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भारत का हरित पथ
संरक्षण से जलवायु कार्रवाई तक
प्रविष्टि तिथि:
07 APR 2026 4:51PM by PIB Delhi
परिचय
इक्कीसवीं सदी में विकास और पर्यावरण के बीच संबंध नीति-विमर्श के हाशिए से उठ कर राष्ट्रीय निर्णय प्रक्रिया के केंद्र में आ गया है। भारत के लिए जैव विविधता संरक्षण और जलवायु कार्रवाई के साथ तेज आर्थिक वृद्धि का संतुलन बनाना खास तौर से जटिल काम है।
भारत के हरित पथ की कुंजी यह समझ है कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास राष्ट्रीय प्रगति के एकदूसरे को मजबूत करने वाले स्तंभ हैं। इस दृष्टिकोण में जलवायु परिवर्तन की मौजूदा वास्तविकता को ध्यान में रखा गया है। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सभी क्षेत्रों में ज्यादा स्पष्ट होता जा रहा है। लिहाजा, देश ने इसे दूर का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की विकास की वास्तविकता के रूप में लिया है जिसके लिए तैयारी और सक्रिय शमन की जरूरत है। इसके अनुरूप भारत ने एक ऐसा व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनाया है जो जैव-विविधता संरक्षण को मजबूती देते हुए जलवायु अनुकूलता का निर्माण करता और संवहनीय विकास को बढ़ावा देता है।
भारत वैश्विक स्तर पर जलवायु न्याय, समानता और संवहनीय विकास के लिए एक विश्वसनीय आवाज के रूप में उभरा है। उसका दृष्टिकोण दिखाता है कि संरक्षण और जलवायु कार्रवाई, दोनों ही विकास को मजबूत करने वाले स्तंभ हैं। यह स्पष्ट करता है कि नागरिकों की समृद्धि और पृथ्वी का संरक्षण एक साथ आगे बढ़ सकते हैं।
जैव विविधता संरक्षण और पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली
भारत दुनिया के 17 अत्यधिक जैव विविधता वाले देशों में से एक है। दुनिया के कुल भू-भाग का केवल 2.4 प्रतिशत हिस्सा होने के बावजूद, यहाँ दुनिया भर में दर्ज की गई सभी प्रजातियों में से लगभग 8 प्रतिशत प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यह देश 96,000 से अधिक पशु प्रजातियों और 47,000 पादप प्रजातियों का घर है, जिसमें दुनिया की लगभग आधी जलीय पादप प्रजातियाँ भी शामिल हैं। यह असाधारण प्राकृतिक विरासत संरक्षण को केवल एक पर्यावरणीय चिंता ही नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय अनिवार्यता बना देती है।1
देश का जैव विविधता शासन ढांचा जैव विविधता अधिनियम, 2002 पर आधारित है। इसे राष्ट्रीय जैव विविधता कार्य योजना के तहत सहायता दी जाती है और यह जैव विविधता सम्मेलन (सीबीडी) के अनुरूप है। भारत 1992 में सीबीडी का हस्ताक्षरकर्ता बना था। 2
2024 में, कैली, (कोलंबिया) में 'जैव विविधता पर कन्वेंशन' (सीबीडी) के 'कॉप 16' में, भारत ने अपनी अपडेटेड 'राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति और कार्य योजना' (एनबीएसएपी) 2024–2030 का शुभारम्भ किया। इस रोडमैप का लक्ष्य 2030 तक जैव विविधता के नुकसान को रोकना और उसे ठीक करना है और इसका दीर्घकालिक दृष्टिकोण 2050 तक प्रकृति के साथ तालमेल बिठाना है। 23 मंत्रालयों और कई हितधारकों को शामिल करते हुए, 'पूरी सरकार और पूरे समाज' के दृष्टिकोण से तैयार की गई यह योजना 'कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता फ्रेमवर्क' के अनुरूप है। यह योजना पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली, प्रजातियों को सही स्थिति में लाने, आर्द्रभूमि और तटीय संरक्षण, तथा 'राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण' और 'जैव विविधता प्रबंधन समितियों' जैसी संस्थाओं के माध्यम से जैव विविधता के बेहतर शासन पर केंद्रित है। 3
कानूनी और नीतिगत ढाँचा
मुख्य पर्यावरण कानून
- वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 – जंगली जानवरों, पक्षियों और पौधों का संरक्षण; संरक्षित क्षेत्रों का निर्माण। 4
- जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण)अधिनियम, 1974 – जल प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण। 5
- वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 – वन भूमि को गैर-वन उपयोग के लिए मोड़ने का विनियमन। 6
- वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 – वायु प्रदूषण का नियंत्रण और उपशमन।7
- पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 – एक व्यापक कानून जो केंद्र सरकार को पर्यावरण की रक्षा और उसमें सुधार करने का अधिकार देता है। 8
- जैव विविधता अधिनियम, 2002 – जैव विविधता का संरक्षण, उसका सतत उपयोग और लाभों का साझाकरण। 9
ये सभी कानून मिलकर एक व्यापक नियामक ढांचा स्थापित करते हैं, जो पारिस्थितिक संतुलन, संसाधनों के सतत प्रबंधन, प्रदूषण नियंत्रण और दीर्घकालिक पर्यावरणीय सुरक्षा को सुनिश्चित करता है।
