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भारतीय इस्पात क्षेत्र आत्मनिर्भर बनने की दिशा में अग्रसर

समग्र इस्पात मूल्य शृंखला में घरेलू क्षमताओं में आई मजबूती

Posted On: 05 MAY 2026 3:51PM

भारत का इस्पात (स्टील) क्षेत्र एक महत्वपूर्णसनराइज़ सेक्टरहै, जिसमें तेज और लगातार वृद्धि हो रही है। वर्ष 2018 में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक देश बना, और आज भी इस स्थान पर काबिज है। घरेलू खपत बढ़ी है और यह पिछले 12 वर्षों में दोगुने से भी अधिक हो गई है। मांग बढ़ने के साथ निर्यात में वृद्धि हुई है और आयात में कमी आई है, जिससे देश की आत्मनिर्भरता मजबूत हुई है। इस विकास को समर्थन देने के लिए सरकार ने कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित की और उत्पादन लागत को कम किया। साथ ही, भारतीय इस्पात उत्पादकों के लिए वैश्विक बाजारों तक पहुंच को भी बेहतर बनाया गया। पीएलआई (PLI) योजना के अंतर्गत ₹23,022 करोड़ के निवेश से विशेष इस्पात (स्पेशलिटी स्टील) के उत्पादन को बढ़ावा मिला और रोजगार के नए अवसर पैदा हुए। इससे 24 लाख टन उत्पादन हुआ और 13,000 से अधिक नए रोजगार सृजित हुए। भारत ने अपनी राष्ट्रीय इस्पात नीति में निर्धारित उत्पादन लक्ष्य का लगभग 66% हासिल कर लिया है। भारत इस्पात क्षेत्र को डीकार्बनाइज़ करते हुए 2070 तक नेट ज़ीरो उत्सर्जन हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है और इसी क्रम में ग्रीन स्टील को बढ़ावा दिया जा रहा है जिसका उद्देश्य जीवाश्म ईंधन के उपयोग को कम करते हुए कार्बन उत्सर्जन घटाना।

 इस्पात क्षेत्र में गति

भारत का इस्पात क्षेत्र राष्ट्र की विकास यात्रा की रीढ़ है। इस क्षेत्र में भारत लगातार आत्मनिर्भर बनने की दिशा में मजबूत होता जा रहा है। भारत 2018 में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक बना और तब से यह दूसरी पोजीशन पर कायम है। कच्चे इस्पात के वैश्विक उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 2014 में 5.2% थी जो 2024 में बढ़कर 7.9% हो गई। इस्पात उत्पादन में यह वृद्धि भारत को एक मजबूत और तेजी से उभरते वैश्विक खिलाड़ी के रूप में स्थापित करती है।

विश्व इस्पात संघ के अनुसार, भारत तैयार (फिनिश्ड) इस्पात का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है। देश में फिनिश्ड स्टील की खपत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह 2014–15 में 77 मिलियन टन से बढ़कर 2025–26 में 163.7 मिलियन टन हो गई है। यह वृद्धि देश में तेजी से हो रहे बुनियादी ढांचे के विकास और बढ़ते शहरीकरण को दर्शाती है। साथ ही, यह मजबूत विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) क्षेत्र और घरेलू मांग में लगातार वृद्धि से भी प्रेरित है। कुल मिलाकर, ये सभी रुझान इस बात को दर्शाते हैं कि भारत का इस्पात क्षेत्र लगातार विकसित हो रहा है और देश के औद्योगिक विकास तथा आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

भारत आत्मनिर्भरता के अपने दृष्टिकोण को साकार करने के लिए विदेशी स्रोतों पर अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में लगातार काम कर रहा है। एक मजबूत घरेलू इस्पात पारिस्थितिकी तंत्र नए व्यावसायिक अवसर पैदा करेगा, औद्योगिक विकास को गति देगा और देश के बुनियादी ढांचा विकास को समर्थन देगा। इसी दिशा में, भारत 2047 तक 500 मिलियन टन इस्पात उत्पादन क्षमता हासिल करने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। साथ ही, 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन लक्ष्य को पूरा करने के लिए इस्पात क्षेत्र से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में कमी पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

 इस्पात क्षेत्र का मजबूत प्रदर्शन

दुनिया में इंजीनियरिंग और निर्माण सामग्री के रूप में सबसे अधिक उपयोग इस्पात का होता है, यही कारण है कि इसे भारत का प्रमुख सनराइज़ सेक्टरकहा गया। यह घरेलू खपत और औद्योगिक विकास को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत में इस्पात उत्पादन लगातार मजबूत और स्थिर गति से बढ़ रहा है। मार्च 2026 में स्टील उत्पादन, मार्च 2025 की तुलना में 2.2% बढ़ा। वहीं, वित्त वर्ष 2025-26 के लिए कुल सूचकांक में पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 9.1% की मजबूत वृद्धि दर्ज की गई। यह बढ़ोतरी उत्पादन क्षमता और मांग दोनों में मजबूती को दर्शाती है।

