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सीमा सड़क संगठन (बीआरओ): पथ निर्माण से राष्ट्र निर्माण तक, जो जोड़ता है राष्ट्र और जन-मन

Posted On: 19 JAN 2026 10:40AM

मुख्य बिंदु

· सीमा सड़क संगठन सैन्य और नागरिक दोनों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सीमावर्ती और दुर्गम क्षेत्रों में रणनीतिक सड़कों, पुलों, सुरंगों और हवाई पट्टियों का निर्माण व रखरखाव करता है।

· वर्ष 1960 में अपनी स्थापना के बाद से, सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) ने भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों और मित्र पड़ोसी देशों में 64,100 किलोमीटर से अधिक लंबी सड़कों, 1,179 पुलों, 7 सुरंगों और 22 हवाई पट्टियों का निर्माण कर एक कीर्तिमान स्थापित किया है।

· भूटान, म्यांमार, अफगानिस्तान और ताजिकिस्तान में इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से, बीआरओ क्षेत्रीय संपर्क और रणनीतिक साझेदारी को सुदृढ़ करता है।

· वित्तीय वर्ष 2024–25 में, सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) ने ₹16,690 करोड़ का अपना अब तक का सर्वाधिक व्यय दर्ज किया। इस गति को बरकरार रखते हुए, वित्तीय वर्ष 2025–26 के लिए ₹17,900 करोड़ का एक महत्वाकांक्षी व्यय लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

· वर्ष 2024 से 2025 की दो साल की अवधि में, बीआरओ ने 250 इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को राष्ट्र को समर्पित किया, जो रणनीतिक सीमा विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।

परिचय

 

हिमालय के उन हिमनदों से जहाँ ऑक्सीजन कम होने लगती है, उन नदी घाटियों तक जहाँ जलधाराएँ गर्जना करती हैं और उन तपते रेगिस्तानों तक जहाँ सन्नाटा भी जलाता है—सीमा सड़क संगठन डामर, फौलाद और पत्थरों पर साहस के अमिट हस्ताक्षर अंकित करता है। सीमा पर तैनात सैनिक के लिए ये सड़कें रक्षा की जीवन रेखा हैं, तो सुदूर घाटियों में बसे ग्रामीणों के लिए ये उम्मीद के सेतु हैं।

7 मई 1960 को स्थापित, सीमा सड़क संगठन एक सरल किंतु प्रेरणादायक आदर्श वाक्य को आत्मसात किए हुए है: 'श्रमेण सर्वं साध्यम्' अर्थात परिश्रम से सब कुछ संभव है पिछले छह दशकों में, इसी मंत्र ने बीआरओ का मार्ग प्रशस्त किया है और इसे केवल एक कंस्ट्रक्शन एजेंसी से ऊपर उठाकर भारत की सीमाओं के एक मौन प्रहरी के रूप में स्थापित किया है।

भारत की सीमाओं से परे, बीआरओ के पदचिह्न भूटान, म्यांमार, अफगानिस्तान और ताजिकिस्तान तक फैले हुए हैं, जहाँ सड़कें और हवाई पट्टियाँ क्षेत्रीय संपर्क और रणनीतिक सहयोग के माध्यम के रूप में कार्य करती हैं। अफगानिस्तान में डेलाराम-ज़ारंज राजमार्ग जैसी परियोजनाएं केवल इंजीनियरिंग का चमत्कार नहीं हैं, बल्कि साझेदारी और भरोसे के स्थायी प्रतीक के रूप में खड़ी हैं।

A bridge over a riverAI-generated content may be incorrect.जब भी आपदा आई है, चाहे वह 2004 की सुनामी हो, कश्मीर का भूकंप हो या लद्दाख की आकस्मिक बाढ़—बीआरओ सबसे पहले पहुँचने वालों में से एक होता है, जो टूटी हुई जीवन रेखाओं को जोड़कर एक बार फिर उम्मीद' को बहाल करता है।

