Farmer's Welfare
जूट: भारत का सुनहरा रेशा
रचनात्मक नीतिगत उपायों के जरिए आजीविका को सुदृढ़ करना
Posted On:
07 SEP 2026 6:12PM
भारत दुनिया का कच्चे जूट का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। जूट से लाखों लोगों की आजीविका में मदद मिलती है और टिकाऊ औद्योगिक विकास को बढ़ावा भी हासिल होता है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान, भारत ने कच्चे जूट के 76 लाख गांठों का उत्पादन किया और 12.80 लाख एमटी जूट के सामान तैयार किए। इसी वर्ष, भारत ने 225.11 करोड़ रुपये मूल्य के 22,700 एमटी कच्चे जूट और 3,155.27 करोड़ रुपये मूल्य के 1,71,300 एमटी जूट के सामानों का निर्यात किया। सरकार के विभिन्न उपायों से किसानों की आय बढ़ी है, मूल्य श्रृंखला का आधुनिकीकरण हुआ है और उत्पादों में विविधता को प्रोत्साहन मिला है। जूट की जैव-अपघटनीय प्रकृति और इसके बढ़ते उपयोग ने इसे सिंथेटिक सामग्रियों का एक महत्वपूर्ण विकल्प बनाया है। नवाचार, बाजार का विस्तार और डिजिटल तकनीक भारत के इस ‘सुनहरे रेशे’ को वैश्विक स्तर पर एक प्रतिस्पर्धी और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार उद्योग के रूप में स्थापित कर रहे हैं।
भारत का ‘सुनहरा रेशा’ उद्योग
जूट भारत के सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक रेशों में से एक है। कई तरह के उपयोगों और पर्यावरण के अनुकूल होने के कारण इसे व्यापक महत्व दिया जाता है। व्यापार एवं उद्योग की दृष्टि से, जूट और मेस्ता को एक जैसे उपयोग के कारण सामूहिक रूप से ‘कच्चा जूट’ के तौर पर वर्गीकृत किया जाता है। मेस्ता तने के रेशे (बास्ट फाइबर) वाली एक फसल है। इसे जूट के सस्ते विकल्प के तौर पर उगाया जाता है। खासकर, कम वर्षा वाले कृषि-जलवायु क्षेत्रों में। अपने खास सुनहरे रंग और रेशम जैसी चमक के कारण, जूट को आमतौर पर “सुनहरा रेशा” कहा जाता है।

भारत दुनिया का कच्चे जूट का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। खाद्यान्नों के उत्पादन के तीसरे अग्रिम अनुमान (2025-26) के अनुसार, जूट और मेस्ता का उत्पादन 2024-25 में 88.02 लाख गांठों से बढ़कर 2025-26 में 94.03 लाख गांठें हो गया है। भारत दुनिया में जूट के सामानों का भी सबसे बड़ा उत्पादक देश है और जुलाई 2026 तक, अनुमानित वैश्विक उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी लगभग 75 प्रतिशत की है। भारत के पूर्वी क्षेत्र, खासकर पश्चिम बंगाल, में जूट उद्योग का एक बड़ा औद्योगिक आधार है। यह उद्योग संगठित मिलों और विविध जूट इकाइयों में लगभग 3.70 लाख श्रमिकों को प्रत्यक्ष रोजगार देता है। यह जूट की खेती में जुटे लगभग 40 लाख किसान परिवारों की आजीविका का साधन भी है। दिसंबर 2025 तक, भारत में 120 कंपोजिट जूट मिलें हैं और अकेले पश्चिम बंगाल में इनमें से 89 मिलें स्थित हैं, जो सभी राज्यों की तुलना में सबसे अधिक है।
जूट के सामान के उत्पादन में भारत पूरी तरह से आत्मनिर्भर बना हुआ है और देश में होने वाला उत्पादन राष्ट्रीय मांग को समुचित तरीके से पूरा करता है। वित्त वर्ष 2025-26 में जूट के सामान की घरेलू खपत 12.05 लाख एमटी थी। यह जूट के सामान के कुल उत्पादन 12.80 लाख एमटी का 94 प्रतिशत है। इसके अलावा, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने 3,155.27 करोड़ रुपये मूल्य के 1.71 लाख एमटी जूट के सामान का निर्यात किया। कच्चे जूट की बात करें तो, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने 225.11 करोड़ रुपये मूल्य के 22,700 एमटी कच्चे जूट का निर्यात किया।
