवार और हर बुज़ुर्ग यही चाहता है कि बुढ़ापे में वे अपने ही घर में रहें, इसलिए मदद का तरीका ऐसा होना चाहिए जिससे माता-पिता को घर छोड़कर कहीं और जाने के बजाय अपने ही घर में रह कर मदद मिल सके।

हमें यह अच्छी तरह समझने और अपनाने की ज़रूरत है कि लगातार बदलती इस दुनिया में बुज़ुर्ग ज्ञान, अनुभव और ठहराव का स्रोत हैं।

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में, केंद्र सरकार की 'एल्डर लाइन' – जो एक टोल-फ्री हेल्पलाइन (14567) है – उनकी मदद के लिए हमेशा मौजूद है; चाहे दिन हो या रात, कभी भी उन्हें किसी से बात करने की ज़रूरत महसूस हो।

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राष्ट्रीय वयोश्री योजना (आरवीवाई) के तहत, बुज़ुर्ग नागरिकों को चलने के लिए छड़ी, सुनने के लिए कान की मशीन, चश्मे और अन्य सहायक उपकरण नि:शुल्क प्रदान किए जाते हैं, ताकि साधनों की कमी की वजह से उनकी आज़ादी छिन न जाए। ये खामोश मदद इसलिए है ताकि दूरी का मतलब अलगाव न हो। जब कोई पोता-पोती उनसे मिलने आएं, तो उन्हें दादा-दादी या नाना-नानी अपने घर पर ही स्वस्थ और सक्रिय मिलें, न कि केवल इंतज़ार करते हुएउन बुजुर्गों के पास सुनाने के लिए भरपूर कहानियां होती हैं।

Rashtriya Vayoshri Yojana

 

भले ही परिवार के सदस्य हर दिन मौजूद न रह पाएं, लेकिन वृद्धावस्था घर पर बिताने का मतलब यह नहीं है कि बुजुर्गों को देखभाल न मिले। 'शतायु' (सीनियर होलिस्टिक केयर असिस्टेंस एंड ट्रेनिंग फॉर योर यूटिलिटी) डैशबोर्ड एक ऐसी प्रणाली बनाने में मदद कर रहा है जिसकी भारत को लंबे समय से ज़रूरत थी—बुज़ुर्गों की देखभाल करने वालों का एक ऐसा ट्रेंड और ट्रैक किया जा सकने वाला नेटवर्क जो हर ज़िले में उपलब्ध हो। ताकि उन घंटों में जब कामकाजी बेटा या दूर रहने वाली बेटी उन्हें समय नहीं दे पाते, तब उनकी जगह कोई प्रशक्षित व्यक्ति देखभाल की ज़िम्मेदारी संभाल सके। यह ऐसी देखभाल है जो घर पर ही मिलती है, इसके लिए घर से बाहर जाने की जरुरत नहीं पड़ती।

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ऐसे कुछ बुज़ुर्ग जिनके आस-पास कोई परिवार नहीं है, उनके लिए 'घर' का मतलब बदल जाता है। ऐसे में सरकार की 'अटल वयो अभ्युदय योजना' (एवीवाइएवाई) के तहत चलने वाले ओल्ड एज होम (बुज़ुर्गों के लिए घर) उनकी ज़रूरत के हिसाब से एक परिवार की तरह काम करते हैं। यहाँ रहने वाले लोग एक साथ खाना खाते हैं, किसी परिवार की तरह त्योहार मनाते हैं, योग और स्वास्थ्य जाँच में हिस्सा लेते हैं और चाय पीते हुए बातचीत करने के लिए उन्हें कोई न कोई मिल ही जाता है। यह एक नए रूप में बना परिवार है, ताकि किसी भी बुज़ुर्ग को कभी भी पूरी तरह अकेले बुढ़ापा न बिताना पड़े।

एक छोटी सी आदत जिसे फिर से अपनाने की ज़रूरत है

अगर कोई एक काम है जो हर परिवार कर सकता है, तो वह है अलग-अलग पीढ़ियों का एक साथ बैठना या साथ रहना। बस एक शाम दादा-दादी या नाना-नानी अपने पोते-पोती को अपने बचपन के किस्से सुनाएं या कोई किशोर अपनी दादी या नानी को वॉइस नोट भेजना सिखाए। उन्हें अपने फ़ोन पर 'जीवन' ऐप (जॉइंट एल्डरली एम्पावरमेंट एंड वर्चुअल असिस्टेंस नेटवर्क) इस्तेमाल करना सिखाना, जिससे वे देख सकें कि वे किन कल्याणकारी योजनाओं के पात्र हैं या बस उनके पास आपातकालीन सहायता का एक बटन हो। इन पलों में कुछ खर्च नहीं होता और न ही इसके लिए किसी बड़े दिखावे की ज़रूरत होती है। इसके लिए ज़रूरत है बस इच्छा और प्रयास की।

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क्योंकि असल में, अलग-अलग पीढ़ियों के बीच जुड़ाव का मतलब सिर्फ़ यह नहीं है कि बुज़ुर्ग युवाओं को कुछ सिखाएं या युवा बुज़ुर्गों में जोश भरें। बल्कि, यह दोनों पीढ़ियों का एक-दूसरे को कुछ ऐसा याद दिलाने के बारे में है, जिसे ज़िंदगी के बीच के सालों में अक्सर हम भुला देते हैं।

आज भारत में कहीं न कहीं, कोई दादा-दादी या नाना-नानी किसी बच्चे के साथ कागज़ की नाव बना रहे होंगे। उस बच्चे को शायद याद न रहे कि वह दोपहर क्यों खास थी, लेकिन वह दोपहर फिर भी खास थी। आइए, हम यह सुनिश्चित करें कि ऐसी और भी कई दोपहरें आएं और इसी मकसद के लिए बनी योजनाओं के शांत सहयोग से, किसी भी दादा-दादी या नाना-नानी को अपना समय अकेले न बिताना पड़े।

(*श्री सुधांश पंत (आईएएस) भारत सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय में सचिव हैं।)

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