संरक्षित क्षेत्र और वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रम
भारत ने वन्यजीवों के संरक्षण और लुप्तप्राय प्रजातियों की सुरक्षा के लिए निम्नलिखित प्रमुख कार्यक्रम लागू किए हैं:

संरक्षित क्षेत्र: संरक्षित क्षेत्रों का नेटवर्क 2014 में 745 से बढ़कर 2025 में 1,134 हो गया है। जानवरों के आवासों को आपस में जोड़ने और उनके सुरक्षित आवागमन को सुनिश्चित करने के लिए वन्यजीव गलियारों की पहचान की गई है। 10
प्रोजेक्ट टाइगर: 2014 में 46 बाघ अभ्यारण्य थे, जो 2025 तक बढ़कर 58 हो गए हैं, और लगभग 85,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र तक फैले हैं। इनमें सबसे नया जोड़ा गया अभ्यारण्य मध्य प्रदेश का माधव बाघ अभ्यारण्य है। अखिल भारतीय बाघ आकलन का छठा चरण शुरू हो गया है।11 यह पिछली गणना पर आधारित है, जिसमें 2022 में 3,167 बाघ दर्ज किए गए थे। भारत प्रमुख भूदृश्यों में 32 पहचाने गए बाघ गलियारों12 के माध्यम से पर्यावास की कनेक्टिविटी भी सुनिश्चित करता है, जिससे दीर्घकालिक संरक्षण योजना और आनुवंशिक प्रसार को मजबूती मिलती है।13
प्रोजेक्ट एलिफेंट: वर्ष 2014 में हाथी अभ्यारण्य की संख्या 26 थी, जो 2025 में बढ़कर 33 हो गई है। इस विस्तार के कारण 8,610 वर्ग किलोमीटर का अतिरिक्त क्षेत्र हाथियों के संरक्षण के दायरे में आ गया है। वर्तमान में 15 राज्यों में 150 हाथी गलियारे चिन्हित किए गए हैं, जो हाथियों की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करते हैं।14
प्रोजेक्ट चीता: 2025 में प्रोजेक्ट चीता का विस्तार किया गया। गांधीसागर वन्यजीव अभ्यारण्य में चीतों को छोड़ा गया। नियोजित विस्तार में नौरादेही और बन्नी घास के मैदान शामिल हैं। दिसंबर 2025 तक, चीतों की कुल आबादी 30 तक पहुँच गई, जिसमें भारत में जन्मे 19 शावक शामिल हैं।15
प्रोजेक्ट स्नो लेपर्ड (हिम तेंदुआ): भारत ने 2019 और 2023 के बीच पहली राष्ट्रव्यापी हिम तेंदुए की गणना को पूरा किया। भारत में हिम तेंदुओं की अनुमानित संख्या 718 है। लद्दाख में 477 और उत्तराखंड में 124 हिम तेंदुए दर्ज किए गए। संरक्षण को बेहतर करने के लिए, वन्यजीव सप्ताह 2025 में 'हिम तेंदुआ गणना भारत 2.0' (स्नो लेपर्ड पॉपुलेशन असेसमेंट इंडिया 2.0)' शुरू किया गया है।16
प्रोजेक्ट डॉल्फिन: प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत, 2021 से 2023 तक किए गए देशव्यापी सर्वेक्षण में 6,327 नदी में रहने वाली डॉल्फ़िन का अनुमान लगाया गया। जनवरी 2026 में बिजनौर से शुरू किया गया दूसरा व्यापक अनुमान सर्वेक्षण गंगा नदी, सिंधु नदी, ब्रह्मपुत्र, सुंदरबन और ओडिशा को कवर करता है।17 इसके अंतर्गत गंगा नदी डॉल्फिन, सिंधु नदी डॉल्फिन और इरावदी डॉल्फिन की गणना की जाएगी।18
इंटरनेशनल बिग कैट (व्याघ्र प्रजातियां) समझौता: भारत अंर्तराष्ट्रीय बिग कैट समूह का नेतृत्व कर रहा है, इस समझौते को अप्रैल 2023 में दुनिया भर में 7 बिग कैट प्रजातियों के संरक्षण के लिए शुरू किया गया था। इस समझौते का फ्रेमवर्क 23 जनवरी 2025 को लागू हुआ, और इसकी सदस्यता बढ़कर 18 देशों तक पहुँच गई।19
वन्यजीव सप्ताह 2025 (2-8 अक्टूबर) के दौरान प्रजातियों के संरक्षण के लिए पाँच राष्ट्रीय-स्तरीय परियोजनाएँ, जिनमें 'प्रोजेक्ट डॉल्फिन' (चरण II), 'प्रोजेक्ट स्लॉथ बियर' और 'प्रोजेक्ट घड़ियाल' शामिल हैं तथा चार प्रजातियों—नदी में रहने वाली डॉल्फिन, बाघ, हिम तेंदुआ और बस्टर्ड के लिए राष्ट्रीय स्तर की कार्य योजनाएं और फील्ड गाइड जारी किए गए हैं, ताकि उनकी जनसंख्या का सटीक आकलन और वैज्ञानिक तरीके से निगरानी की जा सके।
एक व्यापक परिदृश्य-स्तरीय रणनीति के तहत इन प्रजाति-केंद्रित संरक्षण संबंधी पहलकदमियों को सहायता दी जाती है, जो वन आवरण, पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली और पर्यावासों को अनुकूल बनाती है। पूरे देश में दीर्घकालिक पारिस्थितिक स्थिरता और संसाधनों के संवहनीय प्रबंधन को सुनिश्चित करने के लिए वन्यजीवों की सुरक्षा और हरित आवरण के विस्तार को एक साथ मिलकर आगे बढ़ाया जाता है।
पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली
भारत के विविध पारिस्थितिकी तंत्र जलवायु परिवर्तन, जंगलों में लगी आग, पर्यावासों के क्षरण, तटीय कटाव और अनियोजित भूमि उपयोग के कारण बढ़ते दबावों का सामना कर रहे हैं। यह स्वीकार करते हुए कि पारिस्थितिक गिरावट सीधे तौर पर जल सुरक्षा, आजीविका और आपदा सहिष्णुता को प्रभावित कर सकती है, भारत सरकार ने महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्रों की सुरक्षा, बहाली और उन्हें जलवायु-अनुकूल बनाने पर केंद्रित एक बहुस्तरीय रणनीति अपनाई है। यह दृष्टिकोण स्थलीय, तटीय और आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्रों में परिदृश्य-स्तरीय संरक्षण, तकनीक-सक्षम निगरानी और लक्षित पर्यावास पुन प्राप्त करने में मदद करता है।