जूट के सामानों के उत्पादन में भारत पूरी तरह से आत्मनिर्भर बना हुआ है और देश में होने वाला उत्पादन राष्ट्रीय मांग को पर्याप्त रूप से पूरा करता है। वित्त वर्ष 2025-26 में, जूट के सामानों की घरेलू खपत 12.05 लाख एमटी थी। यह जूट के सामानों के कुल उत्पादन 12.80 लाख एमटी का 94 प्रतिशत है। इसके अलावा, वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान, भारत ने 3,155.27 करोड़ रुपये मूल्य के 1.71 लाख एमटी जूट के सामानों का निर्यात किया। कच्चे जूट की बात करें तो, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने 225.11 करोड़ रुपये मूल्य के 22,700 एमटी कच्चे जूट का निर्यात किया।
भारत में जूट उत्पादन का इतिहास
भारत में जूट का इतिहास तीसरी सदी ईसा पूर्व से शुरू होता है। हालांकि, यह एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक वस्तु के रूप में इसका प्रचलन ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान रणनीतिक सैन्य उपयोग की दृष्टि से अहम होने के कारण हुआ। ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल में कई जूट मिलें स्थापित कीं, जिससे यह क्षेत्र जूट की खेती और उसके प्रसंस्करण का केंद्र बन गया।
वर्ष 1947 में भारत की आजादी और उसके बाद हुए देश के बंटवारे ने बंगाल की जूट की समन्वित अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया। जूट उगाने वाले लगभग 80 प्रतिशत इलाके पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) का हिस्सा बन गए। लेकिन अधिकांश जूट मिलें भारत में ही रह गईं, जिससे इन मिलों में प्रसंस्करण के लिए कच्चे माल की भारी कमी हो गई। इस असंतुलन को दूर करने हेतु, सरकार ने सितंबर 1949 में “अधिक जूट उगाओ” अभियान शुरू किया। किसानों को धान की खेती छोड़कर जूट की खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। परिणामस्वरूप, भारत में कच्चे जूट का उत्पादन 6.7 लाख टन (1951-52) से बढ़कर 14.56 लाख टन (1961-62) हो गया। यानी दोगुने से भी अधिक। जूट पैकेजिंग अधिनियम, 1987 ने आवश्यक सामानों की पैकेजिंग के लिए जूट की बोरियों के उपयोग को अनिवार्य करके इस सेक्टर को और मजबूत किया। इस कदम से भारत के जूट के किसानों के लिए एक स्थिर बाजार सुनिश्चित हुआ। समय के साथ, जूट एक रणनीतिक हरित रेशे के रूप में उभरा और इसने ग्रामीण आजीविका एवं पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ औद्योगिक विकास में योगदान दिया।
वर्तमान में, देश में कच्चे जूट की खेती में पश्चिम बंगाल की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। इसके बाद बिहार, असम, ओडिशा और झारखंड का स्थान है। जूट की बुवाई आम तौर पर मार्च-अप्रैल में होती है और 100-110 दिनों में इसकी कटाई कर ली जाती है। यह गर्म एवं नमी वाले मौसम में अच्छी तरह पनपता है और फसल के बढ़ने के दौरान इसे 700-1,500 मिलीमीटर वर्षा की जरूरत होती है। इन कृषि-जलवायु संबंधी आवश्यकताओं को देखते हुए, इसकी खेती मुख्य रूप से पूर्वी एवं पूर्वोत्तर भारत में होती है और यह अधिकांशतः वर्षा पर निर्भर होती है। इस फसल को मुख्य रूप से छोटे और सीमांत किसान उगाते हैं।
जूट एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक रेशा क्यों है?