इस्पात एक मिश्रधातु (एलॉय) है, जो मुख्य रूप से लोहा, कार्बन (2% से कम) और मैंगनीज़ (लगभग 1%) से मिलकर बनती है। इसके साथ ही इसमें थोड़ी मात्रा में सिलिकॉन, फॉस्फोरस, सल्फर और ऑक्सीजन भी शामिल होते हैं।

इस्पात क्षेत्र के लिए स्टील और आयरन के विभिन्न रूप बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख प्रकार इस प्रकार हैं

  • कच्चा इस्पात - तरल इस्पात के ठोस होने पर बनने वाला पहला ठोस इस्पात उत्पाद।
  • तैयार इस्पात - अर्ध-तैयार इस्पात के हॉट रोलिंग/फोर्जिंग के बाद तैयार होने वाला उत्पाद।
  • हॉट मेटल, पिग आयरन स्पोन्ज इस्पात - इस्पात के प्रमुख स्वरूप इस्पात उद्योग जगत के भीतर विभिन्न महत्वपूर्ण प्रकार के इस्पात का निर्माण करते हैं।

 

कच्चा इस्पात 

कच्चा इस्पात अन्य इस्पात उत्पादों के लिए एक मूल कच्चा माल होता है। इसका उत्पादन 2004-05 में 43.44 मिलियन टन था जो बढ़कर 2014-15 में 88.98 मिलियन टन और 2025-26 में 168.4 मिलियन टन तक पहुंच गया। यह भारत की मजबूती और वैश्विक इस्पात क्षेत्र में इसके लगातार विस्तार को दर्शाता है। क्रूड स्टील के उत्पादन में 2021-22 से 2025-26 के बीच लगभग 9% की वार्षिक वृद्धि दर (सी जी आर) दर्ज की गई है। साथ ही, वित्त वर्ष 2025-26 में पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में उत्पादन में 10.7% की वृद्धि हुई है।

कच्चा इस्पात (मिलियन टन में)

 

वित्तीय वर्ष  2022-23

वित्तीय वर्ष  2023-24

वित्तीय वर्ष 2024-25

वित्तीय वर्ष  2025-26

उत्पादन

127.2

144.3

152.2

168.4

 

हॉट मेटल, पिग आयरन और स्पोन्ज आयरन

हॉट मेटल ब्लास्ट फर्नेस में तैयार होने वाला तरल लोहा होता है। 2025-26 में अप्रैल से सितंबर के दौरान इसके उत्पादन में पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 7.3% की वृद्धि दर्ज की गई। ब्लास्ट फर्नेस से निकलने वाला एक अन्य प्रमुख उत्पाद पिग आयरन है। इसके उत्पादन में भी अप्रैल से सितंबर 2025-26 के दौरान पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 6.6% की बढ़ोतरी हुई। इसी अवधि में स्पोन्ज आयरन ने भी अच्छा प्रदर्शन किया और इसके उत्पादन में 9.1% की वृद्धि दर्ज की गई। स्पोन्ज आयरन को डायरेक्ट-रिड्यूस्ड आयरन भी कहा जाता है। यह सभी आंकड़े दर्शाते हैं कि इस्पात उद्योग के प्रमुख क्षेत्रों में व्यापक और संतुलित विकास हो रहा है।

इस्पात श्रेणियों का उत्पादन

श्रेणियाँ

अप्रैल - सितंबर

2024-25 (मिलियन टन)

अप्रैल - सितंबर

2025-26 (मिलियन टन)

वृद्धि (%)

हॉट मेटल

43.99

47.21

7.3

पिग आयरन

4.04

4.31

6.6

 

 

स्पोन्ज आयरन

27.00

29.46

9.1

 

 

फिनिश्ड स्टील

फिनिश्ड स्टील (तैयार इस्पात), आधुनिक बुनियादी ढांचे और विनिर्माण के लिए एक आधारभूत सामग्री है। इसका उत्पादन वित्त वर्ष 2025-26 में 160.9 मिलियन टन रहा। यह पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 9.7% की वृद्धि को दर्शाता है। उत्पादन में बढ़ोतरी के साथ-साथ फिनिश्ड स्टील की खपत में भी मजबूत बनी रही। यह 163.7 मिलियन टन तक पहुंच गई, जो 7.6% की वृद्धि है। ये आंकड़े देश में लगातार बढ़ती घरेलू मांग और इस्पात क्षेत्र की मजबूती को उजागर करते हैं।

 

फिनिश्ड (मिलियन टन)

 

वित्तीय वर्ष 2022-23

वित्तीय वर्ष  2023-24

वित्तीय वर्ष 2024-25

वित्तीय वर्ष  2025-26

उत्पादन 

123.2

139.2

146.7

160.9

खपत

119.9

136.3

152.1

163.7

 

 इस्पात व्यापार की गाथा

 