वन और जीवमंडल पारिस्थितिकी तंत्र: भारत के स्थलीय संरक्षण प्रयास एक मजबूत जीवमंडल आरक्षित नेटवर्क पर आधारित हैं, जिसके तहत वर्तमान में देश में 18 अधिसूचित जीवमंडल आरक्षित क्षेत्र हैं जो 91,425 वर्ग किलोमीटर में फैले हुए हैं। इनमें से 13 को यूनेस्को के 'वर्ल्ड नेटवर्क ऑफ बायोस्फीयर रिजर्व' (डब्ल्यूएनबीआर) के तहत मान्यता प्राप्त है, और सितंबर 2025 में हिमाचल प्रदेश के 'कोल्ड डेजर्ट' (शीत मरुस्थल) जीवमंडल आरक्षित क्षेत्र को इस सूची में शामिल किए जाने से वैश्विक संरक्षण के क्षेत्र में भारत की स्थिति और अधिक सुदृढ़ हुई है।20
जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिमों से वन पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखने के लिए, भारत ने वनों में लगने वाली आग की रोकथाम और नियंत्रण के लिए एक व्यापक प्रणाली स्थापित की है। भारतीय वन सर्वेक्षण एक उपग्रह-आधारित, वास्तविक समय में आग की निगरानी करने वाली व्यवस्था का संचालन करता है। इसके तहत एसएमएस और ईमेल के माध्यम से अलर्ट जारी किए जाते हैं, और इसे एक 24×7 राष्ट्रीय नियंत्रण कक्ष का भी सहयोग प्राप्त है जो पूरे देश में होने वाली ऐसी घटनाओं पर नज़र रखता है। 21 22
एक पेड़ माँ के नाम (प्लांट4मदर अभियान)23
एक राष्ट्रव्यापी जन-भागीदारी अभियान के रूप में शुरू किया गया, 'एक पेड़ माँ के नाम' अभियान नागरिकों को अपनी माँ के प्रति श्रद्धांजलि के रूप में एक पेड़ लगाने और साथ ही पर्यावरण संरक्षण में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित करता है।
एक पेड़ माँ के नाम' अभियान सबसे बड़े जन-केंद्रित पर्यावरण आंदोलनों में से एक बन गया है। 31 दिसंबर 2025 तक कुल 262.4 करोड़ पौधे लगाए गए।24
आर्द्रभूमि और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र
जंगलों और मैंग्रोव के अलावा, भारत की संरक्षण रणनीति में आर्द्रभूमि और तटीय क्षेत्र भी शामिल हैं, जो जैव विविधता संरक्षण, जल सुरक्षा और जलवायु अनुकूलन में अहम भूमिका निभाते हैं।
चक्रवातों, तूफ़ानी लहरों और तटीय कटाव के ख़िलाफ़ प्राकृतिक सुरक्षा कवच के तौर पर मैंग्रोव की भूमिका को पहचानते हुए, भारत 'तटीय आवास और मूर्त आय के लिए मैंग्रोव पहल' (मैंग्रोव इनिशिएटिव फ़ॉर शोरलाइन हैबिटैट्स एंड टैंजिबल इनकम्स (मिष्टी) को लागू कर रहा है। साल 2025 में, इस पहल के तहत 4,536 हेक्टेयर मैंग्रोव क्षेत्र को बहाल किया गया25 और 22,560 हेक्टेयर (13 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में) ऐसे मैंग्रोव क्षेत्रों की पहचान की गई, जो खराब हो चुके थे, ताकि भविष्य में वहाँ वृक्षारोपण और बहाली का काम किया जा सके। 26

भारत ने आर्द्रभूमि संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है। वर्ष 2025 में, 11 नए रामसर स्थलों27 की घोषणा की गई, जिससे 31 जनवरी 2026 तक ऐसे स्थलों की कुल संख्या बढ़कर 98 हो गई है; जबकि 2014 में यह संख्या मात्र 26 थी।28 अब भारत, ऐसे स्थलों की संख्या के मामले में एशिया में शीर्ष स्थान पर और वैश्विक स्तर पर तीसरे स्थान पर है। हाल ही में शामिल किए गए स्थलों में पटना पक्षी अभ्यारण्य (उत्तर प्रदेश) और छारी-ढांड (गुजरात) शामिल हैं। शहरी आर्द्रभूमि प्रबंधन को और अधिक सुदृढ़ बनाते हुए, उदयपुर और इंदौर भारत के पहले ऐसे शहर बन गए हैं जिन्हें 'रामसर-मान्यता प्राप्त आर्द्रभूमि शहर' का दर्जा मिला है। 29 30
भारत के तटीय क्षेत्र को अनुकूल बनाने के लिए 'राष्ट्रीय तटीय मिशन' पर जोर दिया जा रहा है, इस मिशन को 767 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ 2025-31 तक के लिए बढ़ा दिया गया है।31 जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना के हिस्से के रूप में कार्यान्वित इस मिशन का उद्देश्य एकीकृत तटीय क्षेत्र प्रबंधन, पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली और समुदाय-आधारित अनुकूलन के माध्यम से भारत की तटरेखा की सुरक्षा करना है। यह मिशन मैंग्रोव, प्रवाल भित्तियों और अन्य तटीय प्रणालियों को प्राकृतिक ढाल के रूप में संरक्षित करने, समुद्री जल स्तर में वृद्धि और तटीय कटाव जैसी चुनौतियों से निपटने, वैज्ञानिक निगरानी को मजबूत करने और संतुलित तटीय विकास सुनिश्चित करने के लिए स्थायी आजीविका को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।
'ब्लू फ्लैग' समुद्रतट ऐसे तटीय स्थल हैं जिन्हें स्वच्छता, पानी की गुणवत्ता, सुरक्षा और संवहनीय प्रबंधन के अंतरराष्ट्रीय मानकों को बनाए रखने के लिए प्रमाणित किया गया है। यह प्रमाणन 'फाउंडेशन फॉर एनवायरनमेंटल एजुकेशन' द्वारा प्रदान किया जाता है, और भारत में इसे पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 'एकीकृत तटीय क्षेत्र प्रबंधन कार्यक्रम' के तहत लागू किया जाता है।32 भारत ने 18 समुद्र तटों के लिए ब्लू फ्लैग प्रमाणन हासिल किया है। ये समुद्र तट 7 तटीय राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों में फैले हुए हैं। यह प्रमाणन 2025-26 तक हासिल कर लिया गया था।33
मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन 34 35
मनुष्यों और वन्यजीवों के बीच सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व सुनिश्चित करने के लिए, मंत्रालय ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत मानव-वन्यजीव संघर्ष के प्रबंधन पर राज्यों को परामर्श जारी किए हैं। इन परामर्शों में समन्वित कार्रवाई, संघर्ष के मुख्य क्षेत्रों (हॉटस्पॉट) की पहचान और त्वरित प्रतिक्रिया टीमों की स्थापना की सिफारिश की गई है। राज्य और जिला-स्तरीय समितियाँ अनुग्रह-राहत की समीक्षा करती हैं और सरकार मृत्यु तथा चोट लगने के मामलों में 24 घंटे के भीतर राहत राशि का भुगतान सुनिश्चित करती है।
वन्यजीव सप्ताह 2025 (2-8 अक्टूबर) के दौरान, मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन के लिए एक 'उत्कृष्टता केंद्र' और 'बाघ अभ्यारण्य के बाहर बाघ' (टाइगर आउटसाइड टाइगर रिज़र्व) नामक एक परियोजना का शुभारंभ किया गया।
ये प्रयास दर्शाते हैं कि पर्यावरण संरक्षण का कार्य अलग-थलग रहकर नहीं किया जाता, बल्कि यह समावेशी विकास और सामाजिक समानता से गहराई से जुड़ा हुआ है। जलवायु कार्रवाई, सामुदायिक भागीदारी और सह-अस्तित्व की रणनीतियों को एक व्यापक विकास ढाँचे में एकीकृत करके, भारत पर्यावरण संरक्षण को संवहनीय और न्यायसंगत विकास के उद्देश्यों के साथ जोड़ता है।
भारत द्वारा जैव विविधता संरक्षण और पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के प्रयासों को बढ़ाने के बावजूद, जलवायु परिवर्तन पारिस्थितिक स्थिरता और विकास संबंधी उपलब्धियों के लिए सबसे गहरा और व्यापक खतरा बना हुआ है। बढ़ता तापमान, चरम मौसमी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति, वर्षा के बदलते पैटर्न और समुद्र के जल स्तर में वृद्धि का दबाव वनों, आर्द्रभूमियों, तटों और समुदायों पर स्पष्ट रूप से दिख रहा है। यह स्वीकार किया गया है कि केवल संरक्षण प्रयास ही पर्याप्त नहीं हैं, जब तक कि उन्हें ऊर्जा के क्षेत्र में गहरे संरचनात्मक बदलावों और हरित विकास के पथ पर आगे बढ़ने का समर्थन प्राप्त न हो।
भारत की केंद्रित जलवायु कार्रवाई, जलवायु जोखिमों के लिए तत्परता को स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार, कम कार्बन वाली प्रौद्योगिकियों और नीतिगत सुधारों के माध्यम से सक्रिय शमन के साथ जोड़ती है।

जलवायु और रणनीतिक नीतिगत ढाँचे
- जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीसीसी) और इसके नौ राष्ट्रीय मिशन: एनएपीसीसी भारत की जलवायु रणनीति के लिए व्यापक रूपरेखा प्रदान करता है। इसके मिशन, सौर ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, स्थायी आवास, जल, हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र, हरित भारत, स्थायी कृषि, रणनीतिक ज्ञान और बाद में अतिरिक्त मिशनों को कवर करते हैं, जो क्षेत्रीय योजना में अनुकूलन और शमन को एकीकृत करते हैं।36

- पेरिस समझौते के तहत राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी): अपने अद्यतन एनडीसी (2022) के माध्यम से भारत ने 2030 तक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की उत्सर्जन तीव्रता को 2005 के स्तर से 45 प्रतिशत कम करने और गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से लगभग 50 प्रतिशत संचयी विद्युत स्थापित क्षमता प्राप्त करने की प्रतिबद्धता जताई थी।37 जून 2025 तक की स्थिति के अनुसार, भारत ने 2005 और 2020 के बीच उत्सर्जन तीव्रता में लगभग 36 प्रतिशत की कमी पहले ही दर्ज कर ली है और अपनी स्थापित विद्युत क्षमता में 50 प्रतिशत गैर-जीवाश्म हिस्सेदारी के लक्ष्य को निर्धारित समय से काफी पहले ही पार कर लिया है। 38 39 40
- दीर्घकालिक कम उत्सर्जन विकास रणनीति (एलटी-एलईडीएस): 2022 में यूएनएफसीसीसी को प्रस्तुत, भारत की एलटी-एलईडीएस 2070 तक नेट-शून्य उत्सर्जन की दिशा में आगे बढ़ने के मार्ग की रूपरेखा प्रस्तुत करती है। 41 42
- राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन और नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार लक्ष्य: 2023 में शुरू किए गए राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का उद्देश्य भारत को हरित हाइड्रोजन के उत्पादन, उपयोग और निर्यात का एक वैश्विक केंद्र बनाना है, जिसके तहत 2030 तक सालाना 5 मिलियन मीट्रिक टन 43 उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इसे नवीकरणीय ऊर्जा के त्वरित विस्तार से समर्थन मिल रहा है, जिसके अंतर्गत भारत ने 2030 तक 500 गीगावॉट गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता हासिल करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। 44 45