जूट जैविक रूप से अपघटनीय (बायोडिग्रेडेबल) और पुनर्चक्रित होने वाला (रीसायकलेबल) एक ऐसा प्राकृतिक रेशा है, जो तेजी से उगता है, सस्ता है और आसानी से उपलब्ध है। यह मजबूत, टिकाऊ, हवादार और बहुमुखी उपयोग वाला रेशा है। इसका सदुपयोग पैकेजिंग, निर्माण कार्य, खेती और औद्योगिक वस्त्र (इंडस्ट्रियल टेक्सटाइल) में किया जाता है। गर्मी एवं आवाज को रोकने की क्षमता, नमी सोखने की अधिक क्षमता और कम स्थिरता (स्टैटिक) पैदा करने समेत जूट में उपयोग की दृष्टि से कई अच्छे गुण भी होते हैं। यह प्राकृतिक और सिंथेटिक, दोनों प्रकार के रेशों के साथ अच्छी तरह घुलमिल जाता है। इससे कई तरह के मूल्य वर्धित और वस्त्र संबंधी उत्पाद बनाना आसान हो जाता है।
क्या जूट को भोजन के तौर पर खाया जा सकता है?
अफ्रीका, मध्य पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे क्षेत्रों में जूट की पत्तियों को लंबे समय से एक सब्जी के तौर पर खाया जाता रहा है। जापान में, जूट की पत्तियों को स्वास्थ्यवर्धक भोजन के तौर पर व्यापक पहचान और लोकप्रियता मिली है। पोषण के दृष्टि से देखें, तो जूट की पत्तियों में विटामिन, कैरोटीनॉयड, कैल्शियम, पोटैशियम और फाइबर आहार भरपूर मात्रा में होते हैं, जो इन्हें सेहत के लिए फायदेमंद भोजन का एक अहम स्रोत बनाते हैं। जूट की पत्तियों से एंटी-ऑक्सीडेंट हर्बल पेय और स्वास्थ्य संबंधी देखभाल से जुड़े उत्पाद (हेल्थ केयर प्रोडक्ट) बनाने के लिए कारगर तकनीकें भी विकसित की गई हैं।
जूट जियोटेक्सटाइल: टिकाऊ बुनियादी ढांचे का कपड़ा
जूट जियोटेक्सटाइल (जेजीटी) जूट से बना एक ऐसा बहु-उपयोगी और विविध उत्पाद है, जो तकनीकी वस्त्र की श्रेणी में आता है। इसका उपयोग सिविल इंजीनियरिंग, मिट्टी के कटाव को रोकने, सड़क पर फुटपाथ बनाने और नदी के किनारों की सुरक्षा जैसे विवि क्षेत्रों में किया जा सकता है। जेजीटी को जूट के रेशों से खास शोधन एवं बुनाई की प्रक्रियाओं के जरिए बनाया जा सकता है।
अपनी काम करने की क्षमता, पर्यावरण के अनुकूल होने, अच्छे तकनीकी-भौतिक गुणों और किफायती कीमत के कारण इसे तेजी से अपनाया जा रहा है। पर्यावरण के दृष्टि से, जेजीटी पूर्ण रूप से जैव-अपघटनीय (बायोडिग्रेडेबल) है। इससे मिट्टी की बनावट और उर्वरता बेहतर होती है। इसके अलावा, जेजीटी को दुनिया भर में खराब हो चुकी भूमि पर मिट्टी को स्थिर करने, कटाव को रोकने और पर्यावरण को बहाल करने का एक असरदार प्राकृतिक समाधान माना जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह मिट्टी का तापमान कम रखकर और सतह में कम से कम छेड़छाड़ करके सूक्ष्म-पर्यावरण को नियंत्रित करने में मदद करता है। इसलिए, यह बीजों के अंकुरण और पौधों के शुरुआती विकास में सहायक होता है।
जूट जियोटेक्सटाइल के उपयोग
जूट जियोटेक्सटाइल को सिविल इंजीनियरिंग, मिट्टी के संरक्षण और बुनियादी ढांचे के विकास में अलग-अलग कामों के लिए एक असरदार प्राकृतिक सामग्री के तौर पर पहचान मिली है:
- इसका उपयोग बड़े पैमाने पर मिट्टी के बांधों, पहाड़ी कटाई वाली जगहों, नदी के किनारों, नहरों और बारिश का पानी जमा करने वाली संरचनाओं में ढलान की सुरक्षा के लिए किया जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इसकी शुरुआती तन्यता संबंधी सामर्थ्य (टेंसाइल स्ट्रेंथ) अधिक होती है और इसकी सतह का खुरदरापन मिट्टी को स्थिर करने एवं कटाव को कम करने में मदद करता है।
- सड़क और माल ढुलाई वाले मार्गों के निर्माण के साथ-साथ रेलवे ट्रैक के निर्माण में, जेजीटी भार वितरण और नियंत्रण में सुधार करता है। इससे रखरखाव की आवश्यकताएं और जीवनचक्र की लागत कम हो जाती हैं।
- खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में गुप्त जल निकासी प्रणालियों में इसका उपयोग मिट्टी के खिसकने को रोकते हुए पानी के नियमित प्रवाह को संभव बनाता है। जेजीटी का उपयोग पूर्वनिर्मित ऊर्ध्वाधर नालियों के जरिए नरम मिट्टी को स्थिर करने, संघनन को तेज करने और भार वहन क्षमता को बढ़ाने के लिए भी किया जाता है।
हाल के वर्षों में, राष्ट्रीय जूट बोर्ड इंजीनियरिंग की एक सामग्री के तौर पर जूट जियोटेक्सटाइल को विकसित करने और बढ़ावा देने के कार्य में सक्रिय रूप से जुटा हुआ है। बोर्ड अंतिम उपयोगकर्ताओं को तकनीकी सहायता देता है, जिसमें डिजाइन संबंधी जरूरतों, खरीद की प्रक्रियाओं, जांच के तरीकों और तैनाती के तरीकों के बारे में मार्गदर्शन शामिल है।
भारतीय दल ने राष्ट्रमंडल खेल 2026 में जूट के कपड़े प्रदर्शित किए
वर्ष 2026 के राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय एथलीटों और टीम के सदस्यों ने जूट-विस्कोस के मिश्रण से बने कपड़े पहने थे। इन कपड़ों को राष्ट्रीय जूट बोर्ड ने तैयार किया है। इन कपड़ों को नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी (निफ्ट), नई दिल्ली ने डिजाइन किया था। यह पहल शत-प्रतिशत बायोडिग्रेडेबल जूट-विस्कोस मिश्रित कपड़े की क्षमता को वस्त्र से संबंधित एक टिकाऊ और नवीन समाधान के तौर पर दर्शाती है। इस पहल ने भारतीय जूट उद्योग को वैश्विक पहचान दिलाई है और साथ ही भारतीय निर्माताओं की कारीगरी को भी रेखांकित किया है।
खेत से बाजार तक: जूट उद्योग के हित में सरकारी उपाय
सरकार ने भारत के जूट क्षेत्र को मजबूत करने हेतु निरंतर कई नीतिगत उपाय किए हैं। इनमें कच्चे जूट के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोतरी शामिल है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए कच्चे जूट का एमएसपी 5,925 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है। इससे पूरे भारत में उत्पादन की औसत लागत पर 61.8 प्रतिशत रिटर्न मिलना सुनिश्चित होगा। यह वित्त वर्ष 2014-15 में कच्चे जूट के एमएसपी (2,400 रुपये प्रति क्विंटल) की तुलना में लगभग 147 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। जूट किसानों को दी जाने वाली एमएसपी की रकम में भी समय के साथ बढ़ोतरी हुई है। वित्त वर्ष 2004-05 से वित्त वर्ष 2013-14 की अवधि के दौरान, भुगतान की गई रकम 441 करोड़ रुपये थी। वित्त वर्ष 2014-15 से वित्त वर्ष 2025-26 के बीच यह बढ़कर 1,342 करोड़ रुपये हो गई है।