भारत के इस्पात व्यापार का प्रदर्शन एक मजबूत और तेजी से प्रतिस्पर्धी होते घरेलू उद्योग की कहानी कहता है। मार्च 2026 में स्टील के निर्यात में साल-दर-साल आधार पर 29.1% की वृद्धि हुई, जबकि आयात में 9.5% की उल्लेखनीय कमी आई। यह संकेत देता है कि देश की घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ी है और विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता कम हुई है। यह सकारात्मक बदलाव इस बात का प्रमाण है कि भारत एक विश्वसनीय वैश्विक इस्पात आपूर्तिकर्ता के रूप में उभर रहा है। साथ ही, यह देश की बढ़ती घरेलू मांग को भी पूरा करने की बेहतर क्षमता को भी दर्शाता है।

 

भारत ने आयरन और स्टील अलॉय (मिश्रधातु) के प्रमुख निर्यातक के रूप में भी अपनी मजबूत पहचान स्थापित की है। स्टील और उससे जुड़े उत्पादों के बढ़ते निर्यात से विदेशी मुद्रा आय में वृद्धि होती है, जिससे देश के व्यापार संतुलन में सुधार होता है। यह आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत एक सशक्त और स्वावलंबी औद्योगिक तंत्र के लक्ष्य को भी समर्थन देता है।

इसके अलावा, वित्त वर्ष 2025–26 में फिनिश्ड स्टील के निर्यात में पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 35.80% की वृद्धि दर्ज की गई। वहीं, इसी अवधि में इसके आयात में 46.47% की भारी कमी आई।

मार्च 2026 में भारत के फिनिश्ड स्टील ने वियतनाम, बेल्जियम और ताइवान जैसे देशों में प्रमुखता से निर्यात किया है। इन तीन देशों को होने वाला निर्यात भारत के कुल फिनिश्ड स्टील निर्यात का 50% से अधिक हिस्सा है।

 सरकार द्वारा किए गए सुधार इस्पात क्षेत्र को दे रहे संबल

 

सरकार ने कच्चे माल की उपलब्धता मजबूत करने, वैश्विक बाजारों तक पहुंच सुनिश्चित करने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इन उपायों से उत्पादन लागत में कमी आई है, इस्पात उद्योग को बढ़ावा देने को गति मिली है, और एमएसएमई तथा छोटे इस्पात उत्पादकों को भी मजबूत समर्थन मिला है।

इस्पात एक डी-रेगुलेटेड (नियंत्रण-मुक्त) क्षेत्र है, जिसमें सरकार सीधे हस्तक्षेप करने के बजाय इसके विकास और विस्तार के लिए अनुकूल नीतिगत ढांचा तैयार करके सहयोगी भूमिका निभाती है।

 

स्पेशलिटी स्टील के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पी अल आई) योजना

प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पी अल आई) योजना सरकार स्वर शुरू की गई एक महत्वपूर्ण पहल है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत की विनिर्माण क्षमता को मजबूत करना है। इस योजना के अंतर्गत पात्र कंपनियों को उनकी बढ़ी हुई बिक्री (इन्क्रीमेंटल सेल्स) के आधार पर वित्तीय प्रोत्साहन (इंसेंटिव) दिया जाता है।

स्पेशलिटी स्टील, इस्पात उत्पादन प्रक्रिया का एक डाउनस्ट्रीम और वैल्यू-एडेड (मूल्य वर्धित) उत्पाद है। यह पीएलआई (पी अल आई) योजना के अंतर्गत शामिल 14 प्रमुख क्षेत्रों में से एक है, जिसका उद्देश्य उच्च मूल्य वाले इस्पात के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना है। यह योजना वर्ष 2021 में ₹6,322 करोड़ के वित्तीय प्रावधान के साथ शुरू की गई थी। इसका लक्ष्य व्यापार संतुलन में सुधार करना और निर्यात से होने वाली आय को बढ़ाना है। साथ ही, यह भारतीय इस्पात उद्योग को नई तकनीकें अपनाने और वैल्यू चेन में आगे बढ़ने में मदद करती है।

इस योजना के अंतर्गत, जो कंपनियां निर्धारित निवेश और उत्पादन लक्ष्यों को पूरा करती हैं, उन्हें 5 वर्षों (वित्त वर्ष 2024-25 से 2030-31) तक प्रोत्साहन (इंसेंटिव) दिया जाता है। अनुमान है कि इस योजना के अंतर्गत निर्यात की मात्रा तीन गुना से अधिक बढ़ेगी, जबकि 2023-24 से 2029-30 के बीच आयात में लगभग चार गुना तक कमी आने की उम्मीद है।

 

इस्पात मंत्रालय की पीएलआई 1.0 और पीएलआई 1.1 योजनाओं के अंतर्गत 44,106 करोड़ रुपये के निवेश की प्रतिबद्धता है। इन योजनाओं के माध्यम से 33,460 लोगों के लिए प्रत्यक्ष रोजगार सुनिश्चित होने की संभावना है, साथ ही 14,340 हजार टन इंक्रीमेंटल उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।