वर्ष 2024 और 2025 में, सीमा सड़क संगठन द्वारा कार्यान्वित 356 इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं राष्ट्र को समर्पित की गईं, जो रणनीतिक सीमा अवसंरचना के विकास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय विकास में बीआरओ के महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए, सरकार ने केंद्रीय बजट 2024-25 में इसके आवंटन को ₹6,500 करोड़ से बढ़ाकर बजट 2025-26 में ₹7,146 करोड़ कर दिया है। वित्त वर्ष 2024-25 में, बीआरओ ने ₹16,690 करोड़ का अपना अब तक का सर्वाधिक व्यय दर्ज किया। इसी निरंतर प्रगति को देखते हुए, वित्त वर्ष 2025-26 के लिए ₹17,900 करोड़ का व्यय लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

आज, बीआरओ इस विश्वास के एक जीवंत प्रतीक के रूप में खड़ा है कि सबसे कठिन रास्ते भी सबसे मजबूत हौसलों के आगे झुक जाते हैं। यह केवल एक संगठन नहीं है, बल्कि देश की सीमाओं पर भारत की सुरक्षा और विकास का एक शांत व अडिग शिल्पकार है, जहाँ हर मील का पत्थर संप्रभुता के रक्षक के रूप में भी अपनी पहचान बनाए रखता है।

 

 

बीआरओ की बेजोड़ उपलब्धियाँ : गौरवशाली विरासत और विशाल विस्तार

 

1960 में स्थापित, सीमा सड़क संगठन भारत सरकार की प्रमुख सीमा इंफ्रास्ट्रक्चर एजेंसी है। यह सुदूर और रणनीतिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कनेक्टिविटी का निर्माण और रखरखाव करता है। वर्ष 2015-16 से, बीआरओ पूरी तरह से रक्षा मंत्रालय के अधीन कार्य कर रहा है। इससे पहले, यह आंशिक रूप से सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के अंतर्गत आता था।

बीआरओ की उपलब्धियों के मूल में इसके लोग हैं जो सैन्य अनुशासन और नागरिक शिल्प कौशल का एक अनूठा संगम है। यह संगठन दो मुख्य स्तंभों पर टिका है—जनरल रिजर्व इंजीनियर फोर्स (जीआरईएफ) और भारतीय सेना के इंजीनियर अधिकारी, जिन्हें आवश्यक नागरिक कर्मियों और कैजुअल पेड लेबरर्स (सीपीएल) का निरंतर सहयोग प्राप्त है।

मात्र दो परियोजनाओं—पूर्व में वर्तक और उत्तर में बीकन—के साथ अपनी शुरुआत करने वाला बीआरओ, आज 18 डायनामिक प्रोजेक्ट्स का नेतृत्व कर रहा है।

उत्तर पश्चिम भारत में 9 (जम्मू और कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान)

उत्तर पूर्व और पूर्वी भारत में 8 (सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम, मेघालय)

भूटान में एक

सीमावर्ती राज्यों में रणनीतिक परियोजनाए

बीआरओ वर्तमान में 18 क्षेत्रीय परियोजनाओं का संचालन कर रहा है, जिनमें से प्रत्येक 11 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में स्ट्रेटेजिक इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण और निष्पादन के लिए समर्पित है। बड़े पैमाने पर सड़कों, पुलों, सुरंगों और हवाई पट्टियों के साथ-साथ टेली-मेडिसिन केंद्रों के माध्यम से, बीआरओ एक्ट ईस्ट और वाइब्रेंट विलेजेस प्रोग्राम जैसी पहलों के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक-आर्थिक विकास दोनों को सुदृढ़ कर रहा है।

अरुणाचल प्रदेश में, बीआरओ की वर्तक, अरुणांक, उदयक और ब्रह्मांक जैसी परियोजनाएं भारत की सबसे चुनौतीपूर्ण सीमाओं पर  हैं। ये परियोजनाएं सिसेरी पुल, सियोम पुल, सेला टनल और नेचिपु टनल जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के माध्यम से दूर-दराज के गांवों को लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) से जोड़ती हैं