सरकार ने ‘जूट पैकेजिंग सामग्री (सामानों की पैकिंग में अनिवार्य उपयोग) अधिनियम’ भी लागू किया है। इसमें उन सामानों और उस सीमा के बारे में बताया गया है, जिनके लिए जूट पैकेजिंग सामग्री का उपयोग अनिवार्य है। सरकार ने शत-प्रतिशत अनाज और 20 प्रतिशत चीनी की पैकिंग जूट के बोरों में करना अनिवार्य कर दिया है।
भारतीय पटसन निगम
भारतीय पटसन निगम लिमिटेड (जेसीआई) कच्चे जूट के लिए एमएसपी नीति को लागू करने वाली एकमात्र नोडल एजेंसी है। जब बाजार में कीमतें एमएसपी से नीचे चली जाती हैं, तो यह सीधे किसानों से जूट खरीदकर उनके हितों की रक्षा करती है। जेसीआई के विभागीय क्रय केन्द्र (डीपीसी), जो ग्रामीण इलाकों में स्थित हैं, सीधे किसानों से कच्चा जूट खरीदते हैं। जेसीआई के पश्चिम बंगाल, असम, बिहार, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और त्रिपुरा राज्यों में लगभग 110 डीपीसी हैं।

सरकार ने राष्ट्रीय जूट विकास कार्यक्रम के तहत जूट की खेती और प्रसंस्करण को बढ़ावा देने के अपने प्रयासों को एकीकृत किया है।
राष्ट्रीय जूट विकास कार्यक्रम (एनजेडीपी)
राष्ट्रीय जूट विकास कार्यक्रम (एनजेडीपी) जूट क्षेत्र के विकास एवं प्रोत्साहन की एक मुख्य योजना है। इसे राष्ट्रीय जूट बोर्ड द्वारा वित्त वर्ष 2021–22 से 2025–26 के दौरान 485.58 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ लागू किया जा रहा है। यह खेती की उत्पादकता और किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ दो मुख्य हिस्सों – जूट-आईकेयर और जूट विविधीकरण योजना - के जरिए विविधता लाने पर भी ध्यान देता है। यह कार्यक्रम प्लास्टिक के विकल्प के तौर पर जूट को बढ़ावा देने हेतु सेमिनार, प्रदर्शनी और जागरूकता अभियान में भी मदद करता है।
राष्ट्रीय जूट बोर्ड (एनजेबी)
राष्ट्रीय जूट बोर्ड (एनजेबी) जूट क्षेत्र की संपूर्ण मूल्य श्रृंखला में इसके विकास, प्रोत्साहन और विविधीकरण के नोडल एजेंसी के तौर पर काम करता है। इसके मुख्य कार्यों में शामिल हैं:

- खेती और रेशे की गुणवत्ता में सुधार करना,
- उत्पादकता और मानकीकरण को बढ़ाना,
- घरेलू और निर्यात बाजारों को बढ़ावा देना,
- अनुसंधान और मूल्य-वर्धित उत्पादों की विविधता को समर्थन देना, और
- क्षमता निर्माण और बाजार विकास के जरिए एमएसएमई और कारीगरों का सशक्तिकरण।
जूट-आईकेयर (बेहतर खेती और उन्नत रेटिंग प्रक्रिया) योजना
वित्त वर्ष 2015-16 में शुरू की गई जूट-आईकेयर योजना का उद्देश्य जूट की पैदावार और रेशे की गुणवत्ता को बढ़ाना है। इसे वैज्ञानिक खेती, मशीनीकरण और गलाने की प्रक्रिया (रेटिंग) की बेहतर तकनीकों के जरिए हासिल किया जा रहा है। यह योजना सब्सिडी वाले प्रमाणित बीज, प्रक्षेत्र प्रदर्शनों (फील्ड डेमोंस्ट्रेशन) और मशीनी तरीकों से छोटे एवं सीमांत किसानों की मदद करती है। इसे सेंट्रल रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर जूट एंड एलाइड फाइबर्स (सीआरआईजेएएफ) और भारतीय पटसन निगम के साथ मिलकर लागू किया जा रहा है। यह योजना प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के साथ तालमेल बिठाकर गलाने की प्रक्रिया से संबंधित तालाब (रेटिंग पोंड) बनाने में भी मदद करती है।
जूट विविधीकरण योजना