ये सभी साधन मिलकर, भारत के संरक्षण से लेकर जलवायु कार्रवाई तक के सफ़र को मज़बूती देते हैं, और पारिस्थितिक संरक्षण को सतत विकास के साथ जोड़ते हैं।
मिशन लाइफ
जलवायु परिवर्तन से जल सुरक्षा, आजीविका और आर्थिक स्थिरता को गंभीर खतरे पैदा होते हैं। अगर समय पर कदम न उठाए गए, तो वैश्विक अनुमानों के अनुसार लगभग तीन अरब लोगों को पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है, और 2050 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था में जीडीपी के 18 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। बड़े पैमाने पर व्यवहारिक परिवर्तन एक महत्वपूर्ण अंतर पैदा कर सकता है। अगर एक अरब लोग संवहनीय जीवनशैली अपनाते हैं, तो वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में लगभग 20 प्रतिशत की कमी आ सकती है। 46
भारत सरकार द्वारा शुरू किया गया 'मिशन लाइफ' (पर्यावरण के लिए जीवनशैली), जलवायु के प्रति जागरूक व्यक्तिगत और सामुदायिक कार्यों को बढ़ावा देता है। मिशन लाइफ के तहत, दिसंबर 2025 तक 6 करोड़ से अधिक लोगों ने 34 लाख से अधिक कार्यक्रमों में भाग लिया है और 4.96 करोड़ संकल्प लिए गए हैं।47
अंतर्राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताएँ और बहुपक्षीय जुड़ाव
भारत की घरेलू प्रगति को निरंतर अंतर्राष्ट्रीय समर्थन मिलता है।
अनुच्छेद 6 के तहत अंतर्राष्ट्रीय कार्बन बाज़ार तंत्रों को लागू करने के लिए, भारत ने 'पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6 के कार्यान्वयन हेतु राष्ट्रीय नामित एजेंसी' को राष्ट्रीय प्राधिकरण के रूप में नामित किया है।48
नवंबर 2025 में ब्राज़ील के बेलेम में आयोजित यूएनएफसीसीसी 'कॉप30' में, भारत ने अपने जलवायु नेतृत्व को रेखांकित किया और प्रतिबद्धताओं से आगे बढ़कर उनके कार्यान्वयन की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। भारत ने विकासशील देशों के लिए बेहतर जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर बल दिया। भारत ने 'ट्रॉपिकल फ़ॉरेस्ट्स फ़ॉरएवर फ़ैसिलिटी' (टीएफएफएफ) शुरू करने की ब्राज़ील की पहल का भी स्वागत किया और एक पर्यवेक्षक के रूप में इसमें शामिल हुआ। 49
भारत "एक विश्व, एक सूर्य, एक ग्रिड" की परिकल्पना के तहत अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) के माध्यम से वैश्विक सौर सहयोग का नेतृत्व करना जारी रखे हुए है। अक्टूबर 2025 में नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित आठवीं आईएसए महासभा में 550 से अधिक प्रतिनिधियों और 30 मंत्री-स्तरीय प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिसने स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के प्रति वैश्विक प्रतिबद्धता को और मजबूत किया। 50
भारत ने मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत प्रमुख ओजोन-क्षयकारी पदार्थों को निर्धारित समय-सीमा से पहले चरणबद्ध तरीके से समाप्त कर अपनी मजबूत प्रतिबद्धता प्रदर्शित की है। 51 52 53 वर्ष 2021 में किगाली संशोधन की पुष्टि के बाद, भारत अब हाइड्रोफ्लोरोकार्बन के उपयोग को कम करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। उल्लेखनीय है कि 2025 तक भारत ने हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन(एचसीएफसी) के उत्पादन और खपत में 67.5 प्रतिशत की प्रभावशाली कटौती हासिल कर ली है, जो वैश्विक पर्यावरण संरक्षण में भारत की अग्रणी भूमिका को रेखांकित करता है।54
भारत की अंतर्राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं को मापने योग्य घरेलू कार्यों से और मज़बूती मिलती है। जहाँ बहुपक्षीय जुड़ाव वैश्विक सहयोग प्रदान करते हैं, वहीं देश के भीतर इन नीतियों का क्रियान्वयन संकल्पों को वास्तविक संरचनात्मक परिवर्तनों में बदल रहा है। वैश्विक ज़िम्मेदारी और राष्ट्रीय क्रियान्वयन के बीच यह तालमेल, भारत के तेज़ी से बढ़ते स्वच्छ ऊर्जा विस्तार में सबसे ज़्यादा स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार और संरचनात्मक ऊर्जा संक्रमण
भारत का स्वच्छ ऊर्जा विस्तार, जीवाश्म-ईंधन पर निर्भरता से हटकर विविध और कम कार्बन वाले ऊर्जा स्रोतों की ओर एक निर्णायक संरचनात्मक बदलाव का प्रतीक है। 'जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन' के तहत की गई प्रतिबद्धताओं और घरेलू सुधारों से निर्देशित, इस संक्रमण का उद्देश्य ऊर्जा सुरक्षा, स्थिरता और दीर्घकालिक आर्थिक सुदृढ़ता को बढ़ाना है।
2025 में, भारत ने गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से 50 प्रतिशत से अधिक संचयी स्थापित बिजली क्षमता हासिल कर ली, जो उसके 2030 के लक्ष्य से पाँच वर्ष पहले है।55