लद्दाख के दुर्गम क्षेत्रों में हिमांक, बीकन, दीपक, विजयक और योजक जैसी परियोजनाएं कारगिल, लेह और काराकोरम क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण लाइफलाइन का काम कर रही हैं। ये परियोजनाएं श्रीनगर-लेह राजमार्ग, दारबुक-श्योक-डीबीओ (डीएस-डीबीओ) मार्ग, अटल टनल और निर्माणाधीन शिंकु ला टनल जैसे सामरिक मार्गों का न केवल रखरखाव करती हैं, बल्कि पूरे क्षेत्र में बारहमासी संपर्क भी सुनिश्चित करती हैं।

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में सिक्किम में स्वस्तिक, मिजोरम में पुष्पक, असम और मेघालय में सेतुक और नागालैंड और मणिपुर में सेवक जैसी परियोजनाएं क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को निरंतर सशक्त बना रही हैं। वहीं, देश की पश्चिमी सीमाओं पर जम्मू में संपर्क और राजस्थान में चेतक जैसी परियोजनाएं रणनीतिक आवागमन को नई ऊंचाइयां दे रही हैं।

हिमालय की ऊंचाइयों से परे, शिवालिक परियोजना उत्तराखंड में चारधाम यात्रा के लिए भरोसेमंद और सुलभ मार्ग सुनिश्चित करती है, जबकि हीरक परियोजना छत्तीसगढ़ के वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में कनेक्टिविटी का विस्तार कर रही है।

 अंततः, भूटान में कार्यरत बीआरओ की विदेशी शाखा दंतक, व्यापक सड़क, पुल और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के माध्यम से द्विपक्षीय संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ बनाती है। सामूहिक रूप से, ये सभी पहलें राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक तैयारी और क्षेत्रीय विकास के प्रति बीआरओ की अटूट प्रतिबद्धता का एक उत्कृष्ट उदाहरण पेश करती हैं।

 

 

 

 

 

महत्वपूर्ण बीआरओ इंफ्रास्ट्रक्चर: सड़कें, सुरंगें, पुल और एयरफील्ड

बीआरओ ने सीमावर्ती राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास की गति को अभूतपूर्व रूप से तेज किया है। संगठन ऐसे रणनीतिक परिसंपत्तियों का निर्माण कर रहा है जो न केवल रक्षा तैयारियों को मजबूत करते हैं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक विकास, आपदा प्रबंधन क्षमता और क्षेत्रीय अखंडता को भी सुदृढ़ करते हैं।

 

सड़कें


वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 तक की पांच साल की अवधि के दौरान, रक्षा मंत्रालय ने जनरल स्टाफ (जीएस) सड़कों के लिए बीआरओ को लगभग ₹23,625 करोड़ आवंटित किए हैं। इस बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराई गई धनराशि ने अग्रिम क्षेत्रों में लगभग 4,595 किमी लंबी सड़कों के निर्माण को संभव बनाया है। विशेष रूप से उत्तरी सीमाओं पर कनेक्टिविटी में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। केवल वित्त वर्ष 2024-25 में ही, लगभग 769 किमी सड़क निर्माण का कार्य सफलतापूर्वक पूरा किया गया है।

 

सुदूरवर्ती हापोली-सरली-हुरी रोड को पक्का करने और लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल की ओर जाने वाले संपर्क मार्गों का तीव्र विस्तार हुआ है।

लद्दाख: लद्दाख में प्रोजेक्ट विजयक ने अब तक 1,000 किलोमीटर से अधिक लंबी सड़कों का जाल बिछाया है। यह परियोजना जोजिला दर्रे जैसे सामरिक रूप से संवेदनशील मार्गों की त्वरित बहाली सुनिश्चित करती है, जिससे पूरे वर्ष निरंतर संपर्क बना रहता है। यह पहल न केवल दुर्गम क्षेत्रों में नागरिकों की पहुंच को सुगम बनाती है, बल्कि चुनौतीपूर्ण भौगोलिक परिस्थितियों में सैन्य आवाजाही को भी अत्यधिक सशक्त करती है।

सिक्किम: सिक्किम में प्रोजेक्ट स्वास्तिक ने 1,000 किलोमीटर से अधिक सड़कों का जाल विकसित किया है और अब यह एनएच 310A/310AG जैसे नए राजमार्गों की योजना बना रहा है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य सिक्किम के दुर्गम इलाकों में बारहमासी संपर्क सुनिश्चित करना है, जिससे न केवल स्थानीय नागरिकों की पहुंच सुगम होगी, बल्कि चुनौतीपूर्ण भौगोलिक परिस्थितियों में सैन्य आवाजाही भी बेहतर होगी