पीएलआई योजना की प्रमुख उपलब्धियां इस प्रकार हैं:

  • ₹23,022 करोड़ का निवेश साकार हुआ
  • 2.4 मिलियन टन स्पेशलिटी स्टील का उत्पादन हुआ
  • 13,264 प्रत्यक्ष रोजगार (डायरेक्ट जॉब्स) सृजित हुए
  • ₹236 करोड़ की प्रोत्साहन राशि (इंसेंटिव) वितरित की गई
  • 24 मिलियन टन स्पेशलिटी स्टील उत्पादन क्षमता विकसित की गई
  • ₹6,000 करोड़ का आयात प्रतिस्थापन हासिल किया गया

पीएलआई योजना का तीसरा चरण (पी एल आई 1.2) की घोषणा नवंबर 2025 में की गई थी, जो उन्नत और उभरते हुए इस्पात उत्पादों में निवेश को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। पी एल आई 1.2 के अंतर्गत 4 उत्पाद श्रेणियों में कुल 85 आवेदन शामिल किए गए हैं, जो इस प्रकार हैं:

  • रणनीतिक क्षेत्रों के लिए स्टील ग्रेड
  • वाणिज्यिक ग्रेडश्रेणी 1
  • वाणिज्यिक ग्रेडश्रेणी 2
  • कोटेड और वायर उत्पाद

इस योजना के अंतर्गत प्रोत्साहन (इंसेंटिव) की दरें 4% से 15% तक रखी गई हैं, जो वित्त वर्ष 2025–26 से पांच वर्षों की अवधि के लिए लागू हैं। हालांकि, प्रोत्साहन राशि का वितरण वित्त वर्ष 2026–27 से शुरू होगा।

हाल ही में, सरकार ने पीएलआई 1.2 के तहत 55 कंपनियों की 85 स्पेशलिटी स्टील परियोजनाओं के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। इन परियोजनाओं में लगभग ₹11,887 करोड़ का निवेश शामिल है और करीब 8.29 मिलियन टन की अतिरिक्त उत्पादन क्षमता जोड़ने की प्रतिबद्धता जताई गई है।

 

घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन

सरकार घरेलू इस्पात उत्पादन को बढ़ावा देने और क्षेत्र की दीर्घकालिक मजबूती सुनिश्चित करने के लिए नीतिगत दृष्टिकोण अपनाती है।

घरेलू रूप से निर्मित आयरन एवं स्टील उत्पाद (डी एम आई एवं एस पी) नीति: इस नीति को मई 2025 में संशोधित किया गया है। इसके अंतर्गत सरकारी खरीद में घरेलू आयरन और स्टील उत्पादों को प्राथमिकता दी जाती है। इसमें अधिसूचित आयरन और स्टील उत्पादों को शामिल किया गया है तथा न्यूनतम घरेलू सामग्री की अपरिहार्यताएं निर्धारित की गई हैं। इसके अतिरिक्त, इसमें ऐसे पूंजीगत वस्तुओं की सूची भी दी गई है, जिन्हें आयरन और स्टील उत्पादों के निर्माण के लिए आयात किया जा सकता है। साथ ही, यह स्वदेशी तकनीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करती है और आयात पर निर्भरता कम करने के प्रावधान भी शामिल करती है। निरंतर निगरानी और फीडबैक तंत्र के माध्यम से पारदर्शिता, जवाबदेही और नीति के दीर्घकालिक स्थायित्व को सुनिश्चित किया जाता है।

घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिएमेल्ट एंड पोर नियमलागू किया गया। इसके तहत यह सुनिश्चित किया जाता है कि स्टील का पूरा निर्माण भारत में ही होयानी कच्चे इस्पात के प्रारंभिक मेल्टिंग (गलाने) और पोरिंग (ढलाई) से लेकर अंतिम उत्पाद तक। यह नियम स्वदेशी तकनीकों को बढ़ावा देता है और आयात पर निर्भरता को कम करता है, जिससे देश की आत्मनिर्भरता और अधिक मजबूत होती है।

राष्ट्रीय इस्पात नीति: राष्ट्रीय इस्पात नीति 2017 का लक्ष्य वर्ष 2030–31 तक कच्चे इस्पात की क्षमता को 300 मिलियन टन प्रति वर्ष और उत्पादन को 255 मिलियन टन प्रति वर्ष तक बढ़ाना है। इसके अलावा, प्रति व्यक्ति फिनिश्ड स्टील की खपत को वर्तमान 61 किलोग्राम से बढ़ाकर 158 किलोग्राम करने का लक्ष्य रखा गया है। यह नीति उच्च गुणवत्ता वाले ऑटोमोबाइल, विद्युत (इलेक्ट्रिकल) और विशेष इस्पात (स्पेशलिटी स्टील) की घरेलू मांग को पूरा करने पर भी केंद्रित है। साथ ही, वर्ष 2030–31 तक कोकिंग कोल के आयात पर निर्भरता को 85% से घटाकर 65% करने का लक्ष्य भी निर्धारित किया गया है।