31 जनवरी 2026 तक, भारत की कुल स्थापित बिजली क्षमता 520,510.95 मेगावाट है। इसमें 248,541.62 मेगावाट जीवाश्म ईंधनों से और 271,969.33 मेगावाट गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त होता है। गैर-जीवाश्म घटक में 8,780 मेगावाट परमाणु ऊर्जा और 263,189.33 मेगावाट नवीकरणीय ऊर्जा शामिल है। 56
अंतर्राष्ट्रीय अक्षय ऊर्जा एजेंसी (आईआरइएनए) के अक्षय ऊर्जा सांख्यिकी 2025 (दिसंबर 2024 तक के आंकड़ों के अनुसार) के आधार पर, वैश्विक स्तर पर भारत सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता में तीसरे स्थान पर, पवन ऊर्जा की क्षमता में चौथे स्थान पर और कुल नवीकरणीय ऊर्जा की क्षमता में चौथे स्थान पर है। 57
भारत में ऊर्जा संक्रमण हर स्तर पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। 9 अक्टूबर 2022 को गुजरात का मोढेरा एकीकृत सौर प्रणालियों के माध्यम से चौबीसों घंटे स्वच्छ ऊर्जा की आपूर्ति सुनिश्चित करने वाला भारत का पहला 24x7 सौर ऊर्जा संचालित गांव बन गया।58 इसी क्रम में, मध्य प्रदेश का ओंकारेश्वर फ्लोटिंग सोलर पार्क (4 जनवरी 2025 तक की स्थिति के अनुसार) भारत का सबसे बड़ा और एशिया के सबसे बड़े फ्लोटिंग सोलर पार्कों में से एक है। 59 इस तरह की परियोजनाएं न केवल संसाधनों के उपयोग को अनुकूलित करती हैं, बल्कि नवाचार के माध्यम से देश की अक्षय ऊर्जा क्षमता का विस्तार भी करती हैं।

ऊर्जा दक्षता में सुधार, क्षमता विस्तार के पूरक होते हैं। बिजली क्षेत्र की कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन तीव्रता, जीडीपी की प्रति इकाई के हिसाब से, 2015–16 में 1 करोड़ रुपये पर 61.45 टन से घटकर 2022–23 में 1 करोड़ रुपये पर 40.52 टन हो गई, यह स्वच्छ विकास के रास्तों और तकनीकी सुधारों को दर्शाता है।60

दक्षता में हुई इन वृद्धियों को उन नीतिगत साधनों का समर्थन प्राप्त है, जो विभिन्न क्षेत्रों में दीर्घकालिक उत्सर्जन कटौती को सुदृढ़ करते हैं। इस गति को बनाए रखने के लिए, भारत की जलवायु रणनीति विनियामक ढाँचों को बाज़ार-आधारित तंत्रों और तकनीकी नवाचार के साथ जोड़ती है, जिससे जवाबदेही मज़बूत होती है और कम-कार्बन वाली अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण की प्रक्रिया तेज़ होती है।
कार्बन बाज़ार, औद्योगिक बदलाव और जलवायु वित्त तंत्र
भारत की जलवायु रणनीति में नियमन, बाज़ार तंत्र और तकनीकी प्रगति को शामिल किया गया है। कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना को लागू करना, 'भारतीय कार्बन बाज़ार' ढांचे के तहत भारत के घरेलू कार्बन बाज़ार को मज़बूत बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह योजना ऐसे अनुपालन और ऑफ़सेट तंत्र स्थापित करती है जो वैश्विक तौर-तरीकों के अनुरूप हैं, और यह उत्सर्जन में मापने योग्य कमी लाने में सहायक है।
जनवरी 2026 में, सरकार ने अतिरिक्त क्षेत्रों के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तीव्रता के लक्ष्य अधिसूचित किए। इस विस्तार के साथ, प्रमुख उत्सर्जन-सघन उद्योगों की 490 बाध्य संस्थाएँ अब इसके दायरे में आ गई हैं। इससे पारदर्शिता, जवाबदेही और क्षेत्रीय अकार्बनीकरण को बढ़ावा मिलता है।61
औद्योगिक उत्सर्जन को कम करने के लिए (सीसीयूएस) एक प्रमुख निम्न-कार्बन तकनीक के रूप में उभरी है, जो कार्बन डाइऑक्साइड को नापने और उसे पुन: उपयोग करने या सुरक्षित रूप से संग्रहीत करने का कार्य करती है। केंद्रीय बजट 2026-27 में रसायन और भारी उद्योगों सहित उत्सर्जन-गहन क्षेत्रों में सीसीयूएस विकास को बढ़ावा देने के लिए पांच वर्षों में 20,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।62 यह आवंटन कार्बन प्रबंधन समाधानों के अनुसंधान, प्रदर्शन और परिनियोजन को प्रोत्साहित करता है, जो भारत के नेट-जीरो लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
जहाँ कार्बन बाज़ार और औद्योगिक अकार्बनीकरण तंत्र लंबे समय के उत्सर्जन में कमी लाने पर ध्यान देते हैं, वहीं पर्यावरणीय शासन को प्रदूषण से जुड़ी तात्कालिक चुनौतियों का भी सामना करना चाहिए। बाज़ार-आधारित जलवायु उपकरण उन विनियामक सुरक्षा उपायों के साथ-साथ काम करते हैं, जो हवा, पानी और कचरे से होने वाले प्रदूषण को उसके स्रोत पर ही नियंत्रित करते हैं। ये सभी मिलकर यह सुनिश्चित करते हैं कि अकार्बनीकरण की प्रक्रिया अलग-थलग न हो, बल्कि एक व्यापक पर्यावरणीय प्रबंधन ढाँचे का हिस्सा बनकर आगे बढ़े जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी को ठोस लाभ मिल सकें।
प्रदूषण नियंत्रण से संवहनीय विकास की ओर
भारत के पर्यावरण प्रबंधन को एक मज़बूत कानूनी ढाँचे का समर्थन प्राप्त है।
जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 और वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 प्रदूषण नियंत्रण से संबंधित हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आस-पास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, 2021 वायु गुणवत्ता शासन के लिए समन्वय को मज़बूत बनाता है।63
इसका कार्यान्वयन राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों के समन्वय से किया जाता है। इसका प्रवर्तन केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों या प्रदूषण नियंत्रण समितियों द्वारा सुनिश्चित किया जाता है। कानूनी और संस्थागत ढांचा पर्यावरणीय सिद्धांतों को मापने योग्य परिणामों में बदलने के लिए एक आधार प्रदान करता है। इन कानूनों को लक्षित राष्ट्रीय कार्यक्रमों के माध्यम से लागू किया जाता है, जो प्रदूषण से जुड़ी प्रमुख चुनौतियों का समाधान एक समन्वित और समय-बद्ध तरीके से करते हैं।
स्वच्छ वायु कार्यक्रम और प्रदूषण में कमी
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जनवरी 2019 में शुरू किए गए राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम का उद्देश्य 130 शहरों में हवा की गुणवत्ता में सुधार करना है।64
शहर सड़क की धूल, वाहनों से होने वाले उत्सर्जन, कचरा जलाने और औद्योगिक प्रदूषण जैसी समस्याओं से निपटने के लिए लक्षित स्वच्छ वायु कार्य योजनाएँ लागू करते हैं। 2017–18 के आधारभूत स्तरों से तुलना करने पर, 130 में से 103 शहरों में 2024–25 में पीएम10 सांद्रता में सुधार देखा गया। चौंसठ शहरों में 20 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई और 25 शहरों ने 40 प्रतिशत की कमी हासिल की।65
हवा की गुणवत्ता में सुधार के लिए किए जा रहे लक्षित उपायों के साथ-साथ, पर्यावरण पर पड़ने वाले द्वितीयक प्रभावों को रोकने के लिए औद्योगिक उप-उत्पादों के प्रबंधन को बेहतर बनाने पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है। फ्लाई ऐश का वैज्ञानिक उपयोग बढ़ाना, प्रदूषण नियंत्रण की इस एकीकृत रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
फ्लाई ऐश का प्रबंधन और उपयोग
फ्लाई ऐश का अवैज्ञानिक तरीके से निपटान करने से ज़मीन खराब हो सकती है, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं और पर्यावरण को भी खतरा हो सकता है; ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इसमें सांस के साथ अंदर जाने वाले बारीक कण और कुछ मात्रा में ज़हरीले तत्व मौजूद होते हैं।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने कोयले और लिग्नाइट पर आधारित थर्मल पावर प्लांट के लिए यह अनिवार्य कर दिया है कि वे तय समय-सीमा के भीतर 100 प्रतिशत फ्लाई ऐश का उपयोग सुनिश्चित करें, ताकि पर्यावरण के अनुकूल तरीकों से इसका इस्तेमाल किया जा सके।
2024–25 में, भारत में 340 मिलियन टन से अधिक फ्लाई ऐश उत्पन्न हुई, जिसमें से 332.63 मिलियन टन का लाभकारी उपयोग किया गया।
उत्पन्न कुल फ्लाई ऐश में से:
- 32% का उपयोग सड़कों और फ्लाईओवर के निर्माण में किया गया,
- 27% का उपयोग सीमेंट उद्योग में किया गया, और
- 14% का उपयोग ईंटों और टाइलों के निर्माण में किया गया।

कचरा पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) का विस्तार
भारत ने कचरा प्रबंधन के बुनियादी ढांचे को काफी मज़बूत किया है। कचरा रीसाइक्लिंग प्लांट की संख्या 2019–20 में 829 से बढ़कर 2024–25 में 3,036 हो गई है, जो रीसाइक्लिंग क्षमता में विस्तार को दर्शाता है और सतत विकास लक्ष्य 12 का समर्थन करता है। 66
विस्तारित उत्पादक दायित्व (इपीआर)
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने प्लास्टिक पैकेजिंग, ई-कचरा, टायर और बैटरियों के लिए इपीआर फ्रेमवर्क अधिसूचित किए हैं। ये फ्रेमवर्क चक्रीय अर्थव्यवस्था को मज़बूत करते हैं और वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन को बढ़ावा देते हैं।
दिसंबर 2025 तक, 71,401 उत्पादक और 4,447 रीसाइक्ल करने वाले पंजीकृत हैं। इन्होंने 375.11 लाख टन कचरे की रीसाइक्लिंग में मदद की है। 339.51 लाख टन के इपीआर प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं, जिनमें से 237.85 टन प्रमाणपत्र उत्पादकों को हस्तांतरित किए जा चुके हैं।67
प्रभावी प्रदूषण नियंत्रण और अपशिष्ट प्रबंधन संवहनीय विकास की नींव हैं। स्वच्छ हवा, सुरक्षित पानी और वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रसंस्करण सीधे तौर पर जन स्वास्थ्य, उत्पादकता और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। विनियामक प्रवर्तन को मजबूत बना कर तथा पुनर्चक्रण और संसाधन दक्षता का विस्तार करके, भारत पर्यावरण संरक्षण को आर्थिक अवसरों, रोज़गार सृजन और सामाजिक कल्याण से जोड़ता है, जिससे यह बात और भी पुष्ट होती है कि समावेशी विकास के लिए संवहनीयता एक अभिन्न अंग है।
संवहनीय विकास और समावेशी विकास