जूट विविधीकरण योजना में जूट के प्रसंस्करण, विपणन और बिक्री में मदद करने वाली योजनाएं शामिल हैं।
जूट के प्रसंस्करण में मदद हेतु पहल: जूट कच्चा माल बैंक (जेआरएमबी)
जूट कच्चा माल बैंक, असंगठित क्षेत्र और छोटी उत्पादन इकाइयों के लिए जूट से बने अलग-अलग तरह के उत्पाद बनाने हेतु कच्चा जूट उपलब्ध कराता है। यह काम मिल-गेट की कीमत और वास्तविक परिवहन लागत को मिलाकर किफायती दर पर कच्चे जूट की आपूर्ति करके किया जाता है। यह योजना जूट से अलग-अलग प्रकार के उत्पाद बनाने वाले कारीगरों, महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) और एमएसएमई को गुणवत्तापूर्ण कच्चा माल निरंतर उपलब्ध कराकर मदद करती है। इससे ग्रामीण इलाकों में लोगों की आजीविका को भी बढ़ावा मिलता है।
उत्पादन, विपणन और बिक्री हेतु उपाय
जूट विविधीकरण योजना विभिन्न उप-योजनाओं के जरिए मूल्य वर्धन, आधुनिकीकरण और बाजार के विस्तार को बढ़ावा देती है:
- संयंत्र और मशीनरी खरीदने हेतु पूंजीगत सब्सिडी: जूट मिलों और जेडीपी बनाने वाली एमएसएमई इकाइयों को मशीनरी की लागत पर 30 प्रतिशत की सब्सिडी मिलती है।
- जूट संसाधन-सह-उत्पादन केन्द्र: कारीगरों, महिलाओं के स्वयं-सहायता समूहों (एसएचजी), उद्यमियों, स्वयंसेवी संगठनों (एनजीओ), सहकारी समितियों के सदस्यों आदि के लिए क्लस्टर-आधारित प्रशिक्षण और उत्पादन केंद्र।
- जूट की खुदरा दुकानें: जेडीपी की खुदरा और शोरूम बिक्री हेतु 25 प्रतिशत की बिक्री संबंधी सहायता (प्रति इकाई 9 लाख रुपये तक) के साथ मदद करना।
- जेडीपी के निर्यात हेतु उत्पादन आधारित प्रोत्साहन: यह निर्यातकों को जूट से बने अलग-अलग तरह के उत्पादों के निर्यात में उपयोग होने वाले कच्चे माल और निर्यात से होने वाली मूल्य प्राप्ति के आधार पर प्रोत्साहन प्रदान करता है।
ब्रांडिंग, गुणवत्ता संबंधी आश्वासन और बाजार संवर्धन हेतु उपाय
‘जूट मार्क इंडिया’ प्रतीक चिन्ह
‘जूट मार्क इंडिया’ प्रतीक चिन्ह जूट और जूट-मिश्रित उत्पादों की प्रामाणिकता, गुणवत्ता संबंधी आश्वासन और टिकाऊपन को दर्शाता है। एक व्यवस्थित ढांचे के भीतर जूट की खास तरह से बनी हुई गांठें प्राकृतिक रेशे की मजबूती, कारीगरी और संपूर्ण मूल्य श्रृंखला में मानकीकरण का प्रतीक हैं। ‘जूट मार्क इंडिया’ प्रतीक चिन्ह गुणवत्ता संबंधी मानकों के पालन को प्रमाणित करता है और मिश्रित उत्पादों में जूट की मात्रा की पुष्टि करता है। इससे ग्राहकों का भरोसा बढ़ता है और ब्रांड की पहचान मजबूत होती है।

घरेलू विपणन संबंधी पहल
सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान प्रमुख शहरों में इंडिया इंटरनेशनल ट्रेड फेयर, सूरजकुंड मेला और भारत टेक्स जैसे 57 से अधिक क्षेत्रीय जूट मेले आयोजित किए।
जूट हथकरघा उद्यम: स्वयं सहायता समूह से निर्यात बाजारों तक