भारत ने कच्चे इस्पात का उत्पादन वित्त वर्ष 2025-26 में पहले ही 168 मिलियन टन प्रति वर्ष हासिल कर लिया है। इसका अर्थ है कि राष्ट्रीय इस्पात नीति 2017 के अंतर्गत निर्धारित कच्चे इस्पात उत्पादन क्षमता का लगभग 66% लक्ष्य पूरा हो चुका है। यह दीर्घकालिक उत्पादन क्षमता लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति को दर्शाता है।

 

बुनियादी परियोजनाएं

वित्त वर्ष 2023-24 में निर्माण और बुनियादी ढांचा क्षेत्र इस्पात की मांग के प्रमुख चालक बने रहे, जिनका कुल खपत में लगभग 68% योगदान रहा। वहीं, इंजीनियरिंग और पैकेजिंग क्षेत्रों का योगदान करीब 22% रहा, जबकि ऑटोमोबाइल उद्योग का हिस्सा लगभग 9% रहा।

क्या आप जानते हैं?

देश के प्रमुख स्टील ज़ोन निम्न स्थानों पर स्थित हैं: कालिंगानगर, अंगुल, राउरकेला, झारसुगुड़ा, नगरनार, भिलाई, रायपुर, जमशेदपुर, बोकारो, दुर्गापुर, कोलकाता, विशाखापट्टनम

स्टील ज़ोन की पहचान: सरकार देश के 12 प्रमुख स्टील ज़ोन में महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक्स और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ा रही है। इन क्षेत्रों में रेल, सड़क और बंदरगाह (पोर्ट) से जुड़े विस्तार कार्यों को प्राथमिकता दी जा रही है, ताकि इस्पात उत्पादन और वितरण के क्षेत्र में आने वाली बाधाओं को दूर किया जा सके और विश्व-स्तरीय मल्टीमोडल कनेक्टिविटी विकसित की जा सके। यह प्रयास इस्पात क्षेत्र की निरंतर वृद्धि और विकास को मजबूत आधार प्रदान करता है।

पीएम गतिशक्ति मास्टरप्लान (अक्टूबर, 2021): इस्पात मंत्रालय ने 2,100 से अधिक कार्यरत स्टील इकाइयों का जियोलोकेशन डेटा पीएम गतिशक्ति प्लेटफॉर्म पर अपलोड किया है। इसमें इन इकाइयों के उत्पाद और उनकी उत्पादन क्षमता से जुड़ी जानकारी भी शामिल है, ताकि इस्पात क्षेत्र में समन्वित (कोऑर्डिनेटेड) और डेटा-आधारित लॉजिस्टिक्स योजना को बेहतर बनाया जा सके।

आयात निर्भरता का न्यूनीकरण

सरकार ने इस्पात क्षेत्र में कच्चे माल की सुरक्षा मजबूत करने, गुणवत्ता मानकों में सुधार करने और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।

  • केंद्रीय बजट 2024–25 में फेरो निकेल और मोलिब्डेनम अयस्क पर बेसिक सीमा शुल्क को शून्य कर दिया गया है। ये दोनों इस्पात उद्योग के लिए महत्वपूर्ण कच्चे माल हैं।
  • इसके अलावा, घरेलू स्क्रैप की उपलब्धता बढ़ाने के लिए स्टील स्क्रैप रीसाइक्लिंग नीति (2019) लागू की गई है। इसका उद्देश्य उच्च गुणवत्ता वाले फेरस स्क्रैप का उत्पादन करना है, जिससे बेहतर गुणवत्ता का स्टील तैयार किया जा सके और आयात पर निर्भरता कम हो।
  • स्टील गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (क्यू सी ): स्टील क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर्स यह सुनिश्चित करते हैं कि केवल बीआईएस मानकों के अनुरूप इस्पात ही उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराया जाए। ये आदेश घरेलू बाजार और आयात दोनों में निम्न-स्तरीय या दोषपूर्ण स्टील उत्पादों पर रोक लगाते हैं, जिससे उद्योग और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा होती है। 31 दिसंबर 2025 तक, सरकार ने 723 उत्पादों पर 143 क्यू सी लागू किए हैं। इससे गुणवत्ता मानकों का पालन सुनिश्चित होता है, बाजार में असंतुलन से बचाव होता है और उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं की सुरक्षा होती है।
  • कोयला मंत्रालय, वर्ष 2024 में शुरू किए गए मिशन कोकिंग कोल को आगे बढ़ा रहा है। इसका उद्देश्य घरेलू कोकिंग कोल उत्पादन को तेजी से बढ़ाना और इसके आयात को कम करना है। यह पहल इस महत्वपूर्ण कच्चे माल में दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता को मजबूत करेगी। इस मिशन का लक्ष्य वित्त वर्ष 2029-30 तक घरेलू कच्चे कोकिंग कोल का उत्पादन बढ़ाकर 140 मिलियन टन तक पहुंचाना है।
  • सरकार ने कुछ चुनिंदा नॉन-अलॉय और अलॉय स्टील फ्लैट उत्पादों पर अप्रैल 2025 में 12% सेफगार्ड ड्यूटी लागू की। इसका उद्देश्य आयात में अचानक बढ़ोतरी से घरेलू निर्माताओं की रक्षा करना और बाजार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा बनाए रखना है।
  • इसके अलावा, नवंबर 2025 में सरल सिम्स (एस आर अल-एस आई एम एस) प्रणाली शुरू की गई, जो स्टील इम्पोर्ट मॉनिटरिंग सिस्टम (एस आई एम एस) के अंतर्गत एक सरल पंजीकरण प्रक्रिया प्रदान करती है। यह प्रणाली आयात की निगरानी को मजबूत बनाती है और अधिक प्रभावी निरीक्षण (ओवरसाइट) सुनिश्चित करती है, जिससे घरेलू इस्पात उद्योग की चिंताओं का समाधान होता है।