 

पुल

अरुणाचल प्रदेश: वर्ष 2008 में स्थापित प्रोजेक्ट अरुणांक ने अब तक सुदूर घाटियों और अग्रिम क्षेत्रों में 1.18 किमी लंबे प्रमुख पुलों का निर्माण और रखरखाव किया है। सियोम पुल और सिसेरी नदी पुल जैसे निर्माण, लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) के साथ सैन्य लॉजिस्टिक्स और सैनिकों की आवाजाही को और अधिक मजबूती प्रदान करते हैं।

लद्दाख: प्रोजेक्ट विजयक ने पूरे लद्दाख क्षेत्र में 80 से अधिक प्रमुख पुलों का निर्माण और रखरखाव किया है, जिससे अत्यधिक ऊंचाई वाले इन दुर्गम इलाकों में बारहमासी आवाजाही में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। विशेष रूप से, बीआरओ ने केवल 32 दिनों के रिकॉर्ड शीतकालीन बंद के बाद, 1 अप्रैल 2025 को जोजिला दर्रे को फिर से खोलकर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया

सिक्किम: प्रोजेक्ट स्वास्तिक ने अब तक 80 प्रमुख पुलों का निर्माण किया है, जिनमें से 26 पुल पिछले एक दशक में ही पूरे किए गए हैं। ये निर्माण बाढ़ और ग्लेशियर फटने (जीएलओएफ) जैसी गंभीर प्राकृतिक चुनौतियों के बावजूद पूरे क्षेत्र में बारहमासी पहुंच सुनिश्चित करते हैं।

जम्मू-कश्मीर: बीआरओ के प्रोजेक्ट संपर्क के तहत निर्मित 422.9 मीटर लंबा देवक पुल एक महत्वपूर्ण सड़क संपर्क को सुदृढ़ करता है। यह पुल न केवल सैन्य आवाजाही और भारी वाहनों के आवागमन को सुगम बनाता है, बल्कि क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को भी नई मजबूती प्रदान करता है। इसका उद्घाटन सितंबर 2023 में बीआरओ की 90 परियोजनाओं के एक बड़े पैकेज के हिस्से के रूप में किया गया था।

उत्तरी सिक्किम: प्रोजेक्ट स्वास्तिक के तहत, बीआरओ ने भारी बारिश और अचानक आई बाढ़ से क्षतिग्रस्त हुए छह प्रमुख पुलों को अप्रैल 2024 तक बहाल कर दिया। इन पुलों के पुनर्निर्माण से क्षेत्र की महत्वपूर्ण जीवन रेखा फिर से स्थापित हो गई है, जो इस उच्च-ऊंचाई वाले क्षेत्र में नागरिकों की आवाजाही और सामरिक गतिविधियों की निरंतरता सुनिश्चित करती है।

 

सुरंग

हिमाचल प्रदेश: रोहतांग दर्रे के नीचे निर्मित 9.02 किमी लंबी अटल टनल, 10,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित दुनिया की सबसे लंबी राजमार्ग टनल है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा उद्घाटित यह टनल, लेह-मनाली के बीच हर मौसम में निर्बाध संपर्क सुनिश्चित करती है।

अरुणाचल प्रदेश: 500 मीटर लंबी नेचिफू टनल बालीपारा-चारद्वार-तवांग मार्ग पर स्थित अत्यधिक कोहरे वाले नेचिफू दर्रे को बायपास करती है। यह टनल न केवल सुरक्षित, तीव्र और बारहमासी आवागमन सुनिश्चित करती है, बल्कि स्थानीय संपर्क और रणनीतिक सैन्य लॉजिस्टिक्स को भी बेहतर बनाती है।

अरुणाचल प्रदेश (तवांग क्षेत्र): 13,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित सेला टनल, अत्यधिक ऊंचाई वाले सेला दर्रे को बायपास करती है। यह सुरंग न केवल नागरिकों के लिए, बल्कि सैन्य आवाजाही के लिए भी तवांग तक निर्बाध और बारहमासी पहुंच सुनिश्चित करती है