भारत संवहनीय विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को आगे बढ़ाने में एक अहम भूमिका निभाता है और नीति आयोग राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर हुई प्रगति के समन्वय के लिए नोडल एजेंसी के तौर पर काम करता है।68 नीति आयोग सभी 17 लक्ष्यों के प्रदर्शन पर नज़र रखता है और राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के बीच प्रतिस्पर्धी और सहकारी संघवाद को बढ़ावा देता है। एसडीजी इंडिया इंडेक्स 2023–24 के अनुसार, भारत का समग्र स्कोर बढ़कर 71 हो गया है। यह 2020–21 के 66 और 2018 के 57 के स्कोर से लगातार ऊपर उठा है, जो राष्ट्रीय स्तर पर हो रही निरंतर प्रगति को दर्शाता है।
भारत ने एसडीजी 7 (किफायती और स्वच्छ ऊर्जा) को आगे बढ़ाने में खास तौर पर उल्लेखनीय प्रगति की है। कुल स्थापित बिजली क्षमता में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी 51.55 प्रतिशत तक पहुँच गई है (नवंबर 2025 तक), जो गैर-जीवाश्म ईंधन ऊर्जा स्रोतों की ओर एक बड़े संरचनात्मक बदलाव का संकेत है।69 इस बदलाव के साथ-साथ, ऊर्जा दक्षता में भी काफी सुधार हुआ है: बिजली क्षेत्र में जीडीपी की प्रति इकाई कार्बनडाइऑक्साइड उत्सर्जन की तीव्रता 2015–16 में 1 करोड़ रुपये पर 61.45 टन से घटकर 2022–23 में 1 करोड़ रुपये पर 40.52 टन हो गई है, जो स्वच्छ और अधिक कुशल आर्थिक विकास को दर्शाता है।70 ये उपलब्धियाँ एसडीजी फ्रेमवर्क के तहत जलवायु कार्रवाई और संवहनीय विकास के प्रति भारत की व्यापक प्रतिबद्धता को और मज़बूत करती हैं।
निष्कर्ष
भारत का पर्यावरणीय बदलाव उसके पैमाने, संस्थागत मज़बूती और निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाता है। नवीकरणीय ऊर्जा का रिकॉर्ड विस्तार, सक्रिय कार्बन बाज़ार, प्रदूषण नियंत्रण को मज़बूत बनाना, संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार, प्रजातियों को बचाने के कार्यक्रम, वनों और मैंग्रोव का पुनरुद्धार, आर्द्रभूमि का संरक्षण और नागरिकों की भागीदारी—ये सभी मिलकर एक व्यापक पर्यावरणीय रणनीति को परिभाषित करते हैं।
2050 तक प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर रहने के भारत के दृष्टिकोण को, विभिन्न क्षेत्रों में किए जा रहे ठोस और मापने योग्य कार्यों का समर्थन प्राप्त है। घरेलू स्तर पर कार्यान्वयन को वैश्विक सहयोग के साथ जोड़ते हुए, भारत ने वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए जलवायु स्थिरता, जैव विविधता संरक्षण और संवहनीय विकास में अपना योगदान लगातार जारी रखा है।
फुटनोट -
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2https://moef.gov.in/convention-on-biological-diversity-cbd
3https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2070401®=3&lang=2
4
5https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/15429/1/the_water_%28prevention_and_control_of_pollution%29_act%2C_1974.pdf
6https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/19381/1/the_forest_%28conservation%29_act%2C_1980.pdf
7https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/9462/1/air_act-1981.pdf
8https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/4316/1/ep_act_1986.pdf
9https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/21545/1/the_biological_diversity_act%2C_2002.pdf
10https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2210100®=6&lang=1
11https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2210100®=6&lang=1
12https://www.pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=1943922®=3&lang=2
13http://ntca.gov.in/corridor-management/
14https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2210100®=6&lang=1
15https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2210100®=6&lang=1
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23https://environmentclearance.nic.in/writereaddata/OMs-2004-2021/24_Jul_2024_153708153974U4365EKPEDMAAKENAAMOM.pdf
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Fly Ash - https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2147745®=3&lang=2
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संदर्भ:
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण
भारतीय वन सर्वेक्षण
इंडिया कोड
पीआईबी
प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय
माईगाव
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय
नीति आयोग
ओज़ोन सेल – मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल
न्यूज़ऑनएयर
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