अंतर्राष्ट्रीय बाजारों तक पहुँच

सरकार द्वारा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ डी आई) नीतियों में किए गए सुधारों ने एफडीआई प्रवाह बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसके परिणामस्वरूप 2014 से 2024 के बीच एफडीआई प्रवाह में 2004–2014 की तुलना में 120% की वृद्धि दर्ज की गई है। इसी अवधि में विनिर्माण क्षेत्र में एफडीआई इक्विटी निवेश में भी 69% की बढ़ोतरी हुई है।

  • सरकार ने ऑटोमैटिक रूट के तहत 100% एफडीआई की अनुमति देकर इस क्षेत्र को मजबूत समर्थन दिया है। इसके परिणामस्वरूप अप्रैल 2000 से जून 2025 के बीच धातुकर्म (मेटलर्जिकल) उद्योगों में ₹1,60,000 करोड़ (18.67 बिलियन अमरीकी डॉलर) का निवेश आकर्षित हुआ है।
  • इसके अलावा, यूनाइटेड किंगडम, यूरोपीय संघ ( यू) और अन्य देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) इस क्षेत्र के लिए वैश्विक बाजारों तक पहुंच को और विस्तारित करने में सहायक होंगे।

 

 इस्पात उद्योग में डी-कार्बनाईजेशन: आगे का मार्ग

डीकार्बोनाइजेशन के तहत कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और इसके समान अन्य गैसों के उत्सर्जन को कम किया जाता है, ताकि ग्रीनहाउस गैसों का कुल उत्सर्जन घटाया जा सके। पेरिस समझौते के अनुसार, वैश्विक तापमान मानकों को बनाए रखने के लिए परिवहन और बिजली उत्पादन से होने वाले CO₂ उत्सर्जन को कम करना आवश्यक है।

Commitment of Ministry of Steel to Decarbonise the Steel Sector in India

In the short term (FY 2030), the focus is on reduction of carbon emissions in the steel industry. This will be achieved through promotion of energy and resource efficiency, greater use of renewable energy etc.

For the medium term (2030-2047), Green Hydrogen based steel making and Carbon Capture, Utilisation and Storage are the focus areas.

For the long term (2047-2070), disruptive alternative technological innovations can help achieve the transition to net-zero.

 

 

ग्रीन स्टील वह इस्पात है जिसका निर्माण जीवाश्म ईंधनों के उपयोग के बिना किया जाता है। तथाकथित ग्रीन हाइड्रोजनएक ऐसा समाधान है जो इस्पात उद्योग के कार्बन फुटप्रिंट को कम करने में सहायक हो सकता है।

भारत के इस्पात उद्योग का भविष्य कम कार्बन और सतत (सस्टेनेबल) उत्पादन की दिशा में मजबूत प्रयासों से आकार ले रहा है। वर्ष 2024 में, भारत ग्रीन स्टील टैक्सोनॉमी लागू करने वाला पहला देश बना। इसमें स्टील कीहरितताको प्रतिशत के आधार पर परिभाषित किया गया है। ग्रीन स्टील वह माना जाता है, जिसे ऐसे इस्पात संयंत्रों में बनाया गया हो जहाँ प्रति टन फिनिश्ड स्टील पर CO₂ समतुल्य उत्सर्जन 2.2 टन से कम हो। 31 मार्च 2026 तक, 89 इस्पात इकाइयों को ग्रीन स्टील प्रमाणन दिया जा चुका है, जो कुल 12.34 मिलियन टन उत्पादन को कवर करता है।

डीकार्बोनाइजेशन के बड़े लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में कुछ निर्धारित लक्ष्य इस प्रकार हैं:

मानक और खरीद: ग्रीन स्टील के लिए मानक निर्धारित करना, इस्पात संयंत्रों में उत्सर्जन की निगरानी करना और हरित सार्वजनिक खरीद (ग्रीन पब्लिक प्रोक्योरमेंट) को अपनाना।

प्रौद्योगिकी और दक्षता: उपलब्ध सर्वोत्तम तकनीकों का उपयोग करना, पेलेट के उपयोग को बढ़ाना और स्क्रैप के अधिक उपयोग के माध्यम से सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देना।

स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव: 2030 तक 45% नवीकरणीय ऊर्जा हिस्सेदारी हासिल करना, नवीकरणीय ऊर्जा के लिए एग्रीगेटर मॉडल विकसित करना, प्राकृतिक गैस की उपलब्धता बढ़ाना और बायोचार के उपयोग को बढ़ावा देना।

ग्रीन हाइड्रोजन एवं कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (सी सी यू एस): डीआरआई (डाइरेक्ट रीड्यूस्ड आयरन) और ब्लास्ट फर्नेस (बी एफ) प्रक्रियाओं में ग्रीन हाइड्रोजन के उपयोग के लिए पायलट परियोजनाओं का प्रदर्शन करना तथा वर्ष 2030 तक सी सी यू के पायलट प्लांट स्थापित करना।

अनुसंधान एवं नवाचार: राष्ट्रीय स्तर पर इस्पात डीकार्बोनाइजेशन के लिए अनुसंधान एवं विकास (आर एंड डी) रोडमैप तैयार करना और प्राथमिकता वाले परियोजनाओं की शुरुआत करना।

वित्त और वैश्विक सहयोग: वित्तीय संसाधनों तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित करना, नई तकनीकों को अपनाने में सहयोग बढ़ाना और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी (कोलैबोरेशन) को मजबूत करना।

महत्वपूर्ण परिवर्तन: कम-कार्बन अर्थव्यवस्था की ओर बदलाव के लिए इस्पात क्षेत्र के कार्यबल को नया कौशल (अपस्किल) और पुनः कौशल (रीस्किल) प्रदान करना।

 

लो - कार्बन स्टील के लिए सरकारी उपाय         

लो - कार्बन स्टील उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने कई महत्वपूर्ण पहलें की हैं।

  • केंद्रीय बजट 2026–27 में स्टील और अन्य उद्योगों के लिए कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (सी सी यू एस) तकनीकों को बढ़ावा देने के लिए 5 वर्षों में ₹20,000 करोड़ के प्रावधान का प्रस्ताव रखा गया है।

कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (सी सी यू एस) ऐसी तकनीकों का समूह है, जिनका उद्देश्य बड़े और स्थिर स्रोतों से निकलने वाले CO₂ उत्सर्जन का पता लगाना (कैप्चर करना) है। इसमें जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली संयंत्रों और अन्य औद्योगिक इकाइयों को शामिल किया जाता है।

इसके अंतर्गत कैप्चर किए गए CO₂ को परिवहन भी किया जाता है, जो आमतौर पर पाइपलाइन के माध्यम से होता है, और कुछ मामलों में जहाज, रेल या सड़क मार्ग से भी ले जाया जाता है। इस CO₂ को निर्धारित स्थानों तक पहुंचाया जाता है, जहां इसका विभिन्न उद्देश्यों में उपयोगों में किया जा सकता है। साथ ही, इसे भू-वैज्ञानिक संरचनाओं और समाप्त हो चुके तेल एवं गैस क्षेत्रों में इंजेक्ट करके स्थायी रूप से संग्रहित (स्टोर) किया जाता है। इस प्रक्रिया के माध्यम से CO₂ को लंबे समय तक सुरक्षित रूप से बंद (ट्रैप) किया जा सकता है, जिससे पर्यावरण पर इसके दुष्प्रभाव कम होते हैं।

 

  • स्टील स्क्रैप रीसाइक्लिंग नीति, 2019 घरेलू स्क्रैप की उपलब्धता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। भारत में कुल स्टील स्क्रैप की खपत लगभग 30 मिलियन टन है, जिसमें से करीब 5 मिलियन टन आयात किया जाता है। इसलिए, ग्रीन स्टील की दिशा में आगे बढ़ने के लिए उच्च गुणवत्ता वाले घरेलू स्क्रैप की उपलब्धता अत्यंत आवश्यक है। स्क्रैप के बढ़ते उपयोग से ऊर्जा की खपत में कमी आती है, पानी की खपत लगभग 40% तक घटती है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 58% की कमी होती है। इस प्रकार, यह नीति भारत के डीकार्बोनाइजेशन प्रयासों को और अधिक मजबूत बनाती है (जनवरी, 2025)

फरवरी 2025 में इस्पात मंत्रालय ने इस्पात क्षेत्र के डीकार्बोनाइजेशन (कार्बन उत्सर्जन में कमी) के लिए पूरे मूल्य श्रृंखला में उपाय सुझाने हेतु 14 टास्क फोर्स का गठन किया।

  • राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के अंतर्गत, इस्पात मंत्रालय ने स्टील क्षेत्र में हाइड्रोजन के उपयोग के लिए 4 पायलट परियोजनाओं को मंजूरी दी है। ये परियोजनाएं मुख्य रूप से 3 क्षेत्रों में लागू की जा रही हैं, जिनमें शामिल हैं- वर्टिकल शाफ्ट आधारित डी आर आई (डाइरेक्ट रीड्यूस्ड आयरन) में आंशिक हाइड्रोजन इंजेक्शन के माध्यम से प्राकृतिक गैस का विकल्प तैयार करना। मौजूदा ब्लास्ट फर्नेस में हाइड्रोजन का उपयोग करके कोयला और कोक की खपत को कम करना। ये पहलें इस्पात उद्योग को अधिक स्वच्छ और पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
  • मोटर वाहन (पंजीकरण और वाहन स्क्रैपिंग सुविधा के कार्य) नियम, 2021 जैसे उपाय उत्सर्जन में कमी लाने में सहायक हैं। इसके अलावा, राष्ट्रीय सौर मिशन (2010) और परफॉर्म, अचीव एंड ट्रेड (पी टी) ऊर्जा दक्षता योजना (2012) ऊर्जा दक्षता में सुधार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • इस्पात क्षेत्र ने आधुनिकीकरण और विस्तार परियोजनाओं में वैश्विक स्तर पर उपलब्ध सर्वोत्तम तकनीकों को अपनाया है।
  • इसके अलावा, जापान की न्यू एनर्जी एंड इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (एन डी ) के ऊर्जा दक्षता सुधार से जुड़े मॉडल प्रोजेक्ट्स को भी स्टील संयंत्रों में लागू किया गया है।

ये सभी उपाय इस्पात क्षेत्र के डी-कार्बोनाइजेशन को मजबूत करते हैं और वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन लक्ष्य हासिल करने के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं। भविष्य के लिए तैयार (फ्यूचर-रेडी) इस्पात क्षेत्र के अपने दृष्टिकोण के अनुरूप, सरकार ने उन्नत तकनीकों को शामिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है।

स्टील पवेलियन में एआई: यह एक अपनी तरह का पहला सहयोगात्मक मंच है, जिसे समस्या से समाधानमार्केटप्लेस के रूप में डिजाइन किया गया है। यह मंच उद्योग की वास्तविक समय (रियल-टाइम) चुनौतियों को संकलित करता है और उन्हें एआई समाधान प्रदाताओं, स्टार्टअप्स, तकनीकी कंपनियों और शोध संस्थानों से जोड़ता है। इससे व्यावहारिक और बड़े पैमाने पर लागू किए जा सकने वाले समाधान विकसित करने में मदद मिलती है।

इस पहल के माध्यम से इस्पात उत्पादकों और खनन कंपनियों के सामने आने वाली विभिन्न चुनौतियों - संचालन (ऑपरेशनल), लॉजिस्टिक्स, सुरक्षा, गुणवत्ता नियंत्रण, स्थिरता (सस्टेनेबिलिटी) और विपणन आदि को सामने लाती है। यह पहल इस बात को दर्शाती है कि अब केवल धीरे-धीरे डिजिटलीकरण से आगे बढ़कर पूरे इस्पात मूल्य श्रृंखला में मिशन मोड में एआई को अपनाया जा रहा है। इसमें खनन, लॉजिस्टिक्स, उत्पादन, गुणवत्ता आश्वासन, विपणन और कॉर्पोरेट गवर्नेंस जैसे सभी प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं।

 

 इस्पात क्षेत्र आउट्लुक

 

भारत का इस्पात (स्टील) क्षेत्र तेजी से अपनी क्षमता, प्रतिस्पर्धात्मकता और आत्मनिर्भरता को मजबूत कर रहा है। कच्चे माल की सुरक्षा, लॉजिस्टिक्स, गुणवत्ता नियंत्रण और पीएलआई प्रोत्साहनों से जुड़े सरकारी सुधार उत्पादन बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। निर्यात में वृद्धि और स्पेशलिटी स्टील के बढ़ते उत्पादन से भारत की वैश्विक स्थिति और मजबूत हो रही है। साथ ही, ग्रीन स्टील और डीकार्बोनाइजेशन के स्पष्ट मार्ग के साथ यह उद्योग दीर्घकालिक स्थिरता (सस्टेनेबिलिटी) लक्ष्यों के अनुरूप आगे बढ़ रहा है। इन सभी प्रयासों के माध्यम से एक मजबूत, लचीला और भविष्य के लिए तैयार इस्पात इकोसिस्टम का निर्माण हो रहा है, जो आने वाले वर्षों में भारत के विकास को गति देगा।

 

संदर्भ

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कैबिनेट

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कोयला मंत्रालय

https://www.pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=2124513&reg=3&lang=2

 

नीति आयोग

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विश्व आर्थिक मंच

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पी आई बी मुख्यालय

https://www.pib.gov.in/PressNoteDetails.aspx?NoteId=155082&ModuleId=3&reg=3&lang=2

 

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पी आई बी अनुसंधा

 

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पीके / केसी/ डीके

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