लद्दाख: दारबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी मार्ग पर स्थित 920 मीटर लंबी श्योक टनल, अत्यधिक चुनौतीपूर्ण और दुर्गम क्षेत्रों में भी पूरे वर्ष विश्वसनीयता के साथ पहुंच सुनिश्चित करती है।

वर्ष 2025 में, सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) ने भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में सामरिक सड़कों, पुलों और सुरंगों के नेटवर्क का निरंतर विस्तार किया। इस पहल ने रक्षा और नागरिक आवाजाही के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बारहमासी पहुंच को सुदृढ़ किया है।

 

एयरफील्ड्स (हवाई पट्टियां)  

पश्चिम बंगाल: 12 सितंबर 2023 को, रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह द्वारा राष्ट्र को समर्पित 90 बीआरओ इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के तहत, बागडोगरा और बैरकपुर एयरफील्ड्स (हवाई पट्टियों) का पुनर्निर्माण किया गया। ₹500 करोड़ से अधिक की लागत वाले इन कार्यों का मुख्य उद्देश्य भारतीय वायु सेना की ऑपरेशनल तैयारियों को मजबूत करना, नागरिक संपर्क को बढ़ावा देना और पूर्वी क्षेत्र में सामरिक क्षमता का विस्तार करना है।

 

 

 

बीआरओ : आपदा प्रबंधन और मानवीय राहत का अग्रदूत

सड़क निर्माण से कहीं आगे बढ़कर, सीमा सड़क संगठन अक्सर प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध भारत की पहली डिफेंस लाइन के रूप में कार्य करता है। हिमालय की दुर्गम चोटियों से लेकर उत्तर-पूर्व के घने जंगलों और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह तक, आपदा आने पर इसकी टीमें सबसे पहले पहुँचकर जीवन रेखाओं (सड़कों और पुलों) को बहाल करती हैं।

रोड ओपनिंग पार्टी, हिमस्खलन राहत दल और ब्रिज यूनिट—बादल फटने, अचानक आई बाढ़ या भूकंप के बाद भूस्खलन को साफ करने, बह गए पुलों के पुनर्निर्माण और पर्वतीय दर्रों को फिर से खोलने के लिए चौबीसों घंटे काम करती हैं। मानवीय सहायता और आपदा राहत (एचएडीआर) को अपने परिचालन सिद्धांत में एकीकृत करके, बीआरओ रक्षा और नागरिक सुरक्षा के दोहरे उत्तरदायित्व का निर्वहन करता है। यह संगठन न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा को अभेद्य बनाता है, बल्कि आपदाओं के विरुद्ध नागरिक सुदृढ़ता को भी सुनिश्चित करता है

 


सीमा सड़क संगठन : त्वरित और प्रभावी राहत का आधार

 

 

  1. सड़क सफाई और सर्दियों के मौसम में बर्फबारी के दौरान प्रबंधन

हर शीतकाल में पहाड़ अपने द्वार बंद कर लेते हैं, और हर बसंत में सीमा सड़क संगठन उन्हें खुलने पर विवश कर देता है। जोजिला से लेकर रोहतांग और सेला दर्रे तक, बीआरओ की टीमें बर्फ की ऊंची दीवारों को चीरकर सैनिकों, राहत दलों और आम नागरिकों के लिए जीवन रेखा बहाल करती हैं। वर्ष 2023 में बीआरओ ने उस वक्त नया इतिहास रचा, जब जोजिला दर्रे को रिकॉर्ड 16 मार्च को ही खोल दिया गया—मार्ग बंद होने के मात्र 68 दिनों के भीतर, जो अब तक का सबसे कम समय है। फिर से खुला हर दर्रा महज एक सड़क नहीं, बल्कि सुरक्षा, सप्लाई और जीवन रक्षा का सीधा मार्ग है।

  1. Flowchart: Off-page Connector: Class 70 Bailey bridges and modular spans are prefabricated steel bridges constructed by BRO, designed to carry very heavy military vehicles and equipment.बेली/मॉड्यूलर ब्रिज और कॉजवे

जब विनाशकारी बाढ़ संपर्क मार्ग बहा ले जाती है, तब सीमा सड़क संगठन नई उम्मीदों का सेतु बनाता है। मात्र चंद दिनों के भीतर तैयार होने वाले क्लास-70 बेली ब्रिज और मॉड्यूलर स्पैन, कटे हुए गाँवों को फिर से मदद और उम्मीदों से जोड़ देते हैं। वर्ष 2021 में, जब ऋषिगंगा की बाढ़ ने रैणी के पुल को नेस्तनाबूद कर दिया था, तब बीआरओ ने मात्र 26 दिनों में 200 फीट लंबा बेली ब्रिज बनाकर संपर्क बहाल किया। इस पुल को ब्रिज ऑफ़ कम्पैशन (करुणा का सेतु) नाम दिया गया, जो पूरी तरह सार्थक है। उत्तराखंड से लेकर असम तक, ये तात्कालिक पुल केवल सामान

ढोने के मार्ग ही नहीं खोलते, बल्कि जीवन रक्षा और जीने की आस को एक किनारे से दूसरे किनारे तक पहुँचाते हैं।

  1. आपातकालीन हवाई लॉजिस्टिक्स

उन्नत लैंडिंग ग्राउंड्स और हेलीपैड्स तक पहुंच बहाल करके, बीआरओ भारतीय वायुसेना को राहत सामग्री पहुँचाने और घायलों को सुरक्षित बाहर निकालने में सक्षम बनाता है। पूर्वोत्तर के पासीघाट, अलोंग और मेचुका से लेकर बाढ़ प्रभावित उत्तराखंड के हर्षिल और गौचर तक—जब-जब जमीन टूटी और रास्ते बंद हुए, बीआरओ ने आसमान के रास्ते खुले रखे ताकि मदद पहुँचती रहे।

  1. अंतर-एजेंसी समन्वय

 सीमा सड़क संगठन भारतीय सेना, वायुसेना, एनडीआरएफ और विभिन्न राज्य एजेंसियों के साथ मिलकर एक अभेद्य टीम के रूप में कार्य करता है। इसकी रोड ओपनिंग पार्टी एक अग्रिम दस्ते की भूमिका निभाती है, जो मलबे और बाधाओं को हटाकर सैनिकों, राहत दलों और आवश्यक सप्लाई के लिए रास्ता साफ करती है।

क्षेत्रीय और पड़ोसी संपर्क

 

सीमा सड़क संगठन ने महत्वपूर्ण विदेशी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के सफल कार्यान्वयन के माध्यम से भारत की क्षेत्रीय पहुँच को मजबूत करने में एक निर्णायक भूमिका निभाई है।

भूटान: बीआरओ का सबसे पुराना और स्थायी मिशन, प्रोजेक्ट दंतक, जिसे 1961 में लॉन्च किया गया था, ने आधुनिक भूटान की कनेक्टिविटी को एक नया आकार दिया है। प्रोजेक्ट दांतक ने न केवल सड़कों और पुलों का निर्माण किया है, बल्कि पारो और योनफुला जैसे प्रमुख हवाई अड्डों का विकास भी किया है। इसके अलावा, इसने दूरसंचार नेटवर्क और हाइड्रोपावर इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में सहयोग देकर भूटान के सामाजिक-आर्थिक विकास में सीधा योगदान दिया है, जो भारत-भूटान की गहरी साझेदारी का प्रतीक है।

म्यांमार / दक्षिण-पूर्व एशिया: बीआरओ ने भारत-म्यांमार मैत्री सड़क जैसी परियोजनाओं के माध्यम से क्षेत्रीय एकीकरण को आगे बढ़ाया है। 2001 में उद्घाटित यह 160 किमी लंबी सड़क भारत के मोरेह को म्यांमार के तामू  और कालेवा से जोड़ती है, जो दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भारत के जुड़ाव का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।

अफगानिस्तान: बीआरओ ने 218 किमी लंबे देलाराम-ज़ारंज राजमार्ग (रूट 606) का निर्माण किया, जिसने अफगानिस्तान को ईरान और चाबहार बंदरगाह तक सीधी पहुँच प्रदान की। इस परियोजना ने न केवल क्षेत्रीय व्यापार के विकल्पों को विस्तार दिया, बल्कि विकास-आधारित कूटनीति के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को भी विश्व पटल पर प्रदर्शित किया।

ताजिकिस्तान: बीआरओ ने फारखोर व आयनी वायुसेना अड्डे का रणनीतिक पुनर्निर्माण किया, जिसमें रनवे का विस्तार, एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम, हैंगर और नेविगेशन संबंधी अपग्रेड शामिल थे। इन परियोजनाओं ने न केवल भारत की रणनीतिक पहुँच को मजबूत किया, बल्कि एक भरोसेमंद क्षेत्रीय भागीदार के रूप में भारत की भूमिका को भी और सुदृढ़ बनाया।

 

इन परियोजनाओं ने न केवल भारत की रणनीतिक पहुँच को मजबूती प्रदान की है, बल्कि क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और सहयोग के क्षेत्र में एक भरोसेमंद भागीदार के रूप में भारत की भूमिका को भी और अधिक सुदृढ़ किया है।

 

बीआरओ: भविष्य की ओर

 

बीआरओ के पर्सपेक्टिव प्लान के तहत, सीमावर्ती क्षेत्रों में लगभग 27,300 किलोमीटर लंबी 470 सड़कों के निर्माण की योजना है। इसी कड़ी में, लगभग 717 किलोमीटर लंबी ट्रांस-कश्मीर कनेक्टिविटी परियोजना को एनएचडीएल (पेव्ड शोल्डर) मानकों के विकास के लिए मंजूरी दे दी गई है। पुंछ से सोनमर्ग तक जाने वाला यह मार्ग प्रमुख पर्वतीय दर्रों के माध्यम से रणनीतिक सड़क इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करेगा। इस मार्ग पर साधना पास, पी-गली, जेड-गली और राजदान पास पर अत्याधुनिक सुरंगों की योजना बनाई गई है, ताकि बारहमासी संपर्क सुनिश्चित किया जा सके। रक्षा मंत्रालय द्वारा वित्तपोषित यह परियोजना बीआरओ द्वारा चरणबद्ध तरीके से पूरी की जाएगी। पूरा होने पर, यह अग्रिम संपर्क को बढ़ावा देने, अंतर-क्षेत्रीय आवाजाही में सुधार और इंटर-वैली लिंकेज को सशक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। कुल मिलाकर, यह परियोजना सैन्य तैयारियों और दीर्घकालिक क्षेत्रीय एकीकरण को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएगा।

 

निष्कर्ष

 

छह दशकों से अधिक समय से, सीमा सड़क संगठन मजबूती, नवाचार और राष्ट्र निर्माण का एक बेमिसाल उदाहरण रहा है। लद्दाख के बर्फीले दर्रों से लेकर पूर्वोत्तर के घने जंगलों तक, दुनिया के सबसे दुर्गम क्षेत्रों में कार्य करते हुए, बीआरओ ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करता है जो भारत की रक्षा तैयारियों को सशक्त बनाने के साथ-साथ दूरस्थ सीमावर्ती क्षेत्रों के जीवन को भी बदल रहा है।

भविष्य की ओर बढ़ते हुए, बीआरओ केवल सड़कों का ही नहीं, बल्कि विश्वास और संपर्क का निर्माण जारी रखेगा। यह राष्ट्र की सीमाओं को उसके हृदय स्थल से जोड़ते हुए सुरक्षा, आवाजाही और समृद्धि को अंतिम छोर तक पहुँचाना सुनिश्चित करेगा। अपने आदर्श वाक्य के अनुरूप, बीआरओ हमेशा या तो रास्ता ढूंढ लेगा या नया रास्ता बना देगा

 

संदर्भ

 

विदेश मंत्रालय

 

पीआईबी प्रेस विज्ञप्ति

 

डीडी न्यूज

 


सीमा सड़क संगठन


राज्य सरकार

अन्य प्रकाशन

  • OONCHI SADAKEN, Vol XXXIII, May 2024, Published at: H Q DGBR

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पीआईबी रिसर्च

 

पीके/केसी/डीवी

(Explainer ID: 156987) आगंतुक पटल : 31
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