ब्रांडिंग, प्रदर्शनी के जरिए प्रचार और बाजार तक व्यवस्थित पहुंच ने जूट कंपनियों के लिए जमीनी स्तर पर अच्छे नतीजे दिए हैं। ऐसी ही कुछ कहानियां भारतीय ग्रामोत्थान संस्था, ऋषिकेश (उत्तराखंड); हेडन हॉल इंस्टीट्यूट, दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल); जूट आर्टिसन्स गिल्ड एसोसिएशन, लखनऊ (उत्तर प्रदेश) और रूरल ऑर्गनाइजेशन फॉर सोशल एक्शन, कटक (ओडिशा) की हैं। राष्ट्रीय जूट बोर्ड के विभिन्न कार्यक्रमों के तहत प्रशिक्षण लेने के बाद, इन संस्थाओं ने मार्गदर्शन (मेंटरिंग) और बाजार के साथ जुड़ाव (मार्केट लिंकेज) का लाभ उठाकर जूट हथकरघा के व्यवस्थित उत्पादन में कदम रखा। उन्होंने आईआईटीएफ, नई दिल्ली; टेक्स-ट्रेंड्स इंडिया, नई दिल्ली और गिफ्टटेक्स शो, मुंबई जैसे बड़े व्यापार मेलों में हिस्सा लेना शुरू किया। इससे उन्हें खरीदारों से सीधे बातचीत करने का मौका मिला, निर्यात के बड़े ऑर्डर मिले और उनकी विपणन कौशल बेहतर हुई। परिणामस्वरूप, उनके सदस्यों की व्यक्तिगत कमाई बढ़ी। साथ ही, उत्पादन क्षमता और सामाजिक पहचान में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ।
आपूर्ति श्रृंखला में डिजिटल और तकनीकी उपाय
जूट-स्मार्ट
वर्ष 2016 से, जूट की बोरियों (अनाज के लिए) की खरीद और आपूर्ति का पूरा काम जूट कमिश्नर का कार्यालय संभाल रहा है। इन कार्यों को आसान बनाने हेतु, जूट कमिश्नर के कार्यालय ने नवंबर 2016 में ‘जूट-स्मार्ट’ नाम का एक एंड-टू-एंड ई-गवर्नेंस सॉफ्टवेयर पोर्टल बनाया और उसे कार्यान्वित किया। अगस्त 2026 तक, इस पोर्टल के जरिए पंजाब, हरियाणा, ओडिशा, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, बिहार, आंध्र प्रदेश और एफसीआई जैसी 20 से अधिक राज्य खरीद एजेंसियों ने लगभग 1,00,000 करोड़ रुपये से अधिक कीमत की बी.टीविल जूट बैग की 303 लाख गांठें (हर गांठ में 500 बैग) खरीदी हैं।
वर्ष 2026 में, आपूर्ति श्रृंखला में अलग-अलग प्रक्रियाओं को डिजिटल बनाने हेतु ‘जूट-स्मार्ट’ को और बेहतर बनाया गया है। इसमें ट्रांसपोर्टर, कच्चे जूट के व्यापारी और निर्यातक जैसे विभिन्न हितधारकों को शामिल किया गया है। कच्चे जूट के व्यापारियों, निर्यातकों और जूट मिलों का पंजीकरण पूरी तरह से डिजिटल कर दिया गया है। नियमों का पालन आसान बनाने हेतु जरूरी रिटर्न दाखिल करने की प्रक्रिया भी पूरी तरह से ऑनलाइन कर दी गई है।
जूट फसल सूचना प्रणाली
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (एनआरएससी) के जरिए जूट फसल सूचना प्रणाली विकसित की है। इसे भारतीय पटसन निगम और राष्ट्रीय जूट बोर्ड के सहयोग से तैयार किया गया है। यह प्रणाली रिमोट सेंसिंग और फील्ड डेटा का उपयोग करके जूट की खेती की निगरानी करती है। इस पहल के अंग के रूप में, दो मुख्य टूल विकसित किए गए हैं:
- भुवन जंप: खेत में जूट की निगरानी हेतु एक मोबाइल ऐप, और
- पटसन (प्रोस्पेक्टिव असेसमेंट ऑफ जूट यूजिंग मोबाइल ऐप-बेस्ड फ़ील्ड ऑब्ज़र्वेशन्स): एक वेब-आधारित प्लेटफॉर्म है, जो अधिकारियों और हितधारकों को उपयुक्त निर्णय लेने में मदद करने हेतु लगभग वास्तविक समय में जूट संबंधी निगरानी और एनालिटिक्स प्रदान करता है।
बाजार का विकास एवं प्रचार संबंधी योजना
सरकार 'राष्टीय जूट विकास कार्यक्रम' के तहत बाजार के विकास एवं प्रचार संबंधी योजना लागू कर रही है। यह योजना जूट से बने अलग-अलग तरह के उत्पादों (जेडीपी) से जुड़े उद्यमियों/निर्यातको को घरेलू एवं निर्यात बाजारों में इन उत्पादों के प्रचार तथा बिक्री में मदद करती है।
श्रमिक कल्याण योजना (छात्रवृत्ति योजना)
राष्ट्रीय जूट बोर्ड अधिनियम, 2008 का उद्देश्य “जूट उद्योग में कार्यरत श्रमिकों के लिए कामकाज की बेहतर परिस्थितियां एवं सुविधाएं सुनिश्चित करना तथा उनके लिए सुविधाओं एवं प्रोत्साहन में सुधार करना” है। इसी के अनुरूप और श्रमिकों के परिवारों को उनके बच्चों की शिक्षा में मदद प्रदान करने हेतु, शैक्षिक सहायता हेतु एक छात्रवृत्ति योजना की परिकल्पना की गई है।
जूट के साथ एक उज्जवल भविष्य
भारत का जूट क्षेत्र टिकाऊ एवं समावेशी विकास का एक मुख्य आधार बन गया है। यह संपूर्ण मूल्य श्रृंखला में लाखों किसानों, श्रमिकों, कारीगरों और उद्यमियों को सहारा देता है। नीतिगत समर्थन, नवाचार और बेहतर उत्पादन ने इस सेक्टर की प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत किया है। जूट ग्रामीण आजीविका, पर्यावरण की स्थिरता और औद्योगिक विकास में योगदान देता है। इसकी बढ़ती अहमियत अपेक्षाकृत अधिक पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ सामग्रियों की दिशा में आगे बढ़ने के भारत के संकल्प को दर्शाती है। निरंतर निवेश, नवाचार और सामुदायिक भागीदारी के जरिए ही इस क्षेत्र की पूरी क्षमता का लाभ उठाया जा सकेगा।
संदर्भ
राष्ट्रीय जूट बोर्ड
https://jute.com/jute/
https://jute.com/jute/njb/21
https://jute.dac.gov.in/pdf/StatusPaper.pdf
https://www.nitiforstates.gov.in/public-assets/Policy/policy_files/SNC504A000660.pdf
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय
https://www.ncfc.gov.in/change-jute-area.html
https://agriwelfare.gov.in/Documents/Time_Series_3rdAE_2025_26_En.pdf
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https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2122016
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2117470
https://www.ibef.org/exports/jute-industry-india
वस्त्र मंत्रालय
https://www.texmin.gov.in/static/uploads/2025/12/c865d599cae0c357c02d247a8a82d24e.pdf
https://www.texmin.gov.in/static/uploads/2026/05/5c48e80d2180ca3194b9e9b01340696d.pdf
https://sansad.in/getFile/loksabhaquestions/annex/182/AU2512_P6JQIu.pdf?source=pqals
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https://www.jutecorp.in/jute-i-care/
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय
https://en.vikaspedia.in/viewcontent/education/policies-and-schemes/scholarships/scholarship-scheme-for-children-2013-worker2019s-welfare?lgn=en
आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2232106®=3&lang=1
विश्व बैंक
https://thedocs.worldbank.org/en/doc/088011224509316922-0560011976/original/WorldBankGroupArchivesfolder30124862.pdf
जूट: भारत का सुनहरा रेशा
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पीआईबी शोध
पीके/केसी/आर
(Explainer ID: 159